पाठ 10 जल jal

जल

सभी सजीव वस्तुओं को जीवित रहने के लिए जल की आवश्यकता होती है। जल ही जीवन है। जल के बिना कोई भी कार्य सम्भव नहीं हैं। पेड़-पौधों और सभी जीव-जन्तुओं का जीवन ही जल के ऊपर निर्भर है। पशुओं का नहाना-धोना, पानी पीना, कपड़े-धोना, खाना बनाना आदि सभी कार्य जल पर ही आधारित हैं। कोयले से चलने वाली रेलगाड़ी भी जल के बिना चलनी असम्भव है।


जल-प्राप्ति के स्रोत – हमें जल अनेक स्रोतों से प्राप्त होता है। वर्षा जल प्राप्ति का प्रमुख स्रोत है। वर्षा का जल ही हमें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होता है। जब वर्षा होती है, तब अधिकांश जल भूमि सोख लेती है। कुछ जल नदी, नालों, तालाबों में भर जाता है। भूमिगत जल को ट्यूबवैल, कुओं और हैण्ड पम्प द्वारा बाहर निकाला जाता है।

जल का प्रदूषित होना – वर्षा का जल साफ होता है। जब यह जल पृथ्वी पर आता है, तो अपने साथ कई पदार्थ धूल, मिट्टी, बालू आदि बहा ले जाता है। धूल और मिट्टी में खनिज पदार्थ होते हैं। ये जल में घुल जाते हैं और जल में घुल जाने के बाद ये जल को प्रदूषित कर देते हैं। जल के प्रदूषित होने के निम्नलिखित कारण हैं.

1. कूड़ा-करकट, मृत प्राणी और कारखानों से निकलने वाले व्यर्थ पदार्थों के जल में मिलने से जल प्रदूषित हो जाता है।

2.तालाबों और पोखरों के भरे हुए जल में कपड़े धोने, स्नान करने और पशुओं को नहलाने से जल प्रदूषित हो जाता है।

3.पेड़-पौधों की पत्तियों के जल में गिरने से जल प्रदूषित हो जाता है।


4.ठहरा हुआ जल प्रदूषित हो जाता है; क्योंकि यह जल न तो बहता है और न ही इसमें ताजा पानी आकर मिलता है।

जल को साफ करने की विधियाँ – गन्दे जल को अग्रलिखित विधियों द्वारा साफ करके पीने-योग्य बनाया जा सकता है –

1. अवसादन जल की अशुद्धियों का तलछट के रूप में नीचे बैठना अवसादन कहलाता है

प्रयोग 1- एक बीकर में पोखर अथवा नदी का गन्दा पानी लीजिए। इसे बिना हिलाये रखे रहने दीजिए। कुछ समय बाद बीकर में रखे पानी को देखिए। आप देखेंगे कि पानी
की अशुद्धियाँ बीकर की पैंदी में तलछट के
रूप में बैठ गई हैं।

2.निथारना-अवसादन विधि द्वारा साफ़ किए हुए पानी को इकट्ठा करने की विधि को निखरना कहते हैं।

प्रयोग 2- अवसादन विधि में आपने देखा कि अशुद्धियाँ जल के नीचे बैठ गईं। उसी बीकर के जल को सावधानी से दूसरे बर्तन में इकट्ठा करो। आप देखेंगे कि स्वच्छ जल
दूसरे बर्तन में आ जाता है और अशुद्धियाँ बीकर की पैंदी में रह जाती हैं।

3.छानकर इस विधि का प्रयोग अधिकतर घरों में किया जाता है किसी बारीक कपड़े या छलनी से जल को छानने की विधि को निस्पंदन या छानना कहलाती है

प्रयोग 3- एक बीकर लीजिए। उसके ऊपर एक बारीक छलनी रखिए। अब छलनी में पानी डालिए। बीकर के भीतर स्वच्छ जल एकत्र हो जायेगा और अशुद्धियाँ छलनी में रह जायेंगी।

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प्रयोग 4 – चार घड़े लेकर उन्हें एक-दूसरे के ऊपर रखिए। उनमें से तीन घड़ों की तलियों में एक-एक छेद कर दीजिए। बिना छेद वाले घड़े को सबसे नीचे वाले स्टैण्ड पर रखिए।

