राज्य की उत्पत्ति के सिद्धांत- theories of origin of state.

राज्य नागरिकशास्त्र में अध्ययन का एक मुख्य विषय है। विभिन्न विद्वानों ने राज्य की उत्पत्ति व स्वरूप के बारे में विस्तृत विचार प्रस्तुत किये। यह प्रश्न विद्वानों के बीच विवाद का विषय रहा है कि राज्य किस प्रकार अस्तित्व में आया। राज्य की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों द्वारा कई सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं। इस संबंध में सबसे पुराना सिद्धान्त राज्य की दैवीय उत्पत्ति का सिद्धान्त है। जिसके अनुसार राज्य का निर्माण ईश्वर की इच्छा का परिणाम है। प्रथम राजा की नियुक्ति ईश्वर द्वारा की गयी है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों, महाभारत का शांतिपर्व तथा मनु की मनुस्मृति में दैवीय उत्पत्ति के सिद्धान्त का समर्थन किया गया है। पश्चिमी देशों में मध्य युग में चर्च के पादरियों तथा जेम्स प्रथम व रॉबर्ट फिलमर ने भी इस सिद्धान्त का समर्थन किया। राज्य की उत्पत्ति के संबंध में दूसरा सिद्धान्त शक्ति सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति के पहले मानव समुदाय कबीलों में निवास करते थे तथा शक्तिशाली कबीले ने अपनी सैनिक शक्ति द्वारा दूसरे कबीलों को अपने नियन्त्रण में लाकर राज्य की स्थापना की। इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक हैं—बोसांके, बर्न हार्डी, सोरेल, नीत्शे, ट्राटस्की आदि। राज्य की उत्पत्ति का एक अन्य सिद्धान्त पितृसत्तात्मक सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त का समर्थन प्राचीन यूनानी विचारक अरस्तू तथा आधुनिक विचारक सर हेनरीमैन ने किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार परिवारों की सत्ता मुखिया के हाथ में होती थी, इन्हीं परिवारों के विस्तार के परिणामस्वरूप राज्य अस्तित्व में आया। इसी तर्क पर आधारित एक अन्य सिद्धान्त मातृसत्तात्मक सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार परिवार की सत्ता महिला मुखिया के हाथ में होती थी तथा ऐसे परिवारों के विस्तार से राज्य अस्तित्व में आया। इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक हैं— मैकलीनन, मॉर्गन तथा जेन्कस।उक्त चार सिद्धान्तों के अतिरिक्त राज्य की उत्पत्ति के संबंध में सर्वाधिक चर्चित दो अन्य सिद्धान्त हैं—सामाजिक समझौता का सिद्धान्त तथा विकासवादी सिद्धान्त। इस अध्याय में इन दो सिद्धान्तों पर विस्तार से चर्चा की गयी है।सामाजिक समझौते का सिद्धान्तसामाजिक समझौते का सिद्धान्त मध्य युग के बाद आधुनिक युग में यूरोप में सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ। मध्य युग में यूरोप में दैवीय उत्पत्ति का सिद्धान्त प्रचलित था। इसके विरोध में पुनर्जागरण के बाद 17वीं व 18वीं शताब्दी में सामाजिक समझौता सिद्धान्त अधिक लोकप्रिय हुआ। इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक थॉमस हॉब्स, जॉन लॉक एवं जीन जैक्स रूसो थे। यद्यपि इन विचारकों के वैयक्तिक विचारों में पर्याप्त अंतर है, लेकिन तीनों इस बात पर सहमत है कि राज्य क उत्पत्ति एक सामाजिक समझौते का परिणाम है। इस सिद्धान्त का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि राज्य एक मानव निर्मित संस्था है, जिसका निर्माण व्यक्तियों ने किया है। अत: राज्य की व्यक्ति के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। यही विचार वर्तमान युग में लोकतंत्र को प्रेरित करने में भी महारा सिद्ध हुआ। सामाजिक समझौता सिद्धान्त को ठीक से समझने के लिए हाब्स, लॉक व रूसी तीनों विचारों का अलग-अलग अध्ययन आवश्यक है।

