पाठ 5 जीव जंतुओं का वर्गीकरण एवं अनुकूलताएं jeev jantuon ka vargikaran

जीव जंतुओं का वर्गीकरण एवं अनुकूलताएं

हमारे ग्रह पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जन्तु रहते हैं। हमारे देश भारत में 70000 जातियों के जन्तु पाये जाते हैं। ये जन्तु भिन्न-भिन्न वातावरण में रहते हैं। कुछ भूमि पर रहते हैं, कुछ वृक्षों पर और कुछ जल में। अन्य कुछ परजीवी हैं। उन्हें अपने वातावरण में निवास, भोजन और प्रजनन की सुविधा मिलती है। यही नहीं, उन्होंने अपने वातावरण के अनुकूल विशेषताएँ विकसित करके अपने को उस वातावरण में स्थापित कर लिया है


निवास स्थान के लिए अनुकूलताएँ –

1.स्थलचरीय जीव-जन्तु

2.उभयचरीय जीव-जन्तु

3.जलीय जीव-जन्तु

4.वृक्षवासी जीव-जन्तु।


1.स्थलचरीय जीव-जन्तु – भूमि पर रहने वाले जीव-जन्तु स्थलचरीय कहलाते हैं। ये जन्तु हर समय भूमि पर रहते हैं। चलने या दौड़ने के लिए इनके लम्बी टाँगें होती हैं। सर्प जैसे जन्तु जिनके चलने या दौड़ने के लिए टाँगें नहीं होतीं, उनके रेंगने के लिए शल्क या प्लेटें होती हैं। इन जन्तुओं के साँस लेने के लिए फेफड़े होते हैं और भोजन ढूँढने तथा खतरा भाँपने के लिए अच्छी तरह विकसित ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं।
ठण्डे स्थानों पर रहने वाले जन्तु, जैसे – भेड़, खरगोश और ध्रुवीय भालू को गर्म रखने के लिए उनकी त्वचा मोटी होती है। धूप से बचने के लिए मरुस्थलीय जन्तुओं की त्वचा मोटी होती है।

ऊँटों के पैर चौड़े और मुलायम गद्दियों वाले होते हैं। जब ऊँट चलता है, तो ये गद्दियाँ फैल जाती हैं। चौड़े पैर और चौड़ी गद्दियों से ऊँट मरुस्थल के रेत पर सरलता से चल सकता है।

2.जलीय जन्तु – जल में रहने वाले जन्तु जलीय जन्तु कहलाते हैं। मछली, कछुआ और केकड़ा आदि जलीय जन्तु हैं। जलीय-जन्तुओं के शरीर का आकार नाव जैसा होता है। मछलियाँ पंखों की सहायता से तैरती हैं। कछुआ तैरने के लिए अपने फ्लिपर (पैडल जैसे हाथ-पैर) से जल को ढकेलता है। मछली और केकड़े गलफड़ों से साँस लेते हैं। वे नाक से जल को बाहर निकालकर श्वास लेते हैं।

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3.उभयचरीय जीव-जन्तु – स्थल और जल दोनों स्थानों पर रहने वाले जीव-जन्तु उभयचरीय कहलाते हैं। इनके पैर की अंगुलियाँ झिल्लीयुक्त होती हैं, जो इन्हें जल में तैरने में सहायता करती हैं। इन जीव-जन्तुओं की टाँगें होती हैं, जिनसे ये भूमि पर चल-फिर सकते हैं। मेंढक, टोड, मगरमच्छ और सैलामैन्डर आदि जन्तु जल और भूमि दोनों पर रहते हैं, इन्हें उभयचरीय कहते हैं। टैडपोल जल में रहते हैं और गिल से श्वास लेते हैं। मेंढक भूमि पर उछलते-कूदते हैं और फेफड़ों से श्वास लेते हैं। अपने झिल्लीदार पंजों से वे जल में तैरते हैं और उस समय अपनी नम त्वचा से श्वास लेते हैं।

