रस – Ras in hindi

रस का अर्थ


रस का शाब्दिक अर्थ आनन्द है। संस्कृत में वर्णन आया है-‘रस्यते आस्वाद्यते इति रस: अर्थात् जिसका आस्वादन किया जाए, वह रस है, किन्तु साहित्यशास्त्र में काव्यानन्द अथवा काव्यास्वाद के लिए रस शब्द प्रयुक्त होता है।
काव्य को पढ़ने, सुनने अथवा नाटक देखने से सहृदय पाठक, श्रोता अथवा दर्शक को प्राप्त होने वाला विशेष आनन्द रस कहलाता है। कहानी, उपन्यास, कविता, फिल्म आदि को पढ़ने, सुनने अथवा देखने के क्रम में उसके पात्रों के साथ स्थापित होने वाली आत्मीयता के कारण काव्यानुभूति एवं काव्यानन्द व्यक्तिगत संकीर्णता से मुक्त होता है। काव्य का रस सामान्य जीवन में प्राप्त होने वाले आनन्द से इसी अर्थ में भिन्न भी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने व्यक्तिगत संकीर्णता से मुक्त अनुभव को ‘हृदय की मुक्तावस्था’ कहा है।


परिभाषा


रस के अवयव


भरतमुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ में लिखा है-‘विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद्रस निष्पत्तिः’ अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इनमें स्थायी भाव स्वतः ही अन्तर्निहित है, क्योंकि स्थायी भाव ही विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी (संचारी) भाव के संयोग से रस दशा को प्राप्त होता है। इस प्रकार रस के चार अवयव अथवा अंग हैं।

  1. स्थायी भाव
    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे परिभाषित करते हुए लिखा है-‘प्रधान (स्थायी) भाव वहीं कहा जा सकता है, जो रस की अवस्था तक पहुँचे।’
    स्थायी भाव ग्यारह माने गए हैं-रति (स्त्री-पुरुष का प्रेम), हास (हँसी), शोक (दुःख), क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा (घृणा), विस्मय (आश्चर्य), निर्वेद (वैराग्य या शान्ति) तथा वात्सल्य (छोटों के प्रति प्रेम), भगवद् विषयक रति (अनुराग)।

  1. विभाव
    विभाव से अभिप्राय उन वस्तुओं एवं विषयों के वर्णन से है, जिनके प्रति सहृदय के मन में किसी प्रकार का भाव या संवेदना होती है अर्थात् भाव के जो कारण होते हैं, उन्हें विभाव कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि विभाव स्थायी भाव के उद्बोधक (जन्म देने वाले) कारण होते हैं। विभाव दो प्रकार के होते हैं-आलम्बन एवं उद्दीपन
  2. (i)आलम्बन विभाव जिन व्यक्तियों या पात्रों के आलम्बन (सहारे) से स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं, वे आलम्बन विभाव कहलाते है; जैसे-नायक-नायिका ।
    आलम्बन के भी दो प्रकार हैं।
  • आश्रय
  • जिस व्यक्ति के मन में रति आदि विभिन्न भाव उत्पन्न होते हैं, उन्हेंआश्रय कहते हैं।
  • विषय
  • जिस वस्तु या व्यक्ति के लिए आश्रय के मन में भाव उत्पन्न होते हैं, उन्हें विषय कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि राम के मन में सीता के प्रति रति का भाव जाग्रत होता है, तो राम आश्रय होंगे और सीता विषय।
    (ii) उद्दीपन विभाव
  • आश्रय के मन में भाव को उद्दीप्त करने वाले विषय की बाहरी चेष्टाओं और बाह्य वातावरण को उद्दीपन विभाव कहते हैं; जैसे-दुष्यन्त शिकार खेलते हुए कण्व के आश्रम में पहुँच जाते हैं। वहाँ वे शकुन्तला को देखते हैं।
  • शकुन्तला को देखकर दुष्यन्त के मन में आकर्षण या रति भाव उत्पन्न होता है। उस समय शकुन्तला की शारीरिक चेष्टाएँ दुष्यन्त के मन में रति भाव को और अधिक तीव्र करती हैं। इस प्रकार, विषय (नायिका शकुन्तला) की शारीरिक चेष्टाएँ तथा अनुकूल वातावरण को उद्दीपन विभाव कहा जाएगा।
  • अनुभाव
    आन्तरिक मनोभावों को बाहर प्रकट करने वाली शारीरिक चेष्टा अनुभाव कहलाती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अनुभाव आश्रय के शारीरिक विकार हैं। अनुभाव चार प्रकार के होते हैं-सात्विक, कायिक, वाचिक एवं आहार्य ।
    (i) सात्विक जो अनुभाव मन में आए भाव के कारण स्वतः प्रकट हो जाते हैं, वे सात्विक हैं; जैसे-पसीना आना, रोएँ खड़े होना, कँपकँपी लगना, मुँह फीका पड़ना आदि। सामान्यतः आठ प्रकार के सात्विक अनुभाव माने जाते हैं- स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कम्प, विवर्णता, स्तम्भ, अश्रु और प्रलाप ।
  • (ii) कायिक शरीर में होने वाले अनुभाव कायिक हैं; जैसे-किसी को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाना, चितवन से अपने प्रेमी को झाँकना आदि।
    (iii) वाचिक किसी प्रसंग विशेष
    वशीभूत होकर नायक अथवा नायिका (प्रेम-पात्र) द्वारा वाणी के माध्यम से अभिव्यक्ति, वाचिक अनुभाव है।
  • (iv) आहार्य नांयक-नायिका या अन्य पात्रों के द्वारा वेश-भूषा के माध्यम से भाव-प्रदर्शित करना आहार्य कहलाता है।
  • संचारी अथवा व्यभिचारी भाव
    स्थायी भाव के साथ आते-जाते रहने वाले अन्य भावों को अर्थात् मन के चंचल विकारों को संचारी भाव कहते हैं। संचारी भावों को व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है। यह भी आश्रय के मन में उत्पन्न होता है। एक ही संचारी भाव कई रसों के साथ हो सकता है। वह पानी के बुलबुले की तरह उठता और शान्त होता रहता है। उदाहरण के लिए; शकुन्तला के प्रति रति भाव के कारण उसे देखकर दुष्यन्त के मन में मोह, हर्ष, आवेग आदि जो भाव उत्पन्न होंगे, उन्हें संचारी भाव कहेंगे।
  • संचारी भावों की संख्या तैंतीस बताई गई है। इनमें से मुख्य संचारी भाव हैं-शंका, निद्रा, मद, आलस्य, दीनता, चिन्ता, मोह, स्मृति, धैर्य, लज्जा, चपलता, आवेग, हर्ष, गर्व, विषाद, उत्सुकता, उग्रता, त्रास आदि।
    स्थायी भाव तथा संचारी भावों में पारस्परिक सम्बन्ध
  • रस, स्थायी भाव तथा संचारी भावों के परस्पर सम्बन्ध को इस प्रकार प्रदर्शित किया जा सकता है।

रसस्थायी भावसंचारी भाव
श्रृंगार रतिस्मृति, चिन्ता , हर्ष, मोह इत्यादि।
हास्यहासहर्ष,निद्रा, आलस्य, चपलता इत्यादि।
करूणशोकग्लानि, शंका, चिंता, दीनता इत्यादि।
रौद्रक्रोधउग्रता, शंका, स्मृति इत्यादि।
वीरउत्साहआवेग, हर्ष, गर्व इत्यादि।
भयानकभयत्रास , ग्लानि, शंका, चिंता इत्यादि।
वीभत्सजुगुप्सादीनता, निर्वेद , ग्लानि इत्यादि।
अद्भुतविस्मयहर्ष, स्मृति, आवेग, शंका इत्यादि।
शांतनिर्वेदहर्ष, स्मृति, धृति इत्यादि।
वात्सल्यवत्सलचिंता, शंका, हर्ष, स्मृति इत्यादि।
भक्तिभगवत्निर्वेद, हर्ष, वितर्क, मति इत्यादि।

रस के भेद


रस के मुख्यतः दस (10) भेद होते हैं। हम रस के सभी भेदों को इस प्रकार स्मरणरख सकते हैं-


श्रृंगार-हास्य-करुण-वीर-रौद्र-भयानकः
‘वीभत्साद्द्भुत शान्ताश्च वात्सल्यश्च रसा दश।’


1.श्रृंगार रस


श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति (प्रेम) है। रति का सामान्य अर्थ है-प्रीति, किसी मनोनुकूल प्रिय व्यक्ति की ओर मन का झुकाव या लगाव। जब नायक-नायिका के मन में एक-दूसरे के प्रति प्रीति उत्पन्न होकर विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के योग उ से स्थायी भाव रति जाग्रत हो तो ‘श्रृंगार रस’ कहलाता है। इसके अन्तर्गत पति-पत्नी अथवा नायक-नायिका का वर्णन होता है। इसमें पर-पुरुष या पर-नारी के प्रेम-वर्णन का निषेध होता है। श्रृंगार रस के अवयव इस प्रकार हैं-


श्रृंगार रस के दो भेद हैं


(i) संयोग श्रृंगार

संयोग श्रृंगार मिलन या संयोग की अवस्था में जब नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन किया जाए तो वहाँ संयोग श्रृंगार होता है।

“दूलह श्रीरघुनाथ बने दुलही सिय सुन्दरी मन्दिर माहीं।
गावति गीत सबै मिलि सुन्दरि बेद जुवा जुरि बिप्र पढ़ाहीं।।
राम को रूप निहारति जानकि कंकन के नग की परछाहीं। यातें सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही, पल टारत नाहीं।।”

स्पष्टीकरण


उक्त पद में स्थायी भाव रति है। विषय राम और आश्रय सीता हैं। उद्दीपन है-राम का नग में पड़ने वाला प्रतिबिम्ब, अनुभाव है- नग में राम के प्रतिबिम्ब का अवलोकन करना, हाथ टेकना तथा संचारी भाव है- हर्ष एवं जड़ता। इस प्रकार यहाँ ‘संयोग श्रृंगार’ है।


(ii) वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार

वियोग अथवा एक-दूसरे से दूर रहने की स्थिति में जब नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन किया जाता है, तब उसे वियोग श्रृंगार कहते हैं।

उदाहरण “मैं निज अलिन्द में खड़ी थी सखि एक रात
रिमझिम बूँदें पड़ती थीं घटा छाई थी।
गमक रही थी केतकी की गन्ध चारों ओर झिल्ली झनकार यही मेरे मन भाई थी। करने लगी मैं अनुकरण स्वनूपुरों से चंचला थी चमकी घनाली घहराई थी। चौंक देखा मैंने चुप कोने में खड़े थे प्रिय,
माई मुखलज्जा उसी छाती में छिपाई थी।”

स्पष्टीकरण


इस पद में स्थायी भाव रति है। आलम्बन है- उर्मिला। उद्दीपन हैं- घटा, बूँदें, फूल की गन्ध और झिल्लियों की झनकार। अनुभाव है- छाती में मुख को छिपाना और संचारी भाव हैं- हर्ष, लज्जा एवं स्मृति। अतः यहाँ ‘वियोग’ अथवा ‘विप्रलम्भ’ श्रृंगार है।

2.हास्य रस


जब किसी (वस्तु अथवा व्यक्ति) की वेशभूषा, वाणी, चेष्टा, आकार इत्यादि में आई विकृति को देखकर सहज हँसी आ जाए तब वहाँ हास्य रस होता है।हास्य रस की अवयव किस प्रकार हैं

स्थाई भावहास
आलंबनविपरीत वस्तु अथवा व्यक्ति
उद्दीपनआलंबन की अनोखी आकृति, चेष्टाएं बातचीत इत्यादि
अनुभाव आश्रय की मुस्कान, आंखों का मिचमिचाना तथा अट्टहास करना
संचारी भावहर्ष, निद्रा , आलस्य, चपलता, भ्रम, कंपन इत्यादि

स्पष्टीकरण


उक्त पद्यांश में विन्ध्य क्षेत्र में पहुँचे श्रीराम के चरण स्पर्श से पत्थर को सुन्दर नारी में परिवर्तित होते जान वहाँ विद्यमान नारियों से दूर रहने वाले तपस्वीगण के प्रसन्न होने का वर्णन है। इस पद्यांश में स्थायी भाव हास है। आलम्बन है- राम और उद्दीपन है- गौतम ऋषि की पत्नी का उद्धार। अनुभाव है- मुनियों की कथा आदि सुनाना और संचारी भाव हैं- हर्ष चंचलता एवं उत्सुकता यहां हास्य रस है।

करूण रस

प्रिय या मनचाही वस्तु के नष्ट होने या उसका कोई अनिष्ट होने पर हृदय शोक से भर जाए, तब ‘करुण रस’ जाग्रत होता है। इसमें विभाव, अनुभाव व संचारी भावों के मेल से शोक नामक स्थायी भाव का जन्म होता है। इसके अवयव इस प्रकार हैं-

स्थाई भाव शोक
आलंबनविनष्ट वस्तु अथवा व्यक्ति
उद्दीपनआलंबन का दाहकर्म, इष्ट की विशेषताओं का उल्लेख उसके चित्र एवं उससे संबंधित वस्तुओं का वर्णन
अनुभावरूदन, प्रलाप, कम्प , मूर्छा, नि:श्वास,छाती पीटना, भूमि पर गिरना, दैविनिंदा इत्यादि
संचारी भावनिर्वेद, व्याधि, चिंता, स्मृति, मोह, अपस्मार, विषाद, दैन्य, उन्माद, श्रम इत्यादि

उदाहरण “जो भूरि भाग्य भरी विदित थी अनुपमेय सुहागिनी,
हे हृदय बल्लभ! हूँ वही अब मैं यहाँ हत भागिनी।
जो साथिनी होकर तुम्हारी थी अतीव सनाथिनी,
है अब उसी मुझसी जगत् में और कोई अनाथिनी।।”

स्पष्टीकरण


यहाँ स्थायी भाव शोक है। आलम्बन के अन्तर्गत विषय है-अभिमन्यु का शव तथा आश्रय है-उत्तरा। उत्तरा के द्वारा अभिमन्यु की वीरता की स्मृति उद्दीपन है और अनुभाव है-उसका चित्कार करना। संचारी भाव है-स्मृति, चिन्ता, दैन्य इत्यादि। ‘अतः यहाँ ‘करुण रस’ है।

वीर रस


युद्ध करने के लिए अथवा नीति, धर्म आदि की दुर्दशा को मिटाने जैसे कठिन कार्यों के लिए मन में उत्पन्न होने वाले उत्साह से वीर रस की उत्पत्ति होती है। वीर रस के अवयव निम्नलिखित हैं-

स्थायी भाव उत्साह
आलंबन शत्रु
उद्दीपन शत्रु की शक्ति, अहंकार, रणवाद्य, यश की चाह, याचक का आत्तरनाद इत्यादि
अनुभाव प्रहार करना, र्गव उक्ति रोमांच कम्प, धर्मानुकूल आचरण करना इत्यादि
संचारी भाव हर्ष, उत्सुकता, र्गव, चपलता, आवेग, उग्रता, मति, धृति, स्मृति, आसूया इत्यादि

उदाहरण “चढ़त तुरंग, चतुरंग साजि सिवराज, चढ़त प्रताप दिन-दिन अति जंग में।
भूषण चढ़त मरहट्अन के चित्त चाव, खग्ग खुली चढ़त है अरिन के अंग में। भौंसला के हाथ गढ़ कोट हैं चढ़त,
अरि जोट है चढ़त एक मेरू गिरिसंग में। तुरकान गम व्योमयान है चढ़त बिनु
मन है चढ़त बदरंग अवरंग में।।”

स्पष्टीकरण

उक्त पद्यांश में स्थायी भाव है- उत्साह। औरंगजेब और तुरक आलम्बन विभाव हैं, जबकि शत्रु का भाग जाना, मर जाना उद्दीपन विभाव हैं। घोड़ों का चढ़ना, सेना सजाना, तलवार चलाना आदि अनुभाव हैं। उग्रता, क्रोध, चाव, हर्ष, उत्साह इत्यादि संचारी भाव हैं। अतः यहाँ ‘वीर रस’ का निष्पादन हुआ है।

5. रौद्र रस

विरोधी पक्ष की ओर से व्यक्ति, समाज, धर्म अथवा राष्ट्र की निन्दा या अपमान करने पर मन में उत्पन्न होने वाले क्रोध से रौद्र रस की उत्पत्ति होती है। इसके अवयव निम्नलिखित हैं-

स्थायी भावक्रोध
आलंबनविरोधी, अनुचित बात कहने वाला व्यक्ति
उद्दीपनविरोधियों के कार्य एवं वचन
अनुभावशस्त्र चलाना, भौंहें चढ़ाना, तथा दांत पीसना, मुख लाल करना, गर्जन, आत्म प्रशंसा, कम्प, प्रस्वेद इत्यादि
संचारी भावउग्रता, अमर्ष, आवेग, उद्वेग, मद, मोह, आसूया, स्मृति इत्यादि
उदाहरण

“उस कॉल मारे क्रोध के तनु का आपने उनका लगा। मानो हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।”

स्पष्टीकरण

इस काव्यांश में स्थाई भाव है-क्रोध एवं अभिमन्यु को मारने वाला जयद्रथ आलंबन है। अकेले बालक अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसा कर सात महारथियों द्वारा आक्रमण करना उद्दीपन है। शरीर कांपना, क्रोध करना, मुख लाल होना अनुभव है तथा उग्रता सफलता आदि संचारी भाव हैं। अतः यह रौद्र रस का उदाहरण है।

शांत रस

तत्व ज्ञान, संसार की क्षण भंगुरता तथा सांसारिक विषय -भोगों की असारता से उत्पन्न होने वाले वैराग्य से शांत रस की उत्पत्ति होती है।इसके अवयव निम्नलिखित है

स्थायी भावनिर्वेद
आलंबन तत्व ज्ञान का चिन्तन एवं सांसारिक क्षणभंगुरता
उद्दीपनशास्त्रार्थ, तीर्थ यात्रा, सत्संग इत्यादि
अनुभावपूरे शरीर में रोमांच, अश्रु, स्वतंत्रत होना इत्यादि ।
संचारी भाव मति, धृति, हर्ष, स्मृति, निर्वेद, विरोध इत्यादि

उदाहरण “मन मस्त हुआ फिर क्यों डोले? हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार-बार वाको क्यों खोले?”


स्पष्टीकरण


इस पद में स्थायी भाव निर्वेद है, ईश्वर विषय है तथा कवि आश्रय है। ईश्वर भक्ति व सुलभ वातावरण उद्दीपन हैं तथा ईश्वर की भक्ति में लीन होना, धन्यवाद करना, गाना आदि अनुभाव हैं। प्रसन्नता, विस्मय आदि प्रकट करना संचारी भाव हैं। अतः यहाँ ‘शान्त रस’ उपस्थित है।

अद्भुत रस



किसी असाधारण, अलौकिक या आश्चर्यजनक वस्तु, दृश्य या घटना देखने, सुनने से मन का चकित होकर, ‘विस्मय’ स्थायी भाव का प्रादुर्भाव होना ‘अद्भुत रस’ की उत्पत्ति करता है। प्रायः जासूसी, तिलिस्मी, ईश्वर वर्णन आदि से सम्बन्धित साहित्य में अद्भुत रस पाया जाता है। इसके अवयव निम्नलिखित हैं

स्थाई भावविस्मय
आलंबनविस्मय उत्पन्न करने वाली वस्तु या व्यक्ति
उद्दीपनअलौकिक वस्तुओं के दर्शन, श्रवण, कीर्तन इत्यादि
अनुभाव रोमांच, गदगद होना, दांतो तले उंगली दबाना, आंखें फाड़ कर देखना, कांपना आंसू आना इत्यादि
संचारी भावहर्ष, उत्सुकता, मोह, धृति, भ्रांति, आवेग इ
उदाहरण “अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु । “

स्पष्टीकरण

यशोदा श्रीकृष्ण के मुख में समस्त ब्रह्माण्ड को देखकर विस्मित हो जाती हैं। उनके मुख से प्रसन्नता के शब्द निकल पड़ते हैं और उनकी आँखें फैल जाती हैं। इस प्रकार यहाँ स्थायी भाव विस्मय है, आलम्बन है- कृष्ण का मुख एवं आश्रय है- यशोदा। उद्दीपन है- श्रीकृष्ण के मुख के अन्दर का दृश्य। अनुभाव हैं- गद्गद् वचन एवं आँखों का फैलना तथा संचारी भाव हैं- विस्मय, आश्चर्य हर्ष आदि। अतः यहाँ ‘अद्भुत रस’ है।

भयानक रस

किसी बात को सुनने, किसी वस्तु, व्यक्ति को देखने अथवा उसकी कल्पना करने से मन में भय छा जाए, तो उस वर्णन में भयानक रस विद्यमान रहता है।
इसके अवयव निम्नलिखित हैं


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