नियंत्रण एवं समन्वय (Control and coordination )

पिछले अध्याय हमने सजीवों में अनुरक्षण (अथवा रख-रखाव ) कार्य में संलग्न जैव प्रक्रमों के बारे में पढ़ा था। हमने इस बात पर विचार करना प्रारंभ किया था कि यदि कोई वस्तु गतिशील है तो वह सजीव है। पादपों में इस तरह की कुछ गतियाँ वास्तव में वृद्धि का परिणाम हैं। एक बीज अंकुरित होता है और वृद्धि करता है, और हम देख सकते हैं कि नवोद्भिद कुछ दिनों में गति करता हुआ मृदा को एक ओर धकेलकर बाहर आ जाता है। लेकिन यदि इसकी वृद्धि रुक गई होती तो ये गतियाँ नहीं होतीं। अधिकांश जंतुओं में तथा कुछ पादप में होने वाली कुछ गतियाँ वृद्धि से संबंधित नहीं हैं। एक दौड़ती बिल्ली, झूले पर खेलते बच्चे, जुगाली करती भैंस – ये गतियाँ वृद्धि के कारण नहीं होती हैं।
दिखाई देने वाली इन गतियों को हम जीवन के साथ क्यों जोड़ते हैं? इसका एक संभावित उत्तर यह है कि हम गतियों को जीव के पर्यावरण में आए परिवर्तन की अनुक्रिया सोचते हैं। बिल्ली इसलिए दौड़ी होगी क्योंकि इसने एक चूहा देखा था। केवल यही नहीं, हम गति को सजीवों द्वारा किए गए एक ऐसे प्रयास के रूप में भी सोचते हैं जिसमें उनके पर्यावरण में हुए परिवर्तन उनके लिए लाभकारी हों। सूर्य के प्रकाश में पौधे वृद्धि करते हैं। बच्चे झूले से आनंद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। भैंस जुगाली करती है ताकि भोजन छोटे टुकड़ों में टूट जाए और उसका पाचन भलीभाँति हो सके। जब तेज़ रोशनी हमारी आँखों पर फोकस की जाती है या जब हम किसी गर्म वस्तु को छूते हैं तो हमें परिवर्तन का पता लग जाता है और इसकी अनुक्रिया में स्वयं को बचाने के लिए गति करते हैं, ऐसा प्रतीत होता है।
यदि हम इसके बारे में और अधिक विचार करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि पर्यावरण की अनुक्रिया के प्रति ये गतियाँ सावधानी से नियंत्रित की जाती हैं। पर्यावरण में प्रत्येक परिवर्तन की अनुक्रिया से एक समुचित गति उत्पन्न होती है। जब हम कक्षा में अपने दोस्तों से बात करना चाहते हैं तो हम ज़ोर से चीखने की अपेक्षा फुसफुसाते हैं। स्पष्ट रूप से कोई भी गति उस घटना पर निर्भर करती है जो इसे प्रेरित करती है। अतः इस तरह की नियंत्रित गति को पर्यावरण में भिन्न घटनाओं के अभिज्ञान से जोड़ा जाना चाहिए जो अनुक्रिया के अनुरूप गति करें। दूसरे शब्दों में, सजीवों को उन तंत्रों का उपयोग करना चाहिए जो नियंत्रण एवं समन्वय का कार्य करते हैं। बहुकोशिकीय जीवों में शरीर संगठन के सामान्य सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए यह कह सकते हैं कि विशिष्टीकृत ऊतक का उपयोग इन नियंत्रण तथा समन्वय क्रियाकलापों में किया जाता है।


जंतु – तंत्रिका तंत्र


जंतुओं में यह नियंत्रण तथा समन्वय तंत्रिका तथा पेशी ऊतक द्वारा किया जाता है जिसके विषय में हम कक्षा 9 में पढ़ चुके हैं। आकस्मिक परिस्थिति में गरम पदार्थ को छूना हमारे लिए खतरनाक हो सकता है। हमें इसे पहचानने की तथा इसके अनुरूप अनुक्रिया की आवश्यकता है। हम कैसे पता लगाएँ कि हम गरम वस्तु को छू रहे हैं? हमारे पर्यावरण से सभी सूचनाओं का पता कुछ तंत्रिका कोशिकाओं के विशिष्टीकृत सिरों द्वारा लगाया जाता है। ये ग्राही प्रायः हमारी ज्ञानेंद्रियों में स्थित होते हैं; जैसे आंतरिक कर्ण, नाक, जिहवा आदि रस संवेदी ग्राही स्वाद का पता लगाते हैं जबकि घ्राणग्राही गंध का पता लगाते हैं।