4.वृक्षवासी जीव-जन्तु – वृक्षों पर रहने वाले जीव-जन्तु वृक्षवासी जीव-जन्तु कहलाते हैं। ये जन्तु अधिकतर समय वृक्षों की शाखाओं पर व्यतीत करते हैं। उनकी बाहें और टाँगें मजबूत होती हैं। बन्दर, वृक्ष पर रहने वाली छिपकली और गिलहरी आदि वृक्षीय जन्तु हैं। इनके शरीर की बनावट विशेष प्रकार की होती है, जिससे ये वृक्ष की शाखाओं को पकड़कर सरलता से चढ़ – उतर सकते हैं। गिलहरी, बन्दर एवं गिरगिट पेड़ों पर आसानी से चढ़ सकते हैं। ये वृक्षों पर ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। बन्दर अपनी पूँछ से किसी शाखा को जकड़ लेते हैं और उल्टे लटककर अपनी कलाबाजियाँ दिखाते हैं। गिलहरियों और छिपकलियों को उनके नुकीले पंजे वृक्षों पर चढ़ने में सहायता प्रदान करते हैं।

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5.वायुवीय जन्तु – पक्षी, चमगादड़ और कुछ कीट वायुवीय जन्तु हैं। ये जन्तु अपना अधिकतर समय वायु में बिताते हैं, इसलिए उड़ने के लिए इनके पंख होते हैं। इनकी हड्डियाँ हल्की और खोखली होती हैं। इनका नाव जैसी आकृति वाला शरीर इन्हें वायु को ढकेलकर आगे बढ़ने में सहायता करता है। कुछ पक्षियों के पैर की अंगुलियाँ और नाखून इस प्रकार के होते हैं कि वे उन्हें वृक्ष की शाखाओं को जकड़कर सुरक्षित बैठने में सहायता करते हैं।

भोजन के लिए अनुकूलताएँ

भोजन पाने में समर्थ होने के लिए जन्तु अपने में कुछ विशेषताएँ विकसित कर लेते हैं। उन्हें हम चार समूहों में रख सकते हैं।

1.शाकाहारी जन्तु – जो जन्तु केवल पौधे के विभिन्न भागों और उनसे बने पदार्थ खाते हैं, वे शाकाहारी कहलाते हैं। जिराफ, जेबरा, गाय, भैंस, बकरी और घोड़ा पौधे खाने वाले जन्तु हैं। उन्हें भोजन की खोज में दूर-दूर तक जाना पड़ता है। अत: उनकी टाँगे मजबूत होती हैं। तेज काटने वाले दाँत और मजबूत चबाने वाले दाँत उन्हें घास इत्यादि खाने में सहायता करते हैं। जिराफ की लम्बी गर्दन उसे वृक्षों की ऊँची शाखाओं से पत्तियाँ खाने में सहायता करती हैं।

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ऊँट अपने कूबड़ में चर्बी (भोजन) तथा अपने पेट की विशेष थैलियों में जल का संग्रह कर लेता है। जब इसे मरुस्थल में बिना भोजन-पानी के चलना पड़ता है, तब यह इस भोजन और पानी का उपयोग कर लेता है। वाष्पीकरण से जल की हानि रोकने के लिए मरुस्थलीय जन्तुओं की त्वचा मोटी होती है।

2.माँसाहारी जन्तु – जो जन्तु दूसरे जन्तुओं का माँस खाते हैं, माँसाहारी कहलाते हैं। इनके माँस को फाड़ने या चीरने के लिए नुकीले दाँत या चोंच होती है। शेर, चीता, बिल्ली और कुत्ता माँसाहारी स्तनपायी हैं। गरुड़, गिद्ध और पेन्गुइन माँसाहारी पक्षी हैं। शार्क एक माँसाहारी मछली है।

कुत्ते और बिल्ली माँसाहारी जन्तु हैं, किन्तु रोटी और दूध भी खा-पी लेते हैं। वे अपनी लम्बी जीभ से दूध, पानी और अन्य द्रव पदार्थों को चाट-चाटकर पीते हैं। शिकार को पकड़ने के लिए गरुड़ और गिद्ध के मजबूत पंजे होते हैं और उसका माँस फाड़ने-चीरने के लिए नुकीली चोंच होती है। पेन्गुइन दक्षिणी ध्रुव के चारों ओर के क्षेत्र में रहती है। वे लगभग एक मीटर ऊँची होती हैं। वे उड़ नहीं सकती हैं, किन्तु अपने मजबूत छोटे पंजों को फ्लिपर की भाँति प्रयोग करके तैरती हैं। वे ठण्डे समुद्र में डुबकी लगाती हैं और मछली पकड़ती हैं।