सामाजिक समझौते पर हाब्स के विचार

इंग्लैण्ड के विचारक थॉमस हॉब्स (1588-1679) ने अपनी पुस्तक ‘लेवियाथन’ में अपने सामाजिक समझौता सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। थॉमस हॉब्स इंग्लैण्ड के तत्कालीन राजा चा द्वितीय के शिक्षक थे। 1642 के सिविल वार में चार्ल्स द्वितीय की हत्या कर दी गयी थी। इस घटना ने हाब्स के राजनीतिक विचारों को प्रभावित किया तथा हाब्स ने अपने सामाजिक समझौता सिद्धान के द्वारा एक निरंकुश राज्य की अवधारणा का समर्थन किया है। हॉब्स के सामाजिक समझौत सिद्धान्त को हम निम्न रूप में समझ सकते हैं-

1. मानव स्वभाव –हाब्स ने मानव स्वभाग का नकारात्मक चित्रण किया है। उसके अनुसार व्यक्ति स्वार्थी, डरपोक तथा चालाक होते हैं और वे सदैव अपने हितों की पूर्ति में संलग्न रहते हैं।

2. प्राकृतिक अवस्था सामाजिक समझौता सिद्धान्त में प्राकृतिक अवस्था उस स्थिति को कहा जाता है, जब राज्य अस्तित्व में नहीं था तथा राजनीतिक सत्ता का अभाव था। हाब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में मानव व्यवहार के प्राकृतिक नियम तो थे, लेकिन राजनीतिक सत्ता के अभाव में स्वार्थी व्यक्ति इन नियमों का पालन नहीं करते थे। परिणामस्वरूप प्राकृतिक अवस्था प्रत्येक की प्रत्येक के विरुद्ध युद्ध व संघर्ष की अवस्था थी। इस अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति असुरक्षित जीवन व्यतीत कर रहा था। व्यक्ति का जीवन एकाकी, गरीब, हिंसक तथा अल्प था।

3. सामाजिक समझौता हाब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति असुरक्षित था तथा दुखी जीवन व्यतीत कर रहा था, जिससे बाहर निकलने के लिए व्यक्तियों ने आपस में एक समझौता किया जिसमें यह कहा गया कि मैं अपने ऊपर शासन करने की शक्ति कुछ व्यक्तियों या एक व्यक्ति पर इस आधार पर सौंपता हूँ कि अन्य व्यक्ति भी अपने ऊपर शासन करने की शक्ति किसी एक व्यक्ति को सौंप देंगे। इस समझौते के परिणामस्वरूप जिस शासक को यह शक्तियां मिलीं वही राज्य था। अथवा उसके द्वारा राज्य की स्थापना की गयी।ने

4. राज्य का स्वरूप-हाब्स के अनुसार राज्य निरंकुश व सम्प्रभु है, क्योंकि वह समझौते की शर्तों से बंधा हुआ नहीं है। चूंकि व्यक्तियों ने शासन करने का अधिकार इस व्यक्ति को दे दिया है, अतः वे राज्य की अनुमति के बिना यह अधिकार वापस नहीं ले सकते। इस प्रकार हाब्स सामाजिक समझौता का सहारा लेकर भी एक निरंकुश सम्प्रभुता व राज्य का समर्थन किया है। व्यक्तियों को राज्य के विरुद्ध कोई अधिकार नहीं है। व्यक्ति केवल एक ही दशा में राज्य का विरोध कर सकते हैं। अगर राज्य व्यक्तियों को अपनी जान लेने का आदेश देता है। इसका तर्क यह था कि व्यक्तियों ने अपनी जान की सुरक्षा के लिए ही राज्य का निर्माण किया है। अन्य किसी दशा में व्यक्तियों को राज्य का विरोध करने का अधिकार नहीं है। समीक्षा-हाब्स के सामाजिक समझौता संबंधी विचारों की आलोचना भी की गयी है। उनके मानव स्वभाव संबंधी विचार संतुलित नहीं है। व्यक्ति खराब होने के साथ-साथ अच्छा भी होता है

