जीवों में जनन – Jeevo Me Janan

किसी जीव के जन्म से लेकर उसकी प्राकृतिक मृत्यु तक अवधि का उस जीव का जीवनकाल कहते हैं। प्रत्येक जीव केवल कुछ निश्चित समय तक ही जीवित रह सकता है। जीव के जन्म से उसकी प्राकृतिक मृत्यु तक का यह काल, उस जीव की जीवन अवधि को निरूपित करता है। क्या यह दोनों बातें रोचक एवं कौतूहल पूर्ण नहीं हैं कि यह अवधि कम से कम एक दिन या फिर अधिक से अधिक कुछ हज़ार वर्ष हो सकती हैं? इन दोनों चरम सीमाओं के मध्य अधिकांश जीवित जीवों की जीवन अवधि बनी रहती है। आप शायद इस बात पर ध्यान देंगे कि किसी जीव की जीवन अवधि का आवश्यक रूप से आकार (साइज) से संबंध नहीं है; कौआ और तोता के आकार में कोई अंतर नहीं होता, फिर भी इन दोनों के जीवन अवधि में बहुत अंतर होता है। ठीक इसी प्रकार से आम के वृक्ष की जीवन अवधि पीपल के वृक्ष की तुलना में बहुत कम होती है। जीवन अवधि भले ही कितनी ही हो, परंतु प्रत्येक जीव की मृत्यु सुनिश्चित है। दूसरे शब्दों में; यह कह सकते कि एक कोशीय जीवों को छोड़कर कोई भी जीव अमर नहीं है। हम क्यों कहते हैं कि एक कोशीय जीव की प्राकृतिक मृत्यु नहीं होती? इस वास्तविकता को जानते हुए क्या आपको आश्चर्य नहीं होता कि हजारों वर्षों से पृथ्वी पर पादपों तथा पशु-पक्षियों की विभिन्न स्पीशीज़ की विशाल संख्या विद्यमान है? जीवित जीवों में कुछ प्रक्रियाएँ अवश्य ही ऐसी हैं जिनसे यह निरंतरता सुनिश्चित होती है। हाँ, यहाँ हम जनन का उल्लेख कर रहे हैं जिसे हम निश्चित मानते हैं।

जीवों में जनन को यहाँ एक जीव विज्ञानीय प्रक्रम के रूप में परिभाषित किया गया है; जिसमें एक जीव अपने समान एक छोटे से जीव (संतति) को जन्म देता है। संतति में वृद्धि होती है, उनमें परिपक्वता आती है तथा इसके बाद वह नयी संतति को जन्म देती है। इस प्रकार जन्म, वृद्धि तथा मृत्यु चक्र चलता रहता है। जनन प्रजाति में एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी में निरंतरता बनाए रखती है।
जीव विज्ञानीय संसार में व्यापक विविधता पाई जाती है तथा प्रत्येक जीव अपने को बहुगुणित करने तथा संतति उत्पन्न करने के लिए अपनी ही विधि विकसित करता है। जीव किस प्रकार से जनन करता है उसके वास, उसकी आंतरिक शरीर क्रिया विज्ञान तथा अन्य कई कारक सामूहिक रूप से उत्तरदायी हैं। जनन प्रक्रिया दो प्रकार की होती है जो एक अथवा दो जीवों के बीच भागीदारी पर आधारित रहती है। जब संतति की उत्पत्ति एकल जनक द्वारा युग्मक (गैमीट) निर्माण की भागीदारी के साथ अथवा इसकी अनुपस्थिति में हो तो वह जनन अलैंगिक कहलाता है।

जब दो जनक (विपरीत लिंग वाले) जनन प्रक्रिया में भाग लेते हैं तथा नर और मादा युग्मक (गैमीट) में युग्मन होता है तो यह लैंगिक जनन कहलाता है।


अलैंगिक जनन


इस विधि में एकल जीव (जनन) संतति उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। इसके परिणामस्वरूप जो संतति उत्पन्न होती है; वह केवल एक दूसरे के समरूप ही नहीं, बल्कि अपने जनक के एकदम समान होती है। क्या यह संतति आनुवंशिक रूप से भी एक समान अथवा भिन्न होती है? अकारिकीय तथा आनुवंशिक रूप से एक समान जीवों के लिए क्लोन शब्द की रचना की गई है।
आइए! जीवों के विभिन्न वर्गों के मध्य पाए जाने वाले अलैंगिक जनन के विस्तृत रूप का अध्ययन करें। अलैंगिक जनन सामान्य रूप से एकल जीव, पादप तथा जीव (अपेक्षाकृत साधारण जीव) आदि में पाया जाता है। प्रजीव तथा एक केंद्रकीय जीव (प्रोटिस्टा एवं मोनेरा) में जनक कोशिका दो में विभक्त होकर नए जीवों को जन्म देती हैं। अत: इन जीवों में कोशिका विभाजन एक प्रकार से जनन की क्रिया विधि है। बहुत से एकल – कोशिका जीव द्विखंडन से उत्पन्न होते हैं, जिनमें एक कोशिका दो भागों में विभक्त हो जाती है और प्रत्येक भाग एक वयस्क जीव के रूप में तीव्रता पूर्वक वृद्धि कर जाता है (जैसे अमीबा, पैरामीसियम आदि) । यीस्ट में यह विभाजन एक समान नहीं होता तथा छोटी कलिकाएँ उत्पन्न हो जाती हैं जो प्रारम्भ में तो जनक कोशिका से जुड़ी रहती हैं और बाद में अलग हो कर नए यीस्ट जीव में परिपक्व हो जाती हैं।
फंजाई जगत के सदस्य तथा साधारण पादप जैसे शैवाल विशेष अलैंगिक जननीय संरचनाओं द्वारा जनन करते हैं। इन संरचनाओं में अत्यंत ही सामान्य संरचनाएँ अलैंगिक चलबीजाणु (जू स्पोर्स) हैं जो सामान्यतः सूक्ष्मदर्शीय चलनशील संरचनाएँ होती हैं। अन्य सामान्य अलैंगिक जनन संरचनाएँ कोनिडिया (पैनीसिलम), कलिका (हाइड्रा ) तथा जैम्यूल (स्पंज) होते हैं।