3.सर्वाहारी जन्तु – जो जन्तु पौधे और जन्तु दोनों को खाते हैं, वे सर्वाहारी जन्तु कहलाते हैं। जैसे- भालू, कौआ एवं कॉकरोच इत्यादि । मनुष्य के अधिकांश दाँत शाकाहारी जन्तुओं की भाँति नुकीले और चबाने वाले होते हैं। वह काटने वाले दाँतों के बीच फाड़ने या चीरने वाले दो जोड़े नुकीले दाँत रखता है, जिन्हें माँसाहारी जन्तुओं की भाँति चीरने-फाड़ने के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है। यही नहीं माँसाहारी जन्तुओं के काटने वाले दाँत नहीं होते हैं। इस प्रकार मनुष्य प्रकृति से शाकाहारी है, किन्तु आजकल मनुष्य सर्वाहारी हो गये हैं।

4.परजीवी जन्तु –जो जन्तु दूसरे जन्तुओं के शरीर के ऊपर या उसके भीतर रहते हैं परजीवी कहलाते हैं। जैसे मच्छर, जोंक, खटमल, पिस्सू एवं फीताकृमि इत्यादि ।
फीताकृमि मनुष्य की आँतों में रहता है। दूसरे जन्तु से भोजन या रक्त चूसने के लिए इनके चूषक होते हैं।

सुरक्षा के लिए अनुकूलन

प्रत्येक जन्तु सुरक्षा चाहता है। जन्तु अपनी सुरक्षा विभिन्न प्रकार से करते हैं

1.पलायन – शत्रुओं से बचने के लिए मेंढक, मक्खी और मछली बड़ी तेजी से कूदते, उड़ते या तैरते हैं। उनकी टाँगें और पंख बहुत मजबूत होते हैं, ताकि वे कूदकर, उड़कर या तैरकर दूर चले जायें। हिरन, खरगोश जैसे जन्तु और पक्षी अपनी दौड़ने और उड़ने की शक्ति का प्रयोग करके अपनी सुरक्षा करते हैं।

2.विशाल आकार – कुछ जन्तु इतने बड़े होते हैं कि दूसरे जन्तु प्रायः उन्हें नहीं खा सकते हैं, जैसे – गैंडा, हाथी, ह्वेल और हिप्पो ।

3.रंग-रूप समानता या रंग-रूप परिवर्तन– कुछ जन्तुओं का रंग-रूप उनके प्राकृतिक वातावरण से मिलता-जुलता है, जो शत्रुओं से थोड़ी बहुत सुरक्षा प्रदान करता है। मिलते-जुलते रंग-रूप के कारण वे वातावरण में छिप जाते हैं। ध्रुवीय भालू और लोमड़ी सफेद रंग के होते हैं। यह सफेद रंग बर्फ के रंग से मिलता-जुलता होने से वे आसानी से दिखाई नहीं देते हैं। कुछ जन्तु जैसे गिरगिट और मेंढक में रंग परिवर्तन की शक्ति होती है। वे अपना रंग वातावरण जैसा बदलकर छिप जाते हैं।

4.शीत निद्रा या शीत निष्क्रियता – मेंढक, छिपकली और मगरमच्छ जैसे कुछ जन्तु अधिक ठण्ड सहन नहीं कर सकते हैं। अतः ये शीतनिद्रा या शीतनिष्क्रियता में भूमि के नीचे चले जाते हैं। यही कारण है कि शीत ऋतु में हमारे घर में छिपकली दिखाई नहीं देती है। इतने समय तक वे अपने शरीर में संग्रहित भोजन का उपयोग करती हैं।

5.देशान्तर – कुछ जन्तु, मुख्य रूप से पक्षी भोजन एवं उष्णता की खोज में बहुत दूर तक चले जाते हैं। इस प्रक्रिया को देशान्तरण कहते हैं। वातावरण अनुकूल होने पर वे फिर वापस लौट आते हैं।