तथा उसमें सामाजिकता की भावना भी पाई जाती है। दूसरी आलोचना यह है कि यदि प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष में संलग्न थे तो अचानक उन्होंने समझौते की बात कैसे स्वीकार कर ली। हाब्स की तीसरी आलोचना यह है कि यदि राज्य का निर्माण व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते के परिणामस्वरूप हुआ है तो राज्य निरंकुश कैसे हो सकता है। राज्य को व्यक्ति की सहमति पर ही आधारित होना चाहिए।


सामाजिक समझौते पर लॉक के विचार


जॉन लॉक (1632-1704) भी इंग्लैण्ड के विचारक थे। उन्होंने अपने राजनीतिक विचार “शासन पर दो निबन्ध” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किये हैं। जॉन लॉक को उदारवाद का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने इंग्लैण्ड की 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति का समर्थन किया है तथा लॉक के विचारों के कारण लोकतंत्र तथा पूंजीवाद दोनों का विकास हुआ है।

  1. मानव स्वभाव-लॉक ने हाब्स के विपरीत मानव स्वभाव का सकारात्मक चित्रण किया है। उनके अनुसार व्यक्ति एक विवेकशील तथा सामाजिक प्राणी है तथा उसके अन्दर दूसरों से सहयोग करने की भावना पायी जाती है। व्यक्ति हिंसा की बजाय शांति में विश्वास करते हैं।
  2. प्राकृतिक अवस्था तथा प्राकृतिक कानून-चूंकि लॉक के अनुसार व्यक्ति स्वभाव से एक अच्छा प्राणी है, अत: प्राकृतिक अवस्था के बारे में लॉक की अवस्था हाब्स के विपरीत है। प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति सहयोग, शांति व सद्भावना का जीवन व्यतीत कर रहे थे तथा प्राकृतिक नियमों का पालन करते थे। लेकिन प्राकृतिक अवस्था में तीन कठिनाइयां थीं—प्राकृतिक नियमों को स्पष्ट करने वाली कोई संस्था नहीं थी। इन नियमों को लागू करने वाली कोई संस्था भी नहीं थी तथा विवाद की स्थिति में विवादों का निपटारा करने वाली भी कोई संस्था नहीं थी ।
  3. प्राकृतिक अधिकार-लॉक ने प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति के तीन अधिकार स्वीकार किये हैं। जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार तथा सम्पत्ति का अधिकार। जॉन लॉक ने इन तीनों ही अधिकारों में सम्पत्ति के अधिकार को सबसे अधिक महत्व दिया है। क्योंकि वह सम्पत्ति के श्रम सिद्धान्त का समर्थक है। जिसके अनुसार व्यक्ति की सम्पत्ति में उसके श्रम के रूप में उसका व्यक्तित्व भी शामिल होता है। अतः सम्पत्ति का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है। लॉक ने इन अधिकारों को इसलिए प्राकृतिक अधिकार माना है क्योंकि यह अधिकार व्यक्ति को जन्म से प्राप्त हैं तथा राज्य की स्थापना से पहले ही प्राप्त थे । अतः राज्य इन्हें न तो सीमित कर सकता है और न ही छीन सकता है।
  4. सामाजिक समझौता उक्त कठिनाइयों से निपटने के लिए ही व्यक्तियों ने आपस में समझौता किया तथा राज्य या राजनीतिक समाज की स्थापना की। जिसके अंतर्गत कानून को स्पष्ट करने के लिए व्यवस्थापिका, नियमों को लागू करने के लिए कार्यपालिका तथा विवादों का निपटारा करने के लिए न्यायपालिका, की स्थापना की गयी। उल्लेखनीय है कि हाब्स दो समझौतों की बात करता है। पहले समझौते द्वारा राजनीतिक समाज अथवा राज्य की स्थापना की गयी तथा दूसरे समझौते द्वारा सरकार की स्थापना की गयी। हाब्स के विपरीत लॉक ने राज्य और सरकार में अंतर किया है। उसके अनुसार सरकार एक ट्रस्ट या लिमिटेड कम्पनी की तरह है, जिसका एकमात्र उद्देश्य व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करना है।
  5. राज्य का स्वरूप-उक्त विचारों के आलोक में लॉक ने एक लोकतांत्रिक राज्य का समर्थन किया है। सरकार जनसहमति पर आधारित होगी। सरकार को व्यक्तियों के प्राकृतिक अधिकारों के उल्लंघन का अधिकार नहीं होगा। यदि सरकार व्यक्ति के इन अधिकारों का उल्लंघन करती है अथवा इन अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होती है तो व्यक्तियों को सरकार का विरोध करने का अधिकार है। उल्लेखनीय है कि इन्हीं विचारों के आलोक में लॉक ने इंग्लैण्ड की 1688 की क्रांति का समर्थन किया था।
  6. समीक्षा—लॉक के उक्त विचारों का परिणाम यह हुआ कि लोकतंत्र, उदारवाद तथा पूंजीवाद तीनों को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। लॉक के जनसहमति के विचार के कारण लोकतंत्र को बढ़ावा मिला तथा निजी सम्पत्ति के सिद्धान्त का समर्थन करने के कारण पूंजीवाद का विकास हुआ। लॉक ने अपने सिद्धान्त में राजनीतिक सम्प्रभुता के सिद्धान्त का समर्थन किया है। लॉक के विचारों की इस आधार पर आलोचना की जाती है कि उसने समाज को व्यक्तियों का समूह माना न कि एक सुनिश्चित राजनीतिक सत्ता। अतः सम्प्रभुता के संबंध में उसके विचार अस्पष्ट हैं। उसने यह नहीं माना कि सम्प्रभुता राज्य में निवास करती है। लेकिन उसने यह भी नहीं स्पष्ट किया कि सम्प्रभुता का निवास कहां है? कई बार उसने माना कि सम्प्रभुता जनता में निहित है तथा अन्य अवसरों पर उसने माना कि सम्प्रभुता विधायिका में निहित है। लॉक के विचारों की एक अन्य आलोचना यह भी है कि जब प्राकृतिक अवस्था में सब कुछ सही था तो व्यक्तियों को सामाजिक समझौते की आवश्यकता ही क्यों पड़ी। उसके प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त की भी आलोचना की गयी है क्योंकि ऐसे किसी अधिकार का कोई मतलब नहीं है जिसे राज्य के कानूनों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। इसीलिए बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों को कोरी बकवास की संज्ञा दी है।

