मानव स्वास्थ्य और रोग (Human Health And Disease)

एक लंबे समय तक स्वास्थ्य को शरीर और मन की ऐसी स्थिति माना गया, जिसमें देह के कुछ तरलों (ह्यूमर) का संतुलन बना रहता था। प्राचीन यूनानवासी जैसे कि हिप्पोक्रेटीज और चिकित्सा का भारतीय आयुर्वेद तंत्र भी यही दावा करते थे। ऐसा माना जाता था कि ‘काले पित्त’ (ब्लैक बाइल) वाले व्यक्ति गरम व्यक्तित्व वाले होते हैं और उन्हें बुखार होता है। इस प्रकार के निष्कर्ष का कारण मात्र विमर्शी, विचारधारा थी । विलियम हार्वे द्वारा प्रयोगात्मक विधि अपनाते हुए रक्त परिसंचरण की खोज और थर्मामीटर का उपयोग करते हुए काले पित्त वाले व्यक्तियों के शरीर का तापमान प्रसामान्य दर्शाने से स्वास्थ्य के ‘अच्छे तरल’ की परिकल्पना (हाइपोथिसिस) को गलत सिद्ध कर दिया। कुछ वर्षो बाद जैविकी ने बताया कि तंत्रिका तंत्र (न्यूरल सिस्टम) और अंत: स्रावी तंत्र (इंडोक्राइन सिस्टम) हमारे प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) को प्रभावित करता है और हमारा प्रतिरक्षा तंत्र हमारे स्वास्थ्य को बनाए रखता है। इस प्रकार मन और मानसिक अवस्था हमारे स्वास्थ्य पर असर डालती हैं। निःसंदेह, स्वास्थ्य निम्नलिखित बातों से प्रभावित होता है।

  • (क) आनुवंशिक विकार (जेनेटिक डिसऑर्डर)-वे अपूर्णताएँजिन को लेकर बच्चा जन्मता है और वे अपूर्णताएँ जो बच्चे को जन्म से ही माँ-बाप से वंशागत रूप से मिलती हैं।
  • (ख) संक्रमण और
  • (ग) हमारी जीवन शैली जिसमें, जो खाना हम खाते हैं और पानी हम पीते हैं, जो विश्राम हम शरीर को देते हैं और जो व्यायाम हम करते हैं, जो स्वभाव हमारे भीतर है और जिनकी हममें कमी है; आदि शामिल हैं।
  • हम सभी स्वास्थ्य शब्द का प्रयोग धड़ल्ले से करते हैं। इसकी क्या परिभाषा है? स्वास्थ्य का अर्थ मात्र ‘रोग की अनुपस्थिति’ अथवा ‘शारीरिक स्वस्थता’ नहीं है। इसे पूर्णरूपेण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जब लोग स्वस्थ होते हैं तो वे काम में अधिक सक्षम होते हैं। इससे उत्पादकता बढ़ती है और आर्थिक संपन्नता आती है। स्वास्थ्य से लोगों का आयुकाल बढ़ता है और शिशु तथा मातृ मृत्युदर में कमी होती है।
  • अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए संतुलित आहार, व्यक्तिगत स्वच्छता और नियमित व्यायाम बहुत महत्त्वपूर्ण है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पाने के लिए अतिप्राचीन काल से योग का अभ्यास किया जा रहा है। रोग और शरीर के विभिन्न प्रकार्यों पर उनके प्रभाव के बारे में जागरूकता, संक्रामक रोगों के प्रति टीकाकरण (प्रतिरक्षीकरण), अपशिष्टों (वेस्ट) का समुचित निपटान, रोगवाहकों (वेक्टर्स) का नियंत्रण एवं खाने और पानी के संसाधनों का स्वच्छ रखरखाव अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
  • जब शरीर के एक या अधिक अंगों या तंत्रों के प्रकार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विभिन्न चिह्न और लक्षण प्रकट होते हैं तो हम कहते हैं कि हम स्वस्थ नहीं हैं अर्थात् हमें रोग हो गया है। रोगों को मोटे तौर पर संक्रामक और असंक्रामक समूहों में बाँटा जा सकता है। जो रोग एक व्यक्ति से दूसरे में आसानी से संचारित हो सकते हैं, उन्हें संक्रामक रोग कहते हैं। संक्रामक रोग बहुत आम है और हम सब कभी न कभी इसके शिकार हुए हैं। कुछ संक्रामक रोग, जैसेकि एड्स, घातक होते हैं। असंक्रामक रोगों में कैंसर मृत्यु का प्रमुख कारण है। नशीले पदार्थों (ड्रग) और ऐल्कोहल का कुप्रयोग भी हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

मानव में सामान्य रोग


अनेक जीव जिसमें जीवाणु (बैक्टीरिया), विषाणु (वायरस), कवक (फंजाई), प्रोटोजोअन, कृमि (हेल्मिंथ) आदि शामिल हैं, मनुष्य में रोग पैदा करते हैं। ऐसे रोगकारक जीवों को रोगजनक ( पैथोजन) कहते हैं। इसलिए अधिकांश परजीवी (पैरासाइट) रोगजनक हैं, क्योंकि ये परपोषी (होस्ट) के भीतर या उसके ऊपर रहकर उसे क्षति या हानि पहुँचाते हैं। रोगजनक हमारे शरीर में कई तरह से प्रवेश कर सकते हैं एवं अपनी संख्या में वृद्धि कर हमारी सामान्य अत्यावश्यक क्रियाओं में बाधा पहुँचाते हैं। फलस्वरूप, आकृतिक (मार्फोलॉजिकल) और प्रकार्यात्मक क्षति होती है। रोगजनकों के लिए आवश्यक है कि वे परपोषी के भीतरी वातावरण के अनुसार अपने को अनुकूलित कर लें। उदाहरण के लिए जो रोगजनक आंत्र में प्रवेश करते हैं उनमें आमाशय (स्टोमक) के निम्न पीएच (pH) में जीवित रहने और विभिन्न पाचक एंजाइमों का प्रतिरोध करने की क्षमता होनी चाहिए। रोगजनक जीवों के भिन्न-भिन्न वर्गों के कुछ निरूपकों और उनसे होने वाले रोगों के बारे में यहाँ चर्चा करेंगे। उन रोगों के प्रति निरोधक और नियंत्रक उपायों के बारे में भी संक्षेप में बताएँगे।
साल्मोनेला टाइफी एक रोगजनक जीवाणु है जिससे मानव में टाइफॉइड ज्वर होता है। यह रोगजनक आमतौर से संदूषित (कंटामिनेटेड) भोजन और पानी द्वारा छोटी आँत में घुस जाता है और वहाँ से रक्त द्वारा शरीर के अन्य अंगों में पहुँच जाता है। इस रोग के कुछ सामान्य लक्षण हैं— लगातार उच्च ज्वर (39° से 40° सेंटी.), कमजोरी, आमाशय में पीड़ा, कब्ज, सिरदर्द और भूख न लगना आदि। गंभीर मामलों में आंत्र में छेद और मृत्यु भी हो सकती है। टाइफॉइड ज्वर की पुष्टि विडाल परीक्षण से हो सकती है। आयुर्विज्ञान में एक चिरप्रतिष्ठित मामला मैरी मैलॉन (उपनाम टाइफाइड मैरी) का है जिसका यहाँ उल्लेख करना सटीक है। वह पेशे से रसोईया थी और जो खाना वह बनाती थी उसके द्वारा वर्षों तक टाइफॉइड वाहक के रूप में टाइफॉइड फैलाती रही।
स्ट्रेप्टोकोकस न्युमोनी और हीमोफिल्स इंफ्लुएंजी जैसे जीवाणु मानव में न्युमोनिया रोग के लिए उत्तरदायी हैं। इस रोग में फुप्फुस (लंग्स) के वायुकोष्ठ (एलव्यूलाई) संक्रमित हो जाते हैं। संक्रमण के फलस्वरूप वायुकोष्ठों में तरल भर जाता है जिसके कारण सांस लेने में गंभीर समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। ज्वर, ठिठुरन, खाँसी और सिरदर्द आदि न्युमोनिया के लक्षण हैं। गंभीर मामलों में, होंठ और हाथ की उंगलियों के नाखूनों का रंग धूसर से लेकर नीला तक हो जाता है। स्वस्थ मनुष्य को संक्रमण किसी संक्रमित व्यक्ति द्वारा छोड़े गए बिंदुकों (ड्रॉप्लेट्स) अथवा एयरोसॉल साँस द्वारा अंदर लेने से या संक्रमित व्यक्ति के गिलास या बर्तन इस्तेमाल करने से भी हो जाता है। मानव में होने वाले कुछ अन्य जीवाण्वीय रोग हैं- अतिसार पेचिश (डाइसेंटरी), प्लेग और डिफ्थीरिया आदि ।
बहुत से विषाणु भी मानव में रोग का कारक होते हैं। विषाणुओं का ऐसा ही एक समूह नासाविषाणुओं (राइनोवायरस) का है जो मानव में सबसे ज्यादा संक्रामक रोग, सामान्य जुकाम फैलाता है। ये नाक और श्वसन पथ को संक्रमित करते हैं, लेकिन फेफड़ों को नहीं। सामान्य जुकाम ( प्रतिश्याय) के अभिलक्षण हैं- नासीय संकुलता (नेजल कंजेसन) और आस्राव, कंठ दाह, स्वररुक्षता अर्थात् फटी आवाज, खाँसी, सिरदर्द, थकावट आदि, जो प्राय: 3-7 दिन तक रहते हैं। संक्रमित व्यक्ति की खाँसी या छींकों से निकले बिंदुक जब स्वस्थ व्यक्ति द्वारा साँस लेने पर अंदर जाते हैं अथवा पेन, किताबों, प्यालों, दरवाजे की मूठों, कंप्यूटरों के कीबोर्ड या माउस जैसी संदूषित हुई वस्तुओं के संपर्क में आता है, तो उसे भी संक्रमण हो जाता है।
मानव में कुछ रोग प्रोटोजोआ से भी होते हैं। आपने मलेरिया के बारे में सुना होगा, एक ऐसा रोग जिससे मनुष्य कई सालों से लड़ता आ रहा है। प्लैजमोडियम नामक एक बहुत ही छोटा सा प्रोटोजोअन इस रोग के लिए उत्तरदायी है।
प्लैज्मोडिया की विभिन्न जातियाँ ( प्लै. वाइवैक्स, प्लै. मेलिरिआई और प्लै. फैल्सीपेरम ) विभिन्न प्रकार के मलेरिया के लिए उत्तरदायी हैं। इनमें से प्लैज्मोडियम फैल्सीपेरम द्वारा होने वाला दुर्दम (मेलिगनेंट) सबसे गंभीर है और यह घातक भी हो सकता है।

