Ruchi ki arth paribhasha रुचि – रुचि का अर्थ एवं परिभाषा, विशेषताएँ, प्रकार, कारक

रुचि का अर्थ एवं परिभाषाएँ
Meaning and Definitions of Interest


‘रुचि’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘INTEREST’ का हिन्दी समानान्तर शब्द है। Interest की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘INTERESSE’ से हुई है। इसका तात्पर्य है – अन्तर स्थापित करना, महत्त्वपूर्ण होना और लगाव होना ।

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अत: शब्दार्थ के आधार पर हम कह सकते हैं कि रुचि के द्वारा उद्दीपक में भिन्नता, महत्ता और लगाव स्थापित किया जाता है।

हम दैनिक जीवन में पाते हैं कि रुचि व्यक्ति के लिये महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। जब हम किसी व्यक्ति से प्रभावित होते हैं तो कहते हैं कि क्या परिष्कृत रुचि वाला व्यक्ति है?
अतः रुचि का स्वरूप अपने में सक्रियता धारण करके व्यक्ति के विकास में सहयोग देता है। समाज में उसके स्थान को निश्चित करता है एवं व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता है।
अतः हम विभिन्न विद्वानों द्वारा विस्थापित परिभाषाओं को प्रस्तुत करते हैं:-

बी. एन. झा. B.N. Jha के अनुसार, “रुचि वह स्थिर मानसिक विधि है, जो ध्यान क्रिया को सतत् बनाये रखती है ।


Interest is that enduring mental system
which sustains conditions and continues the activity called attention


क्रो एवं क्रो Crow and Crow के शब्दों में, “रुचि वह अनुप्रेरक शक्ति है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की ओर ध्यान देने के लिये बाध्य करती है अथवा ये एक प्रभावात्मक अनुभूति है, जो स्वयं क्रिया द्वारा अनुप्रेरित होती है। दूसरे शब्दों में रुचि’ किसी क्रिया का कारण भी हो सकती है और उस क्रिया में भाग लेने का परिणाम भी हो सकती है।”

उपर्युक्त विद्वानों के मतों का यदि विश्लेषण किया जाय तो निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं:


1.रुचि जन्मजात होती है। कभी-कभी उसे प्रत्यक्षदर्शी बनाने में बाह्य तत्त्वों का योगदान रहता है, इसलिये हम रुचि को अर्जित भी मानते हैं।

2.रुचि मानसिक स्थिति को प्रकट करती है, जो वस्तुओं में भिन्नता स्थापित करती है।

3 रुचि के द्वारा व्यक्ति में सक्रियता उत्पन्न होती है।

4 रुचि के द्वारा ध्यान शक्ति में स्थिरता आती है।

5.रुचि सीखने में सहायक होती है। थकान उत्पन्न नहीं होने देती है। मानसिक शक्तियों में संगठन स्थापित करती है।

6.रुचि मानव में आवश्यकतानुसार बदलती रहती है और व्यक्ति को तरोताजा रखने में सहायक होती है।

रुचि की विशेषताएँ Characteristics of
Interest


रुचि की विशेषताएँ निम्नलिखित प्रकार हैं:-

1.रुचियाँ परिवर्तनशील होती हैं।

रुचियों की प्रकृति स्थायी होती है परन्तु रुचियाँ चाहे स्थायी प्रकृति की हों या अस्थायी प्रकृति की हों, वे परिवर्तित हो जाती हैं। रुचियों का अधिगम और परिवर्तन आयु के साथ-साथ होता रहता है।

ट्यूसन Tution, 1955 ने Kunder preference record की सहायता से 311 छात्र – छात्राओं की रुचियों का अध्ययन किया। इस अध्ययन में 140 लड़के तथा 171 लड़कियाँ थीं। इस माध्यम में यह देखा गया कि 8वीं से 9वीं कक्षा तक एवं 11वीं से 12वीं. कक्षा में रुचियों में कितना परिवर्तन होता है? अध्ययन के परिणाम इस प्रकार थे कि 35% ,रुचियाँ परिवर्तित हो जाती हैं।