सामाजिक समझौते पर जीन जैक्स रूसो के विचार

रूसो (1712-1778) का जन्म यद्यपि स्विट्जरलैण्ड के जेनेवा शहर में हुआ था, लेकिन उसने अपने विचारों का प्रतिपादन फ्रांस में किया था। उसके सामाजिक समझौता संबंधी विचार उसकी पुस्तक सामाजिक समझौते में प्राप्त होते हैं। मॉण्टेस्क्यू और वाल्टेयर के साथ ही रूसो को भी फ्रांस की क्रांति का वैचारिक जनक माना जाता है। अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर रूसो इस बात पर विश्वास करता था कि आधुनिक सभ्यता, संस्कृति और नियम कानूनों ने व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव को बदल दिया है तथा उसकी स्वतंत्रता बाधित हुई है। उसकी पुस्तक का पहला वाक्य है कि ‘व्यक्ति स्वतंत्र पैदा हुआ है, लेकिन वह सर्वत्र जंजीरों में बंधा हुआ है’। अतः रूसो की प्रथम समस्या व्यक्ति को बाहरी बन्धनों से मुक्त करके उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

  1. मानव स्वभाव-रूसो ने व्यक्ति को मूलत: अच्छा माना है तथा उसे एक आदर्श जंगली की संज्ञा दी है। वह मूलतः सरल व आत्मकेन्द्रित है।
  2. प्राकृतिक अवस्था-प्राकृतिक अवस्था में व्यक्तियों को पूर्ण स्वतंत्रता व समानता प्राप्त तथा उसका जीवन आदर्श खुशहाली का जीवन था, लेकिन रूसो के अनुसार सम्पत्ति के विकास के साथ समाज का विकास हुआ और समाज के विकास के साथ उसके नियमों व बंधनों का विकास हुआ तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ गयी। उसका कहना था कि जिस व्यक्ति ने जमीन के एक टुकड़े पर पैर रखकर यह कहा होगा कि यह मेरी जमीन है, समाज का वही संस्थापक है। अर्थात् समाज की स्थापना सम्पत्ति के विकास से ही होती है और इसके साथ ही असमानता, रूढ़ियों तथा समाज के कायदे-कानूनों का विकास होता है, जोकि व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक है। इसीलिए उसने नारा दिया था कि ‘प्रकृति की ओर लौटो।’ चूंकि सम्पत्ति के विकास के बाद उसका अंत नहीं किया जा सकता। रूसो की चुनौती यह थी कि सम्पत्ति और समाज के रहते हुए भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को कैसे बचाया जाये ?
  3. सामाजिक समझौता तथा सामान्य इच्छा-रूसो के अनुसार व्यक्तियों ने अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए एक समझौता किया तथा अपने ऊपर शासन करने की शक्ति को किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि समाज की सामान्य इच्छा को सौंप दिया। राज्य और सरकार इसी सामान्य इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं।सामान्य इच्छा का विचार रूसो का एक नया योगदान है। उसके अनुसार ‘सामान्य इच्छा केवल सभी की इच्छाओं का योगदान नहीं है, बल्कि सामान्य इच्छा सभी की जनहित से प्रेरित विवेकसम्मत इच्छाओं का योग है। जिसमें व्यक्तियों की भावनात्मक इच्छायें तथा स्वार्थपूर्ण इच्छायें शामिल नहीं होती हैं।’ इस प्रकार सामान्य इच्छा विवेकसम्मत है तथा सामान्य हित से प्रेरित है। रूसो ने सामान्य इच्छा की निम्न विशेषतायें बतलाई हैं,