आइए प्लैज्मोडियम के जीवन चक्र पर एक निगाह डालते हैं । जब संक्रमित मादा ऐनोफेलीज मानव को काटती है तो प्लैज्मोडियम जीवाणु (स्पोरोजॉइट्स) के रूप में मानव शरीर में घुस जाते हैं। जीवाणुज संक्रामक रूप है। प्रारंभ में परजीवी यकृत में अपनी संख्या बढ़ाते रहते हैं और फिर लाल रुधिर कणिकाओं पर आक्रमण करते हैं जिससे लाल रक्त कणिकाएँ फट जाती हैं। लाल रक्त कणिकाओं के फटने के साथ ही एक अविषालु (टॉक्सिक) पदार्थ हीमोजोइन निकलता है जो ठिठुरन और प्रत्येक तीन से चार दिन के अंतराल से आने वाले उच्च आवर्ती ज्वर के लिए उत्तरदायी है। जब मादा ऐनोफेलीज मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटती है, तब परजीवी उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और उनका आगे का परिवर्धन वहाँ होता है। ये परजीवी मच्छर में बहु संख्यात्मकरूप से बढ़ते रहते हैं और जीवाणुज बन जाते हैं जो उसकी लार ग्रंथियों में जमा हो जाते हैं। जब यह मच्छर किसी मानव को काटता है तो जीवाणुज उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और इस प्रकार ऊपर वर्णित घटना आरंभ हो जाती है। यह दिलचस्प बात है कि मलेरिया परजीवी को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए, मनुष्य और मच्छर, दो परपोषियों की जरूरत पड़ती है। मादा ऐनोफेलीज रोगवाहक अर्थात् रोग का संचरण करने वाली भी है।
मानव की वृहत् आंत्र में पाए जाने वाले एंटअमीबा हिस्टोलिटिका नामक प्रोटोजोन परजीवी से अमीबता ( अमीबिएसिस) या अमीबी अतिसार होता है। कोष्ठबद्धता (कब्ज), उदरीय पीड़ा और ऐंठन, अत्यधिक श्लेषमल और रक्त के थक्के वाला मल इस रोग के लक्षण हैं। घरेलू मक्खियाँ इस रोग की शारीरिक वाहक हैं और परजीवी को संक्रमित व्यक्ति के मल से खाद्य और खाद्य पदार्थों तक ले जाकर उन्हें संदूषित कर देती हैं। मल पदार्थ द्वारा संदूषित पेय जल और खाद्य पदार्थ संक्रमण के प्रमुख स्रोत हैं।
सामान्य गोलकृमि, ऐस्कारिस और फाइलेरिया कृमि, वुचेरेरिया कुछ ऐसे कृमि हैं जो मनुष्य के लिए रोगजनक हैं। आंत्र परजीवी ऐस्कारिस से ऐस्केरिसता ( ऐस्केरिएसिस) नामक रोग होता है। आंतरिक रक्तस्राव, पेशीय पीड़ा, ज्वर, अरक्तता और आंत्र का अवरोध इस रोग के लक्षण हैं। इस परजीवी के अंडे संक्रमित व्यक्ति के मल के साथ बाहर निकल आते हैं और मिट्टी, जल, पौधों आदि को संदूषित कर देते हैं। स्वस्थ व्यक्ति में यह संक्रमण संदूषित पानी, शाक-सब्जियों, फलों आदि के सेवन से हो जाता है।
वुचेरेरिया (बु. बैंक्रोफ्टाई और वु. मैलाई ) ऐसे फाइलेरिआई कृमि हैं जिनके कारण अंगों में, प्रायः अर्धः पाद की लसीका वाहिकाओं (लिम्फैटिक वेसेल्स) में, धीरे-धीरे बढ़ने वाला दीर्घकालिक शोथ हो जाता है। ये कृमि इन अंगों में कई वर्षों तक रहते हैं। यह रोग हस्तिपाद (हाथी पाँव) या श्लीपद ( एलीफैशीएसिस ) अथवा फाइलेरिया (फाइलेरिएसिस) कहलाता है। जननिक अंग भी अक्सर इस रोग से प्रभावित हो जाते हैं और इसकी वजह से बड़ी भारी विरूपताएँ आ जाती हैं। रोगवाहक मादा मच्छर जब किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटती है, तो रोगजनक उस व्यक्ति के शरीर में संचारित हो जाते हैं।
माइक्रोस्पोरम, ट्राइकोफाइटॉन और एपिडर्मोफाइटॉन आदि वंश (जेनरा) के अनेक कवक, दाद (रिंगवर्म) के लिए उत्तरदायी हैं। यह संक्रामक रोग मनुष्यों में बहुत ही सामान्य है। शरीर के विभिन्न भागों जैसे- त्वचा, नाखून और शिरोवल्क (स्कैल्प ) पर सूखी, शल्की विक्षतियाँ (स्केली लीजन) इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। इन विक्षतियों में तेज खुजली होती है। ऊष्मा और नमी इन कवकों को त्वचा के वलनों (फोल्ड), जैसेकि ग्रोइन अथवा पादंगुलियों के बीच पनपने में मदद करती हैं। दाद आमतौर पर मिट्टी से या संक्रमित व्यक्तियों के तौलिए, कपड़े या कंघे तक का प्रयोग करने से हो जाता है।
अनेक संक्रामक रोगों के निरोध और नियंत्रण के लिए व्यक्तिगत तथा जन स्वच्छता बनाए रखना बहुत महत्त्वपूर्ण है। व्यक्तिगत स्वच्छता से शरीर को साफ रखना, पीने के लिए साफ पानी, खाना, शाक-सब्जियों, फल आदि का सेवन शामिल है। जन स्वास्थ्य में अपशिष्ट पदार्थ और मल-मूत्र उत्सर्ग (एक्सक्रीटा) का समुचित निपटान ; जलाशयों, कुंडों (पूल) और मलकुंडों (सेसपूल्स) और तालाबों की समय-समय पर सफाई और विसंक्रमण तथा जन खान-पान प्रबंध में स्वच्छता के मानक का पालन करना है। ये उपाय विशेषरूप से वहाँ अनिवार्य हैं जहाँ संक्रामक रोग खाद्य पदार्थ और पानी के द्वारा संचारित होते हैं जैसेकि टाइफॉइड, अमीबता, ऐस्केरिसता । न्युमोनिया और सामान्य जुकाम जैसे वायुवाहित (एयर-बॉर्न) रोगों के मामले में ऊपर बताए गए उपायों के अलावा संक्रमित व्यक्तियों के या उनके सामान के निकट संपर्क में आने से बचना चाहिए। कीट रोगवाहकों के द्वारा संचारित होने वाले मलेरिया और फाइलेरिया जैसे रोगों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय रोगवाहकों और उनके प्रजनन (ब्रीडिंग) की जगहों का नियंत्रण या उन्हें खत्म कर देना है। यह लक्ष्य आवासीय क्षेत्रों में और उसके आस पास पानी को जमा नहीं होने देने, घरेलू शीतलयंत्रों (कूलर) की नियमित सफाई, मच्छरदानी का प्रयोग मच्छर के डिंबकों (लार्वा) को खाने वाली गंबुज़िया जैसी मछलियाँ डालने, खाइयों, जलनिकास क्षेत्रों और अनूपों (दलदलों) (स्वंप्स) आदि में कीटनाशकों के छिड़काव से जा सकता है। इसके अलावा दरवाजों और खिड़कियों में जाली लगानी चाहिए, ताकि मच्छर अंदर न घुस सकें। भारतवर्ष के बहुत से भागों में हाल ही में रोगवाहक-वाहित (एडीज मच्छर ) डेंगू और चिकनगुनिया जैसे रोगों का व्यापक रूप से फैलने के संदर्भ में ऐसे उपाय और भी महत्त्वपूर्ण हो गए हैं।
जीव विज्ञान में हुई प्रगति से हमें अनेक संक्रामक रोगों से निबटने के लिए कारगर हथियार मिल गए हैं। टीका (वैक्सीन) के उपयोग और प्रतिरक्षीकरण कार्यक्रमों से चेचक जैसे जानलेवा रोग का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया गया है। वैक्सीन के इस्तेमाल से पोलियो, डिफ्थीरिया, न्युमोनिया और टिटनस जैसे अनेक संक्रामक रोगों को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया है। जैवप्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी), जिसके बारे में आप बारहवें अध्याय में और ज्यादा पढ़ेंगे, नए-नए और अधिक सुरक्षित वैक्सीन बनाने के कगार पर है। प्रतिजैविको (ऍंटीबायोटिक) एवं अन्य दूसरी औषधियों की खोज ने भी संक्रामक रोगों के प्रभावी ढंग से उपचार करने में हमें सक्षम बनाया है।