कक्षा 11 में आपने पादपों के कायिक जनन के बारे में अवश्य ज्ञान प्राप्त किया होगा। आपका क्या विचार है कि कायिक जनन भी एक प्रकार का अलैंगिक जनन है? आप ऐसा क्यों सोचते हैं? क्या क्लोन शब्द कायिक जनन से उत्पन्न संतति के लिए उपयोज्य है।
जबकि जंतुओं तथा अन्य साधारण जीवों में अलैंगिक शब्द का प्रयोग स्पष्ट रूप से तथा पादपों में इस शब्द का प्रयोग निरंतर किया जाता है। पादपों में कायिक प्रवर्धन की इकाई जैसे उपरिभूस्तारी (सर) प्रकन्द, (सरजोम) सकरकन्द, बल्व, भूस्तरी (औफ सेंट) सभी नयी संतति को पैदा करने का सामर्थ्य रखते हैं। ये संरचनाएँ कायिक प्रवर्ध कहलाती हैं, चूँकि इन संरचनाओं के निर्माण में दो जनक भाग नहीं लेते, अतः यह अलैंगिक जनन ही होगा।

आपने निश्चित तौर पर जलाशयों की ‘महाविपत्ति’ अथवा ‘बंगाल के आतंक’ के बारे में अवश्य सुना होगा। यह कुछ भी नहीं, बल्कि जलीय पादप वाटर हायसिंथ है जो ठहरे जल में सर्वाधिक वृद्धि करने वाला खरपतवार है। यह जल से ऑक्सीजन खींच लेता है जिसके परिणामस्वरूप मछलियाँ मर जाती हैं। आपको जानकर रोचक लग सकता है कि इस पादप का भारतवर्ष में आगमन मात्र इसमें सुंदर आकार के पुष्प तथा पत्तियों के कारण हुआ । यद्यपि यह कायिक प्रवर्धन द्रुतगति से कर सकता है और अल्प समय में ही संपूर्ण जलाशय पर फैल जाता है और अपने आप से जलाशय को ढक देता है और इससे छुटकारा पाना बहुत ही कठिन होता है।
क्या आप इस तथ्य से परिचित हैं कि आलू, गन्ना, केला, अदरक, डहलिया जैसे पादपों की खेती किस प्रकार की जाती है? क्या आपने आलू के कंद पर स्थित कलिका (जिसे आँख भी कहते हैं) से, और केले तथा अदरक के प्रकंद से नन्हा सा पादप निकलता हुआ देखा है? जब आप ध्यान पूर्वक उपर्युक्त सूचीबद्ध पादपों में से विकसित होने वाले पादपकों (प्लांटलेट्स) की उत्पत्ति स्थानों का निर्धारण करने का प्रयत्न करेंगे तब आप पाएँगे कि यह अधिकतर इन पादपों के रूपांतरित स्तंभों में उपस्थित प्रर्वसंधियों (नोड्स) से उत्पन्न होती हैं, जब यह पर्वसंधियाँ नमीयुक्त मृदा अथवा जल के संपर्क में आती हैं तब इनके मूल (रूट्स) तथा नए पादप उत्पन्न होते हैं। ठीक इसी प्रकार पत्थरचटा (ब्रायोफिलम) की पत्तियों में कटे किनारों से अपस्थानिक (एडवेंटिसियस) कलिकाएँ उत्पन्न होती हैं। माली लोग तथा किसान पादपों के इस गुण सामर्थ्य का पूरा लाभ उठाते हुए ऐसे पादपों का बड़े पैमाने पर प्रवर्धन करते हैं।
ध्यान देने योग्य एक रोचक बात यह है कि अपेक्षाकृत साधारण जीवों में अलैंगिक जनन ही जनन की सामान्य विधि है; जैसे कि शैवाल तथा फंजाई और ये प्रतिकूल परिस्थितियों आरंभ से पूर्व जनन की लैंगिक विधि की ओर बढ़ने लगती हैं । यह पता करें कि किस प्रकार लैंगिक जनन प्रतिकूल परिस्थितियों में इन जीवों को जीवित रहने में सहायता करता है? लैंगिक जनन ऐसी परिस्थितियों में सफलतापूर्वक क्यों संपन्न होता है ? उच्च श्रेणी के पादपों में दोनों विधियों – अलैंगिक ( कायिक) तथा लैंगिक द्वारा जनन देखा गया है। दूसरी ओर, अधिकांश जंतुओं में जनन की केवल लैंगिक विधि ही होती है।