    • (अ) सामान्य इच्छा विवेकसम्मत व सामान्य इच्छा से प्रेरित है।
    • (ब) सामान्य इच्छा सर्वोच्च तथा निरंकुश है।(स) सामान्य इच्छा सदैव सही है, अतः उसका विरोध नहीं किया जा सकता।
    • (द) सम्प्रभुता का निवास सामान्य इच्छा में ही है तथा राज्य उसका प्रतिनिधि मात्र है। रूसो ने लोकसम्प्रभुता के सिद्धान्त का समर्थन किया है जिसके अनुसार सम्प्रभुता जनसमुदाय की सामान्य इच्छा में निहित होती है।
    • (य) कानून सामान्य इच्छा की ही अभिव्यक्ति है।
    • (र) व्यक्ति की स्वतंत्रता इस बात में निहित है कि वह सामान्य इच्छा की आज्ञा का कहां तक पालन करता है। सामान्य इच्छा का पालन करना ही स्वतंत्रता है, क्योंकि सामान्य इच्छा का पालन करना अपनी ही इच्छा का पालन करना है। सामान्य इच्छा में ही व्यक्ति की अपनी इच्छा शामिल है।
  4. राज्य का स्वरूप ,रूसो ने सामान्य इच्छा के सिद्धान्त पर यह प्रतिपादित किया है कि राज्य अगर सामान्य इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है तो वह एक साथ लोकतांत्रिक व निरंकुश दोनों है। लोकतांत्रिक इसलिए है क्योंकि वह समुदाय की सामान्य इच्छा पर आधारित है और निरंकुश इसलिए है क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थिति में सामान्य इच्छा का विरोध नहीं कर सकता है। रूसो ने कहा है कि यदि व्यक्ति को स्वतंत्र बनाना है तो उसे सामान्य इच्छा की आज्ञा का पालन करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।समीक्षा—मानव स्वतंत्रता के समर्थन करने में रूसो का प्रमुख स्थान है। रूसो के प्रभाव के कारण ही फ्रांस की क्रांति में स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारा के नारों को शामिल किया गया। रूसो की इस बात के लिए आलोचना भी की जाती है कि उसकी सामान्य इच्छा की धारणा अस्पष्ट तथा भ्रामक है। सामान्य इच्छा यदि सबकी इच्छा नहीं है तो उसका व्यवहार में निर्धारण करना बहुत मुश्किल है। दूसरी आलोचना उसके विचारों में यह भी विरोधाभास है कि उसने एक साथ लोकतंत्र व निरंकुश शासन का समर्थन किया है, जोकि व्यवहार में संभव नहीं है। तीसरी आलोचना इस बात के लिए की जाती है कि उसने आधुनिक सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान आदि का विरोध किया है जोकि तर्कसंगत नहीं है।सामाजिक समझौता सिद्धान्त की आलोचना यद्यपि सामाजिक सामझौता सिद्धान्त के समर्थकों ने राज्य के दैवीय उत्पत्ति के सिद्धान्त की अवहेलना कर राज्य के बारे में इहलौकिक दृष्टिकोण अपनाया तथापि सामाजिक समझौता सिद्धान्त की अग्र आधारों पर आलोचना की जाती है-