प्रतिरक्षा


हमें हर रोज बड़ी संख्या में संक्रामक कारकों का सामना करना पड़ता है। परंतु, इनमें से कुछ ही रोग के शिकार बनाते हैं- क्यों? इसका कारण यह है कि हमारा शरीर अधिकांश बाह्य कारकों से अपनी रक्षा कर लेता है। परपोषी की रोगकारक जीवों से लड़ने की क्षमता जो उसे प्रतिरक्षी – तंत्र के कारण मिली है, प्रतिरक्षा ( इम्युनिटी) कहलाती है। प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है- (क) सहज प्रतिरक्षा (ख) उपार्जित प्रतिरक्षा |


सहज प्रतिरक्षा


सहज प्रतिरक्षा (इनेट इम्युनिटी) एक प्रकार की अविशिष्ट रक्षा हैं जो जन्म के समय मौजूद होती है। यह प्रतिरक्षा हमारे शरीर में बाह्य कारकों के प्रवेश के सामने विभिन्न प्रकार के रोध खड़ा करने से हासिल होती है। सहज प्रतिरक्षा में चार प्रकार के रोध होते हैं। ये रोध हैं—
(क) शारीरिक रोध (फीजिकल बैरियर ) – हमारे शरीर पर त्वचा मुख्य रोध हैं-
जो सूक्ष्मजीवों के प्रवेश को रोकता है। श्वसन, जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेटाइनल) और जननमूत्र पथ को आस्तरित करने वाली एपिथीलियम का श्लेष्मा आलेप ( म्यूकस कोटिंग) भी शरीर में घुसने वाले रोगाणुओं को रोकने में सहायता करता है।
(ख) कायिकीय रोध (फीजियोलॉजिकल बैरियर )
आमाशय में अम्ल, मुँह में लार, आँखों के आँसू, ये सभी रोगाणीय वृद्धि को रोकते हैं।

(ग) कोशिकीय रोध ( सेल्युलर बैरियर ) – हमारे शरीर के रक्त में बहुरूप केंद्रक श्वेताणु उदासीनरंजी (पी एम एन एल न्युट्रोफिल्स) जैसे कुछ प्रकार श्वेताणु और एक केंद्रकाणु (मोनोसाइट्स) तथा प्राकृतिक, मारक लिंफोसाइट्स के प्रकार एवं ऊतकों में बृहत् भक्षकाणु (मैक्रोफेजेज) रोगाणुओं का भक्षण करते और नष्ट करते हैं।

(घ) साइटोकाइन रोध विषाणु संक्रमित कोशिकाएँ इंटरफेरॉन नामक प्रोटीनों का स्रवण करती हैं जो असंक्रमित कोशिकाओं को और आगे विषाणु संक्रमण से बचाती हैं।


उपार्जित प्रतिरक्षा


दूसरी ओर उपार्जित प्रतिरक्षा रोगजनक विशिष्ट है। इसका अभिलक्षण स्मृति है। इसका अर्थ यह है कि हमारे शरीर का जब पहली बार किसी रोगजनक से सामना होता है तो यह एक अनुक्रिया (रेस्पांस ) करता है जिसे निम्न तीव्रता की प्राथमिक अनुक्रिया कहते हैं। बाद में उसी रोगजनक से सामना होने पर बहुत ही उच्च तीव्रता की द्वितीयक या पूर्ववृत्तीय ( एनामिस्टिक) अनुक्रिया होती है। इसका कारण यह तथ्य है कि हमारे शरीर को प्रथम ‘मुठभेड़’ की स्मृति है।

प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिरक्षा अनुक्रियाएँ हमारे शरीर के रक्त में मौजूद दो विशेष प्रकार के लसीकाणुओं द्वारा होती हैं। ये हैं बी- लसीका और टी– लसीकाणु। रोगजनकों की अनुक्रिया में बी– लसीकाणु हमारे रक्त में प्रोटीनों की सेना उत्पन्न करते हैं ताकि वे रोगजनकों से लड़ सकें। ये प्रोटीने प्रतिरक्षी (एंटीबायोटिक्स) कहलाती हैं। टी-कोशिकाएँ खुद तो प्रतिरक्षियों का स्रवण नहीं करतीं, लेकिन प्रोटीन उत्पन्न करने में बी- कोशिकाओं की सहायता करती हैं। प्रत्येक प्रतिरक्षी अणु में चार पेप्टाइड श्रृंखलाएँ होती हैं, दो छोटी जो लघु श्रृंखलाएँ कहलाती हैं और दो बड़ी जो दीर्घ श्रृंखलाएँ कहलाती हैं। इसलिए प्रतिरक्षी को HL के रूप में दर्शाया जाता है। हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के प्रतिरक्षी उत्पन्न किए जा सकते हैं जिनमें से 1gA, IgM IgE, IgG कुछ उदाहरण हैं। एक प्रतिरक्षी का कार्टून नीचे दिया गया है। ये प्रतिरक्षी रक्त में पाई जाती हैं, इसलिए इन्हें तरल प्रतिरक्षा अनुक्रिया ( ह्युमोरल इम्युन रेसपांस) कहा जाता है। यह दो प्रकार की प्रतिरक्षी माध्यित उपार्जित प्रतिरक्षा अनुक्रियाओं में से एक है। दूसरे प्रकार की अनुक्रिया कोशिका – माध्यित प्रतिरक्षा अनुक्रिया या कोशिका – माध्यित प्रतिरक्षा (सी एम आई – सेल मेडिएटेड इम्युनिटी) कहलाती है। टी-लसीकाणु सी एम आई का माध्यम बनते हैं। जब हृदय, नेत्र, वृक्क, यकृत जैसे अंग संतोषजनक रूप से काम करना बंद कर देते हैं तो एकमात्र उपचार प्रतिरोपण होता है जिससे रोगी सामान्य जीवन जी सके। किसी उपयुक्त दाता की तब तलाश शुरू होती है। ऐसा क्यों है कि प्रतिरोपण के लिए हर किसी दाता के अंग नहीं लिए जा सकते ? वह क्या है जिसकी जाँच डॉक्टर करते हैं? किसी भी स्रोत “पशु, अन्य प्राइमेट या किसी क्योंकि वे देर-सबेर नकार दिए। भी मानव का निरोप (ग्राफ्ट) नहीं लगाया जा सकता; जाएँगे। कोई भी निरोप / प्रतिरोप लेने से पहले ऊतक मिलान और रक्त मिलान अत्यावश्यक है और इसके बाद भी रोगी को अपने शेष जीवन भर प्रतिरक्षा-निरोधक (इम्युनोसप्रेसेंट) लेने पड़ते हैं। शरीर ‘स्वयं’ और ‘पर’ में भेद करने में सक्षम है और कोशिका – माध्यित प्रतिरक्षा अनुक्रिया निरोप को अस्वीकृत करने के लिए उत्तरदायी है।

जब परपोषी प्रतिजनों (एंटीजेंस) का सामना करता है तो उसके शरीर में प्रतिरक्षी पैदा होते हैं। प्रतिजन, जीवित या मृत रोगाणु या अन्य प्रोटीनों के रूप में हो सकते हैं। इस प्रकार की प्रतिरक्षा सक्रिय प्रतिरक्षा (ऐक्टिव इम्युनिटी) कहलाती है। सक्रिय प्रतिरक्षा धीमी होती है और अपनी पूरी प्रभावशाली अनुक्रिया प्रदर्शित करने में समय लेती है। प्रतिरक्षीकरण (इम्यूनाइजेशन) के दौरान जान बूझकर रोगाणुओं का टीका देना अथवा प्राकृतिक संक्रमण के दौरान संक्रामक जीवों का शरीर में पहुँचना सक्रिय प्रतिरक्षा को प्रेरित करता है। जब शरीर की रक्षा के लिए बने बनाए प्रतिरक्षी सीधे ही शरीर को दिए जाते हैं तो यह निष्क्रिय प्रतिरक्षा (पैसिव इम्युनिटी) कहलाती है। क्या आप जानते हैं कि हाल ही में जन्मे शिशु के लिए माँ का दूध क्यों बहुत ही आवश्यक माना जाता है? दुग्धस्रवण (लैक्टेशन) के प्रारंभिक दिनों के दौरान माँ द्वारा स्रावित पीले से तरल ‘पीयूष (कोलोस्ट्रम)’ में प्रतिरक्षियों (IgA) की प्रचुरता होती है जो शिशु की रक्षा करता है। सगर्भता (प्रीग्नेंसी) के दौरान भ्रूण को भी अपरा (प्लेसेंटा) द्वारा माँ से कुछ प्रतिरक्षी मिलते हैं। ये निष्क्रिय प्रतिरक्षा के कुछ उदाहरण हैं।


