स्वतंत्रता एवं समानता अध्याय -2(LIBERTY AND EQUALITY)

स्वतंत्रता किसी अन्य व्यक्ति की प्राप्ति का साधन नहीं वरना सर्वोच्च साथ है|

डॉ. राधाकृष्णन

स्वतंत्रता की आवश्यकता है या उसका महत्व-

मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकारों का अस्तित्व नितान्त आवश्यक है और व्यक्ति के विविध अधिकारों में स्वतन्त्रता का स्थान निश्चित रूप में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। बर्ट्रेण्ड रसैल कहते हैं कि ‘स्वतन्त्रता की इच्छा व्यक्ति की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है और इसी के आधार पर सामाजिक जीवन का निर्माण सम्भव है।” मनुष्य का सम्पूर्ण भौतिक, मानसिक एवं नैतिक विकास स्वतन्त्रता के वातावरण में ही सम्भव है। स्वतन्त्रता प्रजातन्त्र का आधार स्तम्भ है। लॉक ने इसे जीवन व सम्पत्ति के अधिकारों के साथ प्राकृतिक अधिकारों की श्रेणी में रखा है। इसके अनुसार स्वतन्त्रता राज्य के पूर्व व्यक्ति को प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त थी ।
यदि हम प्रकृति पर दृष्टि डालें तो भी यह बात स्पष्ट हो जाती है कि स्वतन्त्रता के बिना किसी भी वस्तु का विकास सम्भव नहीं है। पेड़-पौधे भी स्वतन्त्रता के वातावरण में ही विकसित हो सकते हैं। जो पौधा या पेड़ किसी विशाल वृक्ष की छाया या दबाव में पड़ जाता है, उसका विकास रुक जाता है। इसी प्रकार पिंजड़े में बन्द पक्षी या सर्कस के कठहरे में बन्द शेर सही अर्थों में पक्षी या शेर नहीं रहते वे अपना सारभूत तत्व खो देते हैं। सृष्टि के इन प्राणियों के सम्बन्ध में जो बात सत्य है, वह विवेकशील मनुष्य के सम्बन्ध में और भी अधिक सत्य है। मनुष्य का भौतिक, बौद्धिक तथा नैतिक विकास स्वतन्त्रता के बिना सम्भव ही नहीं है। इसी आधार पर जे. एस. मिल द्वारा अपनी पुस्तक ‘On Liberty‘ में स्वतन्त्रता को मानव जीवन का मूल आधार बताया गया है। बर्न्स ने ठीक ही लिखा है कि “स्वतन्त्रता न केवल सभ्य जीवन का आधार है, वरन् सभ्यता का विकास भी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर ही निर्भर करता है।” इसी प्रकार महाकवि तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में लिखा है ‘करि विचार देखहु मन माहीं, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।
स्वतन्त्रता अमूल्य वस्तु है और उसका मानवीय जीवन में बहुत अधिक महत्व है। यह बात व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय स्वतन्त्रता दोनों के ही सम्बन्ध में सत्य है। स्वतन्त्रता का महत्व न होता, तो विभिन्न देशों में लाखों व्यक्तियों द्वारा स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान न दिया जाता। इटली के प्रसिद्ध देशभक्त मैजिनी (Mazzini) का कथन है कि “स्वतन्त्रता के अभाव में आप अपना कोई कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते। अतएव आपको स्वतन्त्रता का अधिकार दिया जाता है और जो भी शक्ति आपको इस अधिकार से वंचित रखना चाहती हो, उससे जैसे भी बने, अपनी स्वतन्त्रता छीन लेना आपका कर्तव्य है।”

स्वतन्त्रता का अर्थ और परिभाषा

आधुनिक युग में स्वतन्त्रता शब्द सबसे अधिक लोकप्रिय है और इस शब्द की लोकप्रियता का परिणाम यह हुआ है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार स्वतन्त्रता के अलग-अलग अर्थ लेता है। अधिकांश मनुष्य स्वतन्त्रता का अर्थ मनमानी करने से या बिना किसी दूसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप के अपनी इच्छानुसार कार्य करने से लेते हैं। स्वतन्त्र विचारक स्वतन्त्रता का अर्थ प्राचीन परम्पराओं और बन्धनों से मुक्त होने से लेते हैं, आध्यात्मिक सन्त स्वतन्त्रता का अभिप्राय सांसारिक माया-मोह से मुक्ति से लेते हैं और परतन्त्र देश के निवासी स्वतन्त्रता को स्वराज्य का पर्यायवाची समझते हैं, किन्तु व्यवहार में प्रचलित स्वतन्त्रता के इन विविध अर्थों में कोई भी अर्थ सही नहीं है । स्वतन्त्रता का सही प्रकार से अभिप्राय दो रूपों में व्याख्या करते हुए समझा जा सकता है : (1) स्वतन्त्रता का निषेधात्मक अर्थ, और (2) स्वतन्त्रता का सकारात्मक अर्थ।

(1) स्वतन्त्रता का निषेधात्मक अर्थ-स्वतन्त्रता का अंग्रेजी रूपान्तर ‘लिबर्टी’ (Liberty) लैटिन भाषा के ‘लिबर’ (Liber) शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है ‘ बन्धनों का अभाव’, किन्तु स्वतन्त्रता शब्द की व्युत्पत्ति के आधार पर प्रचलित इस अर्थ को स्वीकार नहीं किया जा सकता। बन्धनों के अभाव के रूप में स्वतन्त्रता स्वच्छन्दता का रूप धारण कर लेती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज में रहते हुए असीमित स्वतन्त्रता का उपयोग कर ही नहीं सकता। इस सम्बन्ध में मैक्केनी ने ठीक ही लिखा है कि “पूर्ण स्वतन्त्रता जंगली गधे की आवारागर्दी की स्वतन्त्रता ही हो सकती है।”” अतः राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत स्वतन्त्रता की जिस रूप में कल्पना की जाती है, उस रूप में स्वतन्त्रता मानवीय प्रकृति और सामाजिक जीवन के इन दो विरोधी तत्वों (बन्धनों का अभाव और नियमों के पालन) में सामंजस्य का नाम है। इसकी परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि “स्वतन्त्रता व्यक्ति की अपनी इच्छानुसार कार्य करने की शक्ति का नाम है, बशर्ते कि दूसरे व्यक्तियों की इसी प्रकार की स्वतन्त्रता में कोई बाधा न पहुंचे।” 1789 की ‘मानवीय अधिकार घोषणा’ (Declaration of Human Rights) में यही कहा गया है कि “स्वतन्त्रता वह सब कुछ करने की शक्ति का नाम है जिससे अन्य व्यक्तियों को आघात न पहुंचे।” सीले, मैक्केनी और लास्की ने स्वतन्त्रता की परिभाषा इस प्रकार से की है :सीले के अनुसार, “स्वतन्त्रता अति शासन की विरोधी है। “

2मैक्केनी के अनुसार, “स्वतन्त्रता सभी प्रकार के प्रतिबन्धों का अभाव नहीं, अपितु अनुचित प्रतिबन्धों के स्थान पर उचित प्रतिबन्धों की व्यवस्था है।”प्रो. लास्की के शब्दों में, “स्वतन्त्रता से मेरा अभिप्राय यह है कि उन सामाजिक परिस्थितियों के अस्तित्व पर प्रतिबन्ध न हो, जो आधुनिक सभ्यता में मनुष्य के सुख के लिए नितान्त आवश्यक हैं।”

