पाठ 7 सूक्ष्म जीव एवं संक्रामक रोग sukshm jeev avn sankramak Rog

सूक्ष्म जीव एवं संक्रामक रोग

सूक्ष्म जीव बहुत छोटे प्राणी हैं, जिन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी की सहायता से ही देखा जा सकता है। सूक्ष्म का अर्थ है कि उन्हें केवल आँखों से नहीं देखा जा सकता। वे प्रत्येक स्थान, वायु, जल, मिट्टी, भोजन एवं जन्तुओं के शरीर के भीतर और शरीर पर पाये जाते हैं।

सूक्ष्म जीव जीवन की सभी मूल संक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। यदि उन्हें पर्याप्त भोजन, नमी और उचित तापमान मिल पाये, तो बहुत कम समय में बड़ी तेजी से बढ़ते हैं, प्रजनन करते हैं और उनकी संख्या बहुत अधिक हो जाती है। भोजन, नमी एवं उचित तापक्रम जीवन के लिए आवश्यक तत्व हैं। सूक्ष्म जीव मनुष्य के लिए लाभदायक या हानिकारक हो सकते हैं। हानिकारक अथवा रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं को कीटाणु (रोगाणु) कहते हैं। ये चार प्रकार के होते हैं –

जीवाणु – जीवाणु एक-कोशिका वाले जन्तु हैं, जो आकृति में गोल, लम्बे या चक्राकर होते हैं। इनसे टाइफाइड, हैजा एवं क्षयरोग आदि होते हैं।

विषाणु – विषाणु जीवाणुओं से बहुत छोटे होते हैं। इन्हें केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है। ये छन्ने कागज में से छन जाते हैं। ये किसी जीवित शरीर में प्रवेश करने पर ही सक्रिय होते हैं। ये फ्लू (इन्फ्लूएंजा), रैबीज, खसरा एवं चेचक आदि रोग उत्पन्न करते हैं।

प्रोटोजोआ – प्रोटोजोआ जीवाणुओं से काफी बड़े होते हैं। ये एक-कोशिका वाले हैं। अमीबा नामक प्रोटोजोआ, अतिसार रोग पैदा करता है तथा प्लाज्मोडियम नामक प्रोटोजोआ मलेरिया रोग पैदा करता है।


फफूँदी – फफूँदी बहुत छोटे पौधे हैं, जो हरे नहीं होते हैं। ये जीवाणु से बड़े होते हैं। फफूँदी से दाद-खाज रोग हो जाते हैं।

संक्रामक रोग

कीटाणु परजीवी होते हैं। यदि ये किसी जीव-जन्तु के शरीर में प्रवेश करते हैं, तो वे स्वस्थ्य सैलों से भोजन चूसकर जीवित रहते और बढ़ते हैं। सफेद रक्त कण कीटाणुओं से लड़ते हैं। हमारे शरीर में कीटाणु नाक, मुँह या कटी-फटी त्वचा में से प्रवेश करते हैं। जब कीटाणु संख्या में बढने लगते हैं और हमारे शरीर को प्रभावित करने लगते हैं, तो इसे संक्रामण कहते हैं।

हमारे शरीर द्वारा संक्रमण के प्रतिरोध करने को प्रतिरोधकता कहते हैं। हमारे शरीर या इसके भागों के सामान्य रूप या क्रियाओं में अन्तर पड़ने को रोग कहते हैं। जो रोग कीटाणुओं द्वारा पैदा होते हैं और सरलता से रोगी व्यक्तियों से स्वस्थ व्यक्तियों में फैल जाते हैं, संक्रामक या छूत के रोग कहलाते हैं। संक्रामक का अर्थ है- जिसमें संक्रमण हो।

संक्रामक रोगों का फैलना

संक्रामक रोग निम्न साधनों द्वारा फैलते हैं –

वायु द्वारा – रोगी व्यक्ति के खाँसने या छींकने से कीटाणु वायु में फैल जाते हैं, जो श्वास के साथ स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में चले जाते हैं। खाँसी, जुकाम, फ्लू, चेचक एवं खसरा जैसे रोग वायु द्वारा फैलते हैं।

सीधे संपर्क द्वारा– जब स्वस्थ व्यक्ति किसी रोगी व्यक्ति, उसके कपड़ों या अन्य सामान के सम्पर्क में आता है, तो विषाणु से होने वाले रोगों जैसे – फ्लू, चेचक, खसरा, दाद, खाँसी और जुकाम के कीटाणु उसमें प्रवेश कर जाते हैं।

भोजन और जल द्वारा “बहुत-से कीटाणु भोजन और जल को प्रदूषित कर देते हैं। टाइफाइड, हैजा, अतिसार, पेचिस, पीलिया और भोजन विषाक्तता प्रदूषित भोजन और जल द्वारा फैलते हैं। रोगी गाय, भैंस का दूध भी संक्रमण पैदा कर सकता है।