यह सूचना एक तंत्रिका कोशिका के द्रुमाकृतिक सिरे द्वारा उपार्जित की जाती है। और एक रासायनिक क्रिया द्वारा यह एक विद्युत आवेग पैदा करती है। यह आवेग द्रुमिका से कोशिकाकाय तक जाता है और तब तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन) में होता हुआ इसके अंतिम सिरे तक पहुँच जाता है। एक्सॉन के अंत में विद्युत आवेग कुछ रसायनों का विमोचन कराता है। ये रसायन रिक्त स्थान या सिनेप्स (सिनेप्टिक दरार) को पार करते हैं और अगली तंत्रिका कोशिका की द्रुमिका
में इसी तरह का विद्युत आवेग प्रारंभ करते हैं। यह शरीर में तंत्रिका आवेग की मात्रा की सामान्य योजना है। इसी तरह का एक अंतर्ग्रथन (सिनेप्स) अंततः ऐसे आवेगों को तंत्रिका कोशिका से अन्य कोशिकाओं, जैसे कि पेशी कोशिकाओं या ग्रंथि तक ले जाता है।
अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि तंत्रिका ऊतक तंत्रिका कोशिकाओं या न्यूरॉन के एक संगठित जाल का बना होता है और यह सूचनाओं को विद्युत आवेग के द्वारा शरीर के एक भाग से दूसरे भाग तक संवहन में विशिष्टीकृत है।

इसमें तंत्रिका कोशिका के भागों को पहचानिए (i) जहाँ सूचनाएँ उपर्जित की जाती हैं, (ii) जिससे होकर सूचनाएँ विद्युत आवेग की तरह यात्रा करती हैं, तथा (iii) जहाँ इस आवेग का परिवर्तन रासायनिक संकेत में किया जाता है जिससे यह आगे संचरित हो सके।
जब नाक बंद होती है तो क्या आप चीनी तथा भोजन के स्वाद में कोई अंतर महसूस करते हैं? यदि हाँ, तो आप सोचते होंगे कि यह क्यों होता है? इस तरह के अंतर जानने के लिए और उनके संभावित हल खोजने के लिए पढ़िए तथा चर्चा करिए। जब आपको जुकाम हो जाता तब भी क्या आप इसी तरह की स्थिति का सामना करते हैं?


प्रतिवर्ती क्रिया में क्या होता है?


पर्यावरण में किसी घटना की अनुक्रिया के फलस्वरूप अचानक हुई क्रिया की चर्चा करते हैं तो बहुधा प्रतिवर्त शब्द का प्रयोग करते हैं। हम कहते हैं ‘मैं प्रतिवर्तस्वरूप बस से कूद गया’, या ‘मैंने प्रतिवर्तस्वरूप आग की लौ से अपना हाथ पीछे खींच लिया’, या ‘मैं इतना भूखा था कि प्रतिवर्तस्वरूप मेरे मुँह में पानी आने लगा, इसका क्या अभिप्राय है? इन सभी उदाहरणों में एक सामान्य विचार आता है कि जो कुछ हम करते हैं उसके बारे में विचार नहीं करते हैं, या अपनी क्रियाओं को नियंत्रण में महसूस नहीं करते हैं। फिर भी ये वे स्थितियाँ हैं जहाँ हम अपने पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों के प्रति अनुक्रिया कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में नियंत्रण व समन्वय कैसे प्राप्त किया जाता है?
इस पर फिर से विचार करते हैं। एक उदाहरण लेते हैं। आग की लपट को छूना हमारे अथवा किसी भी जंतु के लिए एक दुराग्रही तथा खतरनाक स्थिति है। हम इसके प्रति कैसे अनुक्रिया करते? एक सरल विधि है कि हम विचार करें कि हमें आघात पहुँच सकता है, और इसलिए हमें अपना हाथ हटा लेना चाहिए। तब एक आवश्यक प्रश्न आता है कि यह सब सोचने के लिए हमें कितना समय लगेगा? उत्तर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार सोचते हैं । यदि तंत्रिका आवेग को उस ओर भेजा जाता है जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं, तब इसी प्रकार के आवेग उत्पन्न करने के लिए मस्तिष्क द्वारा चिंतन भी आवश्यक है। विचार करना एक जटिल क्रिया है अतः यह बहुत सी तंत्रिका कोशिकाओं के तंत्रिका आवेग की जटिल अन्योन्यक्रियाओं से जुड़ने के लिए बाध्य है।
यदि यह वस्तुस्थिति है तो कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे शरीर में सोचने वाले ऊतक, जटिल रूप से व्यवस्थित न्यूरॉन के घने जाल से बने हैं। यह खोपड़ी में अग्र सिरे पर स्थित हैं तथा शरीर के सभी हिस्सों से संकेत प्राप्त करते हैं तथा उन पर अनुक्रिया से पहले विचार करते है। निस्संदेह, ये संकेत प्राप्त करने के लिए खोपड़ी में मस्तिष्क का सोचने वाला भाग तंत्रिकाओं द्वारा शरीर के विभिन्न भागों से जुड़ा होना चाहिए । इसी तरह, यदि मस्तिष्क का यह भाग पेशियों को गति करने का आदेश देता है तो तंत्रिकाएँ इन संकेतों को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाने का कार्य करती हैं। हम किसी गर्म वस्तु को छुएँ और हमें यह सब करना पड़े तो इसमें काफ़ी समय लगेगा कि हम जलन महसूस कर सकते हैं।
शरीर की डिज़ाइन किस तरह इस समस्या का हल करती है? ऊष्मा के संवेदन के बारे में सोचने की अपेक्षा यदि जो तंत्रिकाएँ ऊष्मा का पता लगाती हैं उन्हें उन तंत्रिकाओं से जोड़ा जाए जो पेशियों को गति कराती हैं, तो जो प्रक्रम आगम संकेतों का पता लगाने तथा तदनुसार निर्गम क्रिया को करने का कार्य करता है वह अतिशीघ्र पूरा हो जाता है। आमतौर पर इस तरह के संबंधन को प्रतिवर्ती चाप कहते हैं।इस प्रकार के प्रतिवर्ती चाप को संबंधन आगत तंत्रिका तथा निर्गत तंत्रिका के मध्य कहाँ होना चाहिए? सबसे उपयुक्त स्थान शायद वही बिंदु होगा जहाँ सबसे पहले वे एक-दूसरे से मिलते हैं। पूरे शरीर की तंत्रिकाएँ मेरुरज्जु में मस्तिष्क को जाने वाले रास्ते में एक बंडल में मिलती हैं। प्रतिवर्ती चाप इसी मेरुरज्जु में बनते हैं, यद्यपि आगत सूचनाएँ मस्तिष्क तक भी जाती हैं।
अधिकतर जंतुओं में प्रतिवर्ती चाप इसलिए विकसित हुआ है क्योंकि इनके मस्तिष्क के सोचने का प्रक्रम बहुत तेज़ नहीं है। वास्तव में अधिकांश जंतुओं में सोचने के लिए आवश्यक जटिल न्यूरॉन जाल या तो अल्प है या अनुपस्थित होता है। अतः यह स्पष्ट है कि वास्तविक विचार प्रक्रम की अनुपस्थिति में प्रतिवर्ती चाप का दक्ष कार्य प्रणाली के रूप में विकास हुआ है। यद्यपि जटिल न्यूरॉन जाल के अस्तित्व में आने के बाद भी प्रतिवर्ती चाप तुरंत अनुक्रिया के लिए एक अधिक दक्ष प्रणाली के रूप में कार्य करता है।