टीकाकरण और प्रतिरक्षीकरण


प्रतिरक्षीकरण या टीकाकरण का सिद्धांत प्रतिरक्षा तंत्र की स्मृति के गुण पर आधारित है। टीकाकरण में रोगजनक या निष्क्रियित / दुर्बलीकृत रोगजनक (टीका) की प्रतिजनी प्रोटीनों को निर्मित शरीर में प्रवेश कराई जाती है। इन प्रतिजनों के विरूद्ध शरीर में उत्पन्न प्रतिरक्षियाँ वास्तविक संक्रमण के दौरान रोगजनी कारकों को निष्प्रभावी बना देती हैं। टीका स्मृति-बी और टी-कोशिकाएँ भी बनाते हैं जो परिवर्ती प्रभावन (सब्सीक्वेंट एक्सपोजर) होने पर रोगजनक को जल्दी से पहचान लेती हैं और प्रतिरक्षियों के भारी उत्पादन से हमलावर को हरा देती हैं। अगर व्यक्ति किन्हीं ऐसे घातक रोगाणुओं से संक्रमित होता है जिसके लिए फौरन प्रतिरक्षियों की आवश्यकता है, जैसा कि टिटेनस में, तो प्रभावकारी निष्पादित प्रतिरक्षियों या प्रतिआविष (एंटीटॉक्सिन एक ऐसी निर्मित जिसमें आविष के लिए प्रतिरक्षियाँ होती हैं) को टीके के रूप में सीधे ही दिए जाने की जरूरत है। साँप के काटे जाने के मामलों में भी रोगी को जो सुई लगाई जाती है उसमें सर्प जीविष (वेनम) के विरूद्ध निष्पादित प्रतिरक्षी होते हैं। इस प्रकार का प्रतिरक्षीकरण निष्क्रिय प्रतिरक्षीकरण कहलाता है।
पुनर्योगज डीएनए (रिकम्बिनेंट डीएनए) प्रौद्योगिकी से जीवाणु या खमीर ( यीस्ट) में रोगजनक की प्रतिजनी पॉलिपेप्टाइड का उत्पादन होने लगा है। इस विधि से टीकों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा है और इसलिए प्रतिरक्षीकरण हेतु उन टीकों की उपलब्धता खूब बढ़ी है, जैसे- खमीर से बनने वाला यकृतशोथ बी टीका ।


ऐलर्जी


आपके साथ कितनी बार ऐसा हुआ है कि आप किसी नई जगह गए हैं और बिना किसी स्पष्ट कारण के छींकना और घरघराहट के साथ साँस लेना शुरू करते हैं और जब आप उस जगह से लौट आते हैं तो आपके ये लक्षण गायब हो जाते हैं? हममें से कुछ लोग पर्यावरण में मौजूद कुछ कणों के प्रति संवेदनशील होते हैं। उपर्युक्त अभिक्रिया पराग, चिचड़ी (माइट) आदि के प्रति ऐलर्जी के कारण हो सकती है। जो भिन्न-भिन्न जगहों पर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

पर्यावरण में मौजूद कुछ प्रतिजनों के प्रति प्रतिरक्षा तंत्र की अतिरंजित अनुक्रिया ऐलर्जी कहलाती है। ऐसे पदार्थ, जिनके प्रति ऐसी प्रतिरक्षित अनुक्रिया होती है ऐलर्जन कहलाते हैं। इनके प्रति बनने वाली प्रतिरक्षियाँ IgE प्रकार की होती है। एलर्जन के सामान्य उदाहरण हैं- धूल में चिचड़ी, पराग, प्राणी लघुशल्क (डैंडर) आदि । ऐलर्जीय अनुक्रियाओं के लक्षणों में छींकना, पनीली आँखें, बहती नाक और साँस लेने में कठिनाई शामिल हैं। ऐलर्जी मास्ट कोशिकाओं से हिस्टैमिन और सीरोटोनिन जैसे रसायनों के निकलने के कारण होती है। ऐलर्जी का कारण जानने के लिए रोगी को संभावित एलर्जनों की बहुत ही थोड़ी सी मात्रा टीके द्वारा दी जाती है और प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जाता है। प्रतिहिस्टैमिन, एड्रीनेलिन और स्टीराइडों जैसी औषधियों के प्रयोग से ऐलर्जी के लक्षण जल्दी घट जाते हैं। लेकिन, आधुनिक जीवन शैली के फलस्वरूप लोगों में प्रतिरक्षा घटी है और एलर्जनों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है। भारतवर्ष के महानगरों के अधिकाधिक बच्चे पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता के कारण ऐलर्जियों और दमा (अस्थमा) से पीड़ित रहते हैं। इसका कारण बच्चों के प्रारंभिक जीवनकाल में उन्हें बहुत रक्षित पर्यावरण में रखना हो सकता है।


स्व प्रतिरक्षा


उच्चतर कशेरूकियों में विकसित स्मृति आधारित उपार्जित प्रतिरक्षा अपनी कोशिकाओं और विजातीय जीवों (जैसे- रोगाणु) के बीच भेद कर सकने की क्षमता पर आधारित है। भेद कर सकने की इस क्षमता का आधार क्या है, यह हमें अभी भी पता नहीं चला है। फिर भी इस बारे में दो उपसिद्धांतों को समझना होगा। पहला, उच्चतर कशेरूकी विजातीय अणुओं और विजातीय जीवों को भी पहचान सकते हैं। प्रयोगात्मक प्रतिरक्षा विज्ञान इस संबंध में जानकारी देता है। दूसरा, कभी-कभी आनुवंशिक और अज्ञात कारणों से शरीर अपनी ही कोशिकाओं पर हमला कर देता है। इसके फलस्वरूप शरीर को क्षति पहुँचती है और यह स्वप्रतिरक्षा रोग कहलाता है। हमारे समाज में बहुत से लोग आमवाती संधिशोथ (रूमेटोयाड आर्थाइटिस) से प्रभावित हैं जो एक स्व-प्रतिरक्षा रोग है।

शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र


मानव प्रतिरक्षा तंत्र में लसीकाभ अंग (लिम्फ्वायड ऑर्गंस), ऊतक कोशिकाएँ और घुलनशील अणु जैसाकि प्रतिरक्षी शामिल है। जैसाकि आप पढ़ चुके हैं, प्रतिरक्षा तंत्र इस मायने में बेजोड़ है कि यह विजातीय प्रतिजनों को पहचानता है, इनके प्रति अनुक्रिया करता है और इन्हें याद रखता है। प्रतिरक्षा तंत्र ऐलर्जी प्रतिक्रियाओं, स्व प्रतिरक्षा रोगों और अंग प्रतिरोपण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लसीकाभ अंगः ये ही वे अंग हैं जिनमें लसीकाणुओं की उत्पत्ति और / या परिपक्वन ( मैचुरेसन) और प्रचुरोद्भवन (प्रोलिफरेसन) होता है। अस्थि मज्जा (बोन मैरो) और थाइमस ऐसे प्राथमिक लसीकाभ अंग हैं जहाँ अपरिपक्व लसीकाणु, प्रतिजन संवेदनशील लसीकाणुओं में विभेदित होते हैं। परिपक्वन के बाद लसीकाणु प्लीहा (स्पलीन) लसीका ग्रंथियों, टासिलों क्षुद्रांत्र के पेयर पैचों और परिशेषिका (अपेंडिक्स) जैसे द्वितीयक अंगों में चले जाते हैं। द्वितीयक लसीकाभ अंग ऐसे स्थान है जहाँ लसीकाणुओं की प्रतिजन के साथ पारस्परिक क्रिया होती है जो बाद में प्रचुर संख्या में उत्पन्न होकर प्रभावी कोशिकाएँ बन जाते हैं।

अस्थि मज्जा मुख्य लसीकाम अंग है जहाँ लसीकाणुओं समेत सभी रुधिर कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं। थाइमस एक सपालि (लोब्ड) अंग है जो हृदय के पास उरोस्थि के नीचे स्थित है। जन्म के समय थाइमस काफी बड़ा होता है, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ आकार में घटता रहता है और यौवनावस्था आने पर यह बहुत छोटे आकार का रह जाता है। अस्थि मज्जा और थाइमस, दोनों ही टी- लसीकाणुओं के परिवर्धन और परिपक्वन के लिए सूक्ष्म पर्यावरण मुहैया कराते हैं। प्लीहा सेम के आकार का बड़ा अंग है। इसमें मुख्यरूप से लसीकाणु और भक्षकाणु होते हैं। यह रुधिर में पैदा होने वाले सूक्ष्म जीवों को फांसकर रुधिर निस्यंदक (फिल्टर) के रूप में काम करते हैं। प्लीहा में लाल रक्त कणिकाओं का बड़ा भंडार होता है। लसीका ग्रंथियाँ छोटी ठोस संरचनाएँ होती हैं. जो लसीका तंत्र पर भिन्न-भिन्न स्थलों पर स्थित हैं। जो सूक्ष्मजीव या दूसरे प्रतिजन लसीका और ऊतक तरल में आ जाते हैं, लसीका ग्रंथियाँ उन्हें फाँस लेती हैं। लसीका ग्रंथियों में फँसे प्रतिजन वहाँ मौजूद लसीकाणुओं के सक्रियण और प्रतिरक्षा अनुक्रिया के लिए उत्तरदायी हैं।
प्रमुख पथों (श्वसन, पाचन और जननमूत्र पथ ) के आस्तरों (लाइनिंग ) के भीतर लसीकाभ ऊतक स्थित हैं जो श्लेष्म संबद्ध लसीकाभ ऊतक ( एम ए एल टी – म्यूकोसल एसोसिएटेड लिम्फॉयड टिशू) कहलाते हैं। यह मानव शरीर के लसीकाभ ऊतक का लगभग 50 प्रतिशत है।


