अलंकार Alankar

अलंकार का अर्थ एवं परिभाषा

प्रसिद्ध संस्कृत आचार्य दण्डी ने अपनी रचना ‘काव्यादर्श’ में अलंकार को परिभाषित करते हुए लिखा है-‘अलंकरोतीति अलंकार:’ अर्थात् शोभाकारक पदार्थ को अलंकार कहते हैं। हिन्दी में रीतिकालीन कवि आचार्य केशवदास ने ‘कविप्रिया’ रचना में अलंकार की विशेषताओं का विवेचन प्रस्तुत किया है।

वस्तुतः भाषा को शब्द एवं शब्द के अर्थ से सुसज्जित एवं सुन्दर बनाने की मनोरंजक प्रक्रिया को ‘अलंकार’ कहा जाता है। ‘अलंकार’ काव्य भाषा के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। यह भाव की अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावी बनाते हैं।

अलंकार के भेद

अलंकार को दो रूपों में व्यक्त किया जाता है- शब्दालंकार एवं अर्थालंकार।

1. शब्दालंकार

शब्द निर्माण की प्रक्रिया में ‘ध्वनि’ तथा ‘अर्थ’ का महत्त्वपूर्ण समन्वय होता है। ध्वनि के आधार पर काव्य में उत्पन्न विशिष्टता अथवा साज-सज्जा ‘शब्दालंकार’ की सृष्टि करते हैं। इस अलंकार में वर्ण या शब्दों की लयात्मकता अथवा संगीतात्मकता उपस्थित होती है। ’शब्दालंकार’ वर्णगत, शब्दगत तथा वाक्यगत होते हैं। अनुप्रास, यमक, श्लेष इत्यादि प्रमुख शब्दालंकार हैं।

2. अर्थालंकार

जब शब्द, वाक्य में प्रयुक्त होकर उसके अर्थ को चमत्कृत या अलंकृत करने वाला स्वरूप प्रदान करे तो वहाँ ‘अर्थालंकार’ की सृष्टि होती है।’अर्थालंकार’ की एक विशेषता यह है कि यदि वाक्य से किसी शब्द को हटाकर उसकी जगह उसके पर्याय शब्द को रखा जाए, तब भी अलंकार की प्रवृत्ति में कोई अन्तर नहीं आता। वस्तुतः ‘अर्थालंकार’ की निर्भरता शब्द पर न होकर शब्द के अर्थ पर होती है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, दृष्टान्त, मानवीकरण इत्यादि प्रमुख अर्थालंकार हैं।

शब्दालंकार

अनुप्रास अलंकार

अनुप्रास वर्णनीय रस की अनुकूलता के अनुसार समान वर्णों का बार-बार प्रयोग है। यह एक प्रचलित अलंकार है, जिसका प्रयोग छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास, लाटानुप्रास आदि के रूप में होता है।

उदाहरण सम सुबरन सुखाकर सुजस न थोर ।

इस वाक्यांश (काव्यांश) में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति दिखती है। यह आवृत्ति ‘अनुप्रास अलंकार’ के रूप में जानी जाती है।

अनुप्रास अलंकार के भेद

इसके पाँच भेद हैं,

  • (i) श्रुत्यानुप्रास एक ही स्थान से उच्चारित होने वाले वर्णों की आवृत्ति ।
  • (ii) वृत्यानुप्रास समान वर्ण की अनेक बार आवृत्ति।
  • (iii) छेकानुप्रास जब कोई वर्ण मात्र दो बार ही आए
  • (iv) लाटानुप्रास शब्द व अर्थ की आवृत्ति के बाद भी अन्वय के उपरान्त भिन्न अर्थ मिले।
  • (v) अन्त्यानुप्रास शब्दों के अन्त में समान ध्वनि की आवृत्ति ।

यमक अलंकार

यमक’ एक शब्दालंकार है। यमक का अर्थ होता है-‘युग्म’ अर्थात् ‘जोड़ा’। इसमें भिन्न अर्थ के साथ किसी वर्ण अथवा शब्द की आवृत्ति होती है।

उदाहरण “कहै कवि बेनी ब्याल की चुराय लीनी बेनी”

इस काव्यांश में ‘बेनी’ की आवृत्ति है। प्रथम ‘बेनी’ का अर्थ है-‘कवि बेनीप्रसाद’ तथा दूसरे ‘बेनी’ का अर्थ है- ‘चोटी’।

श्लेष अलंकार

जब कोई शब्द वाक्य में प्रयुक्त होकर दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न अर्थ दे तो वहाँ ‘श्लेष अलंकार’ होता है। इस अलंकार के अन्तर्गत एक शब्द एक से अधिक अर्थों का बोध कराकर पूरे काव्य को विशिष्ट अर्थ प्रदान करने में सक्षम होता है।

उदाहरण “सुबरन को ढूँढ़े फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।’

“इस काव्य पंक्ति में ‘सुबरन’ के कई अर्थ ध्वनित हो रहे हैं। ‘सुबरन’ का अर्थ यहाँ कवि, व्यभिचारी और चोर से सम्बन्धित है। यथा- कवि ‘सुबरन’ अर्थात् सुवर्ण (अच्छे शब्द) को ढूँढ़ता है। व्यभिचारी ‘सुबरन’ अर्थात् ‘गोरी’ को ढूँढ़ता है। चोर ‘सुबरन’ अर्थात् ‘स्वर्ण’ को ढूँढ़ता है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