(2) स्वतन्त्रता का सकारात्मक अर्थ-सीले और लास्की ने स्वतन्त्रता की जो परिभाषाएं की हैं, उनमें स्वतन्त्रता का चित्रण अनुचित प्रतिबन्धों के अभाव के रूप में किया गया है और इस प्रकार ये परिभाषाएं स्वतन्त्रता के नकारात्मक स्वरूप को प्रकट करती हैं, किन्तु जैसा कि गैटिल ने कहा है, “स्वतन्त्रता का समाज में केवल नकारात्मक स्वरूप ही नहीं है, वरन् सकारात्मक स्वरूप भी है।” स्वतन्त्रता के सकारात्मक स्वरूप की सर्वप्रथम विधिवत् व्याख्या अंग्रेज विचारक प्रो. टी. एच. ग्रीन ने की है। स्वतन्त्रता के सकारात्मक या वास्तविक स्वरूप की नकारात्मक स्वरूप से भिन्नता बताये हुए टी. एच. ग्रीन ने लिखा है कि “जिस प्रकार सौन्दर्य के अभाव का ही नाम नहीं होता, उसी प्रकार स्वतन्त्रता प्रतिबन्धों के अभाव का ही नाम नहीं है।” सकारात्मक कुरूपता या वास्तविक स्वरूप की नकारात्मक स्वरूप से भिन्नता बताते हुए आगे चलकर ग्रीन ही स्वतन्त्रता के सकारात्मक रूप को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि “स्वतन्त्रता ऐसे कार्य करने और उपभोग करने की शक्ति का नाम है जो करने योग्य या उपभोग के योग्य हो।”” स्वतन्त्रता के इस रूप की व्याख्या करते हुए लास्की ने भी कहा है कि “स्वतन्त्रता उस वातावरण को बनाये रखना है जिसमें व्यक्ति को जीवन का सर्वोत्तम विकास करने की सुविधा प्राप्त हो।,इस प्रकार सकारात्मक रूप में स्वतन्त्रता का तात्पर्य ऐसे वातावरण और परिस्थितियों की विद्यमानता से है जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके।

(1) न्यूनतम प्रतिबन्ध – स्वतन्त्रता का प्रथम तत्व यह है कि व्यक्ति के जीवन पर शासन और समाज के दूसरे सदस्यों की ओर से न्यूनतम प्रतिबन्ध होने चाहिए, जिससे व्यक्ति अपने विचार और कार्य-व्यवहारमें अधिकाधिक स्वतन्त्रता का उपभोग कर सके।

(2) व्यक्तित्व के विकास हेतु सुविधाएं स्वतन्त्रता का दूसरा तत्व यह है कि समाज और राज्य द्वारा व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व के विकास हेतु अधिकाधिक सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए।

अतः स्वतन्त्रता के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही स्वरूपों को दृष्टि में रखते हुए स्वतन्त्रता की परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि “स्वतन्त्रता जीवन की ऐसी अवस्था का नाम है जिसमें व्यक्ति के जीवन पर न्यूनतम प्रतिबन्ध हों और व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु अधिकतम सुविधाएं प्राप्त हों। “

स्वतन्त्रता के विविध रूप –

फ्रांसीसी विद्वान मॉण्टेस्क्यू ने एक स्थान पर कहा है कि “स्वतन्त्रता के अतिरिक्त शायद ही कोई ऐसा शब्द हो जिसके इतने अधिक अर्थ होते हों और जिसने नागरिक के मस्तिष्क पर इतना अधिक प्रभाव डाला हो। ” जिनमें मॉण्टेस्क्यू के इस कथन का कारण यह है कि राजनीति विज्ञान में स्वतन्त्रता के विविध रूप प्रचलित हैं, निम्नलिखित प्रमुख हैं :

(1) प्राकृतिक स्वतन्त्रता (Natural Liberty)—इस घोषणा के अनुसार स्वतन्त्रता प्रकृति की देन है और मनुष्य जन्म से ही स्वतन्त्र होता है। इसी विचार को व्यक्त करते हुए रूसो ने लिखा है कि “मनुष्य स्वतन्त्र उत्पन्न होता है, किन्तु सर्वत्र वह बन्धनों में बंधा हुआ है।” लॉक ने भी स्वतन्त्रता के अधिकार को व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार माना है।प्राकृतिक स्वतन्त्रता का आशय मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतन्त्रता से है। संविदावादी विचारकों का मत है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व व्यक्तियों को इस प्रकार की स्वतन्त्रता प्राप्त थी। संयुक्त राज्य अमरीका की ‘स्वाधीनता की घोषणा’ और फ्रांस की राज्य क्रान्ति में इसी प्रकार की स्वतन्त्रता का प्रतिपादन किया गया था। प्राकृतिक स्वतन्त्रता की इस धारणा के अनुसार स्वतन्त्रता प्रकृति प्रदत्त और निरपेक्ष होती है अर्थात् समाज या राज्य व्यक्ति की स्वतन्त्रता को किसी भी प्रकार से सीमित या प्रतिबन्धित नहीं कर सकता है| परंतु प्राकृतिक स्वतंत्रता की या धारणा पूर्णतया भ्रमात्मक है प्राकृतिक स्वतंत्रता की स्थिति में तो मत्स्य न्याय का व्यवहार प्रचलित होगा और परिणामता समाज के कुछ ही व्यक्ति अस्थाई रूप से स्वतंत्रता का उपभोग कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त समाज में रहकर असीमित स्वतन्त्रता का उपभोग नहीं किया जा सकता। सामूहिक हित में स्वतन्त्रता को सीमित करना नितान्त आवश्यक है।इस धारणा की आलोचना की जाने पर भी इसका पर्याप्त महत्व है। यह सिद्धान्त इस बात को स्पष्ट करता है कि प्रत्येक व्यक्ति की कुछ स्वाभाविक शक्तियां होती हैं तथा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास इन शक्तियों के विकास पर ही निर्भर करता है। राज्य का कर्तव्य यह है कि वह नागरिकों को इन शक्तियों के विकास हेतु पूर्ण अवसर प्रदान करे। वर्तमान समय में प्राकृतिक स्वतन्त्रता का विचार इस रूप में मान्य है कि सभी व्यक्ति समान हैं और उन्हें व्यक्तित्व के विकास हेतु समान सुविधाएं प्राप्त होनी चाहिए।

(2) व्यक्तिगत स्वतन्त्रता (Personal Liberty ) — इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के उन कार्यों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए, जिनका सम्बन्ध केवल उसके ही निजी जीवन से हो, इस प्रकार के व्यक्तिगत कार्यों में भोजन, वस्त्र, धर्म और पारिवारिक जीवन को सम्मिलित किया जा सकता है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का सबसे प्रमुख समर्थक जे. एस. मिल है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के समर्थकों के अनुसार इनसे सम्बन्धित कार्यों में व्यक्तियों को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। व्यक्तिवादी विचारक मिल व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का समर्थन करते हुए कहते हैं कि “मानव समाज को केवल आत्मरक्षा के उद्देश्य से ही किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से हस्तक्षेप करने का अधिकार हो सकता है। अपने ऊपर, अपने शरीर, मस्तिष्क और आत्मा पर व्यक्ति सम्प्रभु है।”इसमें सन्देह नहीं कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का आदर किया जाना चाहिए, लेकिन वर्तमान समय में सामाजिक जीवन इतना जटिल हो गया है कि व्यक्ति के कौन से कार्य स्वयं उनसे ही सम्बन्धित हैं, इस सम्बन्ध कुछ भी नहीं कहा जा सकता है और अनेक बार ऐसे अवसर उपस्थित हो सकते हैं, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य, शालीनता और व्यवस्था के हित में व्यक्ति की भोजन, वस्त्र और धार्मिक आचरण की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करना पड़े। समाजवादी विचारधारा का तो आधार ही यह है कि व्यक्ति के सभी कार्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज पर प्रभाव डालते हैं और उन पर समस्त समाज का नियन्त्रण होना चाहिए। इस प्रकार यद्यपि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के विचार को अब मान्यता प्राप्त नहीं रह गयी है, तथापि इस विचार में इतनी सत्यता अवश्य ही है कि जिन कार्यों का सम्बन्ध एक ही व्यक्ति से हो, उनके विषय में उसे पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए।