एड्स


एड्स शब्द उपार्जित प्रतिरक्षा न्यूनता संलक्षण (एड्स – एक्वायर्ड इम्यूनो डिफिसियेंसी सिंड्रोम) के लिए प्रयुक्त होता है। इसका अर्थ है प्रतिरक्षा तंत्र की न्यूनता, जो व्यक्ति के जीवनकाल में उपार्जित होती है और जो इस बात का संकेत है कि यह न्यूनता कोई जन्मजात रोग नहीं है। एड्स का सबसे पहले 1981 में पता चला और जो लगभग पिछले 25 वर्षों में सारे विश्व में फैल गया है और इस रोग से दो करोड़ पचास लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

एड्स एक विषाणु रोग है जो मानव में प्रतिरक्षा न्यूनता विषाणु (एचआईवी – ह्यूमन इम्यूनो डिफिसिएंसी वायरस) के कारण होता है। एचआईवी विषाणुओं के उस समूह में आता है जिसे पश्चविषाणु (रिट्रोवायरस) कहते हैं जिनमें आरएनए जीनोम को ढकने वाला आवरण होता है (चित्र 8.6)। आमतौर पर एचआईवी का संक्रमण निम्नलिखित से होता है— (क) संक्रमित व्यक्ति के यौन संपर्क से, (ख) संदूषित रक्त और रुधिर उत्पादों के आधान से, (ग) संक्रमित सुइयों के साझा प्रयोग से जैसाकि अंत: शिरा ( इंट्रावेनस) द्वारा ड्रग का कुप्रयोग करने वालों के मामले में और (घ) संक्रमित माँ से अपरा द्वारा उसके बच्चे में। इसलिए, जिन लोगों में यह संक्रमण होने का बहुत ज्यादा खतरा है वे हैं— ऐसे व्यक्ति जो अनेक से मैथुन करते हैं, मादक द्रव्य व्यसनी जो अंतः शिरा द्वारा ड्रग लेते है, ऐसे व्यक्ति जिन्हें बार बार रक्त आधान की जरूरत होती है और संक्रमित माँ से जन्मे बच्चे । क्या आपको मालूम है कि लोगों को बार- बार रक्त आधान की आवश्यकता कब होती है ? यहाँ पर यह ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है कि एचआईवी एड्स केवल छूने या शरीर के संपर्क में आने से नहीं फैलता है। यह केवल शरीर में स्रवित द्रवों से फैलता है। इसलिए यह भी महत्वपूर्ण है कि शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक स्वस्थता के लिए यह आवश्यक है कि एच आई वी / एड्स प्रभावित व्यक्ति को परिवार से या समाज से अलग-थलग न किया जाए। पता लगाइए और ऐसी परिस्थितियों की सूची बनाइए । संक्रमण होने और एड्स के लक्षण प्रकट होने के बीच हमेशा अंतराल होता है यह अवधि कुछ महीनों से लेकर कई वर्षों (प्राय: 5-10 वर्ष) की हो सकती है।

“व्यक्ति के शरीर में आ जाने के बाद विषाणु बृहतभक्षकाणु (मेक्रोफेग) में प्रवेश करता है जहाँ उसका आरएनए जीनोम विलोम ट्रांसक्रिप्टेज प्रकिण्व ( रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एंजाइम ) की सहायता से प्रतिकृतीयन ( रेप्लीकेसन) द्वारा विषाणवीय डी एन ए बनाता है। यह विषाणवीय डीएनए परपोषी की कोशिका के डीएनए में समविष्ट होकर संक्रमित कोशिकाओं को विषाणु कण पैदा करने का निर्देश देता है। बृहतभक्षकाणु विषाणु उत्पन्न करना जारी रखते हैं और इस तरह एक एचआईवी फैक्टरी की तरह काम करते हैं। इसके साथ ही एचआईवी सहायक टी- लसीकाणुओं (टी एच) (टी- लसीकाणुओं के एक प्रकार या उपसमुच्चय है जिसके बारे में आप ऊपर प्रतिरक्षा तंत्र में पढ़ चुके हैं) में घुस जाता है प्रतिकृति बनाता है और संतति विषाणु पैदा करता है। रुधिर में छोड़े गए संतति विषाणु दूसरे सहायक टी-लसीकाणुओं पर हमला करते हैं। यह क्रम बार-बार दोहराया जाता है जिसकी वजह से संक्रमित व्यक्ति के शरीर में सहायक टी लसीकाणुओं की संख्या में उत्तरोत्तर कमी होती है। इस अवधि के दौरान, बार-बार बुखार और दस्त आते हैं तथा वजन घटता है। सहायक टी- लसीकाणुओं की संख्या में गिरावट के कारण व्यक्ति जीवाणुओं, विशेषरूप से माइकोबैक्टीरियम विषाणुओं, कवकों यहाँ तक की टॉक्सोप्लेज्मा जैसे परजीवियों के संक्रमण का शिकार हो जाता है। रोगी में इतनी प्रतिरक्षा न्यूनता हो जाती है कि वह इन संक्रमणों से अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो जाता है। एड्स के लिए व्यापकरूप से काम में लाया जाने वाला नैदानिक परीक्षण एंजाइम्स संलग्न प्रतिरक्षा रोधी आमापन एलीसा (एलीसा एंजाइम लिंक्ड इम्यूनोजारबेट एस्से) है प्रति पश्चविषाणवीय (एंटी रिट्रोवायरल ) औषधियों से एड्स का उपचार आंशिक रूप से ही प्रभावी है। ये औषधियाँ रोगी की अवश्यंभावी मृत्यु को आगे सरका सकती हैं, रोक नहीं सकती। एड्स की रोकथाम एड्स को ठीक नहीं किया जा सकता; इसलिए इसकी रोकथाम ही सबसे उत्तम उपाय है। इसके अलावा, एचआईवी संक्रमण सचेतन व्यवहार पैटर्न के कारण फैलता है न कि न्यूमोनिया या टाइफॉइड की तरह अनजाने में। यह ठीक है कि रक्त-आधान रोगियों में, नवजातों में (माँ से ) आदि में यह संक्रमण सही निगरानी (मॉनिटरिंग) न होने के कारण हो सकता है। एकमात्र बहाना अनभिज्ञता हो सकती है। लेकिन कहावत बिल्कुल सही है कि ‘अज्ञानता के कारण मत मरो’। हमारे देश में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एन ए सी ओ नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन) और अन्य गैर-सरकारी संगठन (एन जी ओ ) लोगों को एड्स के बारे में शिक्षित करने के लिए बहुत काम कर रहे हैं। एचआईवी संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनेक कार्यक्रम आरंभ किए हैं। रक्त बैंकों के रक्त को एचआईवी से मुक्त करना, सार्वजनिक और निजी अस्पतालों और क्लिनिकों में केवल प्रयोग डिस्पोजेबल सुईयाँ और सिरिंज ही काम में लाई जाएँ – इसकी व्यवस्था करना, कंडोम का मुफ्त वितरण, ड्रग के कुप्रयोग को नियंत्रित करना, सुरक्षित यौन संबंधों की सिफारिश करना और सुग्राही समष्टि (ससेप्टेवुल पॉपुलेशन) में एचआईवी के लिए नियमित जाँच को बढ़ावा देना, इन कार्यक्रमों में से कुछ एक है।
एच आई वी से संक्रमण या एड्स से ग्रस्त होना कोई ऐसी बात नहीं है जिसे छुपाया जाए; क्योंकि छुपाने से यह संक्रमण और भी ज्यादा लोगों में फैल सकता है। समाज में एचआईवी/एड्स संक्रमित लोगों को सहायता और सहानुभूति की जरूरत होती है एवं उन्हें हेय दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। जब तक समाज इसे एक ऐसी समस्या के रूप में नहीं देखेगा जिसका समाधान सामूहिक तौर पर किया जाना चाहिए, तब तक रोग के व्यापक रूप से फैलने की गुंजाइश कई गुना ज्यादा बढ़ेगी । यह एक ऐसी व्याधि है जिसके फैलाव को समाज और चिकित्सक वर्ग के सम्मिलित प्रयास से ही रोका जा सकता है।


कैंसर


मानव के भयंकर रोगों में से एक कैंसर है और विश्वभर में मौत का प्रमुख कारण है। भारतवर्ष में प्रतिवर्ष दस लाख से भी ज्यादा लोग कैंसर से पीड़ित होते हैं और इससे बड़ी संख्या में मर जाते हैं। कैंसर होने की क्रियाविधि अथवा कोशिकाओं का कैंसरजनी रूपांतरण (कार्सिनोजेनिक ट्रांसफारमेशन), इसका उपचार और नियंत्रण जैविकी और आयुर्विज्ञान में गहन अनुसंधान का विषय है।
हमारे शरीर में कोशिका वृद्धि और विभेदन अत्यधिक नियंत्रित और नियमित है। कैंसर कोशिकाओं में, ये नियामक क्रियाविधियाँ टूट जाती हैं। प्रसामान्य कोशिकाएँ ऐसा गुण दर्शाती हैं जिसे संस्पर्श संदमन (कांटेक्ट इनहिबिसन) कहते हैं और इसी गुण के कारण दूसरी कोशिकाओं से उनका संस्पर्श उनकी अनियंत्रित वृद्धि को संदमित करता है । ऐसा लगता है कि कैंसर कोशिकाओं में यह गुण खत्म हो गया है। इसके फलस्वरूप कैंसर कोशिकाएँ विभाजित होना जारी रख कोशिकाओं का भंडार खड़ा कर देती हैं जिसे अर्बुद (ट्यूमर) कहते हैं। अर्बुद दो प्रकार के होते हैं— सुदम (बिनाइन ) और दुर्दम (मैलिग्नेंट)। सुदम अर्बुद सामान्यतया अपने मूल स्थान तक सीमित रहते हैं, शरीर के दूसरे भागों में नहीं फैलते तथा इनसे मामूली क्षति होती है। दूसरी और दुर्बम अर्बुद प्रचुरोद्भव कोशिकाओं का पुंज है जो नवद्रव्यीय ( नियोप्लास्टिक) कोशिकाएँ कहलाती हैं। ये बहुत तेजी से बढ़ती हैं और आस पास के सामान्य ऊतकों पर हमला करके उन्हें क्षति पहुँचाती हैं। अर्बुद कोशिकाएँ सक्रियता से विभाजित और वर्धित होती है जिससे वे अत्यावश्यक पोषकों के लिए सामान्य कोशिकाओं से स्पर्धा करती हैं और उन्हें भूखा मारती हैं। ऐसे अर्बुदों से उतरी हुई कोशिकाएँ रक्त द्वारा दूरदराज स्थलों पर पहुँच जाती हैं। और जहाँ भी ये जाती है नये अर्बुद बनाना प्रारंभ कर देती हैं। मैटास्टेसिस कहलाने वाला यह गुण दुर्दम अर्बुदों का सबसे डरावना गुण है।

