ऐतिहासिक स्रोत

इतिहास, अतीत को जानने का एक साधन है। किसी समाज या राष्ट्र के इतिहास के अध्ययन के द्वारा हम उस समाज या राष्ट्र के अतीत के बारे में जान सकते हैं। अतीत का तात्पर्य यह है कि उस राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता से है। किसी भी देश अथवा राष्ट्र की अस्मिता की पहचान उसकी संस्कृति और सभ्यता से की जाती है। प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन से हम यह जान सकते हैं कि मानव समुदायों ने हमारे देश में प्राचीन संस्कृति का विकास कब, कहाँ और कैसे किया था ?


भारत का नामकरण


अपने देश भारत के लिए हम प्रायः इण्डिया अथवा भारत जैसे नामों का प्रयोग करते हैं। इण्डिया शब्द ‘इण्डस’ से निकला है, जिसे संस्कृत में सिन्धु भी कहा जाता है। भारतवर्ष नाम सर्वप्रथम पाणिनी की पुस्तक अष्टाध्यायी में उल्लेखित हैखारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख में भी भारतवर्ष का उल्लेख मिलता है। भारत देश का यह नामकरण ऋग्वैदिक काल के प्रमुख जन ‘भरत’ के नाम पर किया गया था।
एक अन्य मान्यता के अनुसार भारत देश का यह नाम प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर किया गया होगा। ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार , इस देश का नामकरण कुरु वंश के प्रतापी सम्राट दुष्यन्त एवं शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर किया गया था। आर्यों का निवास स्थल होने के कारण भारत देश का नामकरण आर्यावर्त के रूप में हुआ। भारत को जम्बूद्वीप का एक भाग भी माना जाता है।


प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के स्रोत


प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के स्रोतों को तीन शीर्षकों के अन्तर्गत रखा जा सकता है |
(i) पुरातात्विक स्रोत
(ii) साहित्यिक स्रोत (iii) विदेशी विवरण

(i) पुरातात्विक स्रोत


पुरातात्विक स्रोत (Archaeological Sources), प्राचीन भारत को जानने का सर्वाधिक सक्षम एवं विश्वसनीय साधन के रूप में माना जाता है। इसके अन्तर्गत मुख्यतः अभिलेख, सिक्के, स्मारक, भवन, मूर्तियाँ, चित्रकला आदि आते हैं। पुरातात्विक वस्तुओं का अध्ययन करने वाले व्यक्ति को पुरातत्वविद् (Archaeologist) कहलाते हैं।


अभिलेख


पत्थरों, स्तम्भों, धातु की पट्टियों और मृद्भाण्डों पर उत्कीर्ण प्राचीन विवरण को अभिलेख कहते हैं। अभिलेखों (Inscriptions) के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (Epigraphy) कहते हैं, और इनकी तथा दूसरे पुराने दस्तावेजों की प्राचीन लिपि के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र (Palaeography) भी कहा जाता है।


अभिलेख मुख्यतः मुहरों, स्तूपों, प्रस्तर स्तम्भों, चट्टानों, ताम्रपत्रों, मूर्तियों, मन्दिर की दीवारों और ईंटों पर प्राप्त होते हैं। अभिलेखों की भाषा प्राकृत, पाली, संस्कृत तथा अन्य दक्षिण भाषाएँ हैं। कुछ अभिलेख द्विभाषी तथा विदेशी भाषा में भी उत्कीर्ण प्राप्त होते हैं ।


सबसे पुराने अभिलेख सिंधु घाटी के हड़प्पा सभ्यता की मुहरों पर मिलते हैं, जो कि लगभग 2500 ई. पू. आस पास के हैं, लेकिन इन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। भारत से बाहर सर्वाधिक प्राचीनतम अभिलेख पश्चिम एशिया जो कि एशिया माइनर के बोंगजकोई नामक स्थान से लगभग 1400 ई. पू. के मिले हैं, जिसमें इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य (अश्विनी कुमार) नामक वैदिक देवताओं के नाम भी मिलते हैं। ईरान से प्राप्त नक्श-ए-रुस्तम अभिलेख से प्राचीन भारत के पश्चिम एशिया से सम्बन्धों की भी जानकारी मिलती है।