1. ऐतिहासिक प्रमाण का अभाव- सामाजिक समझौता सिद्धान्त के तीनों समर्थक आरंभिक अवस्था में व्यक्तियों के बीच हुए समझौते का उल्लेख कर राज्य की उत्पत्ति की बात करते हैं। लेकिन मानव इतिहास में राज्य की स्थापना के लिये किये गये किसी ऐसे समझौते का उल्लेख नहीं मिलता। अतः समझौते की बात ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध नहीं होती।

2. विरोधाभाषों से पूर्ण—इस सिद्धान्त में तमाम विरोधाभाष भी हैं। उदाहरण कि लिये, हाब्स ने कहा कि सामाजिक समझौते से राज्य की उत्पत्ति होती है लेकिन समझौता होते ही राज्य निरंकुश हो जाता है। जिस राज्य की स्थापना व्यक्तियों द्वारा की गयी है वह लोकतांत्रिक होना चाहिये न कि निरंकुश, जबकि हाब्स व रूसो दोनों ही निरंकुश राज्यों के समर्थक हैं।

3. मानव स्वभाव का एकांगी चित्रण-सामाजिक समझौता सिद्धान्त के प्रतिपादकों ने मानव स्वभाव का चित्रण एकतरफा किया है जो कि परस्पर विरोधी है। हाब्स ने व्यक्ति को स्वार्थी तथा डरपोक कहा है, जबकि लॉक ने उसी व्यक्ति को सामाजिक प्राणी कहा है। इन दोनों से भिन्न रूसो ने व्यक्ति को आदर्श जंगली कहा है। वास्तव में मानव स्वभाव का सटीक चित्रण किसी ने भी नहीं किया है। प्रत्येक ने अपने सिद्धान्त की आवश्यकताओं के अनुसार ही मानव स्वभाव का चित्रण कर दिया जो एकांगी है1

4. अस्पष्टता-सामाजिक समझौते का सिद्धान्त अस्पष्टताओं का भी शिकार है। उदाहरण के लिये, रूसो की सामान्य इच्छा का सिद्धान्त नितान्त अस्पष्ट है। व्यावहारिक दृष्टि से यदि सामान्य इच्छा सबकी या बहुमत की इच्छा नहीं है तो फिर वह इच्छा क्या है? सामान्य इच्छा की खोज करना अथवा उसका निर्माण करना असंभव कार्य है।

5. तार्किकता का अभाव-सामाजिक समझौता सिद्धान्त तार्किकता से रहित है। उदाहरण के लिये, हाब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में स्वार्थी व चालाक होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ युद्ध की अवस्था में था। यदि ऐसा था तो अचानक सभी व्यक्ति समझौते के लिये तैयार कैसे हो गये ? शक्तिशाली व्यक्ति ऐसी स्थिति में समझौते के लिये कभी भी तैयार नहीं हो सकते हैं। यही तार्किकता का अभाव लॉक के सिद्धान्त में दिखाई देता है। लॉक के अनुसार यदि प्राकृतिक अवस्था सद्भाव की अवस्था थी तो व्यक्तियों को राज्य की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?