कैंसर के कारण प्रसामान्य कोशिकाओं का कैंसरी नवद्रव्यीय कोशिकाओं में रूपांतरण को प्रेरित करने वाले कारक भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक हो सकते हैं। ये कारक कैंसरजन कहलाते हैं। एक्स-किरण और गामा किरणों जैसे आयनकारी विकिरण और पराबैंगनी जैसे अनावनकारी विकिरण डीएनए को क्षति पहुँचाते हैं, जिससे नवद्रव्ययी रूपांतरण होता है। तंबाकू के धुएँ में मौजूद रासायनिक कैंसरजन फेफड़े के कैंसर के मुख्य कारण हैं। कैंसर उत्पन्न करने वाले विषाणु अर्बुदीय विषाणु (आंकोजेनिक वायरस) कहलाते हैं। इनमें जो जीन होते हैं उन्हें विषाणुवीय अर्बुदजीन ( वायरल आंकोजिन) कहते हैं। इसके अलावा प्रसामान्य कोशिकाओं में कई जीनों का पता चला है जिन्हें कुछ विशेष परिस्थितियों में सक्रियित किए जाने पर वे कोशिकाओं का कैंसरजनी रूपांतरण कर देते हैं। ये जीन कोशिकीय अर्बुदजीन (सेल्यूलर आंकोजिन-सी आंक) या आदि अर्बुद जीन (प्रोटो-आकोजिन) कहलाते हैं।

कैंसर अभिज्ञान और निदान कैंसरों का शुरू में ही पता लगाना बहुत ही आवश्यक है, क्योंकि ऐसा होने पर कई मामलों में इस रोग का सफलतापूर्वक उपचार किया जा सकता है। कैंसर अभिज्ञान ऊतकों की जीवूतिपरीक्षा (बायोप्सी) और ऊतक विकृति (हिस्टोपैथोलॉजिकल) अध्ययनों तथा बढ़ती कोशिका गणना के लिए रुधिर तथा अस्थिमज्जा परीक्षण पर आधारित है जैसा कि अधिश्वेतरक्तता (ल्यूकीमिया) के मामले में होता है। जीवूतिपरीक्षा में जिस ऊतक पर शक होता है उसका एक टुकड़ा लेकर पतले अनुच्छेदों में काटकर अभिरंजित करके रोग विज्ञानी द्वारा जाँचा जाता है। आंतरिक अंगों के कैंसर का पता लगाने के लिए विकिरण चित्रण (रेडियोग्राफी) (एक्स-किरणों का प्रयोग), अभिकलित टॉमोग्राफी (सी टी कंप्यूटेड टॉमोग्राफी) और चुंबकीय अनुनादी इमेजिंग (एम आर आई- मैगनेटिक रेजोजेंस इमेजिंग) जैसी तकनीकें बहुत उपयोगी है। अभिकलित टॉमोग्राफी एक्स-किरणों का उपयोग करके किसी अंग के भीतरी भागों की त्रिविम प्रतिबिंब बनाती है। जीवित ऊतक में वैकृतिक ( पैथोलॉजिकल) और कायिकीय (फिजियोलॉजिकल) परिवर्तनों का एकदम सही पता लगाने के लिए एम आर आई में तेज चुंबकीय क्षेत्रों और अनायनकारी विकिरणों का उपयोग किया जाता है ।
कुछ कैंसरों का पता लगाने के लिए कैंसर विशिष्ट प्रतिजनों के विरुद्ध प्रतिरक्षियों का भी उपयोग किया जाता है। कुछ कैंसरों के प्रति वंशागत सुग्रहिता वाले व्यक्तियों में जीनों का पता लगाने के लिए आण्विक ( मॉलीकुलर) जैविकी की तकनीकों को काम में लाया जा सकता है। ऐसे जीनों की पहचान, जो किसी व्यक्ति को विशेष कैंसरों के प्रति प्रवृत (प्रीडिस्पोज) करते हैं, कैंसर की रोकथाम के लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों को कुछ ऐसे विशेष कैंसरजनों से, जिनके प्रति वे सुग्राही हैं, (जैसे- फुप्फुस कैंसर में तंबाकू का धुआँ) से बचने की सलाह देनी चाहिए। कैंसरों का उपचार आमतौर पर कैंसरों के उपचार के लिए शल्यक्रिया, विकिरण चिकित्सा और प्रतिरक्षा चिकित्सा का सहारा लिया जाता है। विकिरण चिकित्सा में, अर्बुद कोशिकाओं को घातकरूप से किरणित ( इर्रेटेड) किया जाता है लेकिन अर्बुद के ढेर के पास वाले प्रसामान्य ऊतकों का पूरा ध्यान रखा जाता है। कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए अनेक रसो चिकित्सीय (कीमोथेरा प्यूटिक) औषध काम में लाए जाते हैं। इनमें से कुछ औषध विशेष अर्बुदों के लिए विशिष्ट हैं। अधिकांश औषधों के अनुषंगी प्रभाव या दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) होते हैं जैसे कि बालों का झड़ना, अरक्तता आदि । अधिकांश कैंसर का उपचार शल्यकर्म, विकिरण चिकित्सा और रसोचिकित्सा के संयोजन से किया जाता है। अर्बुद कोशिकाएँ प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा पता लगाए जाने और नष्ट किए जाने से बचती हैं। इसलिए, ऐसे पदार्थ दिए जाते हैं जिन्हें जैविक अनुक्रिया रूपांतरण कहते हैं, जैसे कि Y-इंटरफेरॉन, जो उनके प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रियित करता और अर्बुद को नष्ट करने में सहायता करता है।

ड्रग और ऐल्कोहल कुप्रयोग


सर्वेक्षणों और आँकड़ों से पता चलता है कि ड्रग और ऐल्कोहल का उपयोग, विशेषरूप से नवयुवकों में बढ रहा है। यह सचमुच चिंता का विषय है; क्योंकि इसके अनेक दुष्परिणाम होते हैं। समुचित शिक्षा और मार्गदर्शन से नवयुवक इन खतरनाक आदतों से अपने आप को बचा पायेंगे और स्वस्थ जीवन शैली अपनाएँगे।
आमतौर पर जिन ड्रगों का कुप्रयोग किया जाता है वे हैं— ओपिओइड्स, कैनेबिनॉइड्स और कोका एल्कैलॉइड्स। इनमें से अधिकांश पुष्पी पादपों से प्राप्त किए जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो कवकों से निकाले जाते हैं।
ओपिओइड्स ऐसे ड्रग हैं जो हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और जठरांत्र पथ में मौजूद विशिष्ट ओपिओइड्स ग्राहियों (रिसेप्टरस) से बंध जाते हैं। आमतौर पर ‘स्मैक’ के नाम से मशहूर हिरोइन रासायनिक रूप से डाइएसिटिल मॉर्फीन है जो एक सफेद, गंधहीन, तीखा रवेदार यौगिक होता है। यह मॉर्फिन के एसीटिलीकरण से प्राप्त किया जाता है, जो कि पोस्त के पौधे पैपेवर सोम्नीफेरम के लेटेक्स के निष्कर्षण द्वारा प्राप्त किया जाता है। आमतौर पर हिरोइन नाक द्वारा जोर से सांस लेकर या टीके द्वारा ली जाती है। यह एक अवसादक (डीप्रेसेंट) है और शरीर के प्रकार्यों को धीमा करती है।