लैंगिक जनन


लैंगिक जनन के अंतर्गत एक से जीव अथवा अभिमुख लिंग वाले भिन्न जीवों द्वारा नर तथा मादा युग्मक (गैमीटों) का निर्माण शामिल है। यह युग्मक आपस में मिलकर युग्मनज (जाइगोट) का निर्माण करते हैं जिससे आगे चलकर नए जीव का निर्माण होता है। यह अलैंगिक जनन की तुलना में एक विस्तृत, जटिल तथा धीमी प्रक्रिया है। नर तथा मादा युग्मकों के युग्मन से जो लैंगिक जनन संपन्न होता है उसके परिणामस्वरूप जो संतति उत्पन्न होती है, वह अपने जनकों के अथवा आपस में भी समरूप नहीं होती है।
पादप, जंतु अथवा फंजाई जैसे वैविध्यपूर्ण जीवों के अध्ययन से पता चलता है कि यद्यपि यह बाह्य आकारिकी, आंतरिक संरचनाओं और शरीर क्रिया विज्ञान में एक-दूसरे से अलग हैं परंतु जब यह लैंगिक प्रजनन के लिए एक-दूसरे के निकट आते हैं, तब वह एक जैसे पैटर्न को अपनाते हैं, यह एक आश्चर्य की बात है। आइए सबसे पहले उन सामान्य विशिष्टताओं पर चर्चा करें जो इन विविध जीवों में सामान्य हैं।
सभी जीव अपने जीवन में वृद्धि की एक निश्चित अवस्था एवं परिपक्वता तक पहुँचते हैं। इसके पश्चात् ही लैंगिक जनन कर सकते हैं। वृद्धि का यह काल किशोर अवस्था की प्रावस्था कहलाता है। पादपों में यह कायिक प्रावस्था कहलाती है। यह प्रावस्था विभिन्न जीवों में अलग अवधि की होती है।
किशोरावस्था/कायिक प्रावस्था की समाप्ति ही जनन प्रावस्था का आरंभ है। इस प्रावस्था को उच्च पादपों में आसानी से तब देखा जा सकता है जब उनके पुष्प आने लगते हैं। गेंदा, धान, गेहूँ, नारियल, आम आदि पेड़ों पर पुष्प लगने में कितना समय लगता है? कुछ पादपों में पुष्पीकरण एक से अधिक बार होता है। तब इस अंतरपुष्पन की अवधि को क्या कहेंगे किशोरावस्था अथवा वयस्कता ?

