प्रत्यय – Pratyay

शतृ (अत् ) और शानच् (आन) –

क्रिया में वर्तमानकालिक सातत्य (निरन्तरता) द्योतित करने के लिए दो प्रत्यय लगाये जाते हैं-शतृ (अत्) एवं शानच् (आन)। शतृ-प्रत्यय परस्मैपदी धातुओं से तथा शानच । प्रत्यय लगने के बाद जो पद बनते हैं, उनका रूप विशेष्य प्रत्यय आत्मनेपदी धातुओं से लगाया जाता तीनों लिङ्गों में चलता है, जैसे-

धातुपुंल्लिङ्गस्त्रीलिङ्गनपुंसकलिङ्ग
भूभवन्भवन्तीभवत्
अस्सन्सतीसत्
श्रुश्रृण्वन्शृण्वतीश्रृण्वत्
दृश्पश्यन्पश्यन्तीपश्यत्
नीनयन्नयन्तीनयत्
क्रीक्रीणन्क्रीणतीक्रीणत्
कथ्कथयन्कथयन्तीकथयत्
गम्गच्छन्गच्छन्तीगच्छत्

तुमुन् (तुम) –

जिस क्रिया के लिए कोई क्रिया की जाती है, उस धातु में तुमुन् (तुम्) प्रत्यय लगाते हैं। तुमुन (तुम्) प्रधान-क्रिया तथा तुमुन्-प्रत्ययान्त क्रिया का कर्ता समान (एक ही) होना चाहिए, जैसे-छात्रः पठितुं विद्यालयं गच्छति। सः स्नातुं नदीं गच्छति। अहं भोक्तुं गृहं गच्छामि। वानरः फलं ग्रहीतुं प्रयतते । छात्रः काशीं गन्तुम् इच्छति। सः कथां श्रोतुं मन्दिरं याति ।

क्त्वा (त्वा) और ल्यप् (य) –

समानकर्ता वाली दो क्रियाओं में पहले होने वाली क्रिया पूर्णकालिक क्रिया कहलाती है। लेकर, जाकर, खाकर आदि अर्थ बताने के लिए धातु में क्त्वा (त्वा) प्रत्यय लगता है, जैसे-मोहनः भुक्त्वा विद्यालयं गच्छति। यहाँ जाने तथा खाने का काम एक ही कर्ता मोहन करता है। इन दोनों में खाने की क्रिया पहले होती है, अतः भुज् + क्त्वा (त्वा) = भुक्त्वा रूप बना। इसी प्रकार- पठित्वा, गत्वा, नीत्वा, आदि रूप बनते हैं।

इसी अर्थ में यदि धातु के पूर्व कोई उपसर्ग लगा हो या क्त्वा प्रत्ययान्त शब्द समास में हो रहे हों तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् (य) प्रत्यय लगता है, जैसे-आ+नी+ल्यप् (य) = आनीय।

प्र+दा+ल्यप् (य) = प्रदाय आदि ।

Leave a Comment