ईरान से प्राप्त कस्साइट अभिलेख तथा सीरिया से प्राप्त मितन्नी अभिलेख में आर्य नामों का उल्लेख प्राप्त होता है। सर्वप्रथम 1837 ई. में अंग्रेज जेम्स प्रिन्सेप को ब्राह्मी लिपि में लिखित मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सफलता मिली।

सम्राट अशोक के अभिलेखों के अलावा प्राचीन भारत के अन्य प्रमुख अभिलेख हैं, जैसे – खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख , शकक्षत्रप रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख, सातवाहन नरेश गौतमी पुत्र शातकर्णी का नासिक गुहालेख, समुद्रगुप्त का प्रयाग स्तम्भ लेख, स्कन्दगुप्त का भीतरी तथा जूनागढ़ अभिलेख, यशोवर्मन का मन्दसौर अभिलेख, पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख, प्रतिहार शासक भोज का ग्वालियर अभिलेख, विजयसेन का देवपाड़ा अभिलेख इत्यादि है । आरम्भिक अभिलेख प्राकृत भाषा में थे।


अभिलेखों में संस्कृत भाषा का प्रयोग ईसा की दूसरी सदी से मिलता है। शक शासक रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख (150 ई.) संस्कृत में लिखा पहला अभिलेख प्राप्त होता है।


सिक्के


सिक्कों (Coins) के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (Numismatics) भी कहा जाता है। प्राचीनतम सिक्के मुख्यतः सोना, चाँदी, ताँबा, काँसा, सीसा और पोटिन के मिलते हैं। भारत के प्राचीनतम सिक्कों पर केवल चिह्न उत्कीर्ण हैं, कोई लेख नहीं मिलता है। ये सिक्के आहत सिक्के या पंचमार्क्स सिक्के कहलाते हैं, जो कि ईसा पूर्व पाँचवीं सदी के हैं


बाद के सिक्कों पर तिथियाँ, राजाओं एवं देवताओं के नाम अंकित होने लगते हैं। आहत सिक्कों की सबसे पुरानी निधियाँ मुख्य रूप से (होर्ड्स) पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा मगध से प्राप्त हुई हैं। सबसे पहले हिन्द-यवनों ने ही भारत में सिक्का निर्माण की ‘डाई विधि’ का प्रचलन कियासर्वप्रथम हिन्द-यूनानियों ने ही स्वर्ण मुद्राएँ जारी किया था ।
सर्वाधिक शुद्ध-स्वर्ण मुद्राएँ कुषाणों ने जारी किया था | तथा सबसे अधिक स्वर्ण मुद्राएँ गुप्तों ने जारी किया था। सबसे पहले सातवाहनों ने ही सीसे की मुद्रा जारी किया था


अन्य पुरातात्विक साधन


अभिलेखों एवं सिक्कों के अलावा प्राचीन महलों एवं मन्दिरों, स्मारकों, मूर्तियों, मृद्भाण्ड, चित्रकला आदि के आधार पर भी प्राचीन भारत के विविध पहलुओं की जानकारी प्राप्त होती है।


महलों एवं मन्दिरों तथा उनके अवशेषों की प्राप्ति वास्तुकला के विकास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है, साथ ही सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक अवस्था का भी आभास मिलता है।


स्मारकों को दो भागों में बाँटकर देखा जा सकता है—देशी तथा विदेशी। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, नालन्दा, हस्तिनापुर इत्यादि देशी स्मारक, कम्बोडिया का अंकोरवाट मन्दिर, जावा का बोरोबुदूर मन्दिर तथा बाली से प्राप्त मूर्तियाँ विदेशी स्मारक हैं। बोर्नियो के मकरान से प्राप्त प्रतिमाओं पर अंकित तिथियाँ कालक्रम स्थापना में विशिष्ट योगदान देती हैं।

मूर्तियाँ सांस्कृतिक तथा कला सम्बन्धी ऐतिहासिक स्रोत हैं, जिससे सामान्य जनता की धार्मिक प्रवृत्तियों तथा आस्था का लेखा-जोखा मिलता है। गान्धार कला एवं मथुरा कला मूर्तिकला की प्रमुख शैलियाँ थीं। सारनाथ, भरहुत, बोधगया एवं अमरावती मूर्तिकला के अन्य प्रमुख केन्द्र थे।