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सबसे ऊपर वाले घड़े में गन्दा पानी भर लीजिए और दूसरे घड़े में बारीक चारकोल डालिए तथा तीसरे घड़े में छिद्र पर रूई का एक बड़ा टुकड़ा रखो। गन्दा पानी बूँद-बूँद करके दूसरे घड़े में गिरेगा। फिर यह चारकोल के चूर्ण में से होकर तीसरे घड़े में गिरेगा। वह रूई में से गुजरेगा तथा साफ पानी सबसे नीचे के घड़े में एकत्र हो जाएगा। यह पानी सभी अशुद्धियों से मुक्त होता है।

छानने की क्रिया में फिल्टर पेपर का प्रयोग करके भी पानी को साफ किया जा सकता है। छानने के लिए यह एक विशेष कागज होता है। इसमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। इस कागज को फिल्टर पेपर कहते हैं। प्रयोग में लाने से पहले इस कागज को बीच में से मोड़कर बराबर भागों में बाँटकर फिर दोबारा भी इसी प्रकार आधे को पुनः मोड़कर चौथाई भाग बना लेते हैं। इसकी तीन तह एक तरफ तथा एक तह दूसरी तरफ कर देते हैं। ऐसा करने पर कागज की एक कीप बन जायेगी।

कागज की इस कीप को गीला करके शीशे की एक कीप में चिपका दें, जो कि एक स्टैण्ड पर फिट हो जाए। कीप के नीचे एक बीकर रखो तथा शीशे की छड़ की सहायता से कीप में गन्दा पानी धीरे-धीरे डालो। अशुद्धियाँ तो कीप में रह जाती हैं और छना हुआ स्वच्छ पानी बीकर में एकत्र हो जाता है। पानी को इस प्रकार साफ करने की विधि को ही छानना कहते हैं। घुलनशील अशुद्धियों को आसवन विधि द्वारा दूर किया जा सकता है।


आसवन विधि – इस विधि में अशुद्ध पानी को गर्म करके भाप में बदलते हैं और भाप को ठण्डा करके जल में बदलते हैं। इस प्रकार घुलनशील अशुद्धियाँ बर्तन में ही रह जाती हैं तथा शुद्ध पानी प्राप्त हो जाता है। इस जल को आसुत जल कहते हैं।

पीने का पानी – उपरोक्त विधियों से पानी पूरी तरह साफ नहीं होता है। यह जरूरी नहीं है कि साफ दिखाई देने वाला पानी पीने योग्य ही हो। इसमें हानिकारक रोगाणु हो सकते हैं, जो हमें दिखाई नहीं देते जिससे बहुत-सी बीमारियाँ जैसे – हैजा एवं मियादी बुखार आदि फैलती हैं।

साफ किये पानी को पीने योग्य बनाना

1.उबालकर यदि हमें पानी के साफ होने का निश्चय नहीं है, तो हमें पानी को /15-20 मिनट उबालकर छान लेना चाहिए। उबालने से जीवाणु मर जाते हैं और यह पानी पीने योग्य हो जाता है।

2.रसायनों से – पानी की पीने योग्य बनाने के लिए उसमें रासायनिक पदार्थ मिलाने चाहिए। जैसे- कुओं में लाल दवाई (पोटैशियम परमैंगनेट) डलकर हानिकारक जीवाणु को मार दिया जाता है। नगरों में पानी की टंकी आदि में क्लोरीन (और फिटकरी जैसे रसायनों का उपयोग करके पानी को जीवाणुओं रहित किया जाता है। जिस पानी में रोगाणु तथा अशुद्धियाँ नहीं होती हैं, वह पानी पीने योग्य होता है। तालाबों, नदियों तथा झीलों का पानी पीने योग्य नहीं होता।


पानी के उपयोग में सावधानी – पीने के पानी को साफ बर्तन में रखना चाहिए। बर्तन से पानी निकालने से पहले अपने हाथों को साफ कर लेना चाहिए और साफ बर्तन से ही पानी निकालना चाहिए। पानी बहुत कीमती है। पानी को हमें व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहिए।

गन्दे पानी से बचाव –

1.घरों के गन्दे पानी को किसी स्थान पर जमा नहीं होने देना चाहिए। गन्दे पानी में ही बीमारियों के विभिन्न जीवाणु उत्पन्न होते हैं।

