Jeev jantuon mein prajanan जीव जन्तुओं में प्रजनन पाठ 4

जीव जन्तुओं में प्रजनन

प्रकृति का नियम है कि कोई भी जीवधारी सदैव जीवित नहीं रहता है। वह संसार में जैसा आता है, एक दिन वैसा ही चला जाता है। सभी जीवधारियों में अपने वंश को बढ़ाने की क्षमता होती है। सभी प्राणी अपनी जाति की निरन्तरता बनाये रखने के लिए प्रजनन करते हैं। मनुष्य हो या जीव-जन्तु सभी अपने जैसी सन्तान उत्पन्न करते हैं। वंश वृद्धि करना प्रत्येक जीवधारी की विशेषता है। जीवधारी प्रजनन-क्रिया द्वारा सन्तान उत्पन्न करते हैं। जिस प्रक्रिया के द्वारा पौधे और जन्तु अपने जैसे नन्हें पौधे या शिशु को उत्पन्न करते हैं, वह क्रिया प्रजनन कहलाती है।

भिन्न-भिन्न जन्तु भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रजनन करते हैं। कुछ जन्तु अपने शिशुओं को जन्म देते हैं, और कुछ जन्तु अण्डे देते हैं। अण्डे को सेने से कुछ समय बाद शिशु निकल आता है। मानव शिशु, बछड़े, पिल्ले, बिल्ली एवं भैंस के बच्चे इत्यादि सीधे जन्म लेते हैं। चूजे, टैडपोल और मछली के शिशु लारवा इत्यादि अण्डों से निकलते हैं।

स्तनपायी जन्तुओं में प्रजनन

स्तनपायी ही केवल ऐसे जन्तु हैं, जो पूरी तरह से विकसित शिशुओं को जन्म देते हैं। मादा के अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए छाती में स्तन होते हैं। वे अपने बच्चों की सब प्रकार से सुरक्षा और देखभाल करते हैं। बाल केवल स्तनपायी जन्तुओं के शरीर पर पाये जाते हैं। वे उष्ण रक्त वाले जन्तु हैं अर्थात् उनके शरीर का तापमान बाहर के तापमान के अनुसार नहीं बदलता है।


कुछ स्तनपायी जन्तुओं जैसे व्हेल मछली का आकार बहुत बड़ा होता है। चूहे (और छछूंदर जैसे स्तनपायी बहुत छोटे होते हैं। अधिकतर स्तनपायी भूमि पर ही रहते हैं, जैसे मनुष्य, गाय, बकरी, घोड़ा, हिरन, हाथी एवं शेर इत्यादि। उनमें से कुछ जैसे बन्दर और गिलहरी वृक्षों पर रहते हैं। दूसरे कुछ जन्तु जैसे व्हेल और डोल्फिन मछली की भाँति जल में रहते हैं। इनमें से बहुत कम वायु में उड़ सकते हैं, जैसे – चमगादड़ ।

नर और मादा स्तनपायी भिन्न-भिन्न होते हैं। मादा ही शिशुओं को जन्म देती है। नन्हें शिशु माता के शरीर में बढ़ते हैं। जब उनका विकास हो जाता है, तो उनका जन्म हो जाता है।

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माता स्तनपायी नन्हें शिशुओं को शुरू में दूध पिलाती है। माता और पिता दोनों शिशुओं को खिलाते-पिलाते,
सुरक्षा और देखभाल करते हैं, जब तक वे इतने बड़े न हो जायें कि अपने खाने-पीने का प्रबन्ध स्वयं कर सकें। मनुष्य तो अपने बच्चों की देखभाल भी करते हैं। हम भी स्तनपायी जन्तु हैं। हमारे माता-पिता हमारी देखभाल करते हैं और हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

अण्डे देने वाले स्तनपायी – दो स्तनपायी जन्तु ऐसे हैं, जो शिशुओं को जन्म नहीं देते हैं, बल्कि अण्डे देते हैं। पहला डकबिल (प्लेटीपस) है, जो आस्ट्रेलिया में पाया जाता है। इसकी बत्तख जैसी चोंच, रोएँदार खाल और झाड़ीदार पूँछ होती है। दूसरा अण्डे देने वाला स्तनपायी है- एकिडना । इसके बाल होते हैं। यह अपने शिशुओं को दूध पिलाता है, किन्तु अण्डे देता है।

अन्य जन्तुओं में प्रजनन – कीट, मछली, मेंढक, सर्प और पक्षी अण्डे देकर प्रजनन करते हैं। कुछ अण्डे बहुत छोटे होते हैं, तो कुछ बहुत बड़े। शुतुरमुर्ग के अण्डे संसार में सबसे बड़े होते हैं। कुछ अण्डे सफेद होते हैं, तो दूसरे भिन्न-भिन्न प्रकार के रंग वाले होते हैं। मादा ही अण्डे देती है। अण्डों से बच्चे निकलते हैं, जो अपने माता-पिता से मिलते-जुलते होते हैं।

