पाठ -11राजपूत काल (सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी)Rajput kal

“सम्राट हर्ष की मृत्यु के बाद भारत में एक शक्तिशाली केन्द्रीय शक्ति का अभाव हो गया। केन्द्रीय शक्ति के अभाव में छोटे-छोटे राज्यों का अभ्युदय हुआ। इन सभी राज्यों के संस्थापक प्रायः राजपूत थे। राजपूत सत्ता के लिए आपस में संघर्ष करते रहते थे।

राजपूतों की उत्पत्ति-राजपूत राजवंशों का उदय सातवीं शताब्दी से ही दिखाई देता है। ग्यारहवीं शताब्दी आते-आते उत्तर भारत में कई राजपूत कुल प्रसिद्ध हो जाते हैं जिनमें प्रतिहार, चौहान, परमार, गहड़वाल, चन्देल राजवंश प्रमुख थे ।

प्राचीन भारतीय समाज जो धीरे-धीरे मध्यकालीन समाज में बदला इसका मुख्य कारण था भूमि • अनुदान की प्रथा । वेतन और पारिश्रमिक की जगह, बड़े पैमाने पर भूमि का अनुदान मिलने लगा था। इसमें राजा को यह सुविधा थी कि करों की वसूली करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने का भार अनुदान प्राप्त करने वालों के ऊपर चला जाता था, परन्तु इससे राजा की शक्ति बहुत ही घटने लगी। ऐसे-ऐसे क्षेत्र बन गए जो राजा के नियन्त्रण से दूर थे। इन सबके फलस्वरूप राजा के अधिकार क्षेत्र को हड़पते हुए भूस्वामी उदित हुए। ये अपने को राजपूत कहते थे ।

राजपूत राजपूत संस्कृत शब्द ‘राजपुत्र’ का बिगड़ा हुआ रूप है। यह शब्द राजकुमार या राजवंश का सूचक था। धीरे-धीरे क्षत्रिय वर्ग राजपूत नाम से प्रसिद्ध हो गया।

प्रमुख राजवंश

प्रतिहार वंश (उज्जैन)- इस वंश को गुर्जर प्रतिहार वंश भी कहते हैं। इस वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक नागभट्ट प्रथम था, इन्होंने प्रतिहारों का राज्य विस्तार किया साथ ही साथ अरबों को सिंध से आगे बढ़ने से रोक दिया । प्रतिहार शासक महेन्द्र पाल के दरबार में सुप्रसिद्ध रचनाकार राजशेखर निवास करते थे।

IMG 20240303 092919 पाठ -11राजपूत काल (सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी)Rajput kal

गहड़वाल वंश

(कन्नौज) – इस वंश के संस्थापक चन्द्रदेव थे। गहड़वालों ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया जबकि काशी इनकी दूसरी राजधानी थी। इस वंश के शासक गोविंद चन्द ने अनेक तुर्क आक्रमण को विफल कर दिया, इस वंश का अन्तिम शासक जयचन्द था जिसे मोहम्मद गोरी ने चंदावर के युद्ध में पराजित किया।

IMG 20240303 093006 पाठ -11राजपूत काल (सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी)Rajput kal

चौहान (चाहमान) वंश (अजमेर – दिल्ली)

इस वंश की स्थापना वसुदेव ने की थी। प्रारम्भ में ये अजमेर से शासन करते थे। बाद में दिल्ली को इन्होंने अपनी राजधानी बनाया। इसी के साथ दिल्ली भारत में सत्ता का केन्द्र बन गई। इस वंश का सबसे प्रतापी शासक पृथ्वीराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय) था। पृथ्वीराज चौहान ने तराइन के प्रथम युद्ध 1191 ई0 में मोहम्मद गोरी को पराजित किया था।


चन्देल वंश (बुन्देलखण्ड)- चन्देलवंश के संस्थापक नन्नुक थे । चन्देल शासकों ने विश्वप्रसिद्ध खजुराहों के मन्दिरों का निर्माण करवाया था।

IMG 20240303 093802 पाठ -11राजपूत काल (सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी)Rajput kal


परमार वंश (मालवा)- इस वंश की स्थापना उपेन्द्र ने मालवा क्षेत्र में की थी। इस वंश के प्रमुख शासक मुंज (973 ई0 से 995 ई0) तथा राजाभोज (1017 ई0 से 10608 थे। 1305 ई0 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा जीत लिया।


पाल वंश (बंगाल)- जिस समय उत्तर भारत में राजपूत शासकों का राज्य स्थापित हो रहा था उसी समय गोपाल ने बंगाल में पाल वंश की स्थापना की। गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल शासक बना। धर्मपाल ने सुप्रसिद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की। बारहवीं शताब्दी के अन्त में पाल वंश का अन्त हो गया और बंगाल में सेनवंश सत्ता में आया ।

IMG 20240303 093845 पाठ -11राजपूत काल (सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी)Rajput kal

राजपूत कालीन समाज

शासन व्यवस्था-इस समय से सामन्ती व्यवस्था की शुरुआत होने लगी जिसमें सामन्त राजा प्रत्येक वर्ष एक निश्चित आय अधिपति को देते थे।
गाँवों में ग्राम पंचायतें होती थीं। उन ग्राम पंचायतों पर शासन का कोई हस्तक्षेप नहीं था। मौर्यों के समय में उत्पन्न हुई पंचायती राज व्यवस्था अभी भी कायम थी। इस प्रकार राजनीतिक उथल-पुथल का गाँवों पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता था ।


सामाजिक व्यवस्था-राजपूत काल में समाज में योद्धा तथा शासक वर्ग मुख्य थे। राजपूतों में साहस, आत्मसम्मान तथा आतिथ्य का भाव था । प्राण जाए पर वचन न जाए जैसे आन/शान की सोच विकसित हुई और उनकी गुण-गाथाएँ भी गाई जाने लगीं ।

ब्राह्मणों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। धनी लोग कीमती वस्त्र और आभूषण पहना करते थे। जन साधारण की वेशभूषा साधारण थी। बाल विवाह तथा सती प्रथा का प्रचलन हो गया था। विधवा विवाह वर्जित था। महिलाओं को सामान्य अधिकार प्राप्त थे और महिलाओं को सम्पति का अधिकार भी दिया गया। इस समय वर्ण व्यवस्था कठोर हो गई थी। जिसके कारण लोगों की मानसिक सोच संकुचित हो चुकी थी।

कला-

राजपूत शासक लड़ाई में व्यस्त रहने के साथ ही कला एवं
साहित्य में भी रुचि रखते थे, इन्होंने प्रतिष्ठा सूचक भव्य दुर्ग, राजभवन तथा मन्दिरों का निर्माण करवाया, जिनको देखने के लिए आज भी हजारों विदेशी पर्यटक आते हैं।
उत्तरी भारत के राजाओं ने कई भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया। जैसे-भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर ।

चन्देल-चन्देल राजाओं ने शिव, विष्णु तथा जैन तीर्थंकरों को समर्पित कई मन्दिर बनवाए जिसमें खजुराहो का कन्दरिया महादेव मन्दिर अपनी बनावट के लिए अति प्रसिद्ध है। ये सभी मन्दिर पीले रंग के बलुआ पत्थरों के बने हैं। इन मन्दिरों में आज भी सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जाते हैं ।


कोणार्क का सूर्य मन्दिर गंग वंश के नरसिम्हा प्रथम के द्वारा बनवाया गया। यह मन्दिर एक रथ के आकार का है जिसमें बारह पहिए हैं तथा सात घोड़े इस रथ को खींचते हुए दर्शाए गए हैं।
मन्दिरों का व्यय चलाने के लिए उच्च वर्ग के लोग सोना, चाँदी, कीमती पत्थर, मोती इत्यादि दान में देते थे। इन मन्दिरों की विशेषता यह थी कि ये धन-धान्य से परिपूर्ण थे ।

शिक्षा एवं साहित्य

राजपूत शासकों के समय में आश्रमों, पाठशालाओं एवं विश्वविद्यालयों में शिक्षा दी जाती थी। इस समय नालन्दा, विक्रमशिला, उज्जयिनी, कन्नौज, काशी, धारानगरी प्रमुख शिक्षा केन्द्र थे।

इसी काल में नाटक, काव्य एवं ग्रन्थ लिखे गए जैसे- राजशेखर की बाल रामायण, भारवि का किरातार्जुनीयम, माघ का शिशुपाल वध (नाटक), कल्हण की राजतरंगिणी (ऐतिहासिक ग्रन्थ), जयदेव का गीत गोविन्द (काव्य) संस्कृत भाषा में लिखे गए। इसी काल में क्षेत्रीय भाषाओं जैसे- हिन्दी, बंगाली, मराठी, उड़िया, गुजराती आदि में भी ग्रन्थ लिखे गए। उदाहरणतः चन्दबरदाई की पृथ्वीराज रासो का वीर गाथा काव्य हिन्दी में लिखा गया है

मन्दिर निर्माण

मोटे तौर पर मन्दिर निर्माण की दो शैलियाँ
उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय । उत्तर भारतीय शैली को नागर एवं दक्षिण भारतीय शैली को द्रविड शैली कहते हैं। इनमें भेद मुख्यतः मन्दिर के शिखर के आकार में देखा जाता है। उत्तर भारतीय शिखरों का आकार टेढ़ी रेखाओं से घिरी हुई ठोस मीनार की भाँति रहता था। मध्य में खुला हुआ तथा ऊपर एक बिन्दु पर आकर समाप्त हो जाता था। उदाहरणतः लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर ।


दक्षिण भारतीय शिखर पिरामिड की तरह दिखते थे जिसमें कई खण्ड होते थे। प्रत्येक खण्ड क्रमशः ऊपर की ओर अपने नीचे वाले खण्ड से छोटा होता जाता था, और सबसे ऊपर जाकर छोटा तथा गोलाकार हो जाता था। दक्षिण भारत के मन्दिरों में स्तम्भों का मुख्य स्थान है जबकि उत्तर भारत के मन्दिरों में इनका सर्वथा अभाव दिखाई देता है।
मन्दिरों को बनाने के लिए कारीगर पत्थर को जमाने के लिए चूने व गारे का घोल इस्तेमाल नहीं करते थे। इस विधि के बगैर ही वे बड़े-बड़े पत्थरों को एक के ऊपर एक चढ़ाते जाते थे जिससे वे वर्षों तक टिके रहें। ये पत्थर एक-दूसरे के भार से ही सैकड़ों साल तक टिके हुए हैं।


इसे भी जानिए

बंगाल का सेन वंश
सामन्त सेन ने 'सेन वंश' की स्थापना की । बल्लाल सेन, लक्ष्मण सेन इस वंश के अन्य प्रमुख शासक थे। सेन शासनकाल में संस्कृत साहित्य का अधिक विकास हुआ। इसी काल
में जयदेव ने प्रसिद्ध 'गीत गोविन्द' की रचना की ।

अभ्यास

1.खजुराहो के मन्दिर किस वंश के शासकों ने बनवाए थे ?

खजुराहो का मंदिर चंदेल वंश के शासको ने बनवाए थे।

2. नरसिम्हा प्रथम ने कौन सा मन्दिर बनवाया था ?

नरसिम्हा प्रथम ने कोणार्क का सूर्य मंदिर बनवाया था।

3.चंदावर का युद्ध किनके बीच लड़ा गया ?

चंदावर का युद्ध मोहम्मद गोरी और जयचन्द के बीच लड़ा गया।

4.राजपूत काल में शिक्षा के मुख्य केन्द्र कौन-कौन से थे ?

राजपूत काल में शिक्षा के मुख्य केंद्र नालंदा विक्रमशिला, उज्जयिनी कन्नौज काशी, धारानगरी, थे

5.उत्तर भारत में राजपूतों के राजनैतिक महत्व का उल्लेख कीजिए ।

इस समय से सामन्ती व्यवस्था की शुरुआत होने लगी और गाँवों में ग्राम पंचायतें होती थीं। उन ग्राम पंचायतों पर शासन का कोई हस्तक्षेप नहीं था।

6.राजपूत कालीन सामाजिक व्यवस्था का वर्णन करें।

राजपूत काल में समाज में योद्धा तथा शासक वर्ग मुख्य थे। राजपूतों में साहस, आत्मसम्मान तथा आतिथ्य का भाव था ।

7.भवन निर्माण की उत्तर भारतीय तथा दक्षिण भारतीय शैली के बारे में लिखिए ।

मन्दिर निर्माण की दो शैलियाँ थी।उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय । उत्तर भारतीय शैली को नागर एवं दक्षिण भारतीय शैली को द्रविड शैली कहते हैं। इनमें भेद मुख्यतः मन्दिर के शिखर के आकार में देखा जाता है। उत्तर भारतीय शिखरों का आकार टेढ़ी रेखाओं से घिरी हुई ठोस मीनार की भाँति रहता था।

8.निम्नलिखित रचनाओं के लेखकों के नाम लिखिए ।

पुस्तकों के नामलेखको के नाम
किरातर्जुनीयमभारवि
शिशुपाल वधमाघ
राजतरंगिणीकल्हण
बालरामायणराजशेखर
गीत गोविन्द जयदेव
पाठ 8 मौर्योत्तर काल में भारत की स्थिति व विदेशियों से संपर्क
पाठ 9 गुप्तकाल
पाठ 10 पुष्यभूति वंश

Leave a Comment