मृद्भाण्डों से भी कलात्मक प्रगति की जानकारी मिलती है। हड़प्पा काल के लाल मृद्भाण्ड, उत्तरवैदिक काल के चित्रित धूसर मृद्भाण्ड तथा मौर्य युग की पहचान उत्तरी काले पॉलिश वाले मृद्भाण्ड से की जाती है।

चित्रकला जीवन के विभिन्न पक्षों को स्पष्टता देने वाला प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत है, जिससे काल विशेष के जीवन की उन्नति तथा भावुकता का पता चलता है। प्राक्-ऐतिहासिक गुफाओं विशेषकर भीमबेटका (मध्य प्रदेश) का गुफा चित्र एक मुख्य पुरातात्विक स्रोत है, जिससे पूर्व ऐतिहासिक काल की सांस्कृतिक विविधता पर प्रकाश पड़ता है। अजन्ता तथा बाघ के उन्नत गुफा चित्रों से गुप्तकाल की उन्नत सांस्कृतिक दशा का पता चलता है

इतिहास और तिथियाँ

अंग्रेजी में बीसी (ई. पू.) का तात्पर्य ‘बिफोर क्राइस्ट‘ होता है। एडी (ई.), ‘एनो डौमिनी‘ नामक दो लैटिन शब्दों से बना है, जिसका तात्पर्य ईसा मसीह के जन्म के वर्ष से है। कभी-कभी एडी की जगह सीई तथा बीसी की जगह बीसीई का प्रयोग होता है। सीई अक्षरों का प्रयोग ‘कॉमन एरा’ तथा ‘बीसीई’ का प्रयोग ‘बिफोर कॉमन एरा’ के लिए होता है। कभी-कभी अंग्रेजी के ‘बीपी’ अक्षरों का प्रयोग होता है, जिसका तात्पर्य ‘बिफोर प्रेजेण्ट’ (वर्तमान से पहले) होता है।

(ii) साहित्यिक स्रोत

अतीत की पुस्तकें हाथ से लिखी होने के कारण पाण्डुलिपि कही जाती हैं। ये पाण्डुलिपियाँ प्रायः ताड़पत्रों अथवा भोज-पत्र पर लिखी मिलती हैं।प्राचीन भारतीय साहित्य को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

1. धार्मिक साहित्य

2. धर्मेत्तर साहित्य

1. धार्मिक साहित्य

धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत मुख्यतः ब्राह्मण साहित्य (हिन्दू धार्मिक साहित्य), बौद्ध साहित्य एवं जैन साहित्य शामिल किए जाते हैं।

ब्राह्मण साहित्य

वेदांग,इसके अन्तर्गत वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् सूत्र साहित्य, स्मृतियाँ, पुराण, रामायण तथा महाभारत आते हैं। ये ग्रन्थ प्राचीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। प्राचीनतम ब्राह्मण साहित्य ‘ऋग्वेद’ है।

वेद

भारत का सबसे प्राचीन धर्मग्रन्थ वेद है। वेदों की संख्या चार है-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद इन चारों वेदों को सम्मिलित रूप से संहिता कहा जाता है। ऋग्वेद को 1500-1000 ई. पू. के लगभग का तथा यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद को 1000-500 ई.पू.के लगभग का माना जाता है।ऋग्वेद में मुख्यतः देवताओं की स्तुतियाँ, यजुर्वेद में यज्ञों के नियम तथा विधि-विधानों का संकलन, सामवेद में यज्ञों के अवसर पर गाए जाने वाले मन्त्रों का संग्रह तथा अथर्ववेद में धर्म, औषधि प्रयोग, रोग निवारण, तन्त्र-मन्त्र, जादू-टोना जैसे अनेक विषयों का वर्णन है। सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है एवं सबसे अन्तिम वेद अथर्ववेद है।

ब्राह्मण ग्रन्थ

सभी वेदों के अलग-अलग ब्राह्मण ग्रन्थ हैं, जो गद्य में है और कर्मकाण्ड की पद्धति का उल्लेख करते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना ऋषियों द्वारा की गई है। यह वेदों की सरल तथा गद्यात्मक व्याख्या है। ऐतरेय, शतपथ आदि प्रमुख ब्राह्मण ग्रन्थ हैं।