अपने क्षेत्र में लगे कुछ वृक्षों का निरीक्षण करो। क्या प्रति वर्ष इन वृक्षों पर उसी माह पुष्प लगते हैं; जिस माह में पिछले वर्ष लगे थे? आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि आम, सेब, कटहल आदि जैसे फल ‘मौसमी’ होते हैं? क्या कुछ पादप ऐसे भी हैं; जिनमें वर्ष भर पुष्पीकरण होता रहता है तथा कुछ में मौसम के आधार पर पुष्प निकलते हैं? पादप वार्षिक तथा द्विवार्षिक किस्मों के होते हैं और यह सभी स्पष्टतः कायिक, जनन तथा जीर्यमान प्रावस्थाओं को प्रदर्शित करते हैं; परंतु बहुवर्षीय जातियों में इन प्रावस्थाओं को स्पष्ट रूप से पारिभाषित करना कठिन होता है। कुछ पादप असामान्य रूप से पुष्पीकरण की क्रियाविधि को प्रदर्शित करते हैं। इनमें से कुछ जैसे बाँस की जाति के पादप अपने पूरे जीवन काल में सामान्यतः 50-100 वर्षों के बाद केवल एक बार पुष्प पैदा करते हैं। परिणामस्वरूप एक बड़ी संख्या में फल उत्पन्न होते हैं और मर जाते हैं। एक अन्य पादप, स्ट्रोबिलैन्थस कुन्यिआना (नीलाकुरेन्जी) 12 वर्षों में एक बार पुष्प उत्पन्न करता है। आप में से अधिकांशतः यह जानते होंगे कि इस पादप ने सितंबर-अक्टूबर 2006 के दौरान इतने पुष्प पैदा किए जिसके परिणामस्वरूप केरल, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क के किनारे पर पुष्पों का कालीन – सा बिछा दिखाई पड़ा, जिस दृश्य से सैलानियों की एक बहुत बड़ी संख्या इनकी ओर आकर्षित होती है। अधिकतर प्राणियों की किशोरावस्था की समाप्ति उनके प्रजनन व्यवहार के पूर्व उनकी शारीरिकी एवं आकारिकी के बदलाव से प्रकट होती है। विभिन्न जीवों में जनन प्रावस्था भी विविध अवधि की होती है।
क्या आप मानव में पाए जाने वाले परिवर्तनों की सूची तैयार कर सकते हैं जिनसे जनन परिपक्वता का पता लग सके ?
प्राणियों में, उदाहरणार्थ; पक्षी क्या वर्ष भर अंडे देते रहते हैं? अथवा क्या यह किसी मौसम से संबद्ध घटनाक्रम है? मेंढक और छिपकली में ये प्रक्रिया कैसे होती है? आप देखेंगे कि प्रकृति में रहने वाले पक्षी केवल विशेष मौसम के आने पर ही अंडे देते हैं। यद्यपि संरक्षण में रखे जाने वाले पक्षियों (जैसा कि कुक्कुट फार्म में) में वर्ष भर अंडे देने की क्षमता उत्पन्न की जा सकती है। ऐसे मामलों में अंडे देने का कार्य जनन क्रिया से संबंधित न होकर; इसकी बड़े पैमाने पर व्यापार के लिए उत्पत्ति है जो मात्र मानव कल्याण ही कहा जा सकता है।
जनन प्रावस्था के दौरान अपरास्तनी मादा के अंडाशय की सक्रियता में चक्रिक तथा सहायक वाहिका और हार्मोन में परिवर्तन आने लगते हैं। नॉन प्राइमेट स्तनधारियों जैसे गाय, भेड़, चूहों, हिरन, कुत्ता, चीता, आदि में जनन के दौरान ऐसे चक्रिक परिवर्तन देखे गए हैं इन्हें मदचक्र (ओएस्ट्स साइकिल ) कहते हैं; जबकि प्राइमेटों (बन्दर, ऐप्स, मनुष्य) में यह ऋतुस्राव चक्र कहलाता है। अधिकांश स्तनधारियों विशेषकर जो प्राकृतिक रूप से वनों में रहते हैं; अपने जनन प्रावस्था के दौरान अनुकूल परिस्थितियों में ऐसे चक्रों का प्रदर्शन करते हैं। इसी कारण इन्हें ॠतु निष्ठ अथवा मौसमी प्रजनक कहते हैं। अधिकांशतः स्तनधारी अपने पूर्ण जनन काल में जनन के लिए सक्रिय होते हैं। इसी कारण इन्हें सतत प्रजनक कहते हैं।
इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि हम सभी आयु में बढ़ते हैं परंतु वृद्ध होने का क्या अर्थ है? प्रजनन आयु की समाप्ति को जीर्णता या वृद्धावस्था के मापदंड के रूप में माना जा सकता है। शरीर में जीवन की अवधि के अंतिम चरण में सहवर्ती परिवर्तन (जैसे उपापचयों का मंद गति से होना) होने लगते हैं। वृद्धावस्था अंततः मृत्यु तक ले जाती है।
पादप तथा प्राणियों दोनों ही में तीनों प्रावस्थाओं के बीच संक्रमण के लिए हार्मोन उत्तरदायी पाए गए हैं। हार्मोन तथा कुछ विशेष पर्यावरणीय कारकों के बीच परस्पर क्रियाएँ जीवों की जनन क्रियाओं तथा व्यवहारिक अभिव्यक्तियों को नियंत्रित करती हैं। लैंगिक जनन की कुछ घटनाएँ परिपक्वता अवस्था प्राप्त करने के पश्चात् सभी लैंगिक जनन करने वाले जीव कुछ घटनाएँ एवं प्रक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं; जिनमें महत्त्वपूर्ण मूलभूत समानता होती है। यद्यपि लैंगिक जनन से संबद्ध संरचनाएँ जीवों में एकदम भिन्न होती हैं। यद्यपि विस्तृत एवं जटिल होने के बावजूद जीवों में लैंगिक जनन की घटनाएँ एक नियमित क्रम का अनुपालन करती हैं। लैंगिक जनन, एक प्रजाति के नर एवं मादा द्वारा उत्पन्न युग्मक के युग्मन ( अथवा युग्मनज निषेचन तथा भ्रूणोद्भव ) द्वारा विशिष्टीकृत होता है। सुविधा के लिए क्रमबद्ध घटनाओं को तीन भिन्न-भिन्न अवस्थाओं निषेचन- पूर्व, निषेचन तथा निषेचन पश्चात् में विभक्त किया जा सकता है।


निषेचन – पूर्व घटनाएँ


इसके अंतर्गत युग्मकों के संयोजन से पूर्व की सारी घटनाएँ सम्मिलित होती हैं। निषेचन पूर्व की दो प्रमुख घटनाएँ युग्मकजनन (गैमेटोजेनिसिस ) तथा युग्मक स्थानांतरण (गैमेटो ट्रांसफर) हैं।


युग्मक जनन


जैसा कि आप जानते हैं; युग्मक जनन नर तथा मादा दो प्रकार के युग्मकों की गठन प्रक्रिया को संदर्भित करता है। युग्मक एक प्रकार से अगुणित कोशिकाएँ होती हैं। कुछ शैवालों में दो युग्मक देखने में एक दूसरे के समान दिखाई पड़ते हैं। इसी कारण वह समयुग्मकी कहलाते हैं; क्योंकि इनकी एकरूपता के कारण हम इन्हें नर तथा मादा युग्मकों के रूप में श्रेणीबद्ध नहीं कर सकते। हालाँकि अधिकतर लैंगिक प्रजनक जीवों द्वारा आकारिकी रूप से स्पष्ट दो प्रकार के ( विषम युग्मक) पैदा किए जाते हैं इस प्रकार के जीवों में नर युग्मकों को पुमणु या शुक्राणु कहते हैं; जबकि मादा युग्मकों को अंड अथवा डिंब कहते हैं।