क्या आप उन घटनाओं के क्रम को खोज सकते हैं जो आपकी आँखों में तेज़ प्रकाश फोकस करने पर होती हैं।

मानव मस्तिष्क


क्या मेरुरज्जु का कार्य केवल प्रतिवर्ती क्रिया है?

निश्चित रूप से नहीं, क्योंकि हम जानते हैं कि हम सोचने वाले प्राणी हैं। मेरुरज्जु तंत्रिकाओं की बनी होती है जो सोचने के लिए सूचनाएँ प्रदान करती हैं सोचने में अधिक जटिल क्रियाविधि तथा तंत्रिक संबंधन होते हैं। ये मस्तिष्क में संकेंद्रित होते हैं जो शरीर का मुख्य समन्वय केंद्र है। मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु केंद्रीय तंत्रिका तंत्र बनाते हैं। ये शरीर के सभी भागों से सूचनाएँ प्राप्त कर हैं तथा इसका समाकलन करते हैं।


हम अपनी क्रियाओं के बारे में भी सोचते हैं। लिखना, बात करना, एक कुर्सी घुमाना, किसी कार्यक्रम के समाप्त होने पर ताली बजाना इत्यादि ऐच्छिक क्रियाओं के उदाहरण हैं जो आगे क्या करना है, के निर्णय पर आधारित हैं। अतः मस्तिष्क को भी पेशियों तक संदेश भेजने होते हैं। यह दूसरा मार्ग है जिसमें तंत्रिका तंत्र पेशियों में संचार भेजता है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तथा शरीर के अन्य भागों में संचार को परिधीय तंत्रिका तंत्र सुगमता प्रदान करता है जो मस्तिष्क से निकलने वाली कपाल तंत्रिकाओं तथा मेरुरज्जु से निकलने वाली मेरु तंत्रिकाओं से बना होता है। इस प्रकार मस्तिष्क हमें सोचने की अनुमति तथा सोचने पर आधारित क्रिया करने की अनुमति प्रदान करता है। जैसी आपको संभावना होगी, यह एक जटिल अभिकल्पना द्वारा मस्तिष्क के विभिन्न भागों से जो विभिन्न आगत एवं निर्गत सूचनाओं को समाकलित करने के लिए उत्तरदायी है, पूरा किया जाता है। मस्तिष्क में इस तरह के तीन मुख्य भाग या क्षेत्र होते हैं जिनके नाम अग्रमस्तिष्क, मध्यमस्तिष्क तथा पश्चमस्तिष्क है। मस्तिष्क का मुख्य सोचने वाला भाग अग्रमस्तिष्क है। इसमें विभिन्न ग्राही से संवेदी आवेग (सूचनाएँ) प्राप्त करने के लिए क्षेत्र होते हैं। अग्रमस्तिष्क के अलग-अलग क्षेत्र सुनने, सूँघने देखने आदि के लिए विशिष्टीकृत हैं। इसमें साहचर्य के क्षेत्र पृथक होते हैं जहाँ इन संवेदी सूचनाओं, अन्य ग्राही से प्राप्त सूचनाओं एवं पहले से मस्तिष्क में एकत्र सूचनाओं का अर्थ लगाया जाता है। इस सब पर आधारित, एक निर्णय लिया जाता है कि अनुक्रिया तथा सूचनाएँ प्रेरक क्षेत्र तक कैसे पहुँचाई जाएँ जो ऐच्छिक पेशी की गति को, जैसे हमारी टाँग की पेशियाँ, नियंत्रित करती हैं। हालाँकि प्रकृति में कुछ संवेदन देखने और सुनने से अधिक जटिल हैं जैसे, हमें कैसे पता लगता कि हम पर्याप्त भोजन खा चुके हैं? हमारा पेट पूरा भरा है। यह जानने के लिए एक भूख से संबंधित केंद्र है जो अग्रमस्तिष्क में एक अलग भाग है।

