पाठ 5 छठी शताब्दी ई0 पू0 का भारत धार्मिक आन्दोलन Bharat dharmik aandolan

छठी शताब्दी ई०पू० में छोटे-छोटे जनपद बड़े राज्य बनने की होड़ में संघर्ष करते रहते थे। इससे प्रजा अपने को असुरक्षित महसूस करने लगी थी। पुराने समय में जन के लोग एक दूसरे की मदद एवं आपस में भरोसा करते थे। ऐसी बातें अब समाप्त हो चली थीं। अब ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लालच में लोग एक दूसरे से झूठ बोलने, एक दूसरे को ठगने व धोखा देने लगे थे।

वैदिक काल के अन्त तक धार्मिक क्रियाकलाप धीरे-धीरे कठोर एवं खर्चीले होते गए। अब यज्ञों में पशुओं की बलि भी दी जाने लगी थी । चमत्कार और ढोंग-ढकोसला का बोलबाला था । वेदों की संस्कृत भाषा जन सामान्य के समझ में नहीं आती थी। वर्ण व्यवस्था अब कठोर जाति व्यवस्था का रूप ले चुकी थी। पुरोहितों के द्वारा पूरे समाज को ऊँची तथा नीची जाति में विभाजित कर दिया गया। इन कारणों से समाज में पूर्णतः असंतुलन की स्थिति आ गई थी। ऐसी बदलती परिस्थितियों में लोगों के विचारों में बड़े-बड़े बदलाव आ रहे थे। सभी के मन में तरह-तरह के सवाल उठ रहे थे।

जैसे-यज्ञ क्यों करना चाहिए ? क्या चढ़ावा चढ़ाने से मोक्ष प्राप्त होता है ?

क्या वास्तव में सब कुछ पूर्व निश्चित है तथा ईश्वर ने तय किया है ? क्या अपनी स्थिति बदली नहीं जा सकती है ?

ऐसा क्या है जो कभी नहीं मरता ? मरने के बाद क्या होता है ? क्या तपस्या करने से तपस्वी अमर हो जाते हैं ?

इन जिज्ञासाओं के लिए उन दिनों कई लोग जंगलों में आश्रम बनाकर रहते थे। उन आश्रमों में वे तरह-तरह के प्रश्नों पर चिन्तन-मनन करते थे। वहाँ आने वालों से वे चर्चा करते थे और अपने पास बैठाकर दूसरों को सिखाते थे। जो लोग आश्रमों में रहते थे वे ऋषि-मुनि कहलाते थे। इन ऋषियों ने के जीवन के बारे में चिन्तन कर बताया कि आत्मा या ब्रह्म कभी भी नष्ट नहीं होती है। आत्मा ही बार-बार जन्म लेती है। कठोर तपस्या के द्वारा ही इसका ज्ञान होता है। आत्मा जब ब्रह्म से मिल जाती है तब मानव को संसार के कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। आत्मा का ज्ञान ही परम ज्ञान है। ऋषियों के यह विचार उपनिषदों (पास बैठना) में मिलते हैं।

ऋषियों, मुनियों के अलावा कुछ और लोग भी ज्ञान की खोज में लगे थे, जो एक स्थान पर नहीं रहते थे। कई राजा भी इन ऋषियों की तरह चिन्तन में आगे थे। वे घर त्यागकर गाँव-गाँव, जंगल-जंगल, शहर-शहर, घूमते रहते थे। ऐसे लोगों में महावीर और गौतम बुद्ध बहुत प्रसिद्ध हुए ।


महावीर (वर्धमान)

महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर (महापुरुष) थे।
इनके बचपन का नाम ‘वर्धमान’ था। इनका जन्म एक राजपरिवार में वैशाली (वर्तमान में बिहार राज्य) के निकट 540 ईसा पूर्व में हुआ था । सत्य और शान्ति की खोज में इन्होंने कठोर तप करने का मार्ग अपनाया। तीस वर्ष की अवस्था में घर छोड़कर कठिन तपस्या की और अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने के कारण वे ‘महावीर’ और ‘जिन’ अर्थात् ‘विजेता’ कहे गए। स्वयं ज्ञान प्राप्त करने के बाद दूसरों की भलाई के लिए उन्होंने अपने सिद्धान्तों का प्रचार प्राकृत भाषा में किया, जो उस समय आम लोगों की बोलचाल की भाषा थी। महावीर स्वामी के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा लक्ष्य जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त होकर कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करना है।

ऋषभ देव जैन धर्म के संस्थापक  एवं प्रथम तीर्थंकर थे।

जीवन के विकास के लिए उन्होंने मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहकर, तीन बातों को मानने पर विशेष
बल दिया ।

1.सही बातों में विश्वास ।

2.सही बातों को ठीक से समझना ।

3.उचित कर्म ।

जैन धर्म में इन्हें ‘त्रिरत्न’ (तीन रत्न) कहा जाता है।
महावीर स्वामी ने अच्छे व्यवहार व आचरण के लिए ‘महाव्रतों’ का पालन करने के लिए कहा। ये महाव्रत हैं-

 1. जीवों को न मारना ।
2.सच बोलना
3.चोरी न करना ।
4.अनुचित धन न जुटाना ।
5.इन्द्रियों को वश में रखना ।


महावीर स्वामी के कैवल्य के लगभग दो शताब्दियों बाद
उनके जैन अनुयायी दो सम्प्रदायों में बँट गए- ‘श्वेताम्बर’ (सफेद कपड़े पहनने वाले) और ‘दिगम्बर (निर्वस्त्र रहने वाले)।

महात्मा बुद्ध

गौतम बुद्ध को महात्मा बुद्ध के नाम से जाना जाता है। महात्मा बुद्ध ‘बौद्ध धर्म’ के संस्थापक थे। इनका जन्म ईसा से 563 वर्ष पूर्व नेपाल में कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के राजा थे। महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम ‘सिद्धार्थ’ था।