कैनाबिनॉइड्स रसायनों का समूह हैं , जो मुख्यरूप से मस्तिष्क में मौजूद कैनोबिनॉइड ग्राहियों से पारस्परिक क्रिया करते हैं । प्राकृतिक कैनेबिनॉइड कैनेबिस सैटाइवा पौधे के पुष्पक्रम ( इंफ्लोरिसेंस) से प्राप्त किए जाते है। भांग के फूलों के शीर्ष, पत्तियाँ और राल (रेसिन) के विभिन्न संयोजन मैरिजुआना, हशीश, चरस और गाँजा बनाने के काम आते हैं। आमतौर पर अंत:श्वशनऔर मुँह द्वारा खाए जाने वाले मादक द्रव्य (ड्रग) शरीर के हृद-वाहिका तंत्र (कार्डियो – वैस्कुलर सिस्टम) को प्रभावित करते हैं।
कोका ऐल्कोलॉइड या कोकिन कोका पादप ऐरिथ्रोजाइलम कोका से प्राप्त किया जाता है जो कि मूलरूप से दक्षिण अमेरिका का पौधा है। यह तंत्रिकाप्रेषक (न्यूरोट्रांसमीटर) डोपेमीन के परिवहन में बाधा डालती है। कोकेन, जिसे आमतौर से कोक या क्रैक कहा जाता है, प्रायः जोर से साँस द्वारा अंदर खींची जाती है। इसका केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर जोरदार उद्दीपक (स्टीमुलेटिंग) असर पड़ता है जिससे सुखाभास (यूफोरिया) और ऊर्जा में वृद्धि की अनुभूति होती है। कोकेन की अत्यधिक मात्रा से विभ्रम ( हैलुसिनेसन) हो जाता है। अन्य प्रसिद्ध पादप, जिनमें विभ्रम पैदा करने का गुण है, ऐट्रोफा बेलेडोना और धतूरा हैं। आजकल कुछ खिलाड़ी भी कैनोबिनॉइडों का दुरुपयोग करते हैं।
बर्बिट्यूरेट, एंफेटेमीन, बेंजोडायजेपीन और लाइसर्जिक अम्ल डाइएथिल एमाइड्स (एल एस डी) जैसे ड्रग और इन जैसे अन्य ड्रग जो अवसाद (डिप्रेसन) और अनिद्रा (इनसोम्नीया) जैसे मानसिक व्याधि से ग्रस्त रोगियों की सहायता के लिए सामान्यतया औषधियों के रूप में काम में लिए जाते हैं, इनका भी कुप्रयोग होता है। मार्फीन एक बहुत प्रभावी शामक (सेडेटिव) और पीड़ाहर है और जिन रोगियों का शल्यक्रिया (सर्जरी) हुई है, उनके लिए बहुत उपयोगी है। विभ्रमी गुणवाले अनेक पादपों, फलों, बीजों का विश्वभर में लोक औषधि, धार्मिक उत्सवों और अनुष्ठानों में सैकड़ों वर्षों से उपयोग हो रहा है। जब ये औषधियाँ चिकित्सा के बजाय दूसरे उद्देश्य से ली जाती हैं या इतनी मात्रा में इतनी बार ली जाती हैं कि व्यक्ति के शारीरिक, कार्यिक अथवा मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों को गड़बड़ा देती हैं तो यह ड्रगों का कुप्रयोग बन जाता है।
धूम्रपान से इन तीव्र ड्रगों के सेवन का रास्ता खुल जाता है। तंबाकू का प्रयोग मानव 400 वर्षों से भी अधिक समय से करता आ रहा है। तंबाकू (धूम्रपान) पीया जाता है, चबाया जाता है या सुँघा (सुँघनी लेना) जाता है। तंबाकू में बहुत से रासायनिक पदार्थ होते हैं जिनमें एक ऐल्केलाइड, निकोटीन शामिल है। निकोटीन अधिवृक्क ग्रंथि (एडीनल ग्लैंड) को उद्दीपित करती है, जिससे एड्रिनलीन और नॉर एड्रिनलीन रक्त परिसंचरण में मोचित होती हैं अर्थात् छोड़ी जाती हैं। ये दोनों रक्तचाप और हृदय स्पंदन दर बढ़ाती है धूम्रपान फुफ्फुस, मूत्राशय और गले के कैंसर, श्वसनीशोथ (ब्रोंकाइटिस), कातस्फीति (एम्फीसिमा), हृदयरोग, जठरव्रण (गेस्ट्रिक अल्सर) से संबद्ध है। तंबाकू चबाना मुख कोटर के कैंसर के खतरे को बढ़ा देता है। धूम्रपान से रक्त में कार्बनमोनोक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है और हीमआबद्ध ऑक्सीजन की सांद्रता घट जाती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
जब व्यक्ति सिगरेट के पैकेट खरीदता है तो यह नहीं हो सकता कि उसकी निगाह पैकेट पर छपी उस वैधानिक (कानूनी) चेतावनी पर न पड़े जोकि धूम्रपान से आगाह करती है और बताती है यह किस प्रकार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । आजकल फिर भी युवाओं और वृद्धों दोनों में धूम्रपान का खूब चलन है धूम्रपान और तंबाकू चबाने के ख़तरे और इसकी लत पड़ जाने वाली प्रवृत्ति को देखते हुए युवा और वृद्ध दोनों को इसकी आदत से बचना चाहिए। किसी भी लत से छुटकारा पाने के लिए परामर्श तथा चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है।


किशोरावस्था और ड्रग / ऐल्कोहल कुप्रयोग


किशोरावस्था का अर्थ ‘एक अवधि’ और ‘एक प्रक्रिया’ दोनों से है जिसके दौरान एक बालक समाज में अपनी प्रभावी सहभागिता के लिए अपनी वृत्ति और विश्वास के अनुसार परिपक्व होता है। 12-18 वर्ष की आयु की अवधि को किशोरावस्था माना जा सकता है। दूसरे शब्दों में किशोरावस्था बचपन और प्रौढ़ता को जोड़ने वाला पुल है। किशोरावस्था के साथ-साथ उनमें अनेक जीवविज्ञान और व्यवहारात्मक परिवर्तन आते हैं। इस प्रकार किशोरावस्था किसी व्यक्ति का मानसिक और मनोवैज्ञानिक विकास का बहुत ही नाजुक समय है।

जिज्ञासा, जोखिम उठाने और उत्तेजना के प्रति आकर्षण और प्रयोग करने की इच्छा, ऐसे सामान्य कारण हैं जो किशोरों को ड्रग तथा ऐल्कोहल के लिए अभिप्रेरित करते हैं। बच्चे की प्राकृतिक जिज्ञासा उसे प्रयोग के लिए अभिप्रेरित करती है। ड्रग और ऐल्कोहल के प्रभाव को फायदे के रूप में देखने से समस्या और भी जटिल हो जाती है। इस प्रकार ड्रग और ऐल्कोहल का पहली बार सेवन जिज्ञासा या प्रयोग करने के कारण हो सकता है, लेकिन बाद में बच्चा इनका उपयोग समस्याओं का सामना करने से बचने के लिए करने लगता है। पिछले कुछ समय से शैक्षिक क्षेत्र में या परीक्षा में सबसे आगे रहने के दबाव से उत्पन्न तनाव ने भी किशोरों को ऐल्कोहल या ड्रगों को आजमाने के लिए फुसलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। युवकों में यह बोध भी कि धूम्रपान करना, ड्रग या ऐल्कोहल का उपयोग व्यक्ति के ‘ठंडा’ या ‘प्रगति’ का प्रतीक है, यही इन आदतों को शुरू करने का मुख्य कारण है। इस बोध को बढ़ावा देने में टेलीविजन, सिनेमा, समाचार पत्र, इंटरनेट ने भी सहायता की है। किशोरों में ड्रग और ऐल्कोहल के कुप्रयोग के अन्य कारणों में, परिवार के ढाँचे में अस्थिरता या एक दूसरे को सहारा देने तथा मित्रों के दबाव का अभाव भी है।

व्यसन और निर्भरता


यह समझ कि ड्रग लाभकारी हैं, इन्हें बार-बार लेने का कारण है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐल्कोहल और ड्रग की अंतर्निहित व्यसनी प्रकृति है, लेकिन व्यक्ति इस बात को समझ नहीं पाता। ड्रगों और एल्कोहॉल के कुछ प्रभावों के प्रति लत, एक मनोवैज्ञानिक आशक्ति है। (यह प्रभाव है सुखाभास और भला चंगा होने की अस्थाई भावना) जो व्यक्ति को उस समय भी ड्रग एवं ऐल्कोहल लेने के लिए प्रेरित करने से जुड़ी हैं जबकि उनकी जरूरत नहीं होती या उनका इस्तेमाल आत्मघाती है। ड्रग के बार बार उपयोग से हमारे शरीर में मौजूद ग्राहियों का सह्य स्तर बढ़ जाता है। इसके फलस्वरूप ग्राही, ड्रगों या ऐल्कोहल की केवल उच्चतर मात्रा के प्रति अनुक्रिया करते हैं, जिसके कारण अधिकाधिक मात्रा में लेने की लत पड़ जाती है। लेकिन एक बात बुद्धि में बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए कि इन ड्रग को एक बार लेना भी व्यसन बन सकता है। इस प्रकार, ड्रग और ऐल्कोहल की व्यसनी शक्ति उन्हें इस्तेमाल करने वाले / वाली को एक दोषपूर्ण चक्र में घसीट लेते हैं, जिससे इनका नियमित सेवन (कुप्रयोग) करने लगते हैं और इस चक्र से बाहर निकलना उनके बस में नहीं रहता। किसी मार्गदर्शन या परामर्श के अभाव में व्यक्ति व्यसनी (लती) बन जाता है और उनके ऊपर आश्रित होने लगता है।
निर्भरता शरीर की वृत्ति है जो ड्रग / ऐल्कोहल की नियमित मात्रा अचानक बंद कर दिए जाने पर अभिलक्षणिक और अप्रिय विनिवर्तन संलक्षण (विड्रावल सिंड्रोम) के रूप में व्यक्त होती है। इसके अभिलक्षण हैं चिंता, कंपन, मिचली और पसीना आना जिनसे ड्रग / ऐल्कोहल का इस्तेमाल फिर से चालू कर दिए जाने पर छुटकारा मिल जाता है। कुछ मामले में विनिवर्तन संलक्षण गंभीर हो सकता है और जीवन के लिए खतरनाक भी तथा व्यक्ति को चिकित्सीय देख रेख की आवश्यकता पड़ सकती है।
निर्भरता के कारण रोगी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त धन पाने के लिए तमाम सामाजिक मानदंडों को ताक पर रख देता है। इनसे अनेक सामाजिक समायोजन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।