मानव मस्तिष्क के नामांकित चित्र का अध्ययन कीजिए। हम देख चुके हैं कि विभिन्न भागों के विशिष्ट कार्य हैं। अपने अध्यापक से परामर्श करके प्रत्येक भाग केकार्य का पता लगाइए।

आइए ‘प्रतिवर्त’ शब्द का दूसरा उपयोग भी देखते हैं जैसी कि हमने प्रारंभ में चर्चा की थी। जब हम किसी ऐसे खाद्य पदार्थ को देखते हैं जिसे हम पसंद करते हैं तो अनायास ही हमारे मुँह में पानी आ जाता है। हृदय स्पंदन के बारे में हम न भी सोचें तब भी यह होगा। वास्तव में, इनके बारे में सोचकर या चाहकर भी आसानी से हम इन क्रियाओं पर नियंत्रण नहीं कर सकते हैं। क्या हमें साँस लेने के लिए या भोजन पचाने के लिए सोचना या याद करना पड़ता है? अतः सामान्य प्रतिवर्ती क्रिया जैसे पुतली के आकार में परिवर्तन तथा कोई सोची क्रिया जैसे कुर्सी खिसकाना के मध्य एक और पेशी गति का सैट है जिस पर हमारे सोचने का कोई नियंत्रण नहीं है। इन अनैच्छिक क्रियाओं में से कई मध्यमस्तिष्क तथा पश्चमस्तिष्क से नियंत्रित होती हैं। ये सभी अनैच्छिक क्रियाएँ जैसे रक्तदाब, लार आना तथा वमन पश्चमस्तिष्क स्थित मेडुला द्वारा नियंत्रित होती हैं।

कुछ क्रियाओं जैसे एक सीधी रेखा में चलना, साइकिल चलाना, एक पेंसिल उठाना पर विचार कीजिए। ये पश्चमस्तिष्क में स्थित भाग अनुमस्तिष्क द्वारा ही संभव है जो ऐच्छिक क्रियाओं की परिशुद्धि तथा शरीर की संस्थिति तथा संतुलन के लिए उत्तरदायी है। कल्पना कीजिए कि यदि हम इनके बारे में नहीं सोच रहे हैं और ये सभी घटनाएँ काम करना बंद कर दें, तो क्या होगा?

ये ऊतक रक्षित कैसे होते हैं?

“मस्तिष्क की तरह कोमल अंग जो विविध क्रियाओं के लिए बहुत आवश्यक की सावधानीपूर्वक रक्षा भी होनी चाहिए। इसके लिए शरीर की अभिकल्पना इस प्रकार की है कि मस्तिष्क एक हड्डियों के बॉक्स में अवस्थित होता है। बॉक्स के अंदर तरलपूरित गुब्बारे में मस्तिष्क होता है जो प्रघात अवशोषक उपलब्ध कराता है। यदि आप अपने हाथ को कमर के मध्य के नीचे ले जाएँ तो आप एक कठोर, उभार वाली संरचना का अनुभव करेंगे। यह कशेरुकदंड या रीढ़ की हड्डी है जो मेरुरज्जु की रक्षा करती है।

तंत्रिका ऊतक कैसे क्रिया करता है?


अब तक हम तंत्रिका ऊतक की चर्चा कर रहे थे, यह कैसे सूचना एकत्र करता है, इन्हें शरीर में भेजता है, सूचनाओं को संसाधित करता है, सूचनाओं के आधार पर निर्णय लेता है और पेशियों तक क्रिया के लिए निर्णय को संवाहित करता है। दूसरे शब्दों में, जब क्रिया या गति संपन्न होनी होती है, पेशी ऊतक अंतिम काम करेंगे। जंतु पेशी कैसे गति करती है? जब तंत्रिका आवेग पेशी तक पहुँचता है तो पेशी को गति करनी चाहिए। एक पेशी कोशिका कैसे गति करती है? कोशिकीय स्तर पर गति के लिए सबसे सरल धारणा है कि पेशी कोशिकाएँ अपनी आकृति बदलकर गति करती हैं। अतः आगामी प्रश्न है कि पेशी कोशिकाएँ आकृति कैसे बदलती हैं? इनका उत्तर कोशिकीय अवयव के रसायन में निहित है। पेशी कोशिकाओं में विशेष प्रकार की प्रोटीन होती है जो उनकी आकृति तथा व्यवस्था दोनों को ही बदल देती है कोशिका में यह तंत्रिका विद्युत आवे की अनुक्रिया के फलस्वरूप होता है। जब यह घटना होती है तो इन प्रोटीन की नयी व्यवस्था पेशी की नयी आकृति देती है। स्मरण कीजिए जब हमने कक्षा 9 में पेशी ऊतक की चर्चा की थी तब भिन्न प्रकार की पेशियाँ जैसे ऐच्छिक पेशियाँ तथा अनैच्छिक पेशियाँ थीं। अब तक हमने जो चर्चा की है इसके आधार पर आपके विचार में इनमें क्या अंतर हो सकते हैं?