आरण्यक

जंगलों में लिखे गए ग्रन्थों को आरण्यक कहा गया। आरण्यक ग्रन्थों की विषय-वस्तु आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चिन्तन है। इनकी रचना ब्राह्मण ग्रन्थों के बाद हुई है। आरण्यक ग्रन्थों को विभिन्न वेदों से जोड़ा गया है। अथर्ववेद का कोई आरण्यक ग्रन्थ नहीं है।

वेदांग

वेदों का अर्थ ठीक प्रकार से समझने के लिए वेदांगों की रचना हुई। वेदांगों की संख्या छः है। ये हैं-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष।

उपनिषद्,

ये वैदिक ग्रन्थों के अन्तिम भाग हैं, जिनमें अध्यात्म तथा दर्शन के गूढ़ रहस्यों का विवेचन हुआ है। वेदों का अन्तिम भाग होने के कारण, उपनिषदों को वेदान्त भी कहा जाता है। उपनिषदों की संख्या 108 है, जिनमें बृहदारण्यक, कठ, छान्दोग्य इत्यादि प्रमुख है

सूत्र साहित्य

सूत्रों में मनुष्यों के कर्त्तव्यों, वर्णाश्रम व्यवस्था एवं सामाजिक नियमों का उल्लेख किया गया है। सूत्रो संख्या तीन है-श्रोत सूत्र, गृह सूत्र एवं धर्म सूत्रा

स्मृतियाँ

स्मृतियों की रचना सूत्रों के पश्चात् हुई। इन्हें धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। मनुष्य के पूरे जीवन काल तथा स्मृतियों से मिलती है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य सम्बन्धित विभिन्न क्रियाकलापों की जानकारी इन स्मृति और एवं मेधातिथि गोविन्दराज तथा कुल्लूकभट्ट याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार विश्वरूप, विज्ञानेश्वर अपरार्क आदि है।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन काल में बंगाल के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज के प्रयासों से ‘मनुस्मृति’ का अंग्रेजी में अनुवाद द जेन्टू कोड (The Gentoo Code) नाम से किया गया।


महाकाव्य


रामायण पहली एवं दूसरी शताब्दी के दौरान संस्कृत भाषा में इसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी। इसमें मूलतः 6,000 श्लोक थे, जो कालान्तर में 12,000 और फिर 24,000 हो गए। इसे चतुर्विंशति सर्हस्री संहिता भी कहा गया है। यह महाकाव्य–बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड नामक सात काण्डों में बँटा हुआ है।


महाभारत ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में इसकी रचना महर्षि व्यास ने की थी। महाभारत में मूलतः 8,800 श्लोक थे, जिसे जयसंहिता कहा जाता है। श्लोकों की संख्या 24,000 होने पर यह भारत कहलाया। गुप्त काल में श्लोकों की संख्या एक लाख होने पर यह शतसहस्री संहिता या महाभारत कहलाया। महाभारत का प्रारम्भिक उल्लेख ‘आश्वलायन गृहसूत्र‘ में मिलता है। यह महाकाव्य 18 पर्वों-आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शान्ति, अनुशासन, अश्वमेध, आश्रमवासी, मौसल, महाप्रास्थानिक एवं स्वर्गारोहण में विभाजित है।


पुराण


प्राचीन आख्यानों से युक्त ग्रन्थ को पुराण कहते हैं। सम्भवतः पाँचवीं सदी ई. पू. से चौथी शताब्दी ई. तक पुराण अस्तित्व में आ चुके थे। पुराणों की कुल संख्या 18 है, जिनमें विष्णु, मत्स्य, वायु, ब्रह्माण्ड तथा भागवत पुराण सर्वाधिक ऐतिहासिक महत्त्व के हैं, क्योंकि इनमें राजाओं की वंशावलियाँ पाई जाती हैं। अठारह पुराणों में सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक मत्स्य पुराण है। इससे सातवाहन वंश की जानकारी मिलती है। विष्णु पुराण से मौर्य वंश तथा वायु पुराण से गुप्त वंश के विषय में जानकारी मिलती है।

