पाठ -12 दक्षिण भारत Dakshin Bharat

दक्षिण भारत


“दक्षिण भारत की प्रारम्भिक जानकारी हमें सम्राट अशोक के अभिलेखों तथा संगम साहित्य से प्राप्त होती है। संगम साहित्य में हमें दक्षिण के तीन राज्यों चेर, चोल तथा पांड्य राज्यों का वर्णन मिलता है। छठी से ग्यारहवी शताब्दी के मध्य दक्षिण भारत में कुछ नवीन राज्यों का उदय हुआ।”


विंध्य पर्वत तथा नर्मदा नदी उत्तर भारत को दक्षिण भारत से अलग करती है। विंध्य पर्वत माला से लेकर कन्याकुमारी तक के विशाल भू भाग को दक्षिण भारत कहते हैं । इसका आकार त्रिभुजाकार है । पूर्वी घाट पर बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिमी घाट पर अरब सागर स्थित है। कन्याकुमारी हिन्द महासागर अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के मिलन बिन्दु पर स्थित है। इन भौगोलिक विविधताओं के बीच छठी से ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य राष्ट्रकूट, चालुक्य, पल्लव तथा चौल वंश का उदय हुआ। इन राज्यों ने न केवल दक्षिण भारत अपितु उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था को भी प्रभावित किया। इन राज्यों ने कला एवं साहित्य के विकास पर विशेष ध्यान दिया। दक्षिण भारतीय शासकों की मन्दिर निर्माण में विशेष रुचि थी। इन शासकों ने एलोरा का कैलाश मन्दिर, विरुपाक्ष मन्दिर, बृहदेश्वर मन्दिर, महाबलीपुरम् का रथ मन्दिर जैसे विश्व प्रसिद्ध मन्दिरों का
निर्माण कराया। इन्होंने भारतीय कला एवं संस्कृति को दूर दराज के देशों तक फैलाया ।


राष्ट्रकूट वंश-(मान्यखेट) –

राष्ट्रकूट वंश का प्रथम शासक दन्तिदुर्ग था। इन्होंने अपनी राजधानी ‘मान्यखेट’ को बनाया जो आधुनिक शोलापुर (महाराष्ट्र) के निकट थी। दन्तिदुर्ग के बाद कृष्ण प्रथम शासक बना। कृष्ण प्रथम ने एलोरा के प्रसिद्ध कैल मन्दिर का निर्माण कराया।

चालुक्य (वातापी)-

चालुक्य वंश के संस्थापक पुलकेशिन प्रथम थे। इन्होंने वातापी को अपनी राजधानी बनाया। वातापी का आधुनिक नाम बादामी है जो कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले में स्थित है। इसी वंश के प्रतापी शासक पुलकेशिन द्वितीय ने उत्तर भारत के सम्राट हर्षवर्धन को युद्ध में पराजित किया था। चालुक्य शासकों ने कई मन्दिरों का निर्माण कराया जिसमें वातापी का विरूपाक्ष मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है।


पल्लव वंश-(कांची) –

पल्लव वंश के संस्थापक सिंह विष्णु थे । पल्लव शासकों ने कांची को राजधानी बनाया। वर्तमान समय में यह स्थान तमिलनाडु राज्य में स्थित है। सिंह विष्णु के बाद महेन्द्रवर्मन, नरसिंहवर्मन प्रथम, महेन्द्रवर्मन द्वितीय, राज सिंह आदि शासक हुए। इस वंश के शासकों ने महाबलीपुरम् में बने रथ मन्दिर को बनवाया। यह मन्दिर एक विशाल पत्थर को काटकर बनाया गया है। पल्लवों के काल में कला के क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति हुई थी ।


चोल वंश (तंजौर)-

चोल वंश एक प्राचीन राजवंश है चोल वंश का उल्लेख अशोक के शिलालेख में मिलता है। दूसरी शताब्दी ईस्वी में करिकाल नामक शासक ने बहुत से राज्यों को जीता था। आठवीं शताब्दी में विजयालय ने पुनः चोल वंश की सर्वोच्चता को स्थापित किया। इन्होंने तंजौर को अपनी राजधानी बनाया। इस वंश के शासकों ने भारतीय सीमा से बाहर भी राज्य विस्तार किया। चोल शासक राजेन्द्र प्रथम ने सम्पूर्ण श्रीलंका को जीत लिया था ।