पादपों में समन्वय


शरीर की क्रियाओं के नियंत्रण तथा समन्वय के लिए जंतुओं में तंत्रिका तंत्र होता है। लेकिन पादपों में न तो तंत्रिका तंत्र होता है और न ही पेशियाँ अतः वे उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया कैसे करते हैं? जब हम छुई-मुई के पादप की पत्तियाँ छूते हैं तो वे प्रारंभ कर देती हैं तथा नीचे झुक जाती हैं। जब एक बीज अंकुरित होता है तो जड़ें नीचे की ओर जाती हैं तथा तना ऊपर की ओर आता है। जानते हो क्या होता है ? छुई-मुई की पत्तियाँ स्पर्श की अनुक्रिया से बहुत तेजी से गति करती हैं। इस गति से वृद्धि का कोई संबंध नहीं है। दूसरी ओर नवोद्भिद की दिशिक गति वृद्धि के कारण होती है। यदि इसकी वृद्धि को किसी प्रकार रोक दिया जाए तब यह कोई गति प्रदर्शित नहीं करेगा। अतः पादप दो भिन्न प्रकार की गतियाँ दर्शाते हैं- एक वृद्धि पर आश्रित है और दूसरी वृद्धि से मुक्त है।


उद्दीपन के लिए तत्काल अनुक्रिया


आइए पहले प्रकार की गति पर विचार करते हैं जैसे छुई-मुई के पौधे की गति । क्योंकि यह वृद्धि से संबंधित नहीं है, पादप को स्पर्श की अनुक्रिया के फलस्वरूप अपनी पत्तियों में गति करनी चाहिए । लेकिन यहाँ कोई तंत्रिका ऊतक नहीं है और न ही कोई पेशी ऊतक। फिर पादप कैसे स्पर्श का संसूचन करता है और किस प्रकार अनुक्रिया में पत्तियाँ गति करती हैं ?
यदि हम विचार करें कि पौधे को किस बिंदु पर छुआ जाता है और पौधे के किस भाग में गति होती है यह आभासी है कि स्पर्श वाला बिंदु तथा गति वाला बिंदु दोनों भिन्न हैं। अतः स्पर्श होने की सूचना संचारित होनी चाहिए। पादप इस सूचना को एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचारित करने के लिए वैद्युत – रसायन साधन का उपयोग भी करते हैं लेकिन जंतुओं की तरह पादप में सूचनाओं के चालन के लिए कोई विशिष्टीकृत ऊतक नहीं होते हैं। अंत में जंतुओं की तरह ही गति करने के लिए कुछ कोशिकाओं को अपनी आकृति बदल लेनी चाहिए। पादप कोशिकाओं में जंतु पेशी कोशिकाओं की तरह विशिष्टीकृत प्रोटीन तो नहीं होतीं अपितु वे जल की मात्रा में परिवर्तन करके अपनी आकृति बदल लेती हैं, परिणामस्वरूप फूलने या सिकुड़ने में उनका आकार बदल जाता है।


वृद्धि के कारण गति


मटर के पौधे की तरह कुछ पादप दूसरे पादप या बाड़ पर प्रतान की सहायता से ऊपर चढ़ते हैं। ये प्रतान स्पर्श के लिए संवेदनशील हैं। जब ये किसी आधार के संपर्क में आते हैं तो प्रतान का वह भाग जो वस्तु के संपर्क में है, उतनी तीव्रता से वृद्धि नहीं करता है जितना प्रतान का वह भाग जो वस्तु से दूर रहता है। इस कारण प्रतान वस्तु को चारों ओर से जकड़ लेता है। आमतौर पर, पादप धीरे से एक निश्चित दिशा में गति करके उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया करते हैं। क्योंकि यह वृद्धि दिशिक है इससे ऐसा लगता है कि पादप गति कर रहा है। आइए इस प्रकार की गति को एक उदाहरण की सहायता से समझते हैं।

7.2.1 उद्दीपन के लिए तत्काल अनुक्रिया
आइए पहले प्रकार की गति पर विचार करते हैं जैसे छुई-मुई के पौधे की गति । क्योंकि यह वृद्धि से संबंधित नहीं है, पादप को स्पर्श की अनुक्रिया के फलस्वरूप अपनी पत्तियों में गति करनी चाहिए । लेकिन यहाँ कोई तंत्रिका ऊतक नहीं है और न ही कोई पेशी ऊतक। फिर पादप कैसे स्पर्श का संसूचन करता है और किस प्रकार अनुक्रिया में पत्तियाँ गति करती हैं ?
यदि हम विचार करें कि पौधे को किस बिंदु पर छुआ जाता है और पौधे के किस भाग में गति होती है यह आभासी है कि स्पर्श वाला बिंदु तथा गति वाला बिंदु दोनों भिन्न हैं। अतः स्पर्श होने की सूचना संचारित होनी चाहिए। पादप इस सूचना को एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचारित करने के लिए वैद्युत – रसायन साधन का उपयोग भी करते हैं लेकिन जंतुओं की तरह पादप में सूचनाओं के चालन के लिए कोई विशिष्टीकृत ऊतक नहीं होते हैं। अंत में जंतुओं की तरह ही गति करने के लिए कुछ कोशिकाओं को अपनी आकृति बदल लेनी चाहिए। पादप कोशिकाओं में जंतु पेशी कोशिकाओं की तरह विशिष्टीकृत प्रोटीन तो नहीं होतीं अपितु वे जल की मात्रा में परिवर्तन करके अपनी आकृति बदल लेती हैं, परिणामस्वरूप फूलने या सिकुड़ने में उनका आकार बदल जाता है।
7.2.2 वृद्धि के कारण गति
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मटर के पौधे की तरह कुछ पादप दूसरे पादप या बाड़ पर प्रतान की सहायता से ऊपर चढ़ते हैं। ये प्रतान स्पर्श के लिए संवेदनशील हैं। जब ये किसी आधार के संपर्क में आते हैं तो प्रतान का वह भाग जो वस्तु के संपर्क में है, उतनी तीव्रता से वृद्धि नहीं करता है जितना प्रतान का वह भाग जो वस्तु से दूर रहता है। इस कारण प्रतान वस्तु को चारों ओर से जकड़ लेता है। आमतौर पर, पादप धीरे से एक निश्चित दिशा में गति करके उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया करते हैं। क्योंकि यह वृद्धि दिशिक है इससे ऐसा लगता है कि पादप गति कर रहा है। आइए इस प्रकार की गति को एक उदाहरण की सहायता से समझते हैं।