सच्चे ज्ञान और शान्ति की खोज के लिए उन्होंने काफी दिनों तक कठिन तपस्या की परन्तु उनको इससे शारीरिक कष्ट ही हुआ और उन्होंने इस रास्ते को छोड़ दिया। वे बहुत दिनों बाद बिहार प्रान्त के ‘गया’ स्थान पर ऋषियों के साथ पहुँचे जहाँ उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ ।


ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम अपना उपदेश सारनाथ (उत्तर प्रदेश) में दिया था। उन्होंने ‘मध्यम मार्ग’ (बीच का रास्ता) अपनाने की शिक्षा दी, जिसका अर्थ होता है विलासिता’ और ‘न तो अधिक कठोर तप’ । महात्मा बुद्ध ने ‘चार आर्य सत्य’ को माना है- 1

1. दुःख है ।
2. दुःख दूर करने का उपाय भी है।
3.दुःख का कारण है।
4.दुःखों के दूर करने का उपाय अष्टांगिक मार्ग है।

ये अष्टांगिक मार्ग सरल मानवता पूर्ण व्यवहार के नियम हैं

1.जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सही सोच

2. होना । सही बात और कार्य करना ।

3.सत्य बोलना ।

4.अच्छा कार्य करना ।

5.अच्छे कार्य द्वारा जीविका अर्जित करना ।

6.मानसिक और नैतिक उन्नति के लिए प्रयास करना ।
7.अपने कार्य व्यवहार पर हमेशा नजर रखना ।

8.ज्ञान प्राप्ति के लिए ध्यान केन्द्रित करना ।


महात्मा बुद्ध ने दुःख से छुटकारा पाने को निर्वाण कहा है। उनके उपदेशों से मानव सोच में बहुत बड़ा बदलाव आया। उनके उपदेश सरल पालि भाषा में थे। उन्होंने बताया कि व्यक्ति का अच्छा या बुरा होना उसके व्यवहार पर निर्भर करता है न कि उसकी जाति पर। महात्मा बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण) कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में हुई।


"मुझे प्यास लगी है कृपया थोड़ा पानी दें, बहन" महात्मा बुद्ध के शिष्य आनन्द ने प्रार्थना की। "क्या आपको पता नहीं है कि मैं एक शूद्र हूँ ?” उसने आश्चर्यचकित होकर पूछा।
"मुझे यह नहीं जानना है कि तुम किस परिवार से हो या तुम्हारी क्या जाति है। यदि तुम्हारे पास पानी है तो कृपया मुझे पीने के लिए दें।" आनन्द ने कहा।

इन घटनाओं व उनके सदाचरण से आम लोग अति प्रभावित हुए और दूर-दूर तक उनके अनुयायी हो गए। दो हजार वर्ष बीत जाने के बाद भी महावीर स्वामी और महात्मा बुद्ध के विचारों का अनुकरण आज भी हो रहा है । सोचो यदि वे कहते कुछ और करते कुछ तो क्या उनके ज्यादा अनुयायी होते?
महात्मा बुद्ध के निर्वाण के कुछ शताब्दियों बाद उनके बौद्ध अनुयायी दो सम्प्रदायों में बँट गए- हीनयान और महायान ।


और भी जानिए

1.भारत की अहिंसावादी छवि इन्हीं के कारण हुई। इन धर्मों के आने से शाकाहारी संस्कृति को बढ़ावा मिला।

2.ये धर्म लोकतांत्रिक एवं उदार थे। संगठित धर्म पर जोर बढ़ने लगा जिसके कारण इन धर्मों का प्रचार दूर-दूर तक बढ़ा। संचार साधनों का अभाव होते हुए भी विदेशी नागरिकों ने इन धर्मों को अपनाया जैसे चीन व दक्षिण-पूर्वी एशिया ।

3.इनके संघों में महिलाओं के प्रवेश के साथ-साथ उन्हें ऊँचा स्थान दिया गया।

4.बुद्ध के पूर्व जन्म से सम्बन्धित जातक कहानियों ने नीति और धर्म को सरल भाव में लोगों तक पहुँचाया ।
5.राष्ट्रध्वज के मध्य में बना चक्र बौद्ध प्रतीक 'धर्म चक्र प्रवर्तन' है।

अभ्यास

निम्नलिखित के विषय में लिखिए

विवरणमहावीर स्वामी महात्मा बुद्ध
जन्म का समय540 ई0 पू0563 ई0 पू0
जन्म का स्थानवैशालीलुम्बनी
बचपन का नामवर्धमान सिद्धार्थ
माता का नामत्रिशलामहामाया
पिता का नामसिद्धार्थशुद्धोधन
उपदेश की भाषाप्राकृत भाषा पालि

1.त्रिरत्न और अष्टांगिक मार्ग क्या हैं ? यह किनसे सम्बन्धित हैं ? लिखिए


2.जैन और बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को लोगों ने क्यों अपनाया ?


महावीर स्वामी द्वारा बताए गए पाँच महाव्रतों के बारे में लिखिए ।


प्रोजेक्ट वर्क


महात्मा बुद्ध एवं महावीर स्वामी की शिक्षाओं को मोटे अक्षरों में दफ्ती पर लिखकर अपनी कक्षा में टाँगिए । सरल मानवतापूर्ण नियमों की सूची बनाइए ।

पाठ-2 पाषाण काल(आखेटक संग्राहक एवं उत्पादक मानव)
पाठ 3 नदी घाटी की सभ्यता- हड़प्पा सभ्यता
पाठ -4 वैदिक काल (1500 ई0 पू0 से 600 ई0पू0)

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