  • मार्कण्डेय पुराण मुख्यतः देवी दुर्गा से सम्बन्धित है, जिसमें ‘दुर्गा सप्तशती’ नामक अंश शामिल है। अग्नि पुराण में तान्त्रिक पद्धति का उल्लेख मिलता है, इसमें गणेश पूजा का प्रथम बार उल्लेख मिलता है। अठारह पुराण निम्नलिखित हैं
  • ब्रह्मपद्म
  • विष्णु
  • शिव
  • भगवत
  • नारद
  • मार्कण्डेय
  • अग्नि
  • भविष्य
  • ब्रह्मवैवर्त
  • लिंग
  • वराह
  • स्कन्द
  • वामन
  • कूर्म
  • मत्स्य
  • गरुड़
  • ब्रह्माण्ड

रामायण, महाभारत एवं प्रमुख पुराणों का अन्तिम रूप से संकलन 400 ई. के आस-पास हुआ प्रतीत होता है। ऐतिहासिक कथाओं का सबसे अच्छा क्रमबद्ध विवरण पुराणों में मिलता है।

बौद्ध साहित्य


बौद्ध साहित्य के दो प्रमुख भाग हैं—जातक तथा पिटक। जातक कथाएँ बुद्ध के पूर्व जन्मों का कथानक वृत्तान्त हैं, जिनमें प्राचीन भारतीय समाज की प्रवृत्तियों का दिग्दर्शन होता है। जातक कथाएँ ईसा पूर्व पाँचवीं सदी से दूसरी सदी तक की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर बहुमूल्य प्रकाश डालती हैं।


सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक है, जिसकी रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के बाद हुई। त्रिपिटक की भाषा ‘पाली’ है। इनकी संख्या तीन है; ये हैं- सुत्तपिटक, विनयपिटक एवं अभिधम्मपिटक। त्रिपिटक में ईसा से पूर्व की शताब्दियों में भारत के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। सुत्तपिटक का विभाजन पाँच निकायों—दीघनिकाय, मज्झिम निकाय, संयुक्त निकाय, अंगुत्तर निकाय तथा खुद्दक निकाय में हुआ है। विनयपिटक में संघ से सम्बन्धित नियम हैं। इसके चार भाग हैं—सुत्तविभंगु, खंदक, पातिमोक्ख तथा परिवार पाठ। अभिधम्मपिटक में बुद्ध की शिक्षा का दार्शनिक विवेचन है। इस पिटक से सम्बन्धित सात ग्रन्थ हैं, जिनमें कथावस्तु सबसे महत्त्वपूर्ण है।

जैन साहित्य


प्राचीनतम जैन ग्रन्थ पूर्व कहे जाते हैं। इसमें महावीर द्वारा प्रचारित सिद्धान्त संगृहीत हैं। इसकी रचना प्राकृत भाषा में हुई है। जैन साहित्य में आगमों का महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसके अन्तर्गत 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण तथा 6 छंद सूत्रों को शामिल किया गया है। आगम ग्रन्थों की रचना सम्भवतः श्वेताम्बर सम्प्रदाय के आचार्यों द्वारा की गई है। जैन साहित्य में पुराणों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिन्हें चरित कहा जाता है।
ये प्राकृत, संस्कृत तथा अपभ्रंश तीनों भाषाओं में लिखे गए हैं। जैन ग्रन्थों का अन्तिम रूप से संकलन ईसा की छठी सदी में गुजरात के वल्लभी नगर में किया गया था। आचारांगसूत्र, भगवती सूत्र, परिशिष्टपर्वन, भद्रबाहुचरित, आवश्यक चूर्णि सूत्र आदि प्रमुख जैन ग्रन्थ हैं।

धर्मेत्तर साहित्य


धर्मेत्तर साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक एवं अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रन्थों तथा जीवनियों का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है।
पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ से, जो एक व्याकरण ग्रन्थ है, पाँचवीं शताब्दी ई. पू. के समाज का विशिष्ट वर्णन मिलता है।


कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ से मौर्य शासन के आदर्श और पद्धति का पता चलता है। विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षस’, सोमदेव के ‘कथासरितसागर’ और क्षेमेन्द्र की ‘वृहतकथामंजरी’ से मौर्य काल की कुछ घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है।


पतंजलि के ‘महाभाष्य’ और कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्र’ नामक नाटक से शुंगवंश के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।


कालिदास के ‘रघुवंशम्’ में समुद्रगुप्त की दिग्विजय तथा सोमदेव के ‘कथासरितसागर’ एवं क्षेमेन्द्र कृत ‘वृहतकथामंजरी’ में राजा विक्रमादित्य की कुछ परम्पराओं का उल्लेख मिलता है।


शूद्रक के ‘मृच्छकटिकम्’ तथा दण्डी के ‘दशकुमारचरित’ में गुप्तकालीन समाज का सुन्दर चित्रण मिलता है।


बाणभट्ट कृत ‘हर्षचरित’ में हर्ष की उपलब्धियों का, वाक्पति के ‘गौडवाहो’ में कन्नौज के शासक यशोवर्मन और विल्हण के ‘विक्रमांकदेवचरित’ में कल्याणी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।


सन्ध्याकरनन्दी के ‘रामचरित’ में पाल शासक रामपाल, हेमचन्द्र के ‘द्वयाश्रय काव्य’ में गुजरात के शासक कुमारपाल, पद्मगुप्त के ‘नवसहसांकचरित’ में परमार वंश तथा जयानक के ‘पृथ्वीराज विजय’ में पृथ्वीराज चौहान की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।


कल्हण की पुस्तक ‘राजतरंगिणी’ भारतीय इतिहास का पहला प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रन्थ है। यह 12वीं सदी में लिखा गया है। इसे आठ तरंगों (मूल पाठों) में बाँटा गया है। इसमें कालक्रम, आलोचना, विश्लेषण तथा तार्किकता का समावेश है।


दक्षिण भारत का प्रारम्भिक इतिहास संगम साहित्य से ज्ञात होता है। संगम साहित्य मूल रूप से तमिल तथा संस्कृत भाषा में रचित है, जिससे चोल, चेर तथा पाण्ड्य शासकों के समय के समाज, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति का विवरण मिलता है। पल्लव एवं बाद के चोल शासकों का इतिहास नन्दिक्कलम्बकम्, कलिंगतुपर्णि और चोलचरित से प्राप्त होता है।

(iii) विदेशी विवरण


विदेशियों के वृत्तान्त भी साहित्यिक साक्ष्य हैं। विदेशी लेखकों की धर्मेत्तर घटनाओं में विशेष रुचि थी। अतः उनके वर्णनों से राजनीतिक और सामाजिक दशा पर अधिक प्रकाश पड़ता है। विदेशियों के वृत्तान्तों का विवेचन तीन वर्गों में किया जा सकता है— यूनान और रोम के लेखक, चीन के लेखक तथा अरब के लेखक।

यूनान और रोम के लेखक

यूनान और रोम के लेखकों में सबसे प्राचीन हेरोडोटस और टीसियस के वृत्तान्त हैं। हेरोडोटस को इतिहास का पिता कहा जाता है, जिसने 5वीं शताब्दी ई. पू. में ‘हिस्टोरिका’ नामक पुस्तक की रचना की। इसमें भारत और फारस के सम्बन्धों का वर्णन किया गया है। टीसियस ईरानी राजवैद्य था।

सिकन्दर के साथ भारत आए यूनानी लेखकों में नियार्कस, आनासिक्रेट्स, अरिस्टोबुलस के विवरण प्रमुख हैं। अरिस्टोबुलस ने ‘हिस्ट्री ऑफ द वार’ (History of the War) तथा आनासिक्रेट्स ने सिकन्दर की जीवनी लिखी। सिकन्दर के पश्चात् के लेखकों में तीन राजदूतों-मेगस्थनीज, डायमेकस और डायनोसियस के नाम उल्लेखनीय हैं। मेगस्थनीज ने अपनी रचना ‘इण्डिका’ में मौर्य प्रशासन, समाज तथा संस्कृति का विवरण दिया है।


