पाषाण काल-प्राचीन भारत का‌ इतिहास

इतिहास में जिस काल के बारे में कोई लिखित साक्ष्य या प्रमाण नहीं मिलता है, उस काल को प्रागैतिहासिक काल कहते हैं। जबकि आद्य-ऐतिहासिक काल में लिपि के साक्ष्य एवं प्रमाण हैं, लेकिन ये साक्ष्य अपठ्य और दुर्बोध होने के कारण उनसे कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। इतिहास में जब से लिखित विवरण मिलते हैं , उस काल को ऐतिहासिक काल कहते है। प्रागैतिहास काल के अंतर्गत पाषाण कालीन सभ्यता आती है , तथा आद्य ऐतिहास काल के अंतर्गत सिंधु घाटी सभ्यता एवं ताम्र सभ्यता जिसमें अहाड़, जोर्वे आदि आती हैं | वैसे तो छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास काल से ऐतिहासिक काल का आरंभ होता है। सर्वप्रथम वर्ष 1863 ईस्वी में भारत में पाषाण कालीन सभ्यता का अनुसंधान खोज प्रारंभ हुआ।

पत्थरो से निर्मित उपकरणों की अधिकता के कारण संपूर्ण पाषाण युगीन संस्कृति को तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया गया है । ये मुख्य चरण इस प्रकार हैं 1.पुरापाषाण काल 2.मध्यपाषाण काल 3. नवपाषाण काल

पुरापाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं

पुरापाषाण काल में पाए गए उपकरणों की भिन्नता के आधार पर पुरापाषाण काल को भी तीन काल खंडो में विभाजित किया जाता है |

  1. पूर्व पुरापाषाण काल में – क्रोड उपकरण व हस्तकुठार, खंडक एवं विदारिणी आदि प्राप्त हुआ है
  2. मध्य पुरापाषाण काल – फलक उपकरण
  3. उच्च पुरापाषाण काल-तक्षिणी एवं खुरचनी उपकरण

सर्वप्रथम पंजाब प्रांत की सोहन नदी घाटी पाकिस्तान से चापर – चापिंग पेबुल संस्कृति के उपकरण प्राप्त हुए हैं ‌। और सर्वप्रथम मद्रास के निकट बदमदुरै तथा अत्तिरमपक्कम नामक स्थान से हैंडऐक्स संस्कृति के उपकरण प्राप्त किए गए हैं । पुरापाषाण काल संस्कृति के अन्य उपकरणों में क्लीवर, स्क्रेपर आदि हैं। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण (Indian Geological Servey) संस्थान के वैज्ञानिक रॉबर्ट ब्रूस फुट जो की ब्रिटिश के भी भूगर्भ वैज्ञानिक और पुरातत्वविद थे, 1863 ईस्वी में रॉबर्ट ब्रूस फुट ने मद्रास के पास पल्लवरम नामक स्थान से सबसे पहला हैंडऐक्स प्राप्त किया था। और रॉबर्ट ब्रूस फुट मित्र विलियम किंग ने अत्तिरमपक्कम नामक स्थान से पूर्व पाषाण काल के उपकरण खोज निकाले। वर्ष 1935 ईस्वी में डी.टेरा के नेतृत्व में एल कैम्ब्रिज अभियान दल ने सोहन घाटी में सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान एवं खोज किए।

जबकि बेलन घाटी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जी. आर. शर्मा के दिशा निर्देशन में अनुसंधान भी किया गया। पूर्व पुरापाषाण काल से संबंधित बेलन घाटी में 44 पुरास्थल प्राप्त हुए हैं। यहां से उपकरणों के अतिरिक्त बेलन घाटी के लोंहदा नाला क्षेत्र से पुरापाषाण काल की अस्थि निर्मित मातृदेवी की एक प्रतिमा भी मिली है | जो की संप्रति कौशाम्बी संग्रहालय में सुरक्षित है।

फलकों की अधिकता के कारण ही मध्य पुरापाषाण काल को फलक संस्कृति भी कहा जाता है। ये उपकरणों का निर्माण मुख्य रूप से क्वार्टजाइट पत्थरों से किया गया है। पुरापाषाण कालीन मानव का जीवन पूर्णरूप से प्राकृतिक था। वे मुख्य रूप से शिकार पर निर्भर रहते थे तथा उनका भोजन मांस अथवा कंदमूल फल हुआ करता था । पुरापाषाण काल के लोग अग्नि के प्रयोग से अपरिचित रहने के कारण वे कच्चा मांस खाते थे। इस युग का मानव शिकारी व खाद्य संग्राहक भी था। पुरापाषाण काल के मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं था।

मध्यपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं

भारत में मध्यपाषाण काल के विषय में जानकारी सर्वप्रथम 1867 ईस्वी – 1868 ईस्वी के मध्य हुई | आर्कीबाल्ड कार्लाइल ने विंध्य क्षेत्र से शैल चित्र Rock Painting को खोज निकाले। मध्यपाषाण काल के विशिष्ट औजार सूक्ष्म पाषाण या पत्थर के बहुत छोटे औजार थे। भारत में मानव अस्थि पंजर सर्वप्रथम मध्यपाषाण काल से ही प्राप्त होने लगता है। गुजरात राज्य में स्थित लंघनाज सबसे महत्वपूर्ण पुरास्थल है। इस स्थान से लघु पाषाणोपकरणों के अतिरिक्त पशुओं की हड्डियां व कब्रिस्तान तथा कुछ मिट्टी के बर्तन भी प्राप्त हुए हैं। लंघनाज से 14 मानव कंकाल भी मिले हैं।

मध्यपाषाण कालीन महदहा जो की प्रतापगढ़, उ. प्र. से हड्डी एवं सीं प्राप्त हुए हैं। पुरातत्ववेत्ता जी.आर. शर्मा ने महदहा के तीन क्षेत्रों का उल्लेख किया है जो इस प्रकार 1.झील क्षेत्र, 2.बूचड़खाना संकुल क्षेत्र 3.कब्रिस्तान निवास क्षेत्र में बंटा था। बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से ही हड्डी एवं सींग से निर्मित उपकरण एवं आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं। इतिहासकार डॉ. जयनारायण पाण्डेय द्वारा लिखित पुस्तक पुरातत्व विमर्श में महदहा, सराय नाहर राय एवं दमदमा तीनों ही स्थलों से हड्डी के उपकरण एवं आभूषण पाए जाने का उल्लेख मिलता है।

दमदमा में किए गए उत्खनन से पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों से कुल मिलाकर 41 मानव शवाधान ज्ञात हुए हैं। इन शवाधानों में से 5 शवाधान ऐसे हैं जो युग्म शवाधान हैं और जबकि एक शवाधान में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए प्राप्त हुए हैं। बाकी शेष शवाधानों में से एक-एक कंकाल मिले हैं। इस प्रकार दमदमा से कुल 48 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं। सराय नाहर राय से ऐसी समाधि मिली है जिसमें चार मानव कंकाल एक साथ दफनाए गए थे। यहां की कब्रें व समाधियां आवास क्षेत्र के अंदर स्थित थीं।ये कब्रें छिछली तथा अंडाकार थीं। विंध्य क्षेत्र के लेखहिया के शिलाश्रय संख्या 1 से मध्यपाषाणिक व लघु पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त 17 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं जिनमें से कुछ सुरक्षित हालत में हैं तथा अधिकांश क्षत-विक्षत अवस्था में हैं। अमेरिका के ओरेगॉन विश्वविद्यालय के जॉन आर. लुकास के अनुसार लेखहिया में कुल 27 मानव कंकालों की अस्थियां मिली हैं। पशुपालन का प्रारंभ मध्यपाषाण काल में हुआ । पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़ जो की होशंगाबाद, म.प्र. तथा बागोर भीलवाड़ा, राजस्थान से प्राप्त हुए हैं। मध्यपाषाण काल के मानव शिकार करके, मछली पकड़कर और खाद्य वस्तुओं का संग्रह कर अपना पेट भरते थे।

नवपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं

मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला का श्रेष्ठ उदाहरण मिलता है। भारत में सर्वाधिक 700 से अधिक से भी शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं | जिनमें से 243 को क्रमांक दिया गया है और इसमें से 133 शिलाश्रयों में चित्रकारी प्राप्त हुई है। यूनेस्को ने भीमबेटका शैल चित्रों को विश्व विरासत की सूची में सम्मिलित किया है। सर्वप्रथम खाद्यान्नों का उत्पादन नवपाषाण काल में प्रारंभ हुआ और नवपाषाण काल में ही गेहूं की कृषि प्रारंभ हुई। नवीनतम खोजों के आधार पर यह पाया गया कि भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव है। लहुरादेव से 9000 ई.पू. से 7000 ई.पू. मध्य के चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए है | और नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित है , और यहां से 7000 ई.पू. के गेहूं के साक्ष्य मिले हैं , जबकि प्राचीनतम धान या चावल के साक्ष्य वाला स्थल कोलडिहवा इलाहाबाद जिले में बेलन नदी के तट पर स्थित है और यहां से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं | चीन के यांग्त्जी नदी घाटी क्षेत्र में लगभग 7000 ई.पू. चावल उगाया गया। मक्का के साक्ष्य लगभग 6000 ई.पू.का प्रथम साक्ष्य मेक्सिको में पाया गया । बाजरा 5500 ई.पू. चीन में व सोरघम 5000 ई.पू. पूर्वी अफ्रीका में व राई 5000 ई. पू. में दक्षिण – पूर्व एशिया में तथा जई 2300 ई. पू. में यूरोप में सर्वप्रथम उगाया गया था। मेहरगढ़ से पाषाण संस्कृति से लेकर हड़प्पा सभ्यता तक के सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं। मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल बुर्जहोम जम्मू-कश्मीर से प्राप्त हुआ है। बुर्जहोम से ही गर्त आवाश के साक्ष्य भी प्राप्त हुआ है | इस पुरास्थल की खोज वर्ष 1935 ईस्वी में डी. टेरा एवं पीटरसन ने की थी । गुफकराल कश्मीर में स्थित एक नवपाषाणिक स्थल है। गुफकराल का शाब्दिक अर्थ होता है – कुलाल अर्थात कुम्हार की गुहा गुफकराल के लोग कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थेचिरांद बिहार राज्य के सारण जिले में स्थित है। चिरांद से नवपाषाणिक अवशेष प्राप्त हुए हैं। चिरांद से हड्डी के अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं। चिरांद से प्राप्त उपकरण हिरण के सींगों से निर्मित हैं। नवपाषाण युगीन दक्षिण भारत में मृतक को दफनाने के स्थल के रूप में बृहत्पाषाण स्मारकों की पहचान की गई है। नवपाषाण कालीन पुरास्थल से राख के टीले कर्नाटक राज्य में मैसूर के पास वेल्लारी जनपद में स्थित संगनकल्लू नामक स्थान से प्राप्त हुए। पिकलीहल और उतनूर आदि स्थलों से भी राख के टीले मिले हैं। ये राख के टीले नवपाषाण युगीन पशुपालक समुदायों के मौसमी शिविरों के जले अवशेष प्रतीत होते हैं। आग का उपयोग नवपाषाण काल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। धातुओं में सबसे पहले तांबे का प्रयोग हुआ था। और इसी चरण में पत्थर एवं तांबे के उपकरणों का साथ-साथ प्रयोग भी जारी रहा। इसी कारण इसे ताम्रपाषाणिक संस्कृति या कैल्कोलिथिक कल्चर भी कहा जाता है। ताम्रपाषाणिक का शाब्दिक अर्थ है – पत्थर एवं तांबे के प्रयोग की अवस्था । भारत में ताम्रपाषाण युग की बस्तियां प्रमुखता दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाई गई हैं।

पाषाण काल-प्राचीन ऐतिहासिक स्थल

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान राज्य में अनेक पुरास्थलों की खुदाई हुई है | ये स्थाल है – अहाड़, बालाथल, बागोर, ओजियाना और गिलुंद है जो राजस्थान राज्य में है। ये प्रमुख पुरास्थल बनास घाटी में स्थित हैं। बनास घाटी में स्थित होने के कारण इस स्थल को बनास संस्कृति भी कहते हैं। अहाड़ का प्राचीन नाम तांबवती है अर्थात तांबा वाली जगह है। गिलुंद बालाथल और ओजियाना में घरों को चाहरदीवारी से घेरा गया है। अहार के निकट गिलुंद में मिट्टी की इमारत बनी है किंतु कहीं-कहीं पर पक्की ईंटें भी लगी हैं। गिलुंद में तांबे के टुकड़े मिले हैं। अहाड़ संस्कृति 2100 ई.पू-1500 ई.पू. अन्य ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों से भिन्न है क्योंकि जहां दूसरे केंद्रों में लाल व काले लेप के मृद्भांड बने मिले हैं वहीं यहां पर इस लेप के ऊपर सफेद रंग से चित्रकारी की गई कृष्ण लोहित मृद्भांड जो की परंपरा विशिष्ट रही है। पश्चिमी मध्य प्रदेश राज्य में मालवा, कायथा, एरण और नवदाटोली आदि प्रमुख स्थल हैं। नवदाटोली, मध्य प्रदेश राज्य का एक महत्वपूर्ण ताम्रपाषाणिक पुरास्थल है, जो की खारगोन जिले में स्थित है। नवदाटोली पुरास्थल का उत्खनन एच.डी. संकालिया ने कराया था। नवदाटोली से मिट्टी, बांस एवं फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं। नवदाटोली के मूल मृद्भांड लाल-काले रंग के हैं, जिन पर ज्यामितीय आरेख भी उत्कीर्ण है। कायथा संस्कृति जो हड़प्पा संस्कृति की कनिष्ठ समकालीन मिलता है, इसके मृदभांडों में कुछ प्राक् हड़प्पा संस्कृति के लक्षण दिखाई देते हैं |और साथ ही इन पर हड़प्पाई प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है। इस संस्कृति की करीब 40 बस्तियां मालवा क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं, जो बहुत छोटी-छोटी हैं। मालवा संस्कृति अपनी मृद्भांडों की उत्कृष्टता के लिए भी जानी जाती है। मध्य प्रदेश राज्य में कायथा और एरण की तथा पश्चिमी महाराष्ट्र राज्य में इनामगांव की बस्तियां किलाबंद हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र के प्रमुख पुरास्थल है-अहमदनगर जिले में स्थित जोर्वे, नेवासा और दैमाबाद है और पुणे जिले में चंदोली, सोनगांव, इनामगांव, प्रकाश और नासिक। ये सभी पुरास्थल जोर्वे संस्कृति 1400 ई.पू.-700 ई.पू.) के हैं। अब तक ज्ञात सभी 200 जोर्वे स्थलों में गोदावरी का दैमाबाद सबसे बड़ा है। यह लगभग 20 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जिसमें लगभग 4000 लोग रह सकते थे। नेवासा जोर्वे संस्कृति स्थल से पटसन का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। टोटीदार पात्र (वर्तन) की परंपरा जोर्वे संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। महाराष्ट्र राज्य की ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति जोर्वे संस्कृति के नेवासादैमाबादचंदोली और इनामगांव आदि पुरास्थलों में मृतकों को अस्थि को कलश में रखकर उत्तर से दक्षिण दिशा में घरों के फर्श के नीचे दफनाए जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। आरंभिक ताम्रपाषाण कालीन अवस्था के इनामगांव स्थल पर चूल्हों सहित बड़े-बड़े कच्ची मिट्टी के मकान और गोलाकार गड्डों वाले मकान मिले हैं। पश्चात की अवस्था 1300 ई.पू.-1000 ई.पू. में पांच कमरों वाला एक मकान मिला है | जिसमें चार कमरे आयताकार हैं और एक वृत्ताकार है | इनामगांव में 130 से अधिक घर और अनेक कब्रें पाई गई हैं। यह बस्ती पूरी तरह से किलाबंद है और खाई से घिरी हुई है।

इनामगांव पुरास्थल में शिल्पी या पंसारी लोग पश्चिम छोर पर रहते थे, जबकि सरदार लोग प्रायः केंद्र स्थल में रहते थे |यहां से अन्नागार भी मिला है। पूर्वी भारत में गंगा तटवर्ती चिरांद, पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के पांडु राजर ढिबि और बीरभूम जिले में महिषदल प्रमुख ताम्रकालीन स्थल हैं। कुछ अन्य पुरास्थल जहां पर खुदाई हुई, वे हैं-बिहार राज्य में सेनुवार, सोनपुर और ताराडीह तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्य में खैराडीह और नरहन। बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश राज्यों में रहने वाले लोग टोटी वाले जलपात्र, गोड़ीदार तस्तरियां और गोड़ीदार कटोरे बनाते थे। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान राज्य व पश्चिमी मध्य प्रदेश व पश्चिमी महाराष्ट्र राज्य और अन्यत्र रहने वाले ताम्रपाषाण युग के लोग मवेशी पालन और कृषि करते थे। वे लोग गाय, भेड़, बकरी और भैंस पालते थे और साथ में हिरण का शिकार भी करते थे। यहा से ऊंट के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। मुख्य अनाज गेहूं और चावल के अतिरिक्त वे लोग बाजरे की भी खेती करते थे। ताम्रपाषाण युग के लोग शिल्प-कर्म में निःसंदेह बड़े दक्ष थे और पत्थर का काम भी अच्छा करते थे। वे लोग कार्नेलियन, स्टेटाइट और क्वार्ट्ज क्रिस्टल जैसे अच्छे पत्थरों से मनके या गुटिकाएं भी बनाते थे। वे लोग कताई और बुनाई भी जानते थे, क्योंकि मालवा में चरखे और तकलियां भी मिली हैं। महाराष्ट्र राज्य में कपास व सन और सेमल की रूई के बने धागे भी मिले हैं। इनामगांव में कुंभकार, धातुकार, हाथी दांत के शिल्पी व चूना बनाने वाले और खिलौने की मिट्टी की मूर्ति टेराकोटा बनाने वाले कारीगर भी दिखाई देते हैं। इनामगांव में मातृ-देवी की प्रतिमा भी मिली है, जो पश्चिमी एशिया में पाई जाने वाली ऐसी प्रतिमा की प्रतिरूप दिखाई देता है। मालवा और राजस्थान में मिली रूढ़ शैली से बनी मिट्टी की वृषभ – मूर्तिकाएं यह सूचित करती हैं कि वृषभ सांड़ धार्मिक पंथ का प्रतीक था। पश्चिमी महाराष्ट्र की चंदोली और नेवासा बस्तियों में भी कुछ बच्चों के गलों में तांबे के मनकों का हार पहनाकर उन्हें दफनाया गया है, जबकि अन्य बच्चों की कब्रों में सामान के तौर पर कुछ बर्तन मात्र पाए जाते हैं। महाराष्ट्र पुरास्थल से पता चलता है कि मृतक को उत्तर-दक्षिण की दिशा में रखा जाता था, लेकिन दक्षिण भारत में पूर्व-पश्चिम की दिशा में पश्चिमी भारत में लगभग संपूर्ण शवाधान एक्सटेंडेड बरिअल प्रचलित था, जबकि पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान फक्शनल रिअल चलता था। सबसे बड़ी निधि मध्य-प्रदेश के गुंगेरिया से प्राप्त हुई है। इसमें 424 तांबे के औजार एवं हथियार तथा 102 चांदी के पतले पत्तर प्राप्त हुआ है। कायथा के एक घर में तांबे के 28 कंगन और दो अद्वितीय ढंग की कुल्हाड़ियां भी पाई गई हैं। इसी स्थान से स्टेटाइट और कार्नेलियन जैसे कीमती पत्थरों की गोलियों के हार पात्रों में जमा पाए गए हैं। जो की गणेश्वर स्थल राजस्थान में खेत्री ताम्र-पट्टी के सीकर-झुंझनू क्षेत्र के तांबे की समृद्ध खानों के निकट पड़ता है। दक्षिण भारत में ब्रह्मगिरि, पिकलीहल, संगलनकल्लू, मस्की, हल्लूर आदि स्थानों से ताम्रपाषाण युगीन बस्तियों के साक्ष्य मिले हैं। दक्षिण भारत में कृषक की अपेक्षा चरवाहा संस्कृति का अधिक प्रमाण मिला है।

अंग्रेजों के शासन काल के समय भारत में सर्वप्रथम 1861 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम को पुरातत्व सर्वेक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था।अंग्रेजों के शासन काल मे 1871 ई. में पुरातत्व सर्वेक्षण को सरकार के एक विभाग के रूप में गठित किया गया था। वर्ष 1901 ईस्वी में लॉर्ड कर्जन के समय में इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रूप में केंद्रीकृत कर जॉन मार्शल को इसका प्रथम महानिदेशक बनाया गया था और वर्ष 1902 ईस्वी में जॉन मार्शल ने कार्यभार ग्रहण किया था ।

पाषाण काल से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न यह है कि रॉबर्ट ब्रूस फुट थे, एक

  • (a) भूगर्भ-वैज्ञानिक
  • (b) पुरावनस्पतिशास्त्री
  • (c) पुरातत्वविद्
  • (d) इतिहासकार

उत्तर -(a) और (c) दोनों

इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार रॉबर्ट ब्रूस फुट एक ब्रिटिश भूगर्भ-वैज्ञानिक और पुरातत्वविद् दोनों ही थे। जियोलॉजिकल सर्वे से संबद्ध रॉबर्ट ब्रूस फुट ने वर्ष 1863 ई. में भारत में पाषाणकालीन बस्तियों के अन्वेषण की शुरुआत की थी। अतः इससे स्पष्ट है कि इस प्रश्न का उत्तर विकल्प (a) और (c) दोनों ही हो सकते हैं।

रॉबर्ट ब्रूस फुट का जन्म- 1834 ई में व मृत्यु – 1912 ई. हुआ , रॉबर्ट ब्रूस फुट एक ब्रिटिश भूगर्भशास्त्री और पुरातत्ववेत्ता थे। उन्हें भारत के प्रागैतिहासिक अध्ययन का संस्थापक भी माना जाता है। 24 वर्ष की उम्र में ही फ्रुट भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग में शामिल हो गए थे। जिसमें वह 33 वर्ष रहे। 1862 ईस्वी में पुरातात्विक सर्वेक्षण की स्थापना के बाद उन्होंने भारत में प्रागैतिहासिक मानव अवशेषों का प्रथम सिलसिलेवार शोध कार्य शुरू किया था और 1863 ईस्वी में यहां हाथ की कुल्हाड़ियों की पहली खोज की थी। उत्खनन- सुविधा के बिना ही सिर्फ़ सतह पर मौजूद अवशेषों और क्षेत्रों के अवलोकन मात्र से वह भारत के प्रागैतिहासिक काल की काफ़ी हद तक सटीक पुनरर्चना कर पाते थे। यूरोपीय समदर्शों के अनुरूप उन्होंने प्रमुख पाषाण सांस्कृतिक कालखंडों को पुरापाषाण, नवपाषाण और लौह युग की संज्ञा दी थी। उनकी कृति कैटेलॉग रेसी 1914 ई. वर्गीकृत सूची और इंडियन प्रिहिस्टॉरिक ऐंड प्रोटोहिस्टॉरिक आर्टिफ़ैक्ट्क 1916 ई.में भारतीय प्रागैतिहासिक काल के बारे में उनके वर्षों के शोध का सार और रूपरेखा है।

प्रश्न यह है कि कोपेनहेगन संग्रहालय की सामग्री से पाषाण, कांस्य और लौह युग का त्रियुगीय विभाजन किया था

  • (a) थॉमसन ने
  • (c) टेलर
  • (b) लुब्बाक ने
  • (d) चाइल्ड ने

उत्तर – ( a ) थॉमसन ने

डेनमार्क के कोपेनहेगन संग्रहालय में 1818 ई. और 1820 ई. में एक आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पाषाण, कांस्य और लौह युग का त्रियुगीय विभाजन क्रिश्चियन जर्गेनसन थॉमसन ने किया था। यद्यपि थॉमसन ने 1836 ई. में इसी वर्गीकरण के अनुसार, संग्रहालय की वस्तुओं का विवरण प्रकाशित भी किया था।

क्रिश्चियन जुर्गेंसन थॉमसन का जन्म 29 दिसंबर 1788 ई. – व मृत्यु 21 मई 1865 ई. हुआ |जुर्गेंसन थॉमसन एक डेनिश पुरातत्ववेत्ता थे , जिन्होंने प्रारंभिक पुरातात्विक तकनीकों और विधियों का विकास किया है |

1816 ई. में जुर्गेंसन थॉमसन को पुरातात्विक संग्रह का प्रमुख नियुक्त किया गया था जो बाद में कोपेनहेगन में डेनमार्क के राष्ट्रीय संग्रहालय के रूप में विकसित हुआ | प्रदर्शनी के लिए पुरावशेषों को व्यवस्थित और वर्गीकृत करते हुए उन्होंने उन्हें तीन-युग प्रणाली के रूप के अनुसार कालानुक्रमिक रूप से प्रस्तुत करने का निर्णय लिया था। अन्य विद्वानों ने पहले प्रस्ताव दिया था कि प्रागैतिहासिक पत्थर के औजारों के युग से आगे बढ़कर कांस्य और लोहे से बने उपकरणों के युग तक पहुंच गए थे । थॉमसन ने तीन आयु प्रणाली को कालानुक्रमिक प्रणाली के रूप में परिष्कृत किया | थॉमसन प्रागैतिहासिक काल को अलग-अलग अवधियों में साक्ष्य-आधारित विभाजन स्थापित करने वाले पहले व्यक्ति थे। इस उपलब्धि के कारण ही उन्हें यूरोपीय पुरातनता की तीन-युग प्रणाली के प्रवर्तक के रूप में श्रेय दिया गया है ।

प्रश्न यह है कि उत्खनित प्रमाणों के अनुसार, पशुपालन का प्रारंभ हुआ था

  • (a) निचले पूर्वपाषाण काल में
  • (b) मध्य पूर्वपाषाण काल में
  • (c) ऊपरी एवं पाषाण काल में
  • (d) मध्यपाषाण काल में

उत्तर- (d) मध्यपाषाण काल में

मध्यपाषाण काल के अंतिम चरण में पशुपालन के साक्ष्य प्राप्त होने लगते हैं। ये पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़, होशंगाबाद, म. प्र. तथा बागोर ,भीलवाड़ा, राजस्थान से मिलते हैं।

प्रश्न यह है कि मध्यपाषाणिक प्रसंग में पशुपालन के प्रमाण जहां मिले, वह स्थान है

  • (a) लंघनाज
  • (b) आदमगढ़
  • (c) बीरभानपुर
  • (d) चोपनी मांडो

उत्तर – (b) आदमगढ़

प्रश्न यह है कि निम्नलिखित से किस स्थल से हड्डी के उपकरण प्राप्त हुए हैं?

  • (a) चोपनी मांडो से
  • (c) महदहा से
  • (b) काकोरिया से
  • (d) सराय नाहर राय से
  • उत्तर-(c&d)

मध्यपाषाण कालीन महदहा जो की उ. प्र. के प्रतापगढ़ जिले में स्थित है यहां से बड़ी मात्रा में हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। इतिहासकार जी. आर. शर्मा महदहा में तीन प्रमुख क्षेत्र का उल्लेख करते हैं, पहला झील क्षेत्र, दुसरा बूचड़खाना संकुल क्षेत्र एवं तीसरा कब्रिस्तान निवास क्षेत्र में बंटा था। जो दुसरा क्षेत्र हैं बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से ही हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण एवं आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं। और सराय नाहर राय नामक स्थान से भी अल्प मात्रा में हड्डी के उपकरण मिले हैं।

प्रश्न यह है कि हड्डी से निर्मित आभूषण भारत में मध्यपाषाण काल के संदर्भ में प्राप्त हुए हैं-

  • (a) सराय नाहर राय से
  • (b) महदहा से
  • (c) लेखहिया से
  • (d) चोपनी मांडो से

उत्तर- (a&b)

प्रश्न यह है एक ही कब्र से तीन मानव कंकाल निकले हैं-

  • (a) सराय नाहर राय से
  • (b) दमदमा से
  • (c) महदहा से
  • (d) लंघनाज से

उत्तर-(b)

मध्य गंगा घाटी के प्रतापगढ़ जिले में स्थित सराय नाहर राय क्षेत्र से महदहा और दमदमा का उत्खनन हुआ है। दमदमा क्षेत्र में लगातार पांच वर्षों तक किए गए उत्खनन के फलस्वरूप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों से कुल मिलाकर 41 की संख्या में मानव शवाधान ज्ञात हुए हैं। इन शवाधानों में से 5 ऐसे शवाधान है जो युग्म शवाधान हैं, और एक शवाधान ऐसा है जहां से 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले हैं। और वही अन्य शेष शवाधानों में से एक-एक कंकाल मिलते हैं।

प्रश्न यह है खाद्यान्नों की कृषि सर्वप्रथम प्रारंभ हुई थी

  • (a) नवपाषाण काल में
  • (b) मध्यपाषाण काल में
  • (c) पुरापाषाण काल में
  • (d) प्रोटोऐतिहासिक काल

उत्तर- (a)

नव पाषाण काल में खाद्यान्नों का उत्पादन सर्वप्रथम हुआ। नवपाषाणकालीन वह समय है, जब मनुष्य कृषि कर्म से परिचित हुआ।

प्रश्न यह है भारत में मानव का सर्वप्रथम साक्ष्य कहां मिलता है ?

  • .(a) नीलगिरि पहाड़ियां
  • (c) नल्लमाला पहाड़ियां
  • (b) शिवालिक पहाड़ियां
  • (d) नर्मदा घाटी

उत्तर- (d)

भारत में मानव का सर्वप्रथम साक्ष्य मध्य प्रदेश राज्य के पश्चिमी नर्मदा क्षेत्र में अवस्थित ‘हथनौरा’ होशंगाबाद नामक पुरास्थल से प्राप्त हुआ। इस स्थान पर खोज पुरातत्वविद् अरुण सोन के द्वारा किया गया था जो कि 5 दिसंबर, 1982 में खोज किया गया था।

प्रश्न यह है प्रथम मानव जीवाश्म भारत की किस नदी घाटी से प्राप्त हुआ था ?