2.नालियों को साफ रखना चाहिए। नालियों में रोगाणुनाशक दवाई डालनी चाहिए।

3. एक स्थान पर जमा पानी पर सप्ताह में एक बार थोड़ा मिट्टी का तेल जरूर छिड़कना चाहिए।

4.जिस बर्तन में पशु पानी पीते हैं, उसके पानी को समय-समय पर बदलते रहने चाहिए।

भूमि से प्राप्त जल पीने योग्य होता है। वर्षा का जल मिट्टी में छनकर छिद्रमय परतों द्वारा होता हुआ एक छिद्ररहित परत तक पहुँचकर इकट्ठा होता रहता है। इस जल को कुओं और हैन्ड पम्पों द्वारा बाहर निकालते हैं और उपयोग में लाते हैं। यह जल भूमि की परतों से छनकर आता है, जबकि नदी एवं तालाब इत्यादि का जल प्रयोग में लाने के लिए उसे. विभिन्न विधियों द्वारा साफ करना पड़ता है।

याद रखिए-

सभी सजीव वस्तुओं को जीवित रहने के लिए जल की आवश्यकता होती है।

पशुओं का नहाना-धोना, पानी पीना, कपड़े-धोना, खाना बनाना आदि सभी कार्य जल
पर ही आधारित हैं।

वर्षा का जल ही हमें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होता है।

धूल और मिट्टी में खनिज पदार्थ होते हैं।

जल की अशुद्धियों का तलछट के रूप में नीचे बैठना अवसादन कहलाता है।
 
अवसादन विधि द्वारा साफ किये हुए पानी को इकट्ठा करने की विधि को निथारना कहते हैं।

देखें आपने क्या सीखा ?

क. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

1.जल-प्राप्ति का मुख्य स्त्रोत क्या है ?

जल प्राप्ति का मुख्य स्रोत वर्षा का जल है

2.जल प्रदूषित होने के कोई दो कारण बताइये।

1. कारखाने से निकलने वाले व्यक्ति पदार्थ के जाल में मिलने से जल प्रदूषण होता है 2. तालाब और पोखरों के जल में कपड़े धोने स्नान करने से जल प्रदूषित हो जाता है।

3.अवसादन और निथारना विधि में क्या अन्तर है ?

जल की अशुद्धियां तलछट के रूप में नीचे बैठना अवसादन कहते हैं अवसादन विधि द्वारा साफ़ किए गए पानी को इकट्ठा करने की विधि को निथारना कहते हैं।

4.निस्पंदन विधि का प्रयोग अधिकतर कहाँ किया जाता है ?

कपड़े या छलनी से जल को छानने की विधि निस्पंदन कहते हैं और इसका अधिकतर प्रयोग घरों में किया जाता है।

5.भूमिगत जल स्वच्छ कैसे होता है ?

भूमिगत जल भूमि की परतों से छानकर स्वच्छ होता है

6.पानी को किस प्रकार साफ करके पीने योग्य बनाया जा सकता है ?

पानी को किसी बारीक कपड़े या छलनी से जल को छानकर साफ किया जाता है और इसे उबाल कर पीने योग्य बनाया जाता है।


ख. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

1.वर्षा का अधिकांश जल भूमि ..सोख..लेती है।

2.धूल और मिट्टी के ...कड़...जल में घुल जाते हैं।

3….पशुओं के नहाने से… जल प्रदूषित हो जाता है।

4…निस्पंदन …विधि से जल को छाना जाता है

5.भूमिगत जल... पीन योग्य… होता है।

ग. निम्नलिखित वाक्यांशों के सामने सही ( ) और गलत (X) के चिह्न लगाइए

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विद्यार्थी स्वयं दें।

1.वर्षा का जल हमें विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है।

2.वर्षा का जल मन्दा होता है।

3.पेड़.पौधो की पत्तियों के जल में गिरने से जल प्रदूषित हो जाता है।

4. प्रदूषित जल विभिन्न विधियों द्वारा साफ किया जा सकता है।

5.अवसादन विधि में जल की अशुद्धियाँ जल के ऊपर तैरती रहती हैं।

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