कटी-फटी त्वचा द्वारा – त्वचा में चोट लगने या कटने से उसमें से होकर अनेक कीटाणु हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। टेटनस जैसे रोग इसी प्रकार फैलते हैं।

कीटों द्वारा – मलेरिया, प्लेग और निद्रा रोग क्रमशः मच्छर, पिस्सू और ट्सेट्सि मक्खी के काटने से होते हैं। मलेरिया परजीवी (प्लाज्मोडियम नामक प्रोटोजोआ) को मादा एनॉफ्लीज मच्छर फैलाती है। जब मच्छर उन्हें खून चूसने के लिए काटते हैं, तो रोगी व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्तियों में रोग पहुँच जाता है।

घरेलू मक्खी और तिलचट्टे जन्तुओं के मल-मूत्र और कूड़े-कचरे से कीटाणुओं को भोज्य पदार्थों में लाते हैं। ये भोज्य पदार्थ बहुत-से रोगों को उत्पन्न करते हैं, जिनमें हैजा रोग प्रमुख है।

जन्तुओं द्वारा – जलांतक (रैबीज) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का खतरनाक रोग है, जो विषाणु द्वारा होता है। इसके कीटाणु मनुष्य में पागल कुत्ते के काटने से आते हैं। पागल कुत्ते की पहचान है कि उसके मुँह से लार बहती रहती है तथा उसकी पूँछ पिछली टाँगों के बीच में धँसी रहती है।

वाहक द्वारा – कभी-कभी स्वस्थ और मजबूत व्यक्तियों में भी कुछ रोगों, जैसे टाइफाइड, पेचिश (और चेचक के कीटाणु रहते हैं। इन व्यक्तियों को, वाहक कहते हैं। ये वाहक स्वयं रोगी नहीं होते, किन्तु रोग के कीटाणु उनके सम्पर्क में आये व्यक्ति में प्रवेश कर जाते हैं।

मिट्टी द्वारा – जब कोई व्यक्ति मिट्टी पर नंगे पैर चलता है, तो अंकुश कृमि (हुकवर्म) का लारवा उसकी त्वचा में छेद करके घुस जाता है और रक्त द्वारा शरीर के दूसरे भागों तक ले जाया जाता है।

संक्रामक रोगों की रोकथाम


संक्रामक रोगों की रोकथाम के तीन उपाय हैं

1. कीटाणुओं और कीटों के प्रजनन को रोकना

(i) पीने के जल को छानकर, उबालकर या क्लोरीन मिलाकर पीना चाहिए तथा उसे सुरक्षित रूप से रखना चाहिए।

(ii) कीटाणु को समाप्त करने के लिए दूध को उबालकर प्रयोग करना चाहिए।

(iii) जल (और भोजन को स्वच्छ रूप से ढक कर रखना चाहिए।

(iv) अधिकतर कीटाणु सीधे सूर्य के प्रकाश और ताजी वायु से मर जाते हैं। अतः घर में सूर्य का प्रकाश और ताजी वायु आने-जाने के लिए पर्याप्त दरवाजे, खिड़कियाँ और रोशनदान होने चाहिए। कपड़ों और बिस्तरों को उचित समय पर ताजी वायु और सूर्य के प्रकाश में डालते रहना चाहिए।

(v) कूड़े-कचरे को ढक कर रखना चाहिए, ताकि मक्खियाँ प्रजनन न कर सकें। उन्हें दूर रखने के लिए खिड़कियों में तार की जाली लगी होनी चाहिए।

(vi) शौचालय और स्नानघर को साफ करके फिनाइल या डेटोल जैसे कीटाणुनाशक द्रवों से धोना चाहिए ।

(vii) जल को घर में या घर के निकट इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए। रुकें हुए जल पर कैरोसीन तेल छिड़कने से मच्छर उस पर अंडे नहीं दे पाते।

2.रोगी व्यक्तियों से कीटाणुओं के फैलने को रोकना

(i) संक्रामक रोगी को अलग कमरे में रखना चाहिए।

(ii) उसके कपड़ों और बर्तनों को अलग रखना चाहिए एवं उन्हें कीटाणुरहित कर देना चाहिए।

(iii) संक्रामक रोग से पीड़ित बच्चों को तब तक स्कूल नहीं भेजना चाहिए, जब तक कि वे पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाएँ।

(iv) मच्छरों को दूर रखने के लिए मच्छरदानी, मच्छर भगाने की क्रीम ऑडोमास या गुडनाइट का प्रयोग करना चाहिए।

