Kaksha kaksh mein sampreshan कक्षाकक्ष में सम्प्रेषण – सम्प्रेषण प्रक्रिया के तरीके, उपयोगी बनाने के सम्प्रेषण

कक्षाकक्ष में सम्प्रेषण Communication in the Classroom


कक्षाकक्ष में शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिये शिक्षक और छात्रों के बीच सम्प्रेषण होना अति आवश्यक है। शिक्षक और छात्र के मध्य सम्प्रेषण ‘शाब्दिक एवं अशाब्दिक सम्प्रेषण’ दोनों प्रकार का होता है। कक्षाकक्ष में बैठकर छात्र व्यवस्थित तथा उद्देश्यपूर्ण शिक्षा प्राप्त करता है।

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शिक्षण को सफल एवं उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिये आवश्यक है कि शिक्षक छात्रों की समस्याओं का समाधान करे। छात्र भी अपनी बात निःसंकोच रख सकें। जिससे शिक्षक और छात्रों के बीच विचारों, भावनाओं की बिना रुकावट के अन्तःक्रिया होगी, सम्प्रेषण अच्छा होगा।

कक्षाकक्ष में ध्यान रखने योग्य बिन्दु निम्न हैं:-

1 बाधाओं एवं अवरोधों को दूर करना – शिक्षक को सम्प्रेषण मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना चाहिये।


2.ज्ञान का विस्फोट Explosion of knowledge – शिक्षक को ज्ञान प्राप्ति के लिये ऐसे उपाय अपनाने चाहिये जिससे कम समय में अधिक ज्ञान प्राप्त हो सके।


3.व्यक्तिगत विभिन्नताएँ Individual differences- शिक्षक को कक्षा सम्प्रेषण में सभी छात्रों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखना चाहिये। शिक्षण कार्य ऐसा करना चाहिये कि सभी छात्रों की आवश्यकताएँ पूर्ण हो सकें।

4.नवीन सामग्री New material- नयी सामग्री या नवीन उपकरण जो विज्ञान ने हमें दिये हैं, उनका प्रयोग करके
सम्प्रेषण कम खर्चे में सहज एवं प्रभावी बनाया जा सकता है।


5.शिक्षण सामग्री Teaching material- कक्षाकक्ष में सम्प्रेषण के समय प्रयुक्त शिक्षण सामग्री जैसे – भाषा संकेत एवं चित्र आदि छात्रों के अनुकूल होनी चाहिये। चित्रण तथा सम्प्रेषण पूर्ण ज्ञान पर आधारित होना चाहिये।

सम्प्रेषण प्रक्रिया के तरीके Methods of
Communication Process


शिक्षाविदों के मतानुसार सम्प्रेषण प्रक्रिया को कक्षा में प्रयोग करते समय निम्न तरीकों पर ध्यान देना चाहिये:-

1.उद्देश्यपूर्ण Purposeful


अच्छी सम्प्रेषण प्रक्रिया की यह विशेषता है कि उसमें शिक्षण के उद्देश्य तथा विशिष्ट उद्देश्य होने चाहिये।

2अध्यापन आदेशात्मक न होकर निर्देशनात्मक Subjective होना चाहिये

सम्प्रेषण, आदेशात्मक नहीं होना चाहिये। अतः कक्षा का वातावरण कठोरता तथा नीरस से युक्त न होकर सरलता, सौहार्द्रता, स्नेह तथा सहानुभूति युक्त होना चाहिये।

3.प्रेरणास्पद Inspired


सम्प्रेषण पूर्णतः प्रेरणाप्रद होना चाहिये। वह उनके अनुभवों पर आधारित होना चाहिये, साथ ही उनकी रुचियों एवं प्रवृत्तियों को विकसित करने वाला होना चाहिये।

4.बाल केन्द्रित Child centered

आजकल यह प्रचलित है और शिक्षाशास्त्रियों ने भी यह स्वीकार किया है कि सम्प्रेषण बाल केन्द्रित होना चाहिये अर्थात् उसकी वैयक्तिक विभिन्नताओं (आदतों, रुचियों एवं योग्यताओं) को ध्यान में रखते हुए अध्यापन किया जाता चाहिये।

5.सुनियोजित Well planned

सम्प्रेषण सुनियोजित ढंग से पूर्ण किया जाना चाहिये। इसके लिये उसे घर से ही पाठ योजना बनाकर लानी चाहिये ओर उसके अनुरूप शिक्षण करना चाहिये।