लुप्त जन्तु – बहुत समय पहले इस पृथ्वी पर डायनासोर रहते थे। इस समय वे सब समाप्त हो चुके हैं, उन्हें हम लुप्त जन्तु कहते हैं। वे इस समय विद्यमान नहीं हैं। वे बदलते हुए वातावरण से अनुकूलन नहीं कर सके इसलिए समाप्त हो गए। अतः जीवित रहने के लिए अनुकूलन का होना बहुत जरूरी है।

याद रखिए-

हमारे ग्रह पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जन्तु रहते हैं। 

हमारे देश भारत में 70000 C जातियों के जन्तु पाये जाते हैं।

भूमि पर रहने वाले जीव-जन्तु स्थलचरीय कहलाते हैं।

धूप से बचने के लिए मरुस्थलीय जन्तुओं की त्वचा मोटी होती है।

जल में रहने वाले जन्तु जलीय जन्तु कहलाते हैं।

मेंढक, टोड, मगरमच्छ और सैलामैन्डर आदि जन्तु जल और भूमि दोनों पर रहते हैं,
इन्हें उभयचरीय कहते हैं।

पक्षी, चमगादड़ और कुछ कीट वायुवीय जन्तु हैं।


देखें आपने क्या सीखा ।

क. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

1.अनुकूलन से आप क्या समझते हैं ?

मनुष्य या जन्तु जिस स्थान पर रहता है वहां का पर्यावरण उसके लिए लाभदायक होता है तो उसे हम अनुकूलन कहते हैं।

2.मरुस्थलीय और ठण्डे देशों के जन्तुओं की त्वचा का क्या कार्य है ?

मरुस्थलीय और ठंडे देशों में जंतुओं का त्वचा मोटे होने के कारण शुष्क तथा ठण्डा स्थान पर बचाव का कार्य करती है।

3. वृक्षीय जन्तुओं के पंजों का क्या उपयोग है ?

वृक्षीय जन्तुओं के पंजों का का उपयोग है डोलियों पर जकड़ कर बैठते के लिए उपयोग करते हैं

4.साँप में बिना टाँगों के चलने के लिए किस प्रकार का अनुकूलन है ?

सांप बिना टांगें को रेंगने के लिए अनुकूलन सल्क या प्लेटे होती हैं

5.जिराफ में अपने भोजन के लिए किस प्रकार का अनुकूलन है ?

जिराफ अपनी भोजन के लिए अपनी लंबी गरदानों के लिए अनुकूलन है।

6. माँसाहारी जन्तु किसे कहते हैं ?

जो जन्तु मांस को कहते हैं उसे मांसाहारी जन्तु कहते हैं।

7.शीत निष्क्रियता किसे कहते हैं ?

जो जीव अधिक ठंड नहीं सह पाते हैं वह भूमि के अंदर चले जाते हैं उसे शीत निष्क्रियता कहते हैं।

8.डायनासोर क्यों लुप्त हो गए ?

डायनासोर बदलते हुए वातावरण से अनुकूलन नहीं कर सके इसलिए समाप्त हो गए।

ख. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –


1….टैडपोल…गिल से साँस लेती है।

2.स्थलीय जन्तुओं की..ज्ञान…इन्द्रियाँ अच्छी तरह विकसित होती हैं।

3.शार्क एक… मांसाहारी…मछली है।

4.जो जन्तु एक-दूसरे के आधार से जीवित रहते हैं.. परजीवी…कहलाते हैं।

5.व्हेल (और) हाथी …विशाल आकार …के कारण सुरक्षित हैं।



ग. सही कथन के सामने ( ) का और गलत कथन के सामने आगे (X) का चिह्न लगाइए-

1.बन्दर अपनी पूँछ से वृक्ष की शाखा को जकड़कर उल्टा लटक सकता है।

2.गिरगिट अपनी त्वचा का रंग बदल सकता है।

3.स्थलीय जन्तुओं को धूप से बचाने के लिए मोटी खाल होती है।

4.बन्दरिया वायुवीय जन्तु है।

5.मेंढक शीतनिद्रा के लिए चला जाता है।

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