कुछ जन्तु एक दो अण्डे ही देते हैं, तो कुछ हजारों अण्डे देते हैं। एक बार के सारे अण्डों से शिशु नहीं निकल पाते हैं। इनमें से कुछ अन्य जन्तु खा जाते हैं और कुछ अन्य कारणों से नष्ट हो जाते हैं।

एक पक्षी के अण्डे की संरचना – पक्षी के अण्डे का बाहरी आवरण कठोर होता है, जो अण्डे के भ्रूण की रक्षा करता है। इसमें ऑक्सीजन जाने के लिए सूक्ष्म छिद्र होते हैं। आवरण के भीतर एल्ब्यूमिन होता है। यह एक सफेद गाढा द्रव होता, जिसे अण्डे की सफेदी भी कहते हैं। यह योक और भ्रूण की रक्षा करता है। इसके भीतर पीला गोल योग (अण्डे की जर्दी) होता है, जो बढ़ते हुए भ्रूण (नन्हें पक्षी) के लिए भोजन का कार्य करता है।

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अण्डे से नन्हा शिशु तभी बन सकता है; जब इसे गर्म रखा जाये। इस प्रक्रिया को सेना कहते हैं। पक्षी अपने अण्डों को गर्म रखने के लिए प्रायः उन पर बैठते हैं। मुर्गी के अण्डे के भ्रूण से चूजा बनने तक लगभग 20 दिन लग जाते हैं। प्रारम्भ में भ्रूण जर्दी के बीच एक लाल बिन्दु होता है। धीरे-धीरे आँखें, पंख, टाँगें और शरीर बढ़ता है। 21वें दिन चूजा अण्डा तोड़कर बाहर आ जाता है।

नन्हें पक्षी के पंख नहीं होते और इसकी आँखें बन्द होती हैं। मादा पक्षी उसको भोजन खिलाती है। माता और पिता उसकी सुरक्षा और देखभाल करते हैं, जब तक कि नन्हा शिशु पर्याप्त मजबूत नहीं हो जाता और उड़ना सीखकर स्वयं अपना भोजन ढूँढने और जुटाने नहीं लगता।

साँप और छिपकली के अण्डे – साँप और छिपकली अपने अण्डे जमीन पर ही दे देते हैं। उनके अण्डों पर चमड़े जैसा आवरण चढ़ा होता है, जो उनकी रक्षा करता है। इनमें से अधिकतर अण्डों या बच्चों की देखभाल नहीं करते। अण्डे सूर्य की गर्मी से सेये जाते हैं।

मछली, मेंढक और कीटों के अण्डों की संरचना सरल है। कीटों के अण्डों पर चिटिन का बना एक कठोर आवरण होता है। किन्तु मछली या मेंढक के अण्डों पर ऐसा कोई आवरण नहीं होता है। मछली और मेंढक अपने अण्डे जल में देते हैं। मेंढक के अण्डे एक गाढ़े लिसलिसे पदार्थ से लिपटे रहते हैं, जो उनकी सुरक्षा करता है।
कीट अपने अण्डों या शिशुओं की बिल्कुल देखभाल नहीं करते हैं। बस वे अण्डे एक सुरक्षित स्थान में दे देते हैं। अण्डे वातावरण की गर्मी से सेये जाते हैं।

मछली और मेंढक अपने अण्डे जलीय पौधों जैसे सुरक्षित स्थानों में देते हैं। अण्डे सूर्य की गर्मी से सेये जाते हैं। वे शिशुओं की देखभाल थोड़े समय के लिए ही करते हैं।

जीवन-चक्र

अण्डे से युवा होने तक विकास की कई अवस्थाएँ होती हैं। इन सब अवस्थाओं को मिलाकर जीवन-चक्र कहते हैं।
मेंढक का जीवन चक्र एक मादा मेंढक जल में अण्डे देती है। अण्डों में से छोटी-छोटी छुछमछलियाँ निकलती हैं। कुछ समय बाद अण्डे से एक स्वतन्त्र तैरने वाला टैडपोल बन जाता है। इनका आकार मछलियों जैसा होता है। टैडपोल मेंढक से बिल्कुल भिन्न दिखाई देता है। यह केवल पानी में ही रह सकता है और गिल द्वारा श्वसन क्रिया करता है।

टैडपोल की एक छोटी-सी पूँछ होती है, जिसकी सहायता से यह पानी में तैरता है। जैसे-जैसे इसका विकास होता है, इसकी पूँछ समाप्त हो जाती है। टैडपोल बढ़ते-बढ़ते युवा मेंढक बन जाता है। मेंढक भूमि पर भी रह सकता है और जल में भी। भूमि पर यह फेफड़ों से श्वास लेता है और जल में नम त्वचा से श्वसन-क्रिया करता है।

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मछली का जीवन चक्र – मछली जल में ही अंडे देती है अंडों से नन्ही मछली निकलती है जिसे फ्राई कहते हैं यह बढ़ाते बढ़ाते युवा मछली बन जाती है