अर्थालंकार

1. उपमा अलंकार

जब काव्य में समान धर्म के आधार पर एक वस्तु की समानता अथवा तुलना अन्य से की जाए, तब वहाँ उपमा अलंकार होता है, जिसकी उपमा दी जाए उसे उपमेय तथा जिसके द्वारा उपमा यानी तुलना की जाए उसे उपमान कहते हैं। उपमेय और उपमान की समानता प्रदर्शित करने के लिए सादृश्यवाचक शब्द प्रयोग किए जाते हैं।

उदाहरणमुख मयंक सम मंजु मनोहर।

‘इस काव्य पंक्ति में ‘मुख’ उपमेय है, ‘चन्द्रमा’ उपमान है, ‘मनोहर’ समान धर्म है तथा ‘सम’ सादृश्य वाचक शब्द होने से उपमा अलंकार परिपुष्ट हो रहा है।

2. रूपक अलंकार

रूपक का अर्थ होता है- एकता। रूपक अलंकार में पूर्ण साम्य होने के कारण प्रस्तुत में अप्रस्तुत का आरोप कर अभेद की स्थिति को स्पष्ट किया जाता है। इस प्रकार जहाँ ‘उपमेय’ और ‘उपमान’ की अत्यधिक समानता को प्रकट करने के लिए ‘उपमेय’ में ‘उपमान’ का आरोप होता है, वहाँ ‘रूपक अलंकार’ उपस्थित होता है।

उदाहरण “चरण कमल बन्दौ हरिराई।

“इस काव्य पंक्ति में उपमेय ‘चरण’ पर उपमान ‘कमल’ का आरोप कर दिया गया है। दोनों में अभिन्नता है, पर दोनों साथ-साथ हैं। इस अभेदता के कारण यहाँ रूपक अलंकार है।रूपक अलंकार के भेद रूपक के विभिन्न भेदों में से तीन मुख्य भेद नीचे दिए गए हैं

  • (i) सांगरूपक इसमें अवयवों के साथ उपमेय पर उपमान आरोपित किए जाते हैं।
  • (ii) निरंग रूपक इसमें अवयवों के बिना ही उपमेय पर उपमान आरोपित किए जाते हैं।
  • (iii) परम्परित रूपक इसमें उपमेय पर प्रयुक्त आरोप ही दूसरे आरोप का कारण बनता है।

3. उत्प्रेक्षा अलंकार

उत्प्रेक्षा’ का अर्थ है- किसी वस्तु के सम्भावित रूप की उपेक्षा करना। उपमेय अर्थात् प्रस्तुत में उपमान अर्थात् अप्रस्तुत की सम्भावना को ‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ कहते हैं। ‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ में मानो, जानो, जनु, मनु, ज्यों इत्यादि शब्दों का प्रयोग होता है।

उदाहरण “सोहत ओढ़े पीत-पट, श्याम सलोने गात।मनहुँ नीलमणि सैल पर, आतपु परयौ प्रभात।

”इस काव्यांश में श्रीकृष्ण के श्यामल शरीर पर नीलमणि पर्वत की तथा पीत-पट पर प्रातःकालीन धूप की सम्भावना व्यक्त की गई है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।

4. भ्रान्तिमान्

जब उपमेय को भ्रम के कारण उपमान समझ लिया जाता है तब वहाँ ‘भ्रान्तिमान् अलंकार’ होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस अलंकार में उपमेय में उपमान का धोखा हो जाता है

उदाहरण

“नाक का मोती अधर की कान्ति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से। देख उसको ही हुआ शुक मौन है,सोचता है अन्य शुक यह कौन है?”

5.संदेह अलंकार

जब किसी वस्तु में उसी के सदृश अन्य वस्तुओं का सन्देह हो और सदृशता के कारण अनिश्चित की मनोदशा हो तब वहाँ सन्देह अलंकार होता है।

उदाहरण

“सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है, सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।

6. अतिशयोक्ति अलंकार

जब किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थिति की प्रशंसा करते हुए कोई बात बहुत बढ़ा-चढ़ा कर अथवा लोक सीमा का उल्लंघन करके कही जाए, ‘अतिशयोक्ति अलंकार’ उपस्थित होता है।

उदाहरण “आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा उतरे कैसे पार ।राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार ।।

“इस काव्यांश में राणा अभी नदी पार करने की सोच ही रहे थे कि उनका घोड़ा चेतक नदी के पार भी हो गया। यहाँ वेग (गति) के विषय में बहुत बढ़ा-चढ़ा कर कहने से अतिशयोक्ति अलंकार परिपुष्ट हुआ है।

7. अनन्वय अलंकार

काव्य में जहाँ उपमान के अभाव के कारण उपमेय को ही उपमान बना दिया जाए वहाँ ‘अनन्वय अलंकार’ होता है।

उदाहरण”राम-से राम, सिया-सी सिया,सिरमौरे बिरंचि बिचारि सँवारे।

8. प्रतीप अलंकार

जहाँ उपमेय को उपमान और उपमान को उपमेय बना दिया गया हो तो वहाँ ‘प्रतीप ‘अलंकार’ होता है। प्रतीप अलंकार में उपमा अलंकार की विपरीत स्थिति होती है।

उदाहरण

“उसी तपस्वी से लम्बे थे देवदारु दो चार खड़े।

9.दृष्टान्त अलंकार

उपमेय एवं उपमान के साधारण धर्म में भिन्नता होने पर भी बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से कथन करने को ‘दृष्टान्त अलंकार’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो दृष्टान्त अलंकार के अन्तर्गत पहले एक बात कहकर उसको स्पष्ट करने के लिए उससे मिलती-जुलती अन्य बात कही जाती है।

उदाहरण

‘परी प्रेम नन्दलाल के मोहि न भावत जोग।मधुप राजपद पाइकै भीखन माँगत लोग।।”

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