पर्यावरणीय प्रेरण जैसे प्रकाश या गुरुत्व पादप की वृद्धि वाले भाग में दिशा परिवर्तित कर देते हैं। ये दिशिक या अनुवर्तन गतियाँ उद्दीपन की ओर या इससे विपरीत दिशा में हो सकती हैं। अतः इन दो भिन्न प्रकार की प्रकाशानुवर्तन गतियों में प्ररोह प्रकाश की ओर मुड़कर अनुक्रिया तथा जड़ इससे दूर मुड़कर अनुक्रिया करते हैं।यह पादप की सहायता कैसे करता है?

पादप अन्य उद्दीपनों के लिए भी अनुक्रिया करके अनुवर्तन दिखाते हैं। एक पादप की जड़ सदैव नीचे की ओर वृद्धि करती है जबकि प्ररोह प्रायः ऊपर की ओर तथा पृथ्वी से दूर वृद्धि करते हैं। यह प्ररोह तथा जड़ में क्रमशः उपरिगामी तथा अधोगामी वृद्धि पृथ्वी या गुरुत्व के खिंचाव की अनुक्रिया निःसंदेह गुरुत्वानुवर्तन है। यदि जल का अर्थ पानी तथा रसायन का अर्थ रासायनिक पदार्थ हो तो जलानुवर्तन तथा रसायनानुवर्तन का क्या अर्थ होगा ? क्या हम इस प्रकार के दिशिक वृद्धि गतियों के उदाहरणों के बारे में विचार कर सकते हैं? रसायनानुवर्तन का एक उदाहरण पराग नलिका का बीजांड की ओर वृद्धि करना है जिसके बारे में हम अधिक जानकारी जीवों में जनन प्रक्रम का अध्ययन करते समय प्राप्त करेंगे।

आइए, एक बार हम फिर विचार करते हैं कि बहुकोशिकीय जीवों के शरीर में सूचनाएँ किस प्रकार संचारित होती हैं। छुई-मुई में स्पर्श की अनुक्रिया की गति बहुत तीव्र है। दूसरी ओर, रात और दिन की अनुक्रिया में पुष्पों की गति बहुत मंद है। पादप की वृद्धि संबंधित गतियाँ भी मंद होती हैं।

जंतु शरीर में भी वृद्धि के लिए सावधानीपूर्वक नियंत्रित दिशाएँ हैं। हमारी भुजा और अँगुलियाँ यादृच्छ न होकर एक निश्चित दिशा में वृद्धि करती हैं। नियंत्रित गति मंद या तीव्र हो सकती है। यदि उद्दीपन के लिए तीव्र अनुक्रिया होती है तो सूचनाओं का स्थानांतरण भी बहुत तीव्र होना चाहिए। इसके लिए तीव्र गति से चलने के लिए संचरण का माध्यम होना चाहिए। इसके लिए विद्युत आवेग एक उत्तम साधन है। लेकिन विद्युत आवेग के उपयोग के लिए सीमाएँ हैं। सर्वप्रथम वे केवल उन्हीं कोशिकाओं तक पहुँचेंगी जो तंत्रिका ऊतक से जुड़ी हैं, जंतु शरीर की प्रत्येक कोशिका तक नहीं। दूसरे, एक बार एक कोशिका में विद्युत आवेग जनित होता है तथा संचरित होता है तो नया आवेग जनित करने तथा उसे संचरित करने के लिए कोशिका फिर से अपनी कार्यविधि को सुचारु करने के लिए कुछ समय लेगी। दूसरे शब्दों में कोशिकाएँ सतत विद्युत आवेग न जनित और न ही संचरित कर सकती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अधिकांश बहुकोशिकीय जीव कोशिकाओं के मध्य संचार के लिए अन्य साधनों का उपयोग करते हैं। हम पहले ही रासायनिक संचरण का संदर्भ दे चुके हैं।