6. प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त आधुनिक युग में मान्य नहीं—लॉक का सिद्धान्त प्राकृतिक अधिकारों की मान्यता पर ही आधारित है। प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार होते हैं जिनका अस्तित्व राज्य से पूर्व होता है तथा उन्हें राज्य की मान्यता की आवश्यकता नहीं होती। वर्तमान में यह विचार मान्य नहीं है क्योंकि राज्य की मान्यता के बिना किसी भी अधिकार को व्यावहारिक दृष्टि से लागू करना संभव नहीं है। इसीलिये बेन्थम ने इन अधिकारों को मूर्खतापूर्ण बकवास कहकर इनकी निन्दा की है।

सामाजिक समझौता सिद्धान्त का महत्व-

1सामाजिक समझौते के पूर्व दैवीय उत्पत्ति के सिद्धान्त का बोलबाला था। इस सिद्धान्त में राज्यों की निरंकुशता का भाव निहित था तथा व्यक्तियों के अधिकारों की कोई मान्यता नहीं थी। इस सिद्धान्त के विपरीत सामाजिक समझौता सिद्धान्त ने एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिसका महत्व निम्नलिखित है—

  • 1. राज्य एक मानव निर्मित संस्था है, अतः उसे व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
  • 2.इसी कारण राज्य लोकतांत्रिक होना चाहिए तथा जनसहमति पर आधारित होना चहिए।
  • 3. व्यक्तियों के कतिपय आवश्यक अधिकार होते हैं। राज्य द्वारा जिनका सम्मान किया जाना चाहिए। इन अधिकारों में प्रमुख हैं—जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार तथा सम्पत्ति का अधिकार ।
  • 4. चूंकि राज्य एक मानव निर्मित संस्था है अतः कतिपय परिस्थितियों में व्यक्तियों को राजनीतिक सत्ता का विरोध करने का अधिकार भी प्राप्त है।
  • 5. सामाजिक समझौते के परिणामस्वरूप उदारवाद, लोकतंत्र तथ पूंजीवाद की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिला।

राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धान्त –

वर्तमान में राज्य की उत्पत्ति का सर्वमान्य सिद्धान्त विकासवादी सिद्धान्त ही है। इसे ऐतिहासिक सिद्धान्त के नाम से भी जानते हैं। सभी आधुनिक विचारक इस सिद्धान्त के समर्थक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य का निर्माण नहीं हुआ, बल्कि उसका धीरे-धीरे विकास हुआ है। गार्नर के शब्दों में, “राज्य न तो ईश्वर द्वारा निर्मित है, न ही यह उच्च भौतिक शक्ति का परिणाम है, न ही यह समझौते की उत्पत्ति है तथा न ही यह परिवार का विस्तार, बल्कि यह एक क्रमिक विकास का परिणाम है।” विकासवादी सिद्धान्त की दो प्रमुख विशेषतायें हैं—–प्रथम यह कि राज्य का जो वर्तमान स्वरूप है वो विभिन्न चरणों से होते हुए विकसित हुआ है। दूसरा, राज्य की उत्पत्ति की व्याख्या किसी एक तत्व के आधार पर नहीं की जा सकती, बल्कि इसका विकास कई तत्वों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम है। गार्नर, गैटेल, मैकाइवर, हाब हाउस, स्पेन्सर आदि इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक हैं। यह सिद्धान्त सर्वाधिक तार्किक व वैज्ञानिक है।