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तिलचट्टे का जीवन-चक्र– तिलचट्टे को कॉकरोच भी कहते हैं। तिलचट्टे और टिड्डे जैसे कीटों के जीवन में तीन अवस्थाएँ होती हैं। तिलचट्टे से एक छोटा-सा कीट निकलता है, जिसे अर्भक या निम्फ कहते हैं। अर्भक और बड़े तिलचट्टे (कॉकरोच) में बहुत कम अन्तर होता है। यह फुदक नहीं सकता है; क्योंकि इसके पंख नहीं होते हैं। कुछ समय पश्चात् यह अपनी त्वचा गिरा देता है और युवा हो जाता है। पुरानी त्वचा के गिराने को मोल्टिंग कहते हैं।


तितली का जीवन-चक्र – तितली और घरेलू मक्खी को युवा होने से पहले चार अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ता है। अण्डों से कीड़े जैसा प्राणी लारवा निकलता है। लारवा माता-पिता से बिल्कुल भिन्न दिखाई पड़ता है। तितली के लारवा को कैटरपिलर या प्यूपा कहा जाता है। कैटरपिलर बहुत सक्रिय होता है और पत्तियाँ खा-खाकर मोटा कोकून बन जाता है। लारवा तेजी से बढ़ता है और अपना आकार बदल लेता है। कुछ समय बाद यह खाना बन्द कर देता (और अपने चारों और एक रेशमी आवरण कोकून बुन लेता है। इस अवस्था को ही प्यूपा कहते हैं। इस अवस्था में यह निष्क्रिय पड़ा रहता है। अन्त में कोकून फटता है और एक सुन्दर तितली बाहर आती है और उड़ जाती है।

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कैटरपिलर से प्यूपा बनकर तितली बनने को रूपान्तरण कहते हैं। घरेलू मक्खी के लारवा को मैगोट कहते हैं।

याद रखिए-

सभी जीवधारियों में अपने वंश को बढ़ाने की क्षमता होती है। 
वंश वृद्धि करना प्रत्येक जीवधारी की विशेषता है।
● भिन्न-भिन्न जन्तु भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रजनन करते हैं।
बाल केवल स्तनपायी जन्तुओं के शरीर पर पाये जाते हैं।
कुछ स्तनपायी जन्तुओं जैसे व्हेल मछली का आकार बहुत बड़ा होता है।

नर और मादा स्तनपायी भिन्न-भिन्न होते हैं। मादा ही शिशुओं को जन्म देती है।

शुतुरमुर्ग के अण्डे संसार में सबसे बड़े होते हैं।

साँप और छिपकली अपने अण्डे जमीन पर ही दे देते हैं।

मछली, मेंढक और कीटों के अण्डों की संरचना सरल है।

मछली और मेंढक अपने अण्डे जलीय पौधों जैसे सुरक्षित स्थानों में देते हैं।

देखें आपने क्या सीखा ।

क. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

1.प्रजनन किसे कहते हैं ?

जिस प्रक्रिया के द्वारा पौधे और जंतु अपने जैसे नन्हे पौधे या शिशु को उत्पन्न करते हैं वह क्रिया प्रजनन कहलाती है

2.स्तनपायी जन्तुओं में पायी जाने वाली तीन विशेषताएँ लिखिए।

1.स्तनपाई ही केवल एक ऐसे जंतु है जो पूरी तरह से विकसित शिशुओं को जन्म देते हैं।.2. मद के अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए छाती में स्तन होते हैं।3. बाल केवल स्तनपाई जंतुओं के शरीर पर पाए जाते हैं।

3. मोल्टिंग क्या होता है ?

अर्भक जब युवा हो जाता है ।तो अपनी पुरानी त्वचा को गिरा देते हैं । उसे मोल्टिंग कहते हैं।

4.जन्तु प्रजनन क्यों करते हैं ?

वंश वृद्धि करना प्रत्येक जीवधारी की विशेषता है इसलिए प्रजनन करते हैं।

5.पक्षी अपने नन्हें शिशुओं की देखभाल क्यों करते हैं ?

नन्हे पक्षी के पंख नहीं होती है और उसकी आंखें बंद होती है। जब तक नन्हा शिशु प्रयाग मजबूत नहीं हो जाता तब तक उसकी देखभाल करते हैं।

ख. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

1.जीवधारियों में … वंश…बढ़ाने की क्षमता होती है।

2.दूध पिलाने वाले पशुओं को .. स्तनपायी…कहते हैं।

3.पक्षी ..पंखों ..से अण्डों को गर्म रखते हैं।

4…तितली ..का जीवन-चक्र चार अवस्थाओं से होकर गुजरता है।

5.प्यूपा विकसित होकर ..तितली …बनता है।

ग. निम्नलिखित सत्य कथन के आगे सही () और असत्य कथन के आगे गलत (X) चिह्न लगाइए.

1.जीवधारी सदैव जीवित रहते हैं।

2.अण्डे देने वाले जन्तुओं के बच्चे अण्डों के अन्दर विकसित होते हैं।

3.अण्डे का पीला भाग जर्दी कहलाता है।

4.तिलचट्टे के अण्डों में से छुछमछलियों निकलती हैं।

5.तितली के अण्डे से निकलने वाले कीट को अर्भक कहते हैं।

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