यदि एक विद्युत आवेग जनित करने के अलावा उद्दीपित कोशिकाएँ एक रासायनिक यौगिक निर्मोचित करना प्रारंभ कर दें तो यह यौगिक आसपास की सभी कोशिकाओं में विसरित हो जाएगा। यदि आसपास की अन्य कोशिकाओं के पास इस यौगिक को संसूचित (detect) करने के साधन हों तो उनकी सतह पर विशेष अणुओं का उपयोग करके वे सूचनाओं का अभिज्ञान (recognise ) करने योग्य होंगे तथा इन्हें संचारित भी करेंगे। हालाँकि यह प्रक्रम बहुत धीमा होगा, लेकिन यह तंत्रिका संबंधन के बिना भी शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचेगा तथा इसे अपरिवर्ती तथा स्थायी बनाया जा सकता है। बहुकोशिकीय जंतुओं द्वारा नियंत्रण एवं समन्वय के लिए प्रयुक्त ये हॉर्मोन हमारी आशा के अनुरूप विविधता दर्शाते हैं। विविध पादप हॉर्मोन वृद्धि, विकास तथा पर्यावरण के प्रति अनुक्रिया के समन्वय में सहायता करते हैं। इनके संश्लेषण का स्थान इनके क्रिया क्षेत्र से दूर होता है और साधारण विसरण द्वारा वे क्रिया क्षेत्र तक पहुँच जाते हैं।
आइए, हम एक उदाहरण लेते हैं जो हम पहले कर चुके हैं । जब वृद्धि करता पादप प्रकाश को संसूचित ( detect) करता है, एक हॉर्मोन जिसे ऑक्सिन कहते हैं, यह प्ररोह के अग्रभाग (टिप ) में संश्लेषित होता है तथा कोशिकाओं की लंबाई में वृद्धि में सहायक होता है। जब पादप पर एक ओर से प्रकाश आ रहा है तब ऑक्सिन विसरित होकर प्ररोह के छाया वाले भाग में आ जाता है। प्ररोह की प्रकाश से दूर वाली साइड में ऑक्सिन का सांद्रण कोशिकाओं को लंबाई में वृद्धि के लिए उद्दीपित करता है। अतः पादप प्रकाश की ओर मुड़ता हुआ दिखाई देता है।
पादप हॉर्मोन का दूसरा उदाहरण जिब्बेरेलिन हैं जो ऑक्सिन की तरह तने की वृद्धि में सहायक होते हैं। साइटोकाइनिन कोशिका विभाजन को प्रेरित करता है और इसीलिए यह उन क्षेत्रों में जहाँ कोशिका विभाजन तीव्र होता है, विशेष रूप से फलों और बीजों में अधिक सांद्रता में पाया जाता है। ये उन पादप हॉर्मोन के उदाहरण हैं जो वृद्धि में सहायता करते हैं। लेकिन पादप की वृद्धि संदमन के लिए भी संकेतों की आवश्यकता है। एब्सिसिक अम्ल वृद्धि का संदमन करने वाले हॉर्मोन का एक उदाहरण है। पत्तियों का मुरझाना इसके प्रभावों में सम्मिलित है।
पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्ररोह की गति से किस प्रकार भिन्न है ? का उदाहरण दीजिए जो वृद्धि को बढ़ाता है।


जंतुओं में हॉर्मोन


ये रसायन या हॉर्मोन जंतुओं में किस प्रकार सूचनाओं के संचरण के साधन की तरह प्रयुक्त होते हैं। कुछ जंतु जैसे गिलहरी को लीजिए, जब वे विषम परिस्थिति में होती हैं तो क्या महसूस करती हैं? वे अपना शरीर लड़ने के लिए या भाग जाने के लिए तैयार करती हैं। दोनों ही बहुत जटिल क्रियाएँ हैं जिसे नियंत्रित तरीके से अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अनेक प्रकार के भिन्न ऊतकों का उपयोग होगा तथा उनकी एकीकृत क्रियाएँ मिलकर ये कार्य करेंगे। यद्यपि लड़ना या दौड़ना, दो एकांतर क्रियाएँ एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं। अतः यहाँ एक स्थिति है जिसमें कुछ सामान्य तैयारियाँ शरीर में लाभप्रद बनाई जाती हैं। ये तैयारियाँ आदर्श रूप से निकट भविष्य में किसी भी क्रिया को सरल बना देती हैं। यह सब कैसे उपलब्ध होगा ?
यदि गिलहरी में शरीर अभिकल्प तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा केवल विद्युत आवेग पर आश्रित होगा तो आगामी क्रिया को करने के लिए प्रशिक्षित ऊतकों का परिसर सीमित होगा। दूसरी ओर, यदि रासायनिक संकेत भी भेजा जाता तो यह शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचता और आवश्यक परिवर्तित परिसर बृहत हो जाता। अधिवृक्क ग्रंथि से स्रावित एड्रीनलीन हॉर्मोन द्वारा मनुष्य सहित अनेक जंतुओं में यह किया जाता है।
एड्रीनलीन सीधा रुधिर में स्रावित हो जाता है और शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचा दिया जाता है। हृदय सहित यह लक्ष्य अंगों या विशिष्ट ऊतकों पर कार्य करता है। परिणामस्वरूप हृदय की धड़कन बढ़ जाती है ताकि हमारी पेशियों को अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति हो सके। पाचन तंत्र तथा त्वचा में रुधिर की आपूर्ति कम हो जाती है क्योंकि इन अंगों की छोटी धमनियों के आसपास की पेशियाँ सिकुड़ जाती हैं। यह रुधिर की दिशा हमारी कंकाल पेशियों की ओर कर देता है। डायाफ्राम तथा पसलियों की पेशी के संकुचन से श्वसन दर भी बढ़ जाती है। ये सभी अनुक्रियाएँ मिलकर जंतु शरीर को स्थिति से निपटने के लिए तैयार करती हैं। ये जंतु हॉर्मोन अंतःस्रावी ग्रंथियों का भाग हैं जो हमारे शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय का दूसरा मार्ग है।