अज्ञात लेखक की रचना ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ में भारतीय बन्दरगाहों तथा वाणिज्यिक गतिविधियों का विवरण मिलता है। लैटिन भाषा में लिखित प्लिनी की ‘नेचुरल हिस्टोरिका’ से भारतीय पशुओं, पौधों और खनिज पदार्थों के अलावा भारत और इटली के बीच होने वाले व्यापार की भी जानकारी मिलती है। यूनानी भाषा में लिखित टॉलेमी की ‘ज्योग्राफी’ तथा प्लूटार्क एवं स्ट्रेबो की रचनाओं से भी प्राचीन भारत के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण विवरण मिलते हैं।


चीनी यात्रियों के वृत्तान्त


चीनी यात्रियों में फाह्यान, ह्वेनसाँग एवं इत्सिंग के विवरण महत्त्वपूर्ण हैं। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय भारत आए फाह्यान की प्रसिद्ध रचना ‘फो-क्यो-की‘ अथवा ‘ए रिकॉर्ड ऑफ द बुद्धिस्ट कण्ट्रीज’ (A Record of the Buddhist Countries) में गुप्तकालीन भारत के समाज, राजनीति, संस्कृति तथा बौद्ध धर्म की स्थिति का प्रभावपूर्ण विवरण मिलता है। सुंगयन (518 ई.) ने भारत में तीन वर्षों की यात्रा के दौरान बौद्ध ग्रन्थों की प्रतियाँ प्राप्त कीं।


हर्षवर्द्धन के शासनकाल में भारत आए ह्वेनसाँग के यात्रा वृत्तान्त ‘सी-यू-की’ अथवा ‘एस्से ऑन वेस्टर्न वर्ल्ड‘ (Essay on Western World) में तत्कालीन भारत की सामाजिक-धार्मिक स्थिति का विवरण मिलता है। सातवीं शताब्दी में भारत आए इत्सिंग की पुस्तक ‘ए रिकॉर्ड ऑफ द बुद्धिस्टरिलिजन एज प्रैक्टिस्ड इन इण्डिया एण्ड द मलय द्वीपसमूह’ (A Record of the Buddhist Religion as Practiced in India and the Malay Archipelago) के विवरण भी महत्त्वपूर्ण हैं। मत्वालिन ने हर्ष के पूर्वी अभियान तथा चाऊ-जू-कुआ ने चोलकालीन इतिहास पर प्रकाश डाला है।

तिब्बत के लेखक लामा तारानाथ की रचनाओं ‘कंग्यूर’ तथा ‘तंग्यूर’ में भी प्राचीन भारतीय इतिहास का विवरण मिलता है।


अरब यात्रियों के वृत्तान्त


आठवीं शताब्दी से अरब लेखकों ने भारत के विषय में लिखना आरम्भ कर दिया था। नौवीं सदी के मध्य में भारत आए सुलेमान ने पाल एवं प्रतिहार राजाओं के विषय में विवरण प्रस्तुत किया है। अलमसूदी ने राष्ट्रकूट राजाओं की महत्ता के विषय में महत्त्वपूर्ण विवरण दिया है। अलबरूनी की रचना ‘तहकीके हिन्द‘ (अरबी भाषा में) में गुप्तोत्तरकालीन समाज का विविधतापूर्ण विवरण मिलता है।


पुरातात्विक तथा साहित्यिक स्रोतों में तुलना


पुरातात्विक स्रोत से इतिहास का निष्पक्ष मूल्यांकन साहित्यिक स्रोतों की अपेक्षा आसानी से किया जा सकता है।
पुरातात्विक स्रोत में काल्पनिकता का अभाव होता है, जबकि साहित्यिक स्रोत में काल्पनिकता, लेखक की व्यक्तिगत भावना आदि का समावेश पाया जाता है।
पुरातात्विक स्रोत में परिवर्तन सम्भव नहीं हैं, जबकि साहित्यिक स्रोतों में समय के साथ परिवर्तन किया जा सकता है।
पुरातात्विक स्रोत समकालीन घटना के दर्पण होते हैं, जबकि साहित्यिक स्रोत अपने पीछे की घटना को भी वर्णित करते हैं।
लेखन तथा रख-रखाव की दृष्टि से साहित्यिक स्रोत पुरातात्विक स्रोत से श्रेष्ठ हैं।

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