जीवों में लैंगिकता सामान्यतः जीवों में लैंगिक जनन के दौरान दो विभिन्न समष्टियों के युग्मकों में युग्मन होता है। परंतु यह सदा के लिए सत्य तथ्य नहीं है। यद्यपि पादपों में इसके उदाहरण प्रस्तुत करना आसान है। पादप में नर तथा मादा दोनों जनन संरचनाएँ पाई जाती हैं; परंतु जब एक ही पादप में दोनों नर तथा मादा जनन संरचनाएँ पाई जाएँ तो वह ‘द्विलिंगी’ अथवा जब वह भिन्न पादपों पर हों ‘एक लिंगी’ कहलाता है। बहुत-सी फंजाई तथा पादपों में द्विलिंगी स्थिति को उल्लिखित करने के लिए उभय लिंगाश्रयी तथा समथैलसी शब्द का प्रयोग करते हैं। एकलिंगता की स्थिति को उल्लिखित करने के लिए एकलिंगाश्रयी तथा विषमथैलसी शब्द प्रयुक्त किए जाते हैं। पुष्पीय पादपों में एक लिंगी नर पुष्प पुंकेसरी होता है अर्थात् पुंकेसर (परागकण ) वहन करने वाला जबकि मादा पुष्प स्त्रीकेसर अर्थात् स्त्रीकेसर धारण किए रहता है। कुछ पुष्पीय पादपों में एक अकेला पादप उभयलिंगाश्रयी ( नर या मादा दोनों लिंगी) हो सकता है और इनमें पैदा होने वाले पुष्प एकलिंगी तथा द्विलिंगी दोनों हो सकते हैं; जबकि मादा पुष्प स्त्रीकेसर अर्थात् स्त्रीकेसर धारण करता है। उभयलिंगाश्रयी पादपों के कुछ उदाहरण कुकरविटों तथा नारियल वृक्ष हैं; जबकि पपीता तथा खजूर एकलिंगाश्रयी के उदाहरण हैं। उन युग्मक प्रकारों के नाम लिखें जो पुंकेसरी एवं स्त्रीकेसरी पुष्पों से बनते हैं।
इसी प्रकार से प्राणियों में क्या होता है? क्या सभी प्रजातियों की व्यष्टि में नर अथवा मादा (एकलिंगी) पाए जाते हैं? अथवा जिनमें दोनों लिंग एक साथ एक ही प्राणी (द्विलिंगी) में पाए जाते हैं। आप संभवत: अनेक एकलिंगीय प्राणी प्रजातियों की सूची बना सकते हैं। प्राणियों में केंचुए स्पंज, टेपवर्म तथा जोंक द्विलिंगी प्राणियों के प्रारूपिक उदाहरण हैं इनमें नर तथा मादा जनन अंग दोनों ही (उभयलिंगी / द्विलिंगी) एक प्राणी में पाए जाते हैं। तिलचट्टा एकलिंगी प्राणी का उदाहरण है।

जीवों का नाम अर्ध सूत्राणु (2x) में गुणसूत्र की संख्यायुग्मकों में गुणसूत्र की संख्या(n)
मनुष्य4623
घरेलू मक्खी12
चूहा21
कुत्ता78
बिल्ली19
फलमक्खी8
ओफिओग्लौसम630
सेब34
धान12
मक्का20
आलू24
तितली380
प्याज16

युग्मक संरचना के दौरान कोशिका विभाजन

सभी विषम युग्मकी प्रजातियों में युग्मक प्रायः दो प्रकार के होते हैं जो नर तथा मादा कहलाते हैं। युग्मक अगुणित होते हैं; चाहे उनके जनक जिससे वह उत्पन्न हुए हैं; वह अगुणित हो अथवा द्विगुणित ही क्यों न हो । एक गुणित जनक सूत्री विभाजन ( समसूत्रण) के द्वारा युग्मक उत्पन्न करते हैं। क्या इसका अर्थ यह है कि जो जीव अगुणित होते हैं उनमें अर्धसूत्री विभाजन कभी भी संपन्न नहीं होता?
बहुत से जीव जिनका संबंध मोनेरा, फंजाई, शैवाल तथा ब्रायोफ़ाइट से है; वह अगुणित पादप काय होते हैं और वे जीव जिनका संबंध टेरीडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म, ऐंजिओस्पर्म तथा अधिकांश प्राणी जिनमें मनुष्य भी शामिल है; उनकी जनकीय काय द्विगुणित होती है।
यह स्पष्ट हो चुका है कि अर्धसूत्री विभाजन जो न्यूनकारी विभाजन है और जहाँ द्विगुणित काय अगुणित युग्मकों को उत्पन्न करता है । द्विगुणित जीवों में अर्धसूत्री कोशिका, अर्धसूत्री विभाजन से होकर गुजरती है। अर्धसूत्री विभाजन के अंत में गुण सूत्रों का केवल एक सेट प्रत्येक युग्मक से निगमित करता है।