ड्रग / ऐल्कोहल कुप्रयोग के प्रभाव

ड्रग और ऐल्कोहल के तत्कालिक प्रतिकूल प्रभाव अंधाधुध व्यवहार, बर्बरता और हिंसा के रूप में व्यक्त होते हैं। ड्रगों की अत्यधिक मात्रा से श्वसन-पात ( रिस्पाइरेटरी फेल्योर ), हृद-पात (हर्ट फेल्योर ) अथवा प्रमस्तिष्क रक्तस्राव (सेरेब्रल हेमरेज) के कारण संमूर्च्छा (कोमा) और मृत्यु हो सकती है। ड्रगों का संयोजन या ऐल्कोहल के साथ उनके सेवन का आमतौर पर यह परिणाम अतिमात्रा होती है युवाओं में ड्रग और ऐल्कोहल दुरुपयोग के सबसे सामान्य लक्षण शैक्षिक क्षेत्र में प्रदर्शन में कमी, बिना किसी स्पष्ट कारण के स्कूल या कालेज से अनुपस्थिति, व्यक्तिगत स्वच्छता के रुचि में कमी, विनिवर्तन, एकाकीपन, अवसाद, थकावट, आक्रमणशील और विद्रोही व्यवहार, परिवार और मित्रों से बिगड़ते संबंध, शौक की रुचि में कमी, सोने और खाने की आदतों में परिवर्तन, भूख और वजन में घट-बढ़ आदि हैं।

ड्रग / ऐल्कोहल के कुप्रयोग के दूरगामी परिणाम भी हो सकते हैं। अगर कुप्रयोगकर्ता को ड्रग / ऐल्कोहल खरीदने के लिए पैसे नहीं मिलें तो वह चोरी का सहारा ले सकता/सकती है। ये प्रतिकूल प्रभाव केवल ड्रग / ऐल्कोहल का सेवन करने वाले तक सीमित नहीं रहता। कभी-कभी ड्रग ऐल्कोहल आदि का अपने परिवार या मित्र आदि के लिए भी मानसिक और आर्थिक कष्ट का कारण बन सकता/सकती है।

जो अंतःशिरा द्वारा (सुई और सिरिंज से सीधे ही शिरा में इंजेक्शन) ड्रग लेते हैं, उनको एड्स और यकृतशोथ – बी जैसे गंभीर संक्रमण होने की संभावना अधिक होती है। इन रोगों के विषाणु संक्रमित सुई और सिरिंज के साझा प्रयोग से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित हो जाते हैं। एड्स और यकृतशोथ-बी, दोनों ही संक्रमण, चिरकारी संक्रमण हैं और अंततः घातक होते हैं। एड्स पति/पत्नी द्वारा मैथुन से स्थानांतरित होता है, जबकि यकृतशोथ बी संक्रमित रुधिर द्वारा स्थानांतरित होता है।

किशोरावस्था के दौरान ऐल्कोहल के सेवन का दीर्घकालिक प्रभाव भी हो सकता हैं; इससे प्रौढ़ावस्था में बहुत अधिक पीने की लत लग सकती है। ड्रग और ऐल्कोहल के चिरकारी उपयोग से तंत्रिका तंत्र और यकृत को क्षति (सेरोसिस) पहुँचती है। ऐसा भी ज्ञात है कि गर्भावस्था के दौरान ड्रगों एवं ऐल्कोहल का उपयोग गर्भ पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

  • ड्रगों का एक और दुरुपयोग कुछ खिलाड़ियों द्वारा अपने प्रदर्शन को और बेहतर करने के लिए हो सकता है। वे खेलों में स्वापक पीड़ा हर (नारकोटिक एनलजेसिक्स), उपचयी स्टेराइडों, मूत्रल दवाओं और कुछ हॉर्मोनों का कुप्रयोग, मांसपेशियों को शक्तिशाली बनाने और अक्रामकता को बढ़ाने और फलस्वरूप खेल प्रदर्शन के लिए करते हैं।
  • महिलाओं में उपचयी स्टेराइडों के सेवन के अनुषंगी प्रभावों में पुंस्त्वन (मैस्कुलिनाइजेसन) (आप लक्षण), बढ़ी अक्रामकता, भावदशा में उतार-चढ़ाव, अवसाद, असामान्य आर्तव चक्र, मुँह और शरीर पर बालों की अत्यधिक वृद्धि, भगशेफ का बढ़ जाना, आवाज का गहरा होना शामिल हैं।
  • पुरूषों में मुँहासे, बढ़ी अक्रामकता, भावदशा में उतार चढ़ाव, अवसाद, वृषणों के आकार का घटना शुक्राणु उत्पादन में कमी, यकृत और वृक्क की संभावित दुष्क्रियता (डिस्फंकसन), वक्ष (स्तन) का बढ़ना, समयपूर्व गंजापन, प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ना शामिल हैं।
  • लंबे समय तक सेवन से ये प्रभाव स्थायी हो सकते हैं। युवा नर या स्त्रियों में, मुँह और शरीर के सख्त मुँहासे, और लंबी अस्थियों के वृद्धि केंद्रों का कालपूर्व बंद होने के फलस्वरूप वृद्धि रुद्ध हो सकती है।

रोकथाम और नियंत्रण

पुरानी कहावत ‘चिकित्सा से रोकथाम ( बचाव) अच्छी है’ यहाँ पर भी खरी बैठती है। यह भी सच है कि धूम्रपान, ड्रग या ऐल्कोहल के सेवन की आदतें पड़ने की संभावना छोटी उम्र में, ज्यादातर किशोरावस्था के दौरान, अधिक होती है इसलिए ऐसी परिस्थितियों की पहचान करना सबसे उत्तम है जो किशोर को ऐल्कोहल या ड्रग के सेवन की ओर धकेलती हैं ताकि समय रहते उसके चिकित्सीय उपाय किए जा सकें।इस मामले में माता-पिता और अध्यापकों का विशेष उत्तरदायित्व है। ऐसा लालन-पालन जिसमें पालन-पोषण का स्तर ऊँचा हो और सुसंगत अनुशासन हो, ऐल्कोहल / ड्रग / तंबाकू के कुप्रयोग का खतरा कम कर देता है। यहाँ दिए गए कुछ उपाय किशोरों में ऐल्कोहल और ड्रग के कुप्रयोग की रोकथाम तथा नियंत्रण में विशेषरूप से कारगर होंगे आवश्यक समकक्षी दबाव से बचेंप्रत्येक बच्चे की अपनी पसंद और अपना व्यक्तित्व होता है, जिसका सम्मान और जिसे प्रोत्साहित करना चाहिए। चाहे मामला अध्ययन, खेल कूद या अन्य गतिविधियों का हो, बालक को उसकी अवसीमा (थ्रेसोल्ड) से अधिक करने के लिए अनावश्यक दबाव नहीं डालना चाहिए।

शिक्षा और परामर्श-

समस्याओं और दबावों का सामना करने और निराशाओं तथा असफलताओं को जीवन का एक हिस्सा समझकर स्वीकार करने की शिक्षा एवं परामर्श उन्हें देना चाहिए। यह भी उचित होगा कि बालक की ऊर्जा को खेल-कूद, पढ़ाई, संगीत, योग और पाठ्यक्रम के अलावा दूसरी स्वस्थ गतिविधियों की दिशा में भी लगाना चाहिए।

माता पिता और समकक्षियों में सहायता लेना-

माता-पिता और समकक्षियों से फौरन मदद लेनी चाहिए, ताकि वे उचित मार्गदर्शन कर सकें। निकट और विश्वसनीय मित्रों से भी सलाह लेनी चाहिए। युवाओं की समस्याओं को सुलझाने के लिए समुचित सलाह से उन्हें अपनी चिंता और अपराध भावना को अभिव्यक्त करने में सहायता मिलेगी।

संकट के संकेतों को देखना-

सावधान माता-पिता और अध्यापकों को चाहिए कि ऊपर बताए गए खतरे के संकेतों पर ध्यान दें और उन्हें पहचानें। मित्रों को भी चाहिए कि अगर वे परिचित को ड्रग या ऐल्कोहल लेते हुए देखें तो वे उस व्यक्ति के भले के लिए माता-पिता या अध्यापक को बताने में हिचकिचाएँ नहीं। इसके बाद बीमारी को पहचानने और उसके पीछे छुपे कारणों का पता लगाने के लिए उचित उपाय करने होंगे। इससे समुचित चिकित्सीय उपाय आरंभ करने में सहायता मिलेगी।

व्यावसायिक और चिकित्सा सहायता लेना-

जो व्यक्ति दुर्भाग्यवश ड्रग / ऐल्कोहल के कुप्रयोग रूपी दलदल में फँस गया है उसकी सहायता के लिए उच्च योग्यता प्राप्त मनोवैज्ञानिकों, मनोरोगविज्ञानियों की उपलब्ध और व्यसन छुड़ाने तथा पुनः स्थापना कार्यक्रमों हेतु काफी सहायता उपलब्ध है। ऐसी सहायता से प्रभावित व्यक्ति पर्याप्त प्रयासों और इच्छाशक्ति द्वारा इस समस्या से पूरी तरह छुटकारा पा सकता है और पूर्णरूपेण प्रसामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकता है।


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