(3) नागरिक स्वतन्त्रता (Civil Liberty)—नागरिक स्वतन्त्रता का अभिप्राय व्यक्ति की उन स्वतन्त्रताओं से है जो व्यक्ति समाज या राज्य का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है। नागरिक स्वतन्त्रता का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर और अधिकार प्रदान करना होता है। अतः स्वभाव से ही यह स्वतन्त्रता असीमित या निरंकुश नहीं हो सकती।
नागरिक स्वतन्त्रता दो प्रकार की होती है—(1) शासन के विरुद्ध व्यक्ति की स्वतन्त्रता, (2) व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों तथा समुदायों से स्वतन्त्रता। शासन के विरुद्ध व्यक्ति की स्वतन्त्रता लिखित या अलिखित संविधान द्वारा मौलिक अधिकारों के माध्यम से या अन्य किसी प्रकार से स्वीकृत की जाती है। नागरिक स्वतन्त्रता का दूसरा रूप मनुष्य के वे अधिकार हैं जिन्हें वह राज्य के अन्य समुदायों के विरुद्ध प्राप्त करता है। नागरिक स्वतन्त्रताओं के अन्तर्गत, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, व्यवसाय की स्वतन्त्रता, संगठन बनाने, भ्रमण तथा निवास की स्वतन्त्रता आदि शामिल है।
नागरिक स्वतन्त्रता का स्तर सभी राज्यों में एक सा नहीं होता है। वस्तुतः जिस राज्य में नागरिक स्वतन्त्रता का स्तर जितना ऊंचा होता है, उसे उतना ही अधिक लोकतन्त्रात्मक एवं लोककल्याणकारी राज्य कहा जा सकता है।
(4) राजनीतिक स्वतन्त्रता (Political Liberty) — अपने राज्य के कार्यों में स्वतन्त्रतापूर्वक सक्रिय रूप से भाग लेने की स्वतन्त्रता को राजनीतिक स्वतन्त्रता कहा जाता है। लास्की के अनुसार, “राज्य के कार्यों में सक्रिय भाग लेने की शक्ति ही राजनीतिक स्वतन्त्रता है।
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राजनीतिक स्वतन्त्रता के अन्तर्गत व्यक्ति को ये अधिकार प्राप्त होते हैं— (1) मत देने का अधिकार, (2) निर्वाचित होने का अधिकार, (3) उचित योग्यता होने पर सार्वजनिक पद प्राप्त करने का अधिकार, (4) सरकार के कार्यों की आलोचना का अधिकार। इन अधिकारों से स्पष्ट है कि राजनीतिक स्वतन्त्रता केवल एक प्रजातन्त्रात्मक देश में ही प्राप्त की जा सकती है। राजनीतिक स्वतन्त्रता के अभाव में नागरिक स्वतन्त्रता का कोई मूल्य नहीं रह जाता, क्योंकि राजनीतिक स्वतन्त्रता के उपयोग से ही ऐसे समाज का निर्माण सम्भव होता है जिसमें नागरिक स्वतन्त्रताओं की रक्षा सम्भव हो सके।
(5) आर्थिक स्वतन्त्रता (Economic Liberty) — वर्तमान समय में आर्थिक स्वतन्त्रता का तात्पर्य व्यक्ति की ऐसी स्थिति से है जिसमें व्यक्ति अपने आर्थिक प्रयत्नों का लाभ स्वयं प्राप्त कर सके तथा उसके श्रम का दूसरे के द्वारा शोषण न किया जा सके। लास्की के अनुसार, “आर्थिक स्वतन्त्रता का यह अभिप्राय है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका कमाने की समुचित सुरक्षा तथा सुविधा प्राप्त हो।” कुछ व्यक्ति आर्थिक स्वतन्त्रता का तात्पर्य ‘उद्योग में प्रजातन्त्र’ की स्थापना से भी लेते हैं।

(6) राष्ट्रीय स्वतन्त्रता (National Liberty)—प्रत्येक व्यक्ति के स्वतन्त्रता के अधिकार के समान ही राष्ट्र को भी स्वतन्त्र होने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए और राष्ट्रों की स्वतन्त्रता के विचार के अनुसार भाषा, धर्म, संस्कृति, नस्ल, ऐतिहासिक परम्परा, आदि की एकता पर आधारित राष्ट्र का यह अधिकार है कि वह स्वतन्त्र राज्य का निर्माण करे तथा अन्य किसी राज्य के अधीन न हो। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का व्यावहारिक रूप राष्ट्रीय आत्म निर्णय का सिद्धान्त है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ व अन्तरर्राष्ट्रीय कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र को स्वतन्त्र जीवन जीने का अधिकार है। अतः एक देश का दूसरे देश पर नियन्त्रण(उपनिवेशवाद) समाप्त होना चाहिए।
किन्तु जिस प्रकार व्यक्ति की स्वतन्त्रता दूसरे व्यक्तियों की समान स्वतन्त्रता से सीमित होती है, उसी प्रकार एक राष्ट्र की स्वतन्त्रता भी दूसरे राष्ट्रों की समान स्वतन्त्रता से सीमित होती है। सम्पूर्ण मानवता के हित में ऐसा होना भी चाहिए।

(7) धार्मिक स्वतन्त्रता (Religious Liberty) — धार्मिक स्वतन्त्रता का आशय यह है कि सभी व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। नागरिकों को अपने धर्म के प्रचार और प्रसार की भी स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। राज्य के द्वारा अपने नागरिकों में, उनके धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
(8) नैतिक स्वतन्त्रता (Moral Liberty)—व्यक्ति को अन्य सभी प्रकार की स्वतन्त्रताएं प्राप्त होने पर भी यदि वह नैतिक दृष्टि से परतन्त्र हो तो उसे स्वतन्त्र नहीं कहा जा सकता। नैतिक स्वतन्त्रता ही वास्तविक एवं महान् स्वतन्त्रता है। नैतिक स्वतन्त्रता का तात्पर्य व्यक्ति की उस मानसिक स्थिति से है जिसमें वह अनुचित लोभ-लालच के बिना अपना सामाजिक जीवन व्यतीत करने की योग्यता रखता हो। प्लेटो, अरस्तू, ग्रीन, बोसांके तथा काण्ट ने इस बात पर बल दिया है कि नैतिक स्वतन्त्रता से ही मनुष्य का विकास सम्भव है। वैसे तो सभी प्रकार के जीवन और शासन-व्यवस्थाओं के लिए नैतिक स्वतन्त्रता की आवश्यकता होती है, किन्तु लोकतन्त्रात्मक शासन के लिए नैतिक स्वतन्त्रता नितान्त आवश्यक है।