6.प्रजातान्त्रिक पद्धति पर आधारित

वर्तमान युग में सम्प्रेषण में प्रजातान्त्रिक दृष्टिकोण को महत्त्व दिया जाने लगा है ताकि कक्षा में प्रजातान्त्रिक वातावरण सृजित हो सके। अध्यापक का सभी बालकों के साथ समान व्यवहार रहे चाहे वह निम्न या उच्च वर्ग का हो या किसी जाति अथवा लिंग का हो।

7.सक्रिय अध्यापन Active teaching


कक्षा में उचित वातावरण बनाया जाना चाहिये और छात्र एवं अध्यापक दोनों सक्रिय रहने चाहिये क्योंकि सम्प्रेषण को द्विमुखी क्रिया माना गया है। सम्प्रेषण के साथ सीखना होना चाहिये अन्यथा सम्प्रेषण व्यर्थ है।

8.विषय से क्रमबद्धता Systematic with subject


विषयवस्तु क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत की जानी चाहिए, उसका क्रम टूटना नहीं चाहिये अन्यथा बालक भ्रम में पड़ सकते हैं।

9.सहयोग की भावना का विकास


सम्प्रेषण में छात्र एवं अध्यापक दोनों से सक्रियता अपेक्षित है। इसके लिये एक-दूसरे का सहयोग अपेक्षित है।

10.पाठ की तैयारी Readiness of lesson

जिस पाठ या विषय को पढ़ाना हो, उसकी पूर्ण तैयारी अध्यापक को पूर्व में ही कर लेनी चाहिये।

11.पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित Related with pre knowledge


पाठ को पढ़ाने से पूर्व अध्यापक को यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिये कि क्या छात्र विषय से पूर्व की जानकारियों से अवगत है या नहीं? अन्यथा सम्प्रेषण दोषपूर्ण हो सकता है।

12.सहायक सामग्री का समुचित प्रयोग Proper use of material aid


सम्प्रेषण में उचित स्थान पर सहायक सामग्री का प्रयोग करना चाहिये ताकि पाठ में रोचकता आ सके और बालक उसे सीख सके।

13.स्वतन्त्र वातावरण Diverted
environment


विषय का सम्प्रेषण अनुशासित होते भी खेल के समान स्वतन्त्र वातावरण से पूरा हो ताकि छात्रों की रुचि का अधिकाधिक विकास हो सके।

14.आत्मविश्वास की जागृति Awareness of self-reliance


सम्प्रेषण अध्यापक में आत्मविश्वास जाग्रत करता है। आत्मविश्वास के साथ पढ़ाया जाना बालक को पूर्ण ज्ञान प्रदान करता है।

15.अध्यापन उपचारपूर्ण होना चाहिये Teaching should be remedial

संचार के द्वारा हमें बालक की बहुत-सी भूलों के बारे में बोध होगा और पुनः उपचारात्मक शिक्षण द्वारा उनका धीरे-धीरे उपचार किया जायेगा।


सम्प्रेषण प्रक्रिया को उपयोगी बनाने के उपाय

बालकों के व्यक्तिगत भेदों को ध्यान में रखते हुए सम्प्रेषण को निम्न प्रकार से उपयोगी बनाया जा सकता है:-

1.कक्षा में छात्रों की संख्या कम रखी जाय, कम छात्र होने से शिक्षक बालकों के व्यक्तिगत भेदों पर ध्यान दे
सकेगा।

2.विद्यालय में शिक्षकों की संख्या बढ़ायी जाय। इससे
शिक्षक छात्र अनुपात कम होगा। वे (शिक्षक) छात्रों के अधिक निकट आ सकेंगे।

3.बालकों की रुचियों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा दी जाय।

4.बुद्धि परीक्षण द्वारा बालकों की बुद्धि का मापन किया जाय और उनका बुद्धि-लब्धि के अनुसार वर्गीकरण कर दिया जाय।

5.कक्षा निर्माण करते समय व्यक्तिगत भेदों को ध्यान में रखा जाय । सूचि, योग्यता और मानसिक क्षमता के आधार पर वर्गीकरण किया जा सकता है।

6.शिक्षकों का कार्य भार Work load कम किया जाय ।

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