युग्मक स्थानांतरण


इनके निर्माण के पश्चात् नर तथा मादा युग्मक कायिक रूप से एक दूसरे के निकट आते हैं ताकि युग्मन (निषेचन) की क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। क्या आपको कभी आश्चर्य नहीं होता कि ये युग्मक आपस में कैसे मिलते हैं? अधिकतर जीवों में नर युग्मक चलनशील तथा मादा अचल तथा स्थान बद्ध होते हैं। कुछ फंजाई और शैवालों में असाधारण रूप से दोनों किस्मों के युग्मक चलनशील होते हैं। इन्हें एक माध्यम की आवश्यकता होती है जिसमें होकर नर युग्मक गति करता है। अधिकांश साधारण पादपों जैसे शैवाल, ब्रायोफाइटा तथा टेरीडोफ़ाइटा में जल ही माध्यम होता है जिसमें होकर युग्मकों का स्थानांतरण संपन्न होता है। नर युग्मकों की एक बहुत बड़ी संख्या यद्यपि मादा युग्मक तक पहुँचने में असमर्थ होती है। तथापि परिवहन के दौरान नर युग्मकों की हानि को पूरा करने के लिए नर युग्मक मादा युग्मकों की तुलना में कई हज़ार गुणा अधिक संख्या में पैदा होते हैं।
बीजीय पादपों में पराग कण नर युग्मकों के वाहक के रूप में कार्य करते हैं तथा अंडप में अंड होता है। परागकण परागकोश में उत्पन्न होते हैं; अतः निषेचन संपन्न हो; उससे पहले ही यह परागकण वर्तिकाग्र में स्थानांतरित हो जाने चाहिए। द्विलिंगियों में स्वतः निषेचणीय पादप जैसे मटर में परागकणों का वर्तिकाग्र पर स्थानांतरण अपेक्षाकृत सरल होता है; क्योंकि इनमें परागकोश तथा वर्तिकाग्र एक दूसरे के निकट स्थित रहते हैं। परागकण जैसे ही झड़ने लगते हैं; उसके तुरंत बाद ये वर्तिकाग्र के संपर्क में आते हैं। पर परागणित पादपों में (जिसमें एकलिंगाश्रयी पादप शामिल हैं) इस विशिष्ट घटना को परागण (पोलीनेशन) कहते हैं। इसमें वर्तिकाग्र पर परागकणों का स्थानांतरण सुगमता
पूर्वक संपन्न हो जाता है। परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होते हैं। तथा परागनली नर युग्मकों को अपने साथ लेती हुई अंडप के भीतर प्रवेश कर जाती है। अंड के पास नर युग्मकों को अपने से बाहर निकाल देती है। एकलिंगाश्रयी प्राणियों में चूँकि नर तथा मादा युग्मक विभिन्न व्यष्टियों (जीवों) में बनते हैं। ऐसे में जीव को युग्मकों के स्थानांतरण के लिए एक विशेष प्रकार की क्रियाविधि विकसित करनी पड़ती है। लैंगिक जनन में इस सर्वाधिक विशिष्ट घटना के लिए निषेचन हेतु सफलतापूर्वक स्थानांतरण तथा युग्मकों का साथ-साथ आना अनिवार्य होता है।


निषेचन


लैंगिक जनन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं रोमांचक घटना संभवतः युग्मक का युग्मन है। यह प्रक्रिया युग्मक संलयन ( साइनगैमी) कहलाती है जिसके परिणाम स्वरूप द्विगुणित युग्मन ( जाइगोट) का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया के लिए भी निषेचन (फर्टिलाइजेशन) का बहुधा प्रयोग किया जाता है। यद्यपि युग्मक संलयन तथा निषेचन शब्दों का प्रयोग बहुधा होता रहता है; हालांकि ये एक दूसरे के पूरक हैं। परंतु तब क्या होगा यदि युग्मक संलयन संपन्न ही न हो पाए ? हालाँकि ; कुछ जीवों में जैसे कि रोटीफर्स में, मधुमक्खियों और यहाँ तक कुछ छिपकलियों तथा पक्षी (टर्की) आदि में बिना निषेचन अर्थात् नर युग्मक के युग्मन के बिना ही मादा युग्मक नए जीव के निर्माण हेतु विकसित होने लगता है। इस प्रकार की घटना अनिषेक जनन (पार्थेनो जेनिसिस ) कहलाती है।

युग्मक संलयन कहाँ संपन्न होता है? अधिकतर जलीय जीवों में जैसे अधिकतर शैवालों तथा मछलियों और यहाँ तक कि जल-स्थल चर प्राणियों में युग्मक संलयन बाहरी माध्यम (जल) में अर्थात् जीव के शरीर के बाहर संपन्न होता है। इस प्रकार के युग्मक-संलयन को बाह्य निषेचन ( इक्सटर्नल फर्टिलाइजेशन) कहा जाता है। बाह्य निषेचन करने वाले जीव दो लिंगों में व्यापक समकालिता प्रदर्शित करते हैं तथा बाहरी माध्यम (जल) युग्मक संलयन के अवसर को बढ़ाने के लिए काफी संख्या में युग्मक निर्मुक्त करते हैं। ऐसा ‘बौनी फिश’ एवं मेंढकों में होता है। जहाँ भारी संख्या में संतानें पैदा होती हैं; परंतु इसमें सबसे बड़ी कमी यह है कि इनकी संतानें शिकारियों का शिकार होने जैसी नाजुक स्थिति से गुजरती हैं और वयस्क होने तक उनकी उत्तरजीविता काफी जोखिम पूर्ण होती है।
बहुत सारे स्थलीय जीवों में जैसे कि फंजाई, उच्च श्रेणी के प्राणी जैसे सरीसृप, पक्षी तथा स्तनधारी एवं अधिकतर पादप (ब्रायोफ़ाइटस, टेरिडोफ़ाइटस, जिम्नोस्पर्म तथा ऐंजिओस्पर्म) में युग्मक संलयन जीव शरीर के भीतर संपन्न होता है। अतः यह प्रक्रिया आंतरिक निषेचन ( इंटरनल फर्टिलाइजेशन) कहलाती है। इन सभी जीवों में, अंडे की रचना मादा के शरीर के भीतर होती है; जहाँ पर वह नर युग्मक से संगलित कर जाते हैं। आंतरिक निषेचन प्रदर्शित करने वाले जीवों में नर युग्मक चलनशील होते हैं और उन्हें अंडे के साथ युग्मन करने के लिए अंडे तक पहुँचना होता है। इस प्रक्रम हेतु जो शुक्राणु पैदा होते हैं, उनकी संख्या विशाल होती है; परंतु जो अंडे उत्पन्न होते हैं; उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। बीजीय पादपों में यद्यपि अचलनशील नर युग्मक पराग नली द्वारा मादा युग्मक तक पहुँचते हैं।


निषेचन पश्च घटनाएँ


लैंगिक जनन में होने वाली घटनाओं के पश्चात् ही युग्मनज का निर्माण होता है। यही पश्च निषेचन घटनाएँ कहलाती हैं।


युग्मनज


द्विगुणित युग्मनज का निर्माण सभी लैंगिक जनन करने वाले जीवों में सर्वव्यापी है। बाह्य निषेचन करने वाले सभी जीवों में युग्मज का निर्माण बाह्य माध्यम (प्रायः जल ) में होता है। जबकि वह जीव जिनमें आंतरिक निषेचन होती है; उनके शरीर के भीतर युग्मनज की संरचना होती है।

युग्मनज के आगे का विकास जीव के अपने जीवन चक्र तथा वहाँ के पर्यावरण पर निर्भर करता है। फंजाई एवं शैवाल से संबद्ध जीवों में युग्मनज एक मोटी भित्ति को विकसित करते हैं जो उनकी शुष्कन तथा क्षति से रक्षा करती है। यह अंकुरण से पूर्व काफी समय तक विश्रांति काल में रहते हैं। द्विगुणित जीवन चक्र वाले जीवों में युग्मनज अर्ध-सूत्रण द्वारा विभाजित होकर अगुणित अंडाणु का निर्माण होता है जो अगुणित व्यष्टि के रूप में वृद्धि करता है।
युग्मनज एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के जीव के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है जो प्रजातियों की निरंतरता को सुनिश्चित करती है। प्रत्येक लैंगिक प्रजनक जीव यहाँ तक कि मानव जीवन की शुरुआत एक एकल कोशिका – युग्मनज के रूप में होती है।

धूणोद्भव


भ्रूणोद्भव युग्मनज से भ्रूण ( embryo) के विकास की प्रक्रिया को संदर्भित करता है। भ्रूणोद्भव के दौरान युग्मनज कोशिका विभाजन ( समसूत्रण ) तथा कोशिका विभेदीकरण गुजरता है। भ्रूण विकास के दौरान जहाँ कोशिका विभाजन से कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है, वहीं कोशिका विभेदीकरण से कोशिकाओं के समूह एक निश्चित रूपांतरणों से गुजरकर विशेषीकृत ऊतकों एवं अंगों की रचना करते हैं। जिसके परिणामस्वरूप जीव का निर्माण होता है। आप पिछली कक्षा में कोशिका विभाजन तथा विभेदीकरण की प्रक्रिया के विषय में अध्ययन कर चुके हैं।
प्राणियों को अंड प्रजक तथा सजीव प्रजक श्रेणियों में विभक्त किया गया है जो इस तथ्य पर आधारित है कि युग्मनज ने मादा जनक के शरीर के बाहर विकास किया है अथवा भीतर अर्थात् उसका जन्म निषेचित या अनिषेचित अंडों के द्वारा हुआ अथवा शिशु के रूप में प्रसव से जन्म हुआ। अंड प्रजक प्राणियों जैसे कि सरीसृप वर्ग तथा पक्षी आदि के द्वारा पर्यावरण के सुरक्षित स्थान पर निषेचित अंडे दिए जाते हैं जो कठोर कैल्सियम युक्त कवच से ढके रहते हैं; जो एक निश्चित निवेशन अवधि के पश्चात् स्फुटन द्वारा नए शिशु को जन्म देते हैं। जबकि दूसरी ओर सजीव प्रजक जीवों में ( अधिकतर स्तनधारी जिसमें मानव शामिल हैं) मादा जीव के शरीर के भीतर युग्मनज विकसित होकर शिशु का विकास करता है और एक निश्चित अवधि एवं विकास के चरणों को पूरा करने के बाद मादा जीव के शरीर से प्रसव द्वारा पैदा किए जाते हैं। भ्रूणीय सही देखभाल तथा संरक्षण के कारण सजीव प्रजक जीवों के उत्तर जीवित रहने के सुअवसर बढ़ जाते हैं।
पुष्पीय पादपों में युग्मनज का निर्माण बीजांड के अंदर होता है। निषेचन के पश्चात् पुष्प के बाह्य दल पंखुड़ी तथा पुंकेसर मुरझा कर झड़ जाते हैं। क्या आप एक ऐसे पादप का नाम बता सकते हैं जिनमें बाह्य दल पुष्प में जुड़े रहते हैं? यद्यपि स्त्रीकेसर पादप से जुड़ा रहता है। युग्मनज भ्रूण में तथा बीजांड बीज में विकसित हो जाता है। अंडाशय फल के रूप में विकसित होती है जिसे फलभित्ति कहते हैं। इसका कार्य फल को सुरक्षा प्रदान करना है। विकिरण के पश्चात् बीज अनुकूल परिस्थितियों के आने पर अंकुरित होता है तथा नए पादप को जन्म देता है।

