कपास (Cotton)केश + रेशे वाली फसल

  • वानस्पतिक नाम – गोसीपीयम स्पेसीज
  • कुल – मालवेसी
  • उत्पत्ति -भारत
  • कपास को सफेद सोना / रेशा वाली फसलों का राजा (White Gold or king of fibre) भी कहते हैं।
  • कपास की खली में 6% नाइट्रोजन पाया जाता है।
  • विश्व में कपास के क्षेत्रफल में भारत का स्थान प्रथम है।-
  • वर्ष 2020 में उत्पादन में भारत का दित्तीय स्थान है प्रथम चीन व USA का तीसरा स्थान है ।
  • कपास दिवस निष्प्रभावी पौधा (Day netural & C3 plant) हैं।
  • भारत में उत्पादन व क्षेत्रफल में गुजरात राज्य का प्रथम स्थान है।
  • राजस्थान में उत्पादन व क्षेत्रफल में हनुमानगढ़ जिले का प्रथम स्थान है।
  • कपास की रूई की एक गांठ (Bale) का वजन 170 Kg होता है। जबकी जूट की एक गांठ (Bale) का वजन 180 Kg होता है।
  • कपास में तेल की मात्रा 15 से 25 प्रतिशत पाई जाती है।कपास में रेशा व बिनोला अनुपात (Ginning %) – 33% होता है।
  • उन्नत किस्मों में रेशा की मात्रा बीजों से ज्यादा होती है।
  • कपास (Seed Cotton /kapas) = Seed + Lint
  • Cotton Seed = Lint को हटाने के बाद जो बीज बचता है वह Cotton Seeds कहलाता है।
  • कपास का रेशा फल से प्राप्त होता है जो सल्यूलोस से बना होता है।
  • रेशा बीज भित्ती की बाहरी वृद्धि होती है।
  • कपास के लम्बे रेशों (व्यवसायिक उपयोगी) को लिंट (lint) व छोटे रेशी को फज (fuzz.) कहते है।
  • बुआई से पहले कपास के बीजों से फज हटाने एवं बीजों के आवरण को मुलायम करने के लिए H2SO4 अम्ल 1 अनुपात एवं 10 अनुपात में बीज काम में लेते है। इससे अंकुरण भी अच्छा होता एवं बीज आवरण में पायी जाने वाली व्याधियों के जर्म एवं कीट आदि भी नष्ट हो जाते है।
  • कपास के पौधे में फुलों को squar तथा फलों को डोडा (boll) कहते है।
  • कपास की शाखाऐं (Branches) – कपास में दो प्रकार की शाखाएं पाई जाती है।
  • मोनोपोडियल (Monopodial) शाखाएं – वानस्पतिक शाखाओं को मोनोपोडियल शाखा कहलाता है।
  • सिम्पोडियल (Sympodil) शाखा- ये कपास में प्रजननीय शाखाएं है जिन पर फल लगता है।
    परागण (Pollination)
  • कपास बहुधा परपरागित (Often cross pollinated) फसल है इसमें परागण (Pollination) मधुमक्खीयों के द्वारा होता है।
  • H – 4 विश्व कि पहली संकर (Hybrid) किस्म है जिसे CT पटेल ने गुजरात में 1970 में विकसित किया।
    कपास का वर्गीकरण (Clasification)
  • देशी कपास (द्विगुणित 2n=26 ) – पुराने विश्व की कपास भी कहलाती है।
    a.गोसीपीयम अरबोरियम
    b. गोसीपीयम हरबेसियम
  • अमेरिकन कपास (चर्थुगुणित 2n=52 ) – नये विश्व की कपास ।