स्वतन्त्रता और कानून का सम्बन्ध-

स्वतन्त्रता और कानून के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय पर राजनीतिक विचारकों में बहुत अधिक मतभेद है और इस सम्बन्ध में प्रमुख रूप से दो विचारधाराओं का प्रतिपादन किया गया है :
(1) अराजकतावादियों और व्यक्तिवादियों के विचार—प्रथम विचारधारा का प्रतिपादन अराजकतावादी और व्यक्तिवादी विचारकों द्वारा किया गया है। अराजकतावादियों के अनुसार, स्वतन्त्रता का तात्पर्य व्यक्तियों की अपनी इच्छानुसार कार्य करने की शक्ति का नाम है और राज्य के कानून शक्ति पर आधारित होने के कारण व्यक्तियों की इच्छानुसार कार्य करने में बाधक होते हैं, अतः स्वतन्त्रता और कानून परस्पर विरोधी हैं। अराजकतावादी विलियम गाडविन के शब्दों में, “कानून सबसे अधिक घातक प्रकृति की संस्था है।” व्यक्तिवादी भी राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हुए कानून और स्वतन्त्रता को परस्पर विरोधी बताते हैं। उनका कथन है कि “एक की मात्रा जितनी अधिक होगी, दूसरे की मात्रा उतनी ही कम हो जायेगी।” जे. एस. मिल की कानून व स्वतन्त्रता को एक-दूसरे का विरोधी मानता है।
(2) आदर्शवादियों के विचार—अराजकतावादी और व्यक्तिवादी धारणा के नितान्त विपरीत आदर्शवादी विचारकों और राजनीति विज्ञान के वर्तमान विद्वानों ने इस विचार का प्रतिपादन किया है कि कानून स्वतन्त्रता को सीमित नहीं करते वरन् स्वतन्त्रता की रक्षा और उसमें वृद्धि करते हैं। विलोबी के अनुसार, “जहां नियन्त्रण होते हैं, वहीं स्वतन्त्रता का अस्तित्व होता है।” लॉक और रिची के द्वारा भी यही मत व्यक्त किया गया है और हाकिन्स ने तो यहां तक कहा है कि “व्यक्ति जितनी अधिक स्वतन्त्रता चाहता है उतनी ही अधिक सीमा तक उसे शासन की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए।’
इन आदर्शवादी विद्वानों का दृष्टिकोण बहुत कुछ सीमा तक सही है और कानून निम्नलिखित तीन प्रकार से व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करते और उसमें वृद्धि करते हैं :
(1) कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता की अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप से रक्षा करते हैं-यदि समाज के अन्तर्गत किसी भी प्रकार के कानून न हों तो समाज के शक्तिशाली व्यक्ति निर्बल व्यक्तियों पर अत्याचार करेंगे और संघर्ष की इस अनवरत प्रक्रिया में किसी भी व्यक्ति की स्वतन्त्रता सुरक्षित नहीं रहेगी।
(2) कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता की राज्य के हस्तक्षेप से रक्षा करते हैं—साधारणतया वर्तमान समय के राज्यों में दो प्रकार के कानून होते हैं—साधारण कानून और संवैधानिक कानून। इन दोनों प्रकार के कानूनों में से संवैधानिक कानूनों द्वारा राज्य के हस्तक्षेप से व्यक्ति की स्वतन्त्रता को रक्षित करने का कार्य किया जाता है। भारत और अमरीका, आदि राज्यों के संविधानों में मौलिक अधिकारों की जो व्यवस्था है, वह इस सम्बन्ध में श्रेष्ठ उदाहरण है। यदि राज्य इन मौलिक अधिकारों (संवैधानिक कानूनों) के विरुद्ध कोई कार्य करता है तो व्यक्ति न्यायालय की शरण लेकर राज्य के हस्तक्षेप से अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा कर सकता है।
(3) स्वतन्त्रता के नकारात्मक स्वरूप के अतिरिक्त इसका एक सकारात्मक स्वरूप भी होता है—स्वतन्त्रता के सकारात्मक स्वरूप का तात्पर्य है व्यक्ति को व्यक्तित्व के विकास हेतु आवश्यक सुविधाएं प्रदान करना। कानून व्यक्तियों के व्यक्तित्व के विकास की सुविधाएं प्रदान करते हुए उन्हें वास्तविक स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं।

वर्तमान समय में लगभग सभी राज्यों द्वारा जनकल्याणकारी राज्य के विचार को अपना लिया गया है और राज्य कानूनों के माध्यम से एक ऐसे वातावरण के निर्माण में संलग्न हैं जिसके अन्तर्गत व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सकें। राज्य के द्वारा की गयी अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था, अधिकतम श्रम और न्यूनतम वेतन के सम्बन्ध में कानूनी व्यवस्था, जनस्वास्थ्य का प्रबन्ध, आदि कार्यों द्वारा नागरिकों को व्यक्तित्व के विकास की सुविधाएं प्राप्त हो रही हैं और इस प्रकार राज्य नागरिकों को वास्तविक स्वतन्त्रता प्रदान कर रहा है।
यदि राज्य सड़क पर चलने के सम्बन्ध में किसी प्रकार के नियमों का निर्माण करता है, मद्यपान पर रोक लगाता है या टीके की व्यवस्था करता है तो राज्य के इन कार्यों से व्यक्तियों की स्वतन्त्रता सीमित नहीं होती, वरन् उसमें वृद्धि ही होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि साधारण रूप से राज्य के कानून व्यक्तियों की स्वतन्त्रता की रक्षा और उसमें वृद्धि करते हैं।
स्वतन्त्रता और कानून के इस घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण ही रैम्जे म्योर ने लिखा है कि “कानून स्वतन्त्रता इस प्रकार अन्योन्याश्रित और एक-दूसरे के पूरक हैं। “
सभी कानून स्वतन्त्रता के साधक नहीं—लेकिन राज्य द्वारा निर्मित सभी कानूनों के सम्बन्ध में इस प्रकार की बात नहीं कही जा सकती है कि वे मानवीय स्वतन्त्रता में वृद्धि करते हैं। यदि शासन अपने ही स्वार्थों को दृष्टि में रखकर कानूनों का निर्माण करता है, जनसाधारण के हितों की अवहेलना करता है और बिना किसी विशेष कारण के नागरिकों की स्वतन्त्रताएं सीमित करता है तो राज्य के इन कानूनों से व्यक्तियों की स्वतन्त्रता सीमित ही होती है। उदाहरणार्थ, हिटलर और मुसोलिनी द्वारा निर्मित अनेक कानून स्वतन्त्रता के विरुद्ध थे।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी कानून नागरिकों की स्वतन्त्रता में वृद्धि नहीं करते, वरन् ऐसा केवल उन्हीं कानूनों के सम्बन्ध में कहा जा सकता है जिनके सम्बन्ध में, लास्की के शब्दों में “व्यक्ति यह अनुभव करते हैं कि मैं इन्हें स्वीकार कर सकता और इनका पालन कर सकता हूं।” उदारवाद के प्रतिपादक जॉन लाक ने भी कहा है, “जहां कानून नहीं है वहां स्वतन्त्रता नहीं है । “
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि यदि राज्य का कानून जनता की इच्छा पर आधारित है तो वह स्वतन्त्रता का पोषक होगा और यदि वह निरंकुश शासन की इच्छा का परिणाम है तो स्वतन्त्रता का विरोधी हो सकता है।


समानता का अर्थ और परिभाषा-

सामान्यतया समानता का यह अर्थ लगाया जाता है कि मनुष्य जन्म से ही समान होते हैं और इसी कारण सभी व्यक्तियों को व्यवहार और आय का समान अधिकार प्राप्त होना चाहिए इसे निरपेक्ष समानता (Absolute Equality) कहा जाता है, किन्तु समानता का यह अभिप्राय भ्रमपूर्ण है और प्रकृति के द्वारा भी सभी व्यक्तियों को समान शक्तियां प्रदान नहीं की गयी हैं। राज्य के द्वारा इस प्रकार की समानता को अपनाया जाना अनुचित ही नहीं वरन् असम्भव भी है। वर्तमान राज्यों में सापेक्ष समानता (Relative Equality) की धारणा अपनाई गई है। इसके अन्तर्गत समानता का अर्थ ‘समानों में समानता तथा असमानों में असमानता है।” इसे दूसरे शब्दों में आनुपातिक समानता भी कहते हैं जिसका सर्वप्रथम प्रतिपादन अरस्तू ने किया था। निरपेक्ष समानता कदापि सम्भव नहीं है, क्योंकि व्यक्तियों की क्षमताओं में अन्तर होता है। यदि अक्षम व्यक्ति सक्षम व्यक्तियों के समान स्थिति की मांग करता है, तो इसे लागू करना सम्भव नहीं है। इसीलिए अरस्तू ने कहा था, क्रान्ति के बीज समानता की भावना में पाये जाते हैं।

वर्तमान समय में हम समाज में जिस प्रकार की असमानता देखते हैं, उस असमानता के कारण दो प्रकार के हैं और इन दो प्रकार के कारणों के आधार पर असमानता भी दो प्रकार की है। एक प्रकार की असमानता वह है जिसका मूल प्रकृति द्वारा विभिन्न व्यक्तियों में किया गया बुद्धि, बल और प्रतिभा का भेद है और इस भेद के कारण जो असमानता उत्पन्न होती है, उसे प्राकृतिक असमानता कहते हैं। इस प्राकृतिक असमानता का निराकरण सम्भव और उचित नहीं है।
समाज में विद्यमान दूसरे प्रकार की असमानता वह है जिसका मूल समाज द्वारा उत्पन्न की गयी विषमताएं हैं। अनेक बार बुद्धि, बल और प्रतिभा की दृष्टि से श्रेष्ठ होने पर भी निर्धन व्यक्तियों के बच्चे

अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर पाते, जैसा विकास उनसे निम्नतर बुद्धि बल के धनिक बच्चे कर लेते हैं। इस सामाजिक असमानता का मूल कारण समाज द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों का वह वैषम्य होता है जिसके कारण सभी व्यक्तियों को व्यक्तित्व के विकास के समान अवसर प्राप्त नहीं हो पाते हैं। राजनीति विज्ञान की एक धारणा के रूप में समानता का तात्पर्य सामाजिक वैषम्य द्वारा उत्पन्न इस असमानता के अन्त से है। इसका तात्पर्य यह है कि राज्य के द्वारा सभी व्यक्तियों को व्यक्तित्व के विकास हेतु समान अवसर दिये जाने चाहिए, ताकि किसी भी व्यक्ति को यह कहने का अवसर न मिले कि यदि उसे यथेष्ट सुविधाएं प्राप्त होतीं, तो वह भी अपने जीवन का विकास कर सकता था। अतः समानता की विधिवत् परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि “समानता का तात्पर्य ऐसी परिस्थितियों के अस्तित्व से होता है जिसके कारण सब व्यक्तियों को व्यक्तित्व के विकास हेतु समान अवसर प्राप्त हो सकें और इस प्रकार उस असमानता का अन्त हो सके जिसका मूल कारण सामाजिक वैषम्य है। “
रशदल ने समानता की परिभाषा इस प्रकार की है : “समानता का अर्थ है कि बराबर वालों में समानता और असमान स्तर के व्यक्तियों में असमानता अर्थात् अन्य बातों के समान होने पर मेरा हित उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि किसी अन्य व्यक्ति का हित ।”
लास्की के अनुसार, “समानता प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्तियों का उपयोग करने का यथाशक्ति समान अवसर प्रदान करने का प्रयत्न है।” हेराल्ड लास्की के अनुसार, समानता के लिए तीन प्रमुख आवश्यकताएं हैं :

(1) विशेष सुविधाओं का अभाव,
(2) सभी के लिए समान अवसरों की उपलब्धि,
(3) सबकी प्राथमिक आवश्यकताओं की सबसे पहले पूर्ति

समानता के विविध रूप।


स्वतन्त्रता के समान ही समानता के भी अनेक प्रकार हैं, जिनमें निम्न प्रमुख हैं :
(1) नागरिक समानता (Civil Equality)—नागरिक समानता के सामान्यतया दो अभिप्राय लिये जाते हैं। प्रथम, राज्य के कानूनों की दृष्टि में सभी व्यक्ति समान होने चाहिए और राज्य के कानूनों द्वारा दण्ड और सुविधा प्रदान करने में व्यक्ति-व्यक्ति में कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए। , इसके अतिरिक्त सभी व्यक्तियों को नागरिक जीवन के अवसर अर्थात नागरिक अधिकार एवं स्वतंत्रताएं समान रूप से प्राप्त होनी चाहिए सारांशत: सभी व्यक्तियों को कानून का समान संरक्षण प्राप्त होना चाहिए

(2) सामाजिक समानता (Social Equality)–सामाजिक समानता का तात्पर्य यह है कि समाज से विशेषाधिकारों का अन्त हो जाना चाहिए और समाज में सभी व्यक्तियों को व्यक्ति होने के नाते ही महत्व दिया जाना चाहिए। समाज में जाति, धर्म, लिंग और व्यवसाय के आधार पर विभिन्न व्यक्तियों में किसी प्रकार का भेद नहीं किया जाना चाहिए। सामाजिक दृष्टिकोण से सभी व्यक्ति समान होने चाहिए और उन्हें सामाजिक उत्थान के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए भारत की जाति व्यवस्था और भूतकाल में दक्षिण अफ्रीका में प्रचलित रंगभेद तथा विश्व के अन्य कुछ देशों में किसी न किसी रूप में आज भी किया जा रहा है रंगभेद सामाजिक समानता की घोर विरुद्ध है

(3) राजनीतिक समानता (Political Equality) — वर्तमान समय में राजनीतिक समानता पर भी बहुत अधिक बल दिया जाता है। राजनीतिक समानता का अभिप्राय सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अधिकार एवं अवसर प्राप्त होने से है, परन्तु इस सम्बन्ध में पागल, नाबालिग और घोर अपराधी व्यक्ति अपवाद कहे जा सकते हैं, क्योंकि इनके द्वारा अपने मत का उचित प्रयोग नहीं किया जा सकता है। राजनीतिक समानता का आधार यह है कि राजनीतिक अधिकार प्रदान करने के सम्बन्ध में रंग, जाति, धर्म और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए और सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अवसर प्राप्त होने चाहिए।

(4) आर्थिक समानता (Economic Equality) — वर्तमान समय में इस तथ्यपूर्ण विचार को लगभग सभी पक्षों द्वारा स्वीकार कर लिया गया है कि मानव जीवन में आर्थिक समानता का महत्व सबसे अधिक है और आर्थिक समानता के अभाव में राजनीतिक एवं नागरिक समानता का कोई मूल्य नहीं है। आर्थिक समानता का तात्पर्य अलग-अलग प्रकार के व्यक्तियों के समान वेतन से नहीं है वरन् इसका तात्पर्य केवल यह है कि मनुष्य की आय बहुत अधिक असमानता नहीं होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, उनकी आय में इतना अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति अपने धन के बल पर दूसरे व्यक्ति के जीवन पर अधिकार कर ले। पूर्व के साम्यवादी देशों तथा वर्तमान के भारत जैसे लोकतांत्रिक समाजवादी देशों में आर्थिक समानता पर विशेष बल दिया गया है। उदाहरण के लिए, पूर्व सोवियत संघ में विभिन्न वर्गों में आय की समानता बनाए रखने पर विशेष बल दिया गया था।

(5) प्राकृतिक समानता (Natural Equality)—प्राकृतिक समानता के प्रतिपादक इस बात पर बल देते हैं कि प्रकृति ने मनुष्य को समान बनाया है और सभी मनुष्य आधारभूत रूप में बराबर हैं। सामाजिक समझौता सिद्धान्त के प्रतिपादकों ने प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य की समानता का विशेष रूप से उल्लेख किया है। वर्तमान समय में प्राकृतिक समानता की इस धारणा को अमान्य किया जा चुका है और इसे ‘कोरी कल्पना’ बताया जाता है। कोल के शब्दों में, “मनुष्य शारीरिक बल, पराक्रम, मानसिक योग्यता, सृजनात्मक शक्ति, समाज सेवा की भावना और सम्भवतया सबसे अधिक कल्पना शक्ति में एक-दूसरे से मूलतः भिन्न हैं।’
(6) धार्मिक समानता (Religious Equality)—इसका अर्थ यह है कि सभी धर्म समान हैं और सभी व्यक्तियों को समान रूप से अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। राज्य के द्वारा धर्म के आधार पर अपने नागरिकों में कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए। धार्मिक समानता की प्राप्ति धर्मनिरपेक्ष राज्य में ही सम्भव है। भारत में धार्मिक आधार पर भेदभाव की मनाही के साथ धर्मनिरपेक्षता की ऐसी धारणा को अपनाया गया है जिसमें ‘सर्वधर्म समभाव’ का आदर्श निहित है।
(7) सांस्कृतिक और शिक्षा सम्बन्धी समानता (Cultural and Educational Equality) – सभी व्यक्तियों को समान रूप से शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए और शिक्षा के क्षेत्र में जाति, धर्म, वर्ण और लिंग के आधार पर कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए। शिक्षा सम्बन्धी समानता में यह बात निहित है कि निर्धन विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए विशेष सुविधाएं दी जानी चाहिए। सांस्कृतिक समानता का तात्पर्य यह है कि सांस्कृतिक दृष्टि से बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक सभी वर्गों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति बनाये रखने का अधिकार होना चाहिए।


स्वतन्त्रता और समानता का सम्बन्ध –

स्वतन्त्रता और समानता के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय पर राजनीतिशास्त्रियों में पर्याप्त मतभेद हैं और इस सम्बन्ध में प्रमुख रूप से दो विचारधाराओं का प्रतिपादन किया गया है जो इस प्रकार हैं :
स्वतन्त्रता और समानता परस्पर विरोधी हैं—कुछ व्यक्तियों द्वारा स्वतन्त्रता और समानता के जन प्रचलित अर्थों के आधार पर इन्हें परस्पर विरोधी बताया गया है। उनके अनुसार स्वतन्त्रता अपनी करने की शक्ति का नाम है, जबकि समानता का तात्पर्य प्रत्येक प्रकार से सभी व्यक्तियों को समान समझने इच्छानुसार कार्य से है। इस आधार पर सामान्य व्यक्ति ही नहीं, वरन् डी. टाकविल और एक्टन जैसे विद्वानों द्वारा भी इन्हें परस्पर विरोधी माना गया है। लॉर्ड एक्टन एक स्थान पर लिखते हैं कि “समानता की उत्कृष्ट अभिलाषा के कारण स्वतन्त्रता की आशा ही व्यर्थ हो गयी है।”” स्वतन्त्रता व समानता को परस्पर विरोधी मानने वाले अधिकांश विद्वान वही हैं जिन्होंने नकारात्मक स्वतन्त्रता की धारणा को मान्यता दी है।
स्वतन्त्रता और समानता को परस्पर विरोधी मानने वाले इन विचारकों द्वारा अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित तर्क दिये गये हैं :
(1) व्यक्ति को स्वतन्त्रता तभी प्राप्त रह सकती है, जबकि उसके ऊपर किसी भी प्रकार के बन्धन न हों, परन्तु इसके ठीक विपरीत समानता स्थापित करने के लिए बन्धनों का होना नितान्त आवश्यक है। ऐसी स्थिति में हमारे द्वारा स्वतन्त्रता और समानता में से एक को ही प्राप्त किया जा सकता है, दोनों को नहीं।


(2) यदि सभी व्यक्तियों को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान कर दी जाय तो समानता स्वतः ही समाप्त हो जायेगी, क्योंकि प्रकृति के द्वारा बल और बुद्धि प्रदान करने में भेद किया गया है और प्रत्येक व्यक्ति सामान्यतः अपने ही स्वार्थ की बात सोचता है। ऐसी स्थिति में अधिक बल तथा बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति जीवन में बहुत अधिक विकास कर लेंगे और बल तथा बुद्धि की दृष्टि से हीन व्यक्ति जीवन में पिछड़ जायेंगे। इस प्रकार स्वतन्त्रता का परिणाम होगा—समाज में सर्वत्र असमानता ।
(3) यदि समाज में पूर्ण रूप से समानता की स्थापना कर दी जाय, तो बुद्धिमान लोगों का स्वतन्त्र विकास असम्भव हो जायेगा। इस प्रकार समानता स्वतन्त्रता को नष्ट कर देगी।
वास्तव में जो विचारक स्वतन्त्रता व समानता में विरोध मानते हैं। वे दोनों की व्यावहारिक स्थिति पर विचार नहीं करते। व्यावहारिक दृष्टि से समानता के अभाव में स्वतन्त्रता सम्भव नहीं है तथा स्वतन्त्रता के अभाव में समानता सामाजिक विकास को अवरुद्ध करती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि सामान्यतया उदारवादी विचारकों ने समानता की तुलना में स्वतन्त्रता को अधिक महत्व दिया है। वहीं समाजवादियों ने समानता को प्रमुखता प्रदान की है।
स्वतन्त्रता और समानता परस्पर पूरक हैं—उपर्युक्त प्रकार की विचारधारा के नितान्त विपरीत दूसरी ओर विद्वानों का बड़ा समूह है, जो स्वतन्त्रता और समानता को परस्पर विरोधी नहीं वरन् पूरक मानते हैं। रूसो, टॉनी, लास्की और मैकाइवर इस मत के प्रमुख समर्थक हैं और अपने मत की पुष्टि में इन विद्वानों ने निम्न तर्क दिये हैं :
(1) स्वतन्त्रता और समानता को परस्पर विरोधी बताने वाले विद्वानों द्वारा स्वतन्त्रता और समानता की गलत धारणा को अपनाया गया है। स्वतन्त्रता का तात्पर्य ‘प्रतिबन्धों के अभाव’ या स्वच्छन्दता से नहीं है, वरन् इसका तात्पर्य केवल यह है कि अनुचित प्रतिबन्धों के स्थान पर उचित प्रतिबन्धों की व्यवस्था की जानी चाहिए और उन्हें अधिकतम सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए, जिससे उनके द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकास किया जा सके। इसी प्रकार पूर्ण समानता एक काल्पनिक वस्तु है और समानता का तात्पर्य पूर्ण समानता जैसी किसी काल्पनिक वस्तु से नहीं, वरन् व्यक्तित्व के विकास हेतु आवश्यक और पर्याप्त सुविधाओं से है, जिससे सभी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें और इस प्रकार उस असमानता का अन्त हो सके, जिसका मूल कारण सामाजिक परिस्थितियों का भेद है। इस प्रकार स्वतन्त्रता और समानता दोनों ही व्यक्तित्व के विकास हेतु नितान्त आवश्यक हैं।
(2) स्वतन्त्रता और समानता दोनों के लिए प्रतिबन्धों का होना अनिवार्य है। बिना प्रतिबन्धों के दोनों ही अव्यावहारिक और अपूर्ण हैं।
(3) वर्तमान समय की परिस्थितियों में अर्थ ने मानव जीवन में बहुत अधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है और वस्तुस्थिति यह है कि आर्थिक समानता सभी प्रकार की स्वतन्त्रताओं की जननी है। प्रो. जोड के शब्दों में, “आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता एक भ्रम है।”
(4) आधुनिक प्रजातन्त्र के युग में स्वतन्त्रता और समानता दोनों ही लोकतन्त्र के आधार-स्तम्भ हैं, अतः दोनों के मध्य किसी भी प्रकार का विरोध सम्भव नहीं। फ्रांस के क्रान्तिकारियों की घोषणा और भारतीय संविधान की प्रस्तावना, आदि में स्वतन्त्रता और समानता दोनों का एक साथ ही उल्लेख किया गया है। स्वतन्त्रता और समानता के परस्पर पूरक होने के कारण ही ऐसा किया गया है। डॉ. आशीर्वादम् ने ठीक ही लिखा है, “फ्रांस के क्रान्तिकारी न तो पागल थे और न ही मूर्ख, जब उन्होंने स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व का नारा लगाया था।

वास्तव में स्वतन्त्रता और समानता परस्पर विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं और समानता के बिना स्वतन्त्रता एक कल्पना बनकर रह जाती है। जिस समाज में किसी एक वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त रहते हैं और सामाजिक तथा आर्थिक अन्तर पाये जाते हैं, वहां वह वर्ग अन्य वर्गों पर अनुचित दबाव डालने की शक्ति प्राप्त कर लेता है और अन्य वर्गों को केवल नाममात्र की ही स्वतन्त्रता प्राप्त रह जाती है। लास्की के मतानुसार, “सम्पत्ति की असमानता स्वतन्त्रता की विरोधी है। साधनों के अभाव के कारण निर्धन व्यक्ति न्यायालयों से उचित न्याय प्राप्त नहीं कर पाते और मुकदमेबाजी की लम्बी प्रक्रिया से धनी लोग अपने निर्धन पड़ोसियों को तबाह कर देते हैं।” अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे लिखते हैं, “बिना कुछ समानता के स्वतन्त्रता छिछली होगी और स्वतन्त्रता के बिना समानता निरर्थक होगी।” प्रो. पोलर्ड ने इस सच्चाई को एक वाक्य में इस प्रकार व्यक्त किया है कि “स्वतन्त्रता की समस्या का केवल एक हल है और वह हल समानता में ही निहित है।
यदि स्वतन्त्रता को यथार्थ में बदलना है तो समानता का होना आवश्यक है। यदि समानता नहीं है तो गरीबों के लिए स्वतन्त्रता का कोई अर्थ नहीं होगा। इसी बात को ध्यान में रखते हुए वंचित वर्गों को विशेष सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। इस प्रकार स्वतन्त्रता और समानता एक-दूसरे के पूरक और सहायक हैं। एच. आर. टॉनी ने सत्य ही कहा है कि “समानता की एक बड़ी मात्रा स्वतन्त्रता की विरोधी न होकर, उसके लिए नितान्त आवश्यक है।” आजकल अधिकांश विचारक दोनों को एक-दूसरे का पूरक मानते हैं।

प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न-

निम्नलिखित प्रश्नों में चार विकल्प दिए गए हैं उनमें से एक सही विकल्प छांट कर लिखिए

  1. ‘On Liberty’ पुस्तक के लेखक हैं :
    (अ) जे. एस. मिल (स) बर्न्स
    (ब) बेन्थम
    (द) मार्क्स
  2. “स्वतन्त्रता न केवल सभ्य जीवन का आधार है, वरन् सभ्यता का विकास भी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर ही
    निर्भर करता है।” यह कथन किसका है :
    (अ) डॉ. राधाकृष्णन का
    (स) बर्न्स का
    (ब) जे. एस. मिल का। (द)लास्की का
  3. ‘लिबर’ (Liber) किस भाषा का शब्द है ?
    (अ) हिन्दी
    (ब) अंग्रेजी
    (स) लैटिन
    (द) फारसी
  4. लैटिन भाषा के ‘लिबर’ (Liber) शब्द का अर्थ होता है :
    (अ) बन्धन। (ब) बन्धनों का अभाव
    (स) स्वच्छन्दता। (द) इनमें से कोई नहीं
  5. “स्वतन्त्रता सभी प्रकार के प्रतिबन्धों का अभाव नहीं, अपितु अनुचित प्रतिबन्धों के स्थान पर उचित प्रतिबन्धों की व्यवस्था है।” यह कथन किसका है ? (अ)सीले का। ( से)प्रो.लास्की का
    (ब) मैक्केनी का। (द)टी. एच. ग्रीन का
  6. “स्वतन्त्रता अतिशासन का विलोम है।” यह कथन किसका हैं :
    (अ) लास्की का
    (ब) बेन्थम का
    (द) रूसो का
    (स) सीले का
  7. “जिस प्रकार सौन्दर्य कुरूपता के अभाव का ही नाम नहीं होता है, उसी प्रकार स्वतन्त्रता प्रतिबन्धों के अभाव का ही नाम नहीं है।” यह कथन किस विचारक का है ?
    (अ) विलोबी का
    (स) टी. एच. ग्रीन का
    (ब)लास्की का
    (द) सीले का
  8. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का सबसे प्रमुख समर्थक है :
    (अ) हिटलर
    (स) जे. एस.मिल
    (ब) मुसोलिनी
    (द) इनमें से कोई नहीं
  9. राजनीतिक स्वतन्त्रता के अन्तर्गत व्यक्ति को कौन-सा अधिकार प्राप्त है ?
    (अ) मत देने का अधिकार
    (ब) निर्वाचित होने का अधिकार
    (स) सरकार के कार्यों की आलोचना का अधिकार (द) इनमें से सभी अधिकार
  10. “जहां नियन्त्रण होते हैं, वहीं स्वतन्त्रता का अस्तित्व होता है।” यह कथन किसका है ?
    (अ) विलोबी का
    (स) लॉक और रिची का
    (ब) हाकिन्स का
    (द) विलियम गाडविन का
  11. स्वतन्त्रता और कानून परस्पर विरोधी हैं। इसे मानने वाली विचारधारा है :
    (अ) अराजकतावादी
    (स) ‘अ’ व ‘ब’ दोनों विचारधाराएं
    (ब) व्यक्तिवादी। (द) इनमें से कोई नहीं
  12. किसने कहा, “व्यक्ति अपने ऊपर, अपने मन तथा अपने शरीर पर सम्प्रभु है ?”
    (अ) लॉक
    (स) रूसो
    (ब) जे. एस. मिल (द) वाल्टेयर
  13. “मनुष्य स्वतन्त्र उत्पन्न होता है, किन्तु सर्वत्र वह बन्धनों में बंधा हुआ है।” यह कथन किसका है?
    (अ) हॉब्स का
    (स) रूसो का
    (ब) लॉक का
    (द) मार्क्स का
  14. कानून किस प्रकार से व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करते हैं :
    (अ) कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता की अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप से रक्षा करते हैं।
    (ब) कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता की राज्य के हस्तक्षेप से रक्षा करते हैं।
    (स) कानून व्यक्तियों के व्यक्तित्व के विकास की सुविधाएं प्रदान करते हुए उन्हें वास्तविक स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं।
    (द) उपर्युक्त सभी प्रकार से ।
  15. “समानता प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्तियों का उपयोग करने का यथाशक्ति समान अवसर प्रदान करने का प्रयत्न है।” यह कथन किसका है ?
    (अ) लास्की का
    (स) जोड का
    (व) विलोबी का
    (द) रशदल का
  16. फ्रांस की क्रान्ति (1789) के तीन नारों में से निम्न में से कौन-सा नहीं है ?
    (अ) स्वतन्त्रता
    (स) न्याय
    (ब) समानता
    (द) भाई-चारा
  17. स्वतन्त्रता एवं समानता को परस्पर विरोधी मानने वाला विचारक है :
    (अ) रूसो
    (स) टॉनी
    (ब) डी. टाकविले
    (द) लास्की
  18. “आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता एक भ्रम है।” यह कथन किसका है ?
    (अ) प्रो. जोड का (स) टॉनी का
    (ब) रूसो का
    (द) लॉर्ड एक्टन का
  19. “जहां कानून नहीं है, वहां स्वतन्त्रता भी नहीं है।” किसने कहा था ?
    (अ) जे. एस. मिल ने
    (स) माण्टेस्क्यू ने
    (ब) लॉक ने
    (द) आस्टिन ने
  20. लॉक के तीन प्राकृतिक अधिकारों में कौन-सा एक शामिल नहीं है ?
    (अ) जीवन का अधिकार
    (स) समानता का अधिकार
    (ब) स्वतन्त्रता का अधिकार
    (द) सम्पत्ति का अधिकार


अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1. स्वतन्त्रता को परिभाषित कीजिए

उत्तर—’स्वतन्त्रता अति-शासन की विरोधी है’-सीले ।

प्रश्न 2. किन्हीं दो राजनीतिक स्वतन्त्रताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर—राज्य के मामलों में सक्रिय रूप से भाग लेने को ही राजनीतिक स्वतन्त्रता कहते हैं। दो प्रमुख राजनीतिक स्वतन्त्रता एंइस प्रकार हैं— (1) निर्वाचित होने की स्वतन्त्रता, (2) सरकार की आलोचना करने की स्वतन्त्रता ।

प्रश्न 3. स्वतन्त्रता के कोई दो भेद लिखिए।

उत्तर-(1) नागरिक स्वतन्त्रता, (2) राष्ट्रीय स्वतन्त्रता ।

प्रश्न 4. समानता के कोई दो प्रकार लिखिए।

उत्तर—(1) राजनीतिक समानता, (2) आर्थिक समानता ।


प्रश्न 5. स्वतंत्रता के सिद्धान्त का सबसे प्रमुख प्रतिपादक कौन है?

उत्तर—जॉन स्टुअर्ट मिल। मिल ने अपनी पुस्तक ‘On Liberty’ में स्वतंत्रता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।


प्रश्न 6. कानून के समक्ष समानता से क्या तात्पर्य है?

उत्तर—जब सभी के लिए बिना किसी भेदभाव के एकसे कानून तथा एकसे न्यायालय होते हैं, तब नागरिकों को कानूनी
समानता प्राप्त हो जाती है।


प्रश्न 7. ‘ऑन लिबर्टी’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर- ‘ऑन लिबर्टी’ नामक पुस्तक के लेखक जे.एस. मिल हैं।.


प्रश्न 8. किन्हीं दो विचारकों के नाम बताइए जो स्वतन्त्रता व कानून को एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं।

उत्तर- (1) डी टाकविले, (2) लॉर्ड एक्टन ।


प्रश्न 9. स्वतन्त्रता व समानता में क्या सम्बन्ध है?

उत्तर – स्वतन्त्रता व समानता एक-दूसरे के पूरक हैं।


प्रश्न 10. किसने कहा था कि व्यक्ति को स्वतन्त्र बनाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए?

उत्तर-—यह कथन रूसो का है।


प्रश्न 11. किसने कहा था कि सामान्य इच्छा के अनुसार कार्य करना ही वास्तविक स्वतन्त्रता है?
उत्तर- रूसो ।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न-

1.आर्थिक स्वतन्त्रता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर -आर्थिक स्वतंत्रता वर्तमान समय में आर्थिक स्वतंत्रता का तात्पर्य व्यक्ति की उस स्थिति से है जिसमें व्यक्ति अपने आर्थिक क्रियाओं का लाभ स्वयं कर सके तथा उसके श्रम का दूसरे के द्वारा शोषण न किया जा सके लास्की के अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता का यह अभिप्राय है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका कमाने की समझी सुरक्षा तथा प्राप्त हो कुछ व्यक्ति आर्थिक स्वतंत्रता का तात्पर्य उद्योग में प्रजातंत्र की स्थापना से भी देते हैं|


2.भाषण की स्वतन्त्रता पर लघु टिप्पणी लिखिए।

उत्तर – राजनीतिक स्वतंत्रता के अंतर्गत व्यक्ति को यह भी अधिकार प्राप्त है इसके अनुच्‍छेद 19 में कहा गया है कि किसी भी व्‍यक्ति के पास अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का अधिकार होगा जिसके तहत वह किसी भी तरह के विचारों और सूचनाओं के आदान-प्रदान को स्‍वतंत्र होगा।


3.नागरिक स्वतन्त्रता व राजनीतिक स्वतन्त्रता में क्या अन्तर है ?

उत्तर -नागरिक स्वतंत्रता का अभिप्राय व्यक्ति की उन स्वतंत्रता से है जो व्यक्ति समाज या राज्य का सदस्य होने के नाते प्राप्त है राजनीतिक स्वतंत्रता अपने राज्य के कार्यों में स्वतंत्रता पूर्वक सक्रिय रूप से भाग लेने की स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता कहा जाता है

4.स्वतन्त्रता का मानव जीवन में महत्व स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- स्वतंत्रता अमूल्य वस्तु है और उसका मानवीय जीवन में बहुत अधिक महत्व है यह बात व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता दोनों के ही संबंध में सत्य है स्वतंत्रता का महत्व विभिन्न देशों में लाखों व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान ना दिया जाता है मैग्नी का कथन है की स्वतंत्रता के अभाव में आप अपना कोई कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते|


5.समानता या समता पर एक लघु टिप्पणी लिखिए।

उत्तर – समता का मतलब बराबरी होता है । जबकि समानता का मतलब एक दूसरे लोगो को समान अवसर उपलब्ध कराने संबंधित है। यही अंतर है। नागरिक समानता के समानतय: दो अभिप्राय लिए जाते हैं प्रथम राज्य कानून की दृष्टि में सभी व्यक्तियों समान होने चाहिए और राज्य के कानून द्वारा दंड और सुविधा प्रदान करने में व्यक्तित्व में कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए द्वितीय इसके अतिरिक्त सभी व्यक्तियों को नागरिक जीवन के अवसर प्राप्त होनी चाहिए|


6.समानता और स्वतन्त्रता के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर -स्वतंत्रता और समानता की पारस्परिक संबंध के विषय पर राजनीति शास्त्रियों में पर्याप्त मतभेद है स्वतंत्रता और समानता दोनों के लिए प्रतिबंधों का होना अनिवार्य है बिना प्रतिबंधों के दोनों ही अव्यावहारिक और अपूर्ण है वर्तमान समय की परिस्थितियों में अर्थ ने मानव जीवन में बहुत अधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है और वस्तु स्थिति है कि आर्थिक समानता सभी प्रकार की स्वतंत्रता की जननी है|समानता और स्वतंत्रता एक दूसरे के पूरक है|

1. स्वतन्त्रता की परिभाषा देते हुए इसके विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।

2. समानता किसे कहते हैं? इसके विभिन्न रूपों को स्पष्ट कीजिए।

3. “कानून व स्वतन्त्रता एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।

4. “स्वतन्त्रता नियन्त्रणों का अभाव है।” इस कथन पर टिप्पणी लिखकर समझाइए।

5. स्वतन्त्रता की परिभाषा देते हुए इसके विभिन्न प्रकारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए तथा समानता के साथ इसका सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।

6.स्वतन्त्रता की परिभाषा कीजिए और विधि के साथ उसका सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।

7. स्वतन्त्रता का अर्थ समझाइए और इसके संरक्षणों का वर्णन कीजिए।

8. समानता के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिए। कौन-सा अधिक महत्वपूर्ण है ?

9. ‘स्वतन्त्रता की समस्या का केवल एक ही समाधान है और वह समाधान समानता में निहित है।’ इस कथन कीविवेचना कीजिए।



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