राज के विकास में सहायक तत्व-

मैं साइबर ने राज्य के विकास में निम्नलिखित छः तत्वों का योगदान दिया है-

(1) रक्त संबंध-मैकाइवर के अनुसार रक्त संबंध समाज का निर्माण करते हैं तथा समाज द्वारा राज्य का विकास किया जाता है। रक्त संबंधों के द्वारा ही परिवार की स्थापना होती है। परिवार बड़ा रूप धारण करके ग्राम में बदल जाता है तथा इसी तरह बड़े संगठन राज्य का धीरे-धीरे विकास होता है। रक्त संबंधों के कारण ही व्यक्तियों में आपसी सहयोग, त्याग, समन्वय, सामाजिकता आदि की भावना का विकास होता है और ये सभी तत्व राज्य के विकास में सहायक होते हैं। व्यक्ति सत्ता का प्रारंभिक रूप परिवार में ही सीखता है।

(2) धर्म-राज्य के विकास में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। धर्म के कारण एक विशेष धार्मिक पद्धति में विश्वास करने वाले लोग एक स्थान पर एकत्रित होते हैं तथा उनमें एकता का भाव विकसित होता है। एक धर्म के अनुयायियों में दायित्व का बोध भी स्वतः विकसित होता है। एकता के अतिरिक्त राज्य के विकास में धर्म का एक महत्वपूर्ण योगदान सत्ता के प्रति सम्मान की भावना का विकास है। प्राचीन समय में जब राज्य के कानून विकसित नहीं थे तो ईश्वर के भय के कारण या धर्म के भय के कारण व्यक्तियों ने सामाजिक हित के अनुकूल आचरण सुनिश्चित किया। संक्षेप में एकता, दायित्व, कर्तव्य बोध, सत्ता का सम्मान, कानून का अनुपालन आदि ऐसे तत्व हैं जिनके कारण राज्य के विकास में धर्म की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

(3) आर्थिक गतिविधियां-प्राचीन काल से ही व्यक्ति अपने जीपन-यापन के लिये आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहा है। एक जैसी आर्थिक गतिविधियां व्यक्तियों को एक साथ लाती हैं तथा उनमें सहयोग व समन्वय हेतु प्रेरित करती हैं। प्राचीन काल से लेकर मध्य युग तक मानव समुदाय की आर्थिक गतिविधियां आखेट अथवा कृषि कार्य पर आधारित थीं। इन गतिविधियों में व्यक्तियों को एक साथ रहने तथा आपस में सहयोग व समन्वय करने की आवश्यकता होती है। यांत्रिक कृषि का विकास बाद की घटना है। इसके पहले कृषि मानव व पशु श्रम पर आधारित थी। इस प्रकार की आर्थिक गतिविधियां व्यक्तियों में आपसी निर्भरता तथा सहयोग की भावना का विकास करती हैं। सहयोग तथा पारस्परिक सहयोग की भावना ने राज्य के विकास में भी योगदान दिया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आर्थिक परिस्थितियों ने राज्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
(4) शक्ति अथवा युद्ध-यद्यपि शक्ति को एक विघटनकारी तत्व माना जाता है लेकिन शक्ति ने मानव समुदाय को एकत्रित करने तथा एक जैसी व्यवस्था के अन्तर्गत लाने का भी काम किया है। यह विश्वास किया जाता है कि प्राचीन काल में जन समुदाय छोटे-छोट कबीलों में निवास करते थे। शक्तिशाली कबीलों ने कमजोर कबीलों पर शक्ति के बल पर अधिकार कर बड़े समुदाय की स्थापना की जो बाद में राज्य के रूप में विकसित हो गये। शक्ति की भूमिका व्यक्तियों को कानूनों के पालन हेतु बाध्य करने में भी महत्वपूर्ण है। यद्यपि व्यक्तियों में सामाजिक चेतना की भावना के कारण दूसरे व्यक्तियों तथा समाज के प्रति दायित्व बोध होता है लेकिन स्वार्थी व्यक्ति को केवल शक्ति के भय से ही कानूनों का पालन करने के लिये बाध्य किया जा सकता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शