Sampreshan ke Siddhant सम्प्रेषण के सिद्धांत Principles of Communication

सम्प्रेषण के सिद्धांत


कोई भी व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं या किसी सम्प्रत्यय को किसी दूसरे व्यक्ति से व्यक्त करता है। अतः सम्प्रेषण द्विपक्षीय प्रक्रिया Two way process है। सम्प्रेषण के मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:-

1.सजगता का सिद्धान्त Principle and activeness

सम्प्रेषण कर्त्ता Communicator और सम्प्रेषण ग्रहण करने वाला व्यक्ति Receiver सम्प्रेषण क्रिया के समय सजग रहते हैं। यदि इस क्रिया में कोई एक व्यक्ति सजग नहीं रहता है तो सम्प्रेषण क्रिया पूरी नहीं होगी।

2.योग्यता का सिद्धान्त Principle of ability

सम्प्रेषण क्रिया में यह आवश्यक है कि सम्प्रेषणकर्ता और सम्प्रेषण ग्रहण करने वाले व्यक्ति दोनों योग्य होने चाहिये; जैसे – यदि कोई अध्यापक अपने विषय में योग्यता नहीं रखता है तो वह कक्षा में सम्प्रेषण करते समय उचित भूमिका नहीं निभा सकता है। कभी-कभी सम्प्रेषणकर्त्ता तो योग्य है परन्तु सम्प्रेषण ग्रहण करने वाला योग्य नहीं है तो भी सम्प्रेषण क्रिया पूरी नहीं होगी।

अतः सम्प्रेषणकर्त्ता Communicator एवं सम्प्रेषण ग्रहण करने वाला Receiver दोनों ही योग्य और उचित अंतः क्रिया से सम्बन्धित आवश्यक योग्यता रखने वाले होने चाहिये।

3.सहभागिता का सिद्धान्त .Principle of sharing


सम्प्रेषण द्वि-पक्षीय प्रक्रिया है। अतः सम्प्रेषणकर्ता और ग्रहण करने वाले दोनों के मध्य सहभागिता होनी चाहिये जिससे सम्प्रेषण क्रिया पूरी की जा सकती है; जैसे- कक्षा में अध्यापक और शिक्षार्थी दोनों की सहभागिता होगी तो सम्प्रेषण प्रभावशील होगा।

4.Principle of proper contents उचित सामग्री का सिद्धान्त

सम्प्रेषणकर्त्ता को उचित सामग्री का ध्यान रखना चाहिये। जैसे अध्यापक योग्य है और उसमें सम्प्रेषण के लिये आवश्यक कौशल भी है परन्तु अगर जो सम्प्रेषण किया जा रहा है उसमें सामग्री या शिक्षण अधिगम अनुभव की कमी है तो सम्प्रेषण का उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा।

अतः सामग्री के औचित्य की ओर ध्यान अवश्य ही दिया जाना चाहिये। सामग्री ऐसी होनी चाहिये जो सम्प्रेषण के उद्देश्यों, सम्प्रेषण परिस्थितियों तथा माध्यम से मेल खाती हो और विद्यार्थियों के स्तर, योग्यताओं, क्षमताओं तथा सम्प्रेषण कौशलों को ध्यान रखकर चलती हो ।

5.सम्प्रेषण माध्यम का सिद्धान्त .Principle of communication media or channel

सम्प्रेषणकर्त्ता और ग्राहक के बीच सम्प्रेषण की कड़ी को जोड़ने के लिये केबिन एक माध्यम होता है; जैसे- दो ध्रुवों Poles के बीच विद्युत धारा को प्रवाहित करने के लिये जो कार्य विद्युत तार द्वारा किया जाता है वही भूमिका सम्प्रेषण माध्यम Communication media द्वारा निभाई जाती है।

अतः सम्प्रेषण माध्यम जितना अधिक उपयुक्त और सशक्त होगा सम्प्रेषण धारा का प्रवाह उतना ही अच्छा रहेगा।

6.पृष्ठ पोषण का सिद्धान्त Principle of feed back

सम्प्रेषण क्रिया में सम्प्रेषण कर्ता को सम्प्रेषण के बारे में ग्राहक से उचित पृष्ठ पोषण Feed Backy प्राप्त होता रहे तो सम्प्रेषण अधिक प्रभावशाली रहेगा; जैसे- कहानी कहने वाला व्यक्ति कहानी कहता है और सुनने वाला व्यक्ति अरुचि एवं अनिच्छा से कहानी सुनता है तो आभास होता है कि सम्प्रेषण का प्रभाव मन्द अथवा बिल्कुल ही नहीं है। सम्प्रेषण की प्रभावशीलता में उचित पृष्ठ पोषण का काफी सक्रिय सहयोग रहता है।

7.सहायक एवं बाधक तत्त्वों का सिद्धान्त Principle of facilitators and barriers


सम्प्रेषण क्रिया में ऐसे तत्त्व और परिस्थितियाँ कार्य करती हैं जो सहायक या बाधक भूमिका निभाने से जुड़ जाती हैं; जैसे- शोरगुल, प्रकाश की कमी, सुनने और देखने में आने वाली कमी आदि।

सम्प्रेषण के अन्य सिद्धांत

1.Principle of Clarity
स्पष्टता का सिद्धांत

संप्रेषण करते समय हमारी भाषा बिल्कुल साफ होने चाहिए। क्योंकि अगर भाषा स्पष्ट नहीं होगी तो प्राप्त करता उसका गलत अर्थ समझ बैठेंगे। इसलिए हमारी भाषा स्पष्ट होने चाहिए।

2.Principle of Coordination समन्वय का सिद्धांत

प्रभावी संप्रेषण तभी हो सकता है जब संदेशों के बीच में समन्वय स्थापित हो। क्योंकि बिना समन्वय के पहले वाले संदेश का अर्थ नहीं निकल पाएगा। जब हम बातचीत करते तो समन्वय होना बहुत जरूरी है।

3.Principle of Consistency संगतता का सिद्धांत

जब आप बातचीत करते हैं तो संदेशों के बीच में विरोधात्मक प्रवृत्ति ना हो अर्थात दोनों संदेश एक दूसरे के विपरीत ना हो। सूचनाएं उपक्रम की नीतियों, योजनाओं तथा उद्देश्यों के अनुरूप ही होनी चाहिए।

4.Principle of Courtesy विशिष्टता का सिद्धांत

संप्रेषण में सूचनाएं शिष्ट एवं शालीन होनी चाहिए। संप्रेषण के दौरान कठोर शब्द, अपशब्द और गाली गलोच शब्द आदि प्रयुक्त नहीं करनी चाहिए।

5.Principle of Attention ध्यान आकर्षण का सिद्धांत

संदेश देते समय ध्यान रखना आवश्यक है क्योंकि अगर भेजने वाले का ध्यान नहीं है तो वह गलत संदेश भी भेज सकता है। अतः सदेश देते समय ध्यान आवश्यक है।

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