शासन व्यवस्था-दक्षिण भारत के राज्यों की शासन व्यवस्था में राजा ही सर्वोपरि होता था। राजा की सहायता के लिए मंत्री तथा कर्मचारी होते थे। उन मंत्रियों और कर्मचारियों की नियुक्ति राजा स्वयं करता था। इस प्रकार उन मंत्रियों और कर्मचारियों पर उनका नियंत्रण रहता था।
चोलों की शासन प्रणाली बहुत विकसित और सुव्यवस्थित थी। समस्त साम्राज्य को ‘राष्ट्रम’ कहते थे। प्रान्तों को ‘मण्डलम’, जनपद को ‘नाडु’ तथा गाँवों को ‘कुर्रम’ कहा जाता था। कुर्रमवासी अपनी बैठकों में समस्याओं का समाधान करते थे। वे सिंचाई के लिए तालाब बनवाते थे, कर वसूलते थे। ये आर्थिक रूप से स्वावलम्बी थे। यहीं से स्थानीय स्वशासन यानि आज से मिलती-जुलती पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत हुई।

सामाजिक स्थिति

दक्षिण भारत का समाज भी वर्ण व्यवस्था पर आधारित था। इस समय समाज में दो वर्ग-ब्राह्मण व गैर ब्राह्मण ही थे। सभी अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते थे। समाज में स्थिरता थी। राज्य में धनी और गरीबों में अन्तर था। धनवान व्यक्तियों के मकान सुन्दर एवं सुसज्जित होते थे। गरीबों के घर सादे होते थे और फर्श कच्ची ईंट की होती थी। किसान भूमि के स्वामी माने जाते थे परन्तु मजदूरों की दशा अच्छी न थी। कृषि मजदूर दासों की तरह ही थे ।

धार्मिक स्थिति

दक्षिण भारत के शासक हिन्दू धर्म को मानने वाले थे, वे अन्य धर्मों के प्रति भी उदार थे। वे बौद्ध एवं जैन धर्म के विहारों तथा मन्दिरों के निर्माण हेतु भी दान दिया करते थे। समाज में विष्णु तथा शिव की पूजा विशेष रूप से होती थी। शंकराचार्य ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम क्षेत्रों में मठों की स्थापना की। इन्होंने आत्मा और परमात्मा को एक बताया। ग्यारहवीं शताब्दी में दक्षिण के रामानुजाचार्य ने शक्ति और ज्ञान को ईश्वर प्राप्ति का साधन बताया।

कला-साहित्य को बढ़ावा

दक्षिण भारत के बड़े व भव्य मन्दिर ठोस चट्टानों को काट कर निर्मित किए गए थे। इनके शिखर आयताकार, ऊँचे एवं कई मंजिलों के होते थे। मन्दिर की दीवारों पर सुन्दर कृतियाँ बनाई जाती थीं। इस प्रकार के मन्दिर उस समय तक उत्तर भारत में नहीं निर्मित हुए थे।


बृहदेश्वर मन्दिर का निर्माण चोल राजाओं ने कराया। यह चौदह मंजिला ऊँचा है। इस समय की मूर्ति
कला भी बहुत विकसित थी। इस मन्दिर में धातु की बनी नटराज की सुन्दर मूर्ति स्थापित है। साहित्य की प्रगति
दक्षिण भारत के राजा शिक्षा व साहित्य के प्रेमी थे । अतः दक्षिण भारत में संस्कृत व तमिल के अलावा अन्य स्थानीय भाषाओं जैसे कन्नड़ की भी पर्याप्त उन्नति हुई। पल्लव शासकों के समय में संस्कृत भाषा की विशेष उन्नति हुई। कांचीपुरम पल्लवों की राजधानी होने के अलावा तमिल और संस्कृत के अध्ययन का केन्द्र भी था। महान संस्कृत कवि दण्डी पल्लव राजा नरसिंह वर्मन द्वितीय की राजसभा में थे। कम्बन द्वारा लिखित ‘रामायणम्’ ग्रन्थ तुलसीकृत रामचरितमानस की भाँति दक्षिण में लोकप्रिय है।

आय के स्रोत-व्यापार व कृषि

दक्षिण भारत में मसालों का उत्पादन बहुत होता है वे अपने इन प्राकृतिक संसाधनों एवं व्यापार से बहुत लाभ उठाते रहे। दक्षिण पूर्व एशिया से इनके अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध थे। प्राचीन काल में ये लोग यूनान, रोम व मिस्र के साथ दूसरी ओर मलय द्वीप समूह के साथ तथा वहाँ से चीन के साथ व्यापार करते थे।

इनका प्रमुख बन्दरगाह महाबलीपुरम् था जो स्थानीय व सुदूर व्यापार के कारण राजकोष की आय के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था। नदियों के तटीय इलाकों में धान व गन्ना की उपज होती थी।

दक्षिण भारत का विदेशों से सम्पर्क

चोल वंश के राजा राजेन्द्र चोल प्रथम के पास बहुत बड़ी जलसेना थी जिसकी सहायता से उन्होंने दक्षिणी पूर्वी एशिया के भू-भागों लंका, निकोबार द्वीप, मलाया तथा मलाया द्वीप समूहों में अपने सम्पर्क बनाए । इस समय भारत के कुछ व्यापारी पड़ोसी देशों में गए जहाँ उन्होंने बस्तियाँ बनाईं। कुछ बौद्ध प्रचारक भी पहुँचे। विदेशों के स्थानीय लोग इनसे प्रभावित हो भारतीय विचार, कला व रीति-रिवाज अपनाते गए।

