सत्यवादी हरिश्चंद्र satyavadi Harishchandra

फुलवारी कक्षा-4 की हिंदी पाठ्य पुस्तक

भारत वर्ष में ऐसे अनेक महान व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन आदर्शों से संपूर्ण मानवता के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व थे राजा हरिश्चंद्र । वह अपनी प्रजा में सत्यवादिता, दान और परोपकार जैसे गुणों के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी पत्नी तारामती तथा पुत्र रोहित था ।
एक बार देवराज इंद्र की प्रेरणा से महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की सत्यवादिता एवं दानशीलता की परीक्षा लेनी चाही। वह राजा हरिश्चंद्र के सपने में प्रकट हुए और उनसे दान में संपूर्ण राज-पाट माँग लिया। राजा हरिश्चंद्र ने सपने में ही उन्हें सब कुछ दान कर दिया ।
अगले दिन प्रातःकाल मुनि विश्वामित्र दरबार में उपस्थित हुए और अपनी दक्षिणा के रूप में एक सहस्र स्वर्ण मुद्राएं माँगी। राजा हरिश्चंद्र अपना सब कुछ दान कर चुके थे। मुनि बिना दक्षिणा लिए चले जाएँ यह भी संभव न था। कोई उपाय न देखकर राजा हरिश्चंद्र ने दक्षिणा चुकाने के लिए स्वयं को परिवार सहित बेचने का निर्णय लिया। राजा हरिश्चंद्र को श्मशान में कर वसूल कर दाह संस्कार कराने वाले व्यक्ति ने खरीद लिया और उनकी पत्नी और पुत्र को घरेलू काम-काज के लिए एक ब्राह्मण ने।
एक दिन जंगल में रोहित को विषैले सर्प ने डस लिया। असहाय तारामती मृत पुत्र को गोद में उठाकर अंत्येष्टि के लिए श्मशान ले गईं। ऐसे संकट के समय में भी राजा हरिश्चंद्र ने सत्य और धैर्य को नहीं छोड़ा तथा तारामती से शवदाह हेतु कर माँगा।
तारामती के पास कर देने के लिए कुछ भी नहीं था। विवश होकर वह अपनी धोती का आधा भाग फाड़कर देने के लिए तत्पर हुई ही थी कि विश्वामित्र और देवता गण प्रकट हो गए। राजा हरिश्चंद्र परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुके थे। सबने राजा के धैर्य, दानशीलता और न्याय की प्रशंसा करते हुए रोहित को जीवित कर दिया तथा राज-पाट भी वापस कर दिया।

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