2.रुचियाँ व्यक्ति एवं उसके पर्यावरण की अन्तःक्रिया के फलस्वरूप विकसित होती हैं।

रुचियों को व्यक्ति और उसके वातावरण के अनेक कारक प्रभावित करते हैं। डार्ले Darley, 1955 ने एक अध्ययन किया, जिसके अनुसार रुचियों के अनुभव किशोरावस्था में कम प्रभावित होते हैं, जबकि जीवन के प्रारम्भिक काल के अनुभव रुचियों को अधिक प्रभावित करते हैं।

3.रुचियाँ सामाजिक स्थिति, सामाजिक एवं आर्थिक स्तर से प्रभावित होती हैं।

एक अध्ययन में यह पाया गया कि मध्यमवर्गीय तथा उच्चवर्गीय लोगों की Inventoried रुचियाँ उनके व्यवसाय की अच्छी भविष्यवाणी करती हैं।

4.रुचियों के निर्धारण में प्रेरकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

स्ट्रॉंग Strong, 1943 ने अपने अध्ययन के आधर पर यह स्थिर किया कि रुचियों के निर्धारण में अभिप्रेरणा, योग्यता, पुरस्कार तथा सन्तुष्टि आदि की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

5.रुचियों का निर्धारण व्यक्तित्व के विकास से होता है।

रुचियों का निर्धारण अभिक्षमता से न होकर व्यक्तित्व के विकास से होता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आवश्यकता, प्रतिष्ठा, मूल्य तथा समझ आदि कारक रुचियों का निर्धारण करते हैं।

6..रुचियों पर यौन कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।

रुचियाँ यौन कारकों से भी प्रभावित होती हैं। रुचियों के निर्धारण में लड़कियों तथा लड़कों में भिन्नता पायी जाती है। दोनों की रुचियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं।

रुचि के प्रकार Types of Interest

विभिन्न विद्वानों ने रुचि को दो भागों में विभाजित किया है,

1.जन्मजात रुचि Inborn interest

जन्मजात रूचियाँ मूल प्रवृत्तियों पर आधारित होती हैं। इनको व्यक्ति की आवश्यकताओं के साथ भी जोड़ा जाता है। बालक खेलने में और भोजन में, माँ अपनी सन्तान में, व्यक्ति अपने सम्मान में मान रहता है।

यही रुचियों के रूप में परिवर्तित होते रहते हैं। अत: जब बालक मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्धित व्यवहारों में अपनी रुचि प्रकट करता है तो उसे जन्मजात रुचि माना जाता है।

2.अर्जित रुचि Derived interest

जब व्यक्ति के अन्दर किसी वस्तु, विचार या व्यक्ति के प्रति भाव सम्वेदन उत्पन्न होता है तो वह उसके प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करता है, जो धीरे-धीरे रुचि में परिवर्तित हो जाता है।
अध्ययनों से स्पष्ट हो चुका है कि कुछ महान् व्यक्तित्व साहित्य, कला, विज्ञान, खेल, राजनीति एवं सामाजिक आदि क्षेत्रों में वंशानुक्रम के प्रभावों के अतिरिक्त विकसित हुए हैं। इसको हम अभ्यास का परिणाम या परिवेशीय कारण मानते हैं।

अतः परिवेश की क्रियाओं के प्रति मानसिक झुकाव उत्पन्न करना ही अर्जित रुचि की प्रथम सीढ़ी होती है।

कक्षा शिक्षण में रुचि जागृत करने की faferi Methods of a Rising Interest in Class Teaching

रुचि को जागृत करना शिक्षा में शिक्षक के लिये एक जटिल समस्या है। माता-पिता अपने बालक से नम्बर कम आने का कारण पूछते हैं तो बालक कहता है कि यह विषय मुझे अच्छा नहीं लगता, खाने में अमुक सब्जी अच्छी नहीं लगती तथा कपड़ों में कुर्ता पहनना अच्छा नहीं लगता आदि ।

प्रश्न उठता है कि शिक्षा के क्षेत्र में रुचि का आधार मात्र बालक ही है या अन्य कारण भी । निश्चय ही बालक एवं अन्य कारक रुचि के विकास में सहयोग एवं असहयोग करते हैं।

अतः शिक्षक को चाहिये कि बालकों की रुचि को शिक्षा की ओर जागृत करने के लिये निम्नलिखित विधियों को अपनायें,

1.छात्र का अध्ययन Study of the student

कक्षा में छात्रों की रुचि को जागृत करने के लिये छात्र का शारीरिक एवं मानसिक अध्ययन करना आवश्यक है। उनका स्वास्थ्य, उनकी मनोदशा, आवश्यकताएँ आदि रुचि में बाधक हो सकती हैं। अतः छात्र को सामान्य बनाकर पढ़ाया जाय तो वह पाठ या विषय में रुचि दिखायेगा ।

2.उद्देश्य की स्पष्टता Clarity of aim

छात्रों को नया पाठ या विषय पढ़ाने से पहले उसकी उपयोगिता, लाभ और भविष्य में आवश्यकता आदि को स्पष्ट की देना चाहिये। आज शिक्षण के क्षेत्र में कक्षा एक से लेकर बड़ी कक्षाओं तक इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

जब छात्र के मन में विषय की उपयोगिता स्पष्ट हो जाती है तो उसका मन सीखने में स्वत: ही लग जाता

3.रुचि मापन Measurement of interest

कक्षा के अन्दर या विषय में रुचि न दिखाने वाले छात्रों की रुचि का मापन शिक्षक को करना चाहिये। इससे विषय सम्बन्धी रुचि एवं रुचि की मात्रा का पता चल जाता है।
यदि बालक में विषय से सम्बन्धित रुचि है, लेकिन जागृत नहीं है तो हमें जागृत करना चाहिये।

यदि छात्र की रुचि विषय की ओर नहीं है तो हमें रुचि को मोड़ना चाहिये। साथ ही रुचि को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों को भी ध्यान में रखना चाहिये ताकि वे छात्र में अरुचि न पैदा कर सके।

4.सहायक सामग्री का प्रयोग Use of material aids

पाठ की ओर बालकों के ध्यान को आकर्षित करने के लिये अध्यापक को सहायक सामग्री का प्रयोग करना चाहिये। इससे पाठ सरल भी होता है और बालकों की रुचि को भी केन्द्रीभूत करता है।

बालक पाठ एवं विषय को सहायक सामग्री के सहयोग से शीघ्र आत्मसात् करता है। इसका कारण मस्तिष्क में साहचर्य के स्वरूप का निर्धारण होता है।

5.उपयुक्त विधि Appropriate method

ज्ञान ग्रहण करने की अपेक्षा ज्ञान देने का तरीका अधिक प्रभावशाली होना चाहिये, जो शिक्षक विभिन्न विधियों, उदाहरणों पर युक्तियों का प्रयोग करके शिक्षण कार्य करते हैं, वे शिक्षण में अधिक सफल होते हैं।
शिक्षक का कार्य पाठ्यवस्तु को बालकों तक पहुँचाना नहीं बल्कि आत्मसात् कराना होता है।

6.विषयवस्तु की उपयोगिता Utility of subject matter

छात्रों को विषयवस्तु की व्यावहारिक उपयोगिता बतानी चाहिये। मानव मन तात्कालिक उपयोगिता पर अधिक ध्यान देता है और उसमें रुचि भी दिखाता है। इसलिये रूसो क्रिया के द्वारा सीखना’ या ‘अनुभव से सीखना’ पर विशेष बल देता था।

शिक्षक को चाहिये कि विषयवस्तु को व्यावहारिक बनाकर बालकों को ज्ञान दें।

7.उच्च आदर्श High Ideals

अध्यापक के ज्ञान को उच्च आदर्शों के साथ जोड़ना चाहिये। छात्र स्वयं को उच्च जीवन के प्रति समर्पण करना सीखेंगे और आत्म-सम्मान के भाव का विकास करेंगे।
इस प्रकार उनके मन में शिक्षा का कार्य केवल व्यावसायिक न होकर मानव निर्माण होगा। अत: वे ज्ञान को मानव प्रेम, समान भाव, भाई-चारा, वसुधैव कुटुम्बकम् आदि उच्च आदर्शों के रूप में ग्रहण करेंगे।

8.अध्यापक का प्रभाव Influence of teacher

छात्रों में रुचि जागृत करने के लिये अध्यापकीय व्यक्तित्व का प्रभाव सबसे अधिक कार्य करता है। छात्र जिन अध्यापकों को पसन्द करते हैं, उनकी बात को, क्रियाओं को और व्यवहारों को बड़े ही ध्यान से देखते हैं। अत: जहाँ पर ध्यान होता है, रुचि स्वतः ही उपस्थित हो जाती है।

जैसा कि मैक्डूगल ने कहा है, “रुचि गुप्त अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।”


Interest is a latent attention; attention is interest in action.


छात्र में पाठ की ओर रुचि जागृत करने हेतु अध्यापक, छात्र एवं अन्य कारक सभी को मिलकर, समझकर कार्य करना चाहिये। विषय के प्रति रुचि क्यों नहीं है? इसका कारण छात्र, वातावरण, अध्यापक, परिवार आदि कोई भी हो सकता है। प्रत्यक्ष रूप से छात्र को ही दोष देना उचित नहीं है।


रुचियों का विकास Development of Interests

रुचियाँ सीखी हुई प्रवृत्तियाँ होती हैं। अधिकतर यह देखा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति बाल्यावस्था में कुछ रुचियों को सीखने से वंचित रह जाता है तो इसके लिये उसे जीवन भर कष्ट उठाना पड़ सकता है।

कुछ व्यक्तियों को इस सम्बन्ध में दुःखी होते हुए भी देखा जा सकता है कि बचपन में उन्होंने इसके लिये रुचि विकसित नहीं की परन्तु इसका यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि रुचियों का विकास केवल बाल्यावस्था में ही होता है।

रुचियाँ जो जीवनपर्यन्त कभी भी सीखी जा सकती हैं। यह अलग बात है कि बाल्यावस्था में बालकों के पास अधिक समय और अवसर होते हैं, जिसे फलस्वरूप उनके लिये नवीन रुचियों को सीखना सरल होता है।


रुचि को प्रभावित करने वाले कारक
Factors Effecting to Interest


बालकों की रुचियों को निम्नलिखित तत्त्व प्रभावित करते हैं:-

1.परिवार की आर्थिक दशा

जिन बालकों के परिवार का वातावरण आर्थिक दृष्टि से गिरा हुआ होता है तथा साधनों की कमी होती है, ऐसे बालक शिक्षा में रुचि उत्पन्न नहीं कर पाते और परिवार की आर्थिक दशा उनकी रुचि पर प्रभाव डालती है।

2.अभिभावकों को अनुचित व्यवहार

कुछ बालकों के माता-पिता बालकों के साथ ठीक व्यवहार नहीं करते हैं, जिसके कारण बालकों की रुचि तीव्रता की अपेक्षा निम्न स्तर की ओर चली जाती है।

3.अवधान का केन्द्रित न होना

जिस विषय में बालक का अवधान केन्द्रित नहीं होता, उस विषय में बालक की रुचि भी जागृत नहीं होती । अतः अवधान का केन्द्रित न होना भी रुचि को प्रभावित करता है।

4.कमजोर स्वास्थ्य एवं थकान का प्रभाव

जिन बालकों को स्वास्थ्य कमजोर होता है अथवा जो थके-थके से रहते हैं, वे शिक्षा में रुचि नहीं लगा पाते। इससे बालक की रुचि बाधित होती है और उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। थका हुआ बालक भी अध्ययन में रुचि नहीं लगा पाता है।

5.विद्यालय का कठोर वातावरण

विद्यालय का कठोर तथा भययुक्त वातावरण भी बालक की रुचियों पर प्रभाव डालता है। जिन विद्यालयों में अनुशासन तथा अध्यापकों का व्यवहार मृदु होता है, बालकों की रुचियाँ प्रभावित नहीं होती । अरुचिकर शिक्षण विधियाँ भी बालकों की रुचि को प्रभावित करती हैं।

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