सारांश


जनन एक प्रजाति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने योग्य बनाता है। जीवों के जनन को व्यापक रूप से दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है – अलैंगिक तथा लैंगिक जनन । अलैंगिक जनन के अंतर्गत युग्मक का निर्माण अथवा युग्मकों का युग्मन शामिल नहीं है। ऐसे जीव जिनके शरीर की संरचना अपेक्षाकृत साधारण होती है; उनमें यह सामान्य रूप से पाए जाते हैं; जैसे – कवक, शैवाल तथा कुछ अकशेरूकी प्राणि । अलैंगिक प्रजनन द्वारा निर्मित संतति एक समान होते हैं। इन्हें क्लोन भी कहा जा सकता है। अधिकांशतः शैवालों तथा कवकों में चलबीजाणु, कोनिडिया आदि सामान्य अलैंगिक संरचनाएँ होती हैं। मुकुलन तथा जिम्मूल निर्माण प्राणियों में सामान्य अलैंगिक विधि देखी गई है।
प्रोकेरिऔट तथा एककोशीय जीव जनक कोशिका के कोशिका विभाजन अथवा द्विखंडन युग्मन से उत्पन्न होते हैं। अनेक जलीय जीवों, पुष्पीय पादपों की स्थलीय प्रजातियों की संरचनाएँ जैसे उपरिभूस्तारी, प्रकंदों, अंत: भूस्तारी कंदों एवं भूस्तरिका आदि में नयी संतानों को पैदा करने की क्षमता होती है। इस प्रकार के अलैंगिक जनन की विधि को कायिक प्रवर्धन कहते हैं।

लैंगिक जनन के अंतर्गत युग्मकों का निर्माण तथा युग्मन शामिल है। अलैंगिक जनन की तुलना में यह एक जटिल एवं धीमी प्रक्रिया है। अधिकांश उच्चश्रेणी के प्राणी पूर्णत: लैंगिक विधि द्वारा जनन करते हैं। लैंगिक जनन की घटना को निषेचन पूर्व, निषेचन तथा निषेचन के बाद की घटना में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है। निषेचन – पूर्व घटना के अंतर्गत युग्मकजनन तथा युग्मक स्थानांतरण जबकि निषेचन – पश्च में युग्मक का निर्माण तथा भ्रूणोद्भव को ही शामिल किया गया है।
जीव द्विलिंगी अथवा एकलिंगी हो सकते हैं। पादपों में लैंगिक विविधता अपेक्षाकृत अधिक होती है। विशेषकर पुष्पीय पादपों में, क्योंकि यह विविध प्रकार के पुष्पों को उत्पन्न कर सकते हैं। पादपों को उभयलिंगाश्रयी एवं एकलिंगाश्रयी में परिभाषित किया गया है। हालाँकि पुष्प द्विलिंगी एवं एकलिंगी हो सकते हैं।
युग्मक प्राकृतिक रूप से सदैव अगुणित होते हैं और प्रायः अगुणित जीवों को छोड़कर; जहाँ युग्मकों का निर्माण समसूत्रण द्वारा होता है। यह समसूत्री विभाजन के प्रत्यक्ष उत्पाद माने जाते हैं।

लैंगिक जनन में नर युग्मक का स्थानांतरण वास्तव में एक अपरिहार्य घटना है। यह द्विलिंगी जीवों में अपेक्षाकृत सरल होती है। एकलिंगी प्राणियों में यह मैथुन द्वारा संपन्न होती है। पुष्पीय पादपों में एक विशेष प्रक्रिया जिसे परागण कहते हैं, पराग कणों का स्थानांतरण होता है।
युग्मक संलयन (निषेचन) नर एवं मादा युग्मकों के मध्य संपन्न होता है। युग्मक संलयन जीव की काय के बाहर अथवा अंदर कहीं भी हो सकता है। युग्मक संलयन के परिणामस्वरूप एक विशेष कोशिका जिसे युग्मनज कहते हैं, का निर्माण होता है।
युग्मनज से भ्रूण के विकास की प्रक्रिया भ्रूणोद्भज कहलाती है। प्राणियों में इसके निर्माण के तुरंत बाद युग्मनज बनने लगता है। प्राणि अंडप्रजक या सजीव प्रजक दोनों हो सकते हैं। सजीव प्रजक जीवों में भ्रूणीय संरक्षण एवं भली प्रकार से देखभाल को अच्छा समझा गया है।
पुष्पी पादपों में निषेचन के पश्चात् अंडाशय फल में विकसित होता है तथा बीजांड परिपक्व होकर बीज बनता है। फल के भीतर परिपक्व बीज अगली पीढ़ी का संचारक भ्रूण होता है।


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