परिशिष्ट वीथिका – प्रथम: भाग: – Parishisht Vithika – Prathamh bhagh – व्याकरणम् (Grammar)

वर्णमाला (Alphabets)

संस्कृत ध्वनियाँ—संस्कृत में वर्णमाला का एक क्रम है जिसे ‘माहेश्वर सूत्र‘ कहा जाता है। यह ध्वनि विज्ञान तथा ध्वनि विश्लेषण के आधार पर गठित सूत्रावली है जिसे पाणिनि ने चौदह सूत्रों में प्रस्तुत किया है। इनको ‘प्रत्याहार सूत्र’ भी कहा जाता है। ये सूत्र हैं-

1. अ, इ, उ, ण्

2. ऋ, लृ, क्,

3. ए,ओ, ङ्

4. ऐ, औ, च्

5. ह, य, व, र, ट्

6. ल, ण्

7. ञ, म, ङ, ण, न, म्

8. झ, भ, ञ्

9. घ, ढ, ध, ष्

10. ज, ब, ग, ड, द, श्

11. ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, व्

12. क, प, य्

13. श, ष, स, र्

14. ह, ल्

वर्ण के प्रकार-

मूलतः वर्ण दो प्रकार के होते हैं-

(क) स्वर (‘अच्’ प्रत्याहार)
(ख) व्यञ्जन (‘हल्’ प्रत्याहार)

वैदिक संस्कृत में कुल वर्ण या ध्वनियाँ 63 मानी जाती हैं। कुछ विद्वानों ने लृकार को प्लुत भी माना है। यदि लृकार को प्लुत मान लिया जाता है तब वर्णां की संख्या 64 हो जाती है। इसके अनुसार 21 स्वर, 25 स्पर्श व्यंजन, 4 अन्तःस्थ, 4 यम, 4 ऊष्म, 2 जिह्वामूलीय, 2 उपाध्मानीय, 1 विसर्ग, 1 अनुस्वार हैं।

स्वर (कुल संख्या : 21)

अ, आ, आ (३), इ, ई, ई (३), उ, ऊ, ऊ (३), ऋ, ऋ, ॠ (३), ए, ए (2), ओ, ओ (2), ऐ, ऐ (2), औ, औ (2)।

व्यञ्जन (कुल संख्या : 25)

क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म।

अन्तःस्थ (कुल संख्या : 04 ) – य, र, ल, व।

यम (कुल संख्या : 04 ) – कुं, खुं, गुं, घुं।

ऊष्म (कुल संख्या: 04) – श, ष, स, ह।

जिह्वामूलीय (कुल संख्या : 02 ) – कृ, ख।

उपाध्मानीय (कुल संख्या : 02) – प, फ।

द्विः स्पृष्ट (कुल संख्या : 01 ) – लृ ।

योग – 63 + लृ + 64

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