3.कीटाणुओं के विरुद्ध प्रतिरोध बढ़ाना


→ रोगों के कीटाणुओं के विरुद्ध प्रतिरोधकता को विकसित किया जाता है। इस क्रिया को प्रतिरोधीकरण कहते हैं। किसी विशेष रोग को उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं की वेक्सीन का बहुत कम मात्रा का टीका स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में लगाते हैं। तब उसके शरीर की कोशिकाएँ रोग के कीटाणुओं के विरुद्ध एक बचाव, सुरक्षा या प्रतिरोध बना लेती हैं। डा० एडवर्ड जेनर ने चेचक की वेक्सीन की सन् 1798 में खोज की।

प्रत्येक व्यक्ति को बचपन में ही कुछ विशेष रोगों के विरुद्ध प्रतिरोधक टीका लगवा लेना चाहिए।

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डीहाइड्रेशन विलयन (पिलाने के लिए) – अतिसार में शरीर से बहुत-से द्रव निकल जाते हैं। जल और खनिजों की इस कमी को जलहानि (डीहाइड्रेशन) कहते हैं। यदि उपचार न किया जाये, तो इससे मृत्यु तक हो सकती है। जल और खनिजों की इस कमी को करने को जलपूर्ति (रिहाइड्रेशन) कहते हैं। बच्चे को बचाने के लिए उसे जलपूर्ति विलयन पिलाना चाहिए। इसे बनाने की विधि इस प्रकार है

एक लीटर छने हुए जल को उबालकर ठण्डा करते हैं। इसमें साधारण नमक एक चम्मच, खाने का सोडा एक चम्मच, चीनी 8 चम्मच घोल लेते हैं। स्वाद के लिए नींबू के रस की
कुछ बूँद डाल सकते हैं। यह जलपूर्ति विलयन पिलाने के लिए तैयार है। इसे एक घंटे से अधिक नहीं रखना चाहिए।


याद रखिए-

सूक्ष्म जीव जीवन की सभी मूल संक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

सूक्ष्म जीव मनुष्य के लिए लाभदायक या हानिकारक हो सकते हैं।

विषाणु जीवाणुओं से बहुत छोटे होते हैं।

प्रोटोजोआ जीवाणुओं से काफी बड़े होते हैं।


देखें आपने क्या सीखा ।

क. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

1.संक्रमण क्या होता है।

सूक्ष्मजीव (रोगाणु) शरीर के हिस्से पर आक्रमण करते हैं और आपको बीमार बनाते हैं। उसे संक्रमण कहते हैं।

2.संक्रामक रोग किसे कहते हैं ?

किसी जीव जंतु के कटे त्वचा के द्वारा कीटाणु किसी अंग को प्रभावित करते हैं तो उसे हम संक्रमण रोग कहते हैं।

3.संक्रामक रोग किस प्रकार फैलते हैं ?

संक्रामक निम्न प्रकार के साधनों द्वारा फैलने हैं 1 वायु द्वारा, सीधे संपर्क द्वारा ,भोजन और जल के द्वारा ,कटी फटी त्वचा के द्वारा, कीटों के द्वारा जंतुओं द्वारा इत्यादि।

4.हैजे के फैलने और इन्फ्लूएन्जा के फैलने में क्या अन्तर है ?

जीवाणु एक कोशिका वाले जंतु हैं इसे हजार छह रोग टाइफाइड होते हैं और विषाणु द्वारा खसरा चेचक का रोग उत्पन्न करते हैं इसे हम इन्फ्लूएंजा कहते हैं।

5. प्रतिरोधकता क्या है और यह कैसे विकसित की जाती है ?

कीटाणुओं के विरुद्ध प्रतिरोध बढ़ता की प्रतिरोधकता कहते हैं प्रतिरोधकता को विकसित करने के लिए प लगाए जाते हैं

6. संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए तीन उपाय-क्या हैं ?

1. पीने के जल को छानकर उबाल कर या क्लोरीन मिलाकर पीना चाहिए, 2 जल और भोजन को स्वच्छ रूप से ढक कर रखना चाहिए, 3. जल को घर में या घर के निकट इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए।

7. पिलाने के लिए जलपूर्ति वियलन कैसे तैयार करते हैं ?

1 लीटर छने हुए जल को उबालकर ठंडा करते हैं इसमें साधारण नमक एक चम्मच खाने का सोडा एक चम्मच चीनी और स्वाद के लिए नींबू के रस की कुछ बूंद डाल सकते हैं या जलापूर्ति विलियन पिलाने के लिए तैयार हो जाता है।

ख. सही वाक्य पर () तथा गलत पर (x) का चिह्न लगाइए-

1. टाइफाइड मच्छर से फैलता है।

2.जिस भोजन पर मक्खियाँ बैठी हों, उसे खाने से रोग फैलता है।

3.यदि आपके परिवार में किसी को हैजा हो जाये, तो आप पुजारी को बुलायेंगे।

4. चेचक के वेक्सीन की खोज सन् 1698 में हुई थी।

5.चेचक के वेक्सीन की खोज एडीसन ने की थी।
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6.पागल कुत्ते के काटने से रैबीज रोग हो जाता है।

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