इसी प्रकार पल्लवों ने सुमात्रा में अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं, जो भारतीय संस्कृति के प्रसार के महत्वपूर्ण केन्द्र बन गए। कम्बोज (कम्बोडिया) और चम्पा, जिसके शासक शैव थे, कम्बोज को संस्कृत भाषा का केन्द्र बनाया और असंख्य लेख संस्कृत भाषा में लिखवाए। भारतीय, स्थानीय लोगों के साथ घुल-मिल गए जिससे भारतीय कला, साहित्य एवं भाषा का विस्तार हुआ। आज भी इसका प्रभाव वहाँ की स्थानीय संस्कृति में दिखाई देता है।

इण्डोनेशिया में आज भी रामायण की कहानी इतनी लोकप्रिय है कि वहाँ की जनता इस पर आधारित लोक नाट्य खेलती है। इण्डोनेशिया भाषा में आज भी कई संस्कृत के शब्द हैं

अंकोरवाट का मन्दिर– यह मन्दिर कम्बोडिया में स्थित है। यह मन्दिर विश्व की धरोहर है । इस मन्दिर की दीवारों पर रामायण-महाभारत की कहानियाँ उभरी हुई मूर्तियों में अंकित हैं ।

अद्भुत बात है कि संसार का सबसे विशाल बौद्ध मन्दिर भारत में नहीं, अपितु बोरोबुदूर (इण्डोनेशिया) में है।

अभ्यास

1.राष्ट्रकूट वंश की राजधानी कहाँ थी ?

राष्ट्रकूट वंश की राजधानी मान्यखेट थी।


2.किस चोल शासक ने श्रीलंका को जीता ?

चोल शासक राजेंद्र प्रथम ने संपूर्ण श्रीलंका को जीता ।

3.दक्षिण भारतीय मन्दिरों की विशेषताएँ लिखिए ?

दक्षिण भारतीय मंदिरों की मुख्य विशेषता चट्टानों को काट कर निर्मित किए गए थे इनके शिखर आयताकार ऊंचे एवं कई मंजिल के होते थे।


4.दक्षिणी भारत के राज्यों का किन-किन देशों से व्यापारिक सम्बन्ध था ?

दक्षिण भारत के राज्यों का यूनान, रोम व मिस्र के साथ दूसरी ओर मलय द्वीप समूह के साथ तथा वहाँ से चीन के साथ व्यापारिक संबंध था।

5.चोलों की शासन व्यवस्था का वर्णन कीजिए ।

चोलों की शासन प्रणाली बहुत विकसित और सुव्यवस्थित थी। समस्त साम्राज्य को ‘राष्ट्रम’ कहते थे। प्रान्तों को ‘मण्डलम’, जनपद को ‘नाडु’ तथा गाँवों को ‘कुर्रम’ कहा जाता था। कुर्रमवासी अपनी बैठकों में समस्याओं का समाधान करते थे।

6.दक्षिण पूर्व एशिया के देशों पर भारतीय संस्कृति के प्रभावों का वर्णन कीजिए ।

दक्षिणी पूर्वी एशिया के भू-भागों लंका, निकोबार द्वीप, मलाया तथा मलाया द्वीप समूहों में अपने सम्पर्क बनाए ।कुछ बौद्ध प्रचारक भी पहुँचे। विदेशों के स्थानीय लोग इनसे प्रभावित हो भारतीय विचार, कला व रीति-रिवाज अपनाते गए।

7.निम्नलिखित के विषय में लिखिए-

(क) अंकोरवाट– यह मन्दिर कम्बोडिया में स्थित है। यह मन्दिर विश्व की धरोहर है ।


(ख)शंकराचार्य– शंकराचार्य ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम क्षेत्रों में मठों की स्थापना की। इन्होंने आत्मा और परमात्मा को एक बताया।

(ग) रामानुजाचार्य-रामानुजाचार्य ने शक्ति और ज्ञान को ईश्वर प्राप्ति का साधन बताया।


(घ)एलोरा मन्दिर
– एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्णा प्रथम ने कराया।

8.रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

(क) एलोरा का कैलाश मन्दिर…कृष्णा प्रथम …राष्ट्रकूट शासक ने बनवाया ।

(ख) चोल काल में गाँव को…कुर्रम..कहा जाता था।
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(ग) अंकोरवाट मन्दिर……कम्बोडियाई…देश में स्थित है।

(घ) पल्लव शासकों ने … महाबलीपुरम ..मन्दिर का निर्माण कराया।

पाठ 9 गुप्तकाल
पाठ 10 पुष्यभूति वंश
पाठ -11राजपूत काल (सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी)

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