स्मरण कीजिए कि पादपों में हॉर्मोन होते हैं जो दिशिक वृद्धि को नियंत्रित करते हैं। जंतु हॉर्मोन क्या कार्य करते हैं? इसके बारे में, हम उनकी भूमिका की कल्पना दिशिक वृद्धि में नहीं कर सकते हैं। हमने किसी जंतु को प्रकाश या गुरुत्व पर आश्रित किसी एक दिशा में अधिक वृद्धि करते कभी नहीं देखा है! लेकिन यदि हम इसके बारे में और अधिक चिंतन करें तो यह साक्षी होगा कि जंतु शरीर में भी सावधानीपूर्वक नियंत्रित स्थानों पर वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए पादप अपने शरीर पर अनेक स्थानों पर पत्तियाँ उगाते हैं, लेकिन हम अपने चेहरे पर अँगुलियाँ नहीं उगाते हैं। हमारे शरीर की अभिकल्पना, बच्चों की वृद्धि के समय भी सावधानीपूर्वक अनुरक्षित है।
यह समझने के लिए कि समन्वित वृद्धि में हॉर्मोन कैसे सहायता करते हैं, आइए कुछ उदाहरणों की परीक्षा करते हैं। नमक के पैकेट पर हम सबने देखा है ‘आयोडीन युक्त नमक’ या ‘आयोडीन से संवर्धित ।

हमें अपने आहार में आयोडीन युक्त नमक लेना क्यों आवश्यक है?

अवटुग्रंथि को थायरॉक्सिन हॉर्मोन बनाने के लिए आयोडीन आवश्यक है। थॉयरॉक्सिन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के उपापचय का, हमारे शरीर में नियंत्रण करता है ताकि वृद्धि के लिए उत्कृष्ट संतुलन उपलब्ध कराया जा सके। थायरॉक्सिन के संश्लेषण के लिए आयोडीन अनिवार्य है। यदि हमारे आहार में आयोडीन की कमी है तो यह संभावना है कि हम गॉयटर से ग्रसित हो सकते हैं। इस बीमारी का एक लक्षण फूली हुई गर्दन है।

क्या आप इसे में अवटुग्रंथि की स्थिति से संबंधित कर सकते हो ?
कभी-कभी हम ऐसे व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं जो बहुत छोटे (बौने) होते हैं या बहुत अधिक लंबे होते हैं। क्या आपको कभी आश्चर्य हुआ है यह कैसे होता है ? पीयूष ग्रंथि से स्रावित होने वाले हॉर्मोन में एक वृद्धि हॉर्मोन है। जैसा इसका नाम इंगि करता है वृद्धि हॉर्मोन शरीर की वृद्धि और विकास को नियंत्रित करता है। यदि बाल्यकाल में इस हॉर्मोन की कमी हो जाती है तो यह बौनापन का कारण बनता है।
जब आप या आपके दोस्तों की आयु 10-12 वर्ष रही होगी तो आपने अपने और उनके अंदर कई नाटकीय अंतर देखे होंगे। ये परिवर्तन यौवनारंभ से संबद्ध हैं क्योंकि नर में टेस्टोस्टेरोन तथा मादा में एस्ट्रोजन का स्रावण होता है।
क्या आप अपने परिवार या दोस्तों में किसी को जानते हो जिन्हें डॉक्टर ने अपने आहार में कम शर्करा लेने की सलाह दी हो क्योंकि वे मधुमेह के रोगी हैं। उपचार के रूप में वे इंसुलिन का इंजेक्शन भी ले रहे हों। यह एक हॉर्मोन है जिसका उत्पादन अग्न्याशय में होता है और जो रुधिर में शर्करा स्तर को नियंत्रित करने में सहायता करता है। यदि यह उचित मात्रा में स्रावित नहीं होता है तो रुधिर में शर्करा स्तर बढ़ जाता है। और कई हानिकारक प्रभाव का कारण बनता है।
यदि यह इतना आवश्यक है कि हॉर्मोन का स्रावण परिशुद्ध मात्रा में होना चाहिए तो हमें एक क्रियाविधि की आवश्यकता है जिससे यह किया जाता है। स्रावित होने वाले हॉर्मोन का समय और मात्रा का नियंत्रण पुनर्भरण क्रियाविधि से किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि रुधिर में शर्करा स्तर बढ़ जाता है तो इसे अग्न्याशय की कोशिका संसूचित (detect) कर लेती है तथा इसकी अनुक्रिया में अधिक इंसुलिन स्रावित करती है। जब रुधिर में शर्करा स्तर कम हो जाता है तो इंसुलिन का स्रावण कम हो जाता है।


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