    a.गोसीपीयम हिरसुटम (अमेरिकन कपास)
    b. गोसीपीयम बारबेडेन्स (इजिप्सियन कपास)
    मृदा एवं जलवायु (Soil & Climate)
  • उष्ण जलवायु का पौधा है।
  • बुवाई मई जून में उपयुक्त है।
  • भारत में 96% क्षेत्र पर हिरसुटम प्रजाती व उसके संकर उगाये जाते है।
  • मृदा क्ले (चिकनी) या काली कपास मृदायें सर्वोत्तम होती है जलोढ़ मृदा भी खेती कि जाती है।
  • PH. 5.5 – 8.5
  • तापमान (Temprature)
  • बीज अंकुरण के लिए – 16°C से अधिक ।
  • वानस्पतिक वृद्धि – के लिए 21-27°C
  • फल पकते समय 27 – 32°C तापमान
  • किस्में (Varieties)
  • देशी कपास की किस्में
    → लोहित – सूखा सहनशील, लाल रंग का पौधा 10-12 qt. / ha. yield
  • → दिग्विजय
    → प्रताप कृषि – 1 (असिंचित क्षेत्र के लिए)
    → गिरनार
    -> RG-8
  • अमेरिकन किस्में –
    → बीकानेरी नरमा
    160 180 दिनों में पक कर तैयार, राजस्थान,
    पंजाब, हरियाणा के शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त ।
    → गंगानगर अगेती
    → सुजाता
    → सुवीन
    → RS-89 – ARS से विकसित, सिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त
    → RS-2013
    → RST-875
    → RST-9
  • संकर (Hybrid) किस्में –
    H-4 / संकर-4 (कपास का प्रथम हाईब्रिड जो सी.टी. पटेल द्वारा GAU से विकसित)
    → H-6
    → Gj-22
    → वारालक्ष्मी (UAS, Dharwad द्वारा विकसित अन्तरजातीय संकरण)
  • मरू विकास (Raj. HH-16 ) – राजस्थान की प्रथम हाईब्रिड कपास
    → सूर्या, सविता
    → MCU-5 – अत्यधिक लम्बा रेशा पाया जाता है।
  • → धनलक्ष्मी
  • BT कपास कि किस्में –
  • → अंकूर
  • → MECH-4
  • RCH-138 1
  • → MECH-162
  • → बॉलगार्ड-2
  • बीजदर (Seed Rate):
  • a. देशी कपास
  • 10 से 18 Kg/ha
  • दुरी- 45-60x15cm
  • देशी कपास के बीज छोटे आकर के, पौधे पतले व सीधे रहते है, डोडों से पकने के बाद भी रूई नही झड़ती, रेशा आकार में मोटा व छोटा होता है तथा कीट व्याधियों का प्रकोप कम हेता है।
    b. अमेरीकन कपास
    ■ 18 से 20Kg/ha
  • दुरी 60 x 30cn.
  • पादप संख्य 55000 प्रति हेक्टेयर ।
  • इस कपास के बीज बड़े आकार के, पौधे बड़े एंव झाड़ीनुमा होते है, रूई चमकिली होती है लेकिन पकने पर झड़ती है।
  • इस कपास में बिमारीयों का प्रकोप ज्यादा होता है तथा रेशा पतला व. लम्बा (2 से.मी. से अधिक) होता है।
    c. संकर कपास
    2 – 3Kg/ha
    दुरी – 100 x 60cmM
  • 13388 plants/ha.
    d. Bt. कपास
  • बीज दर : 1 – 1.5Kg/ha
  • दुरी – 100 x 100cm (10,000 plants/ha.)
  • Bt. कपास के बीजों के पैकिट के साथ 20% बीज non Bt कपास के भी दिये जाते है। जिन्हे लगाना आवश्यक होता है, जिससे कपास के डोडों की लटटे Bt. कपास के प्रति रोधि नही हो पाती
  • विश्व में Bt कपास की पहली पीढी (BG-I) 1996 में विकसित हुई, जिसमें कपास के डोडे की लटों को मारने वाली crylAc जीन बैसिलस थुरिन्जेनसिस बेक्टिरीया से प्राप्त कर कपास के पौधे में डाली गयी थी, जिसे भारत में लगाने की अनुमति 2002 में GEAC द्वारा मिली।
  • विश्व में Bt कपास की दुसरी पीढी (BG-II) 2006 में विकसित की गयी,
  • जिसमें crylAC एवं Cry 2Ab जीन डाली गयी, क्योंकि कई क्षेत्रों में BG-I
  • किस्मों के प्रति डोडे की लटे रोधी हो चुकी थी। भारत में BG-I एवं BG-II दोनों की किस्में प्रचलित है।
  • बीटी कपास के मुख्य खेत के चारों और 20 प्रतिशत क्षेत्र में नॉन बीटी कपास उगाना रिफुजिया (Refugia strategy) कहलाता है। RPSC AO-2009
  • बीटी कपास जैव प्रोद्योगिकी द्वारा विकसित आनुवाशिक रूपान्तरित (GM) फसल है जो कपास के डोडे की लटों के प्रति प्रतिरोधक है।
  • भारत में बीटी कपास का क्षेत्रफल 12.6 मिलियन हेक्टेयर (कुल कपास का 96 प्रतिशत) है।
  • बीटी कपास की भारत में स्वीकृति 2002 व व्यवसायिक उत्पादन 2002 – 2003 में प्रारम्भ हुआ।
  • बीटी कपास में terminator gene डाली जाती है, जिससे इसका प्रभाव पौधे में केवल एक वर्ष तक रहता है। इस कारण bt कपास के बीज प्रत्येक वर्ष नये खरीदने पडते है।
  • खरपरवार प्रबन्ध (Weeds Management)
  • एलाक्लोर (लासो) @1kg/ha. अंकुरण पूर्व ।
  • बेसालिन (फ्लूक्लोरालीन) @1kg/ha. बुआई पूर्व
  • डाइयुरोन (Diuron) अंकुरण पूर्व (Pre emergence) @ 0.5 Kg./ha यह कपास का शाकनाशी (cotton herbicide) कहलाता है।
  • कपास में कभी भी 2,4-D खरपतवारनाशी काम में नहीं लेते हैं क्योंकि यह पौधें पर विषैला प्रभाव डालता है तथा इसके प्रयोग से कपास की पत्तियां अंगुलीनूमा हो जाती है।
  • कपास के दैहिक विकार (Physical disorder)
  • तिराक (Tirak) –
  • गांठ (Seed ball) का परिपक्व होने से पहले फट जाना तिराक कहलाता है।
  • यह समस्या क्षारीय मृदा में N की कमी होती है वहाँ ज्यादा होती है।
  • लिटल लीफ (Little leaf):-
    विकार में पौधे की पत्तियां छोटी हो जाती है
  • . यह जिंक की कमी से होता है।
  • Crinkle Leaf :-
  • इस विकार में पौधे की पत्तियां सिकुड़ जाती है।
  • यह Mn की अधिकता से होता है।
  • रोग (Diseases)
  • जीवांणु अंगमारी / ब्लेक आर्म/झुलसा- जेन्थोमोनॉस मालवेसेरम • यह कपास का प्रमुख जीवाणु जनित रोग है।
    इसे कपास का काली भूजा (Angular leaf spot) रोग भी कहते हैं।
  • इसकी रोकथाम Streptocycline @ 0.1g/litre एवं कॉपर ऑक्सीक्लोराइड @ 1g/litre का छिड़काव करते हैं।
  • उकटा (फ्यूजेरीयम स्पेसीज)-
  • मैंन्कोजेब 0.2% का छिड़काव करें।
    Refugia strategy:-
  • मुख्य बीटी कपास के खेत के चारों तरफ गैर बीटी कपास के लिए 20% क्षेत्र रखा गया है
  • इसके पीछे उद्देश्य बीटी कपास के खिलाफ बॉल लटों के प्रतिरोध को रोकना है।
    महत्वपूर्ण बिंदु:
  • फाइबर की लंबाई एवं पतलापनः आनुवांशिक लक्षण है। • कपास की उत्पत्तिः भारत
    •कपास में लिंट प्रतिशत (ginning %) है: 33%
    · फाइबर की परिपक्वता कीसके द्वारा मापी जाती है: एरियालोमीटर
    फाइबर की मोटाई मापी जाती है: नेपिनेस द्ववारा
  • कताई प्रदर्शन कीसके द्वारा मापा जाता है: गिनती की संख्या ( number
    of counts)
  • · कपास की एक गठरी (bale) का वजन: 170 किलो ।
  • · कपास के बीज में तेल की मात्रा 14.5 से 25.6% तक होती है
  • कपास के बीज में मौजूद विषाक्त वर्णक/फिनोल यौगिक है: गॉसिपोल ।
  • कपास का रेशा (cotton fiber) बीज आवरण के एक एपिडर्मल कोशिका की वृद्धि या बहिर्गमन है।

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