  • (a) गंगा नदी
  • (c) नर्मदा घाटी
  • (b) यमुना घाटी
  • (d) ताप्ती घाटी
  • (e) उपर्युक्त में से कोई नहीं / उपर्युक्त में से एक से अधिक

उत्तर-(c)

प्रश्न यह है कि मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज था-

  • (a) गेहूं
  • (c) जौ
  • (b) चावल
  • (d) बाजरा

उत्तर-(c)

आधुनिक मानव समाज द्वारा इस समय मुख्य रूप से 8 खाद्य अनाजों का उपभोग किया गया है जो कि इस प्रकार है जौ, गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा, सोरघम और राई एवं जई। | प्राचीन काल में अनाजों के पौधे विभिन्न क्षेत्रों में जंगली घास के रूप में विद्यमान थे, जिन्हें बीजों के रूप में अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग समय पर मानव ने उगाया। वैश्विक दृष्टि से देखा जाए तो सर्वप्रथम जौ (Bar- ley) 8000 ई.पू. के आस-पास भूमध्य सागर एवं ईरान के मध्य स्थित पश्चिमी एशिया के देश में मानव द्वारा उगाया गया। बाद में लगभग इन्हीं क्षेत्रों में 8000 ई.पू. के आस-पास ही गेहूं (Wheat) भी उगाया जाने लगा।

12. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं

(a) कोलडिहवा से (c) मेहरगढ़ से(b) लघुरादेव से(d) टोकवा से

उत्तर-(b)|

नवीनतम खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित | लहुरादेव है। यहां से 9000 ई.पू. से 7000 ई.पू. तक के बीच चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। उल्लेखनीय है कि इस नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ | ( पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित; यहां से 7000 ई.पू. के गेहूं के साक्ष्य मिले है), जबकि प्राचीनतम चावल के साक्ष्य वाला स्थल | कोलडिहवा (इलाहाबाद जिले में बेलन नदी के तट पर स्थित; यहां | से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं) माना जाता था। | उपरोक्त संदर्भों में अब यदि विकल्प में लहुरादेव रहता है, तो उपयुक्त विकल्प वही होगा परंतु लहुरादेव के विकल्प में न होने की स्थिति में इसका उत्तर पूर्व की भांति होगा।

13. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं-

(a) ब्रह्मगिरि से(b) बुर्जहोम से(c) कोलडिहवा से(d) मेहरगढ़ से

उत्तर- (d)

14. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य कहां से प्राप्त हुएहै?

(a) लोथल(c) मेहरगढ़उत्तर-(c)15.(b) हड़प्पा (d) मुंडिगाक

उत्तर –

मेंनवपाषाण युग में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र मेंनिम्नलिखित में से किस स्थान पर कृषि के अभ्युदय के प्रारंभिकप्रमाण प्राप्त हुए हैं?(a) मुंडिगाक(b) मेहरगढ़(c) दम्ब सादत (e) अमरी(d) बालाकोटChhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017

कली गुल मोहम्मद से(d) मेहरगढ़ सेपर्युक्त में से कोई नहीं / उपर्युक्त में से एक से अधिक64th B.P.S.C. (Pre) 2018श्न की व्याख्या देखें ।स्थल का नाम बताइए, जहां से प्राचीनतम स्थायी जीवन केमिले हैं?लावीरा(b) किली गुल मोहम्मदकालीबंगा(d) मेहरगढ़U.P.P.C.S. (Spl.) (Mains) 2008विकल्पों में प्राचीनतम स्थायी जीवन के प्रमाण सर्वप्रथम न के कच्छी मैदान स्थित मेहरगढ़ से मिले हैं। जिसकी तिथि सातवीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व (7000 ई.पू.) है। जबकि | मोहम्मद एवं कालीबंगा की प्राचीनतम तिथि क्रमश: 4000 3500 ई.पू. है। अतः विकल्प (d) सही उत्तर है।लेखित में से किन स्थानों से मध्यपाषाण काल में पशुपालनमाण मिलते हैं?औदेगोर(b) बोरी(d) लखनियांU.P.P.C.S. (Pre) 2018पशुपालन केकाल से पशुपालन के साक्ष्य प्राप्त होने लगते हैं।साक्ष्य मध्य प्रदेश में होशंगाबाद के निकट आदमगढ़ पुरास्थलस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित बागोर से मिलते हैं।लिखित में से किसको चालकोलिथिक युग भी कहा जाता है ?पुरापाषाण युगनवपाषाण युगताम्रपाषाण युगलौह युग44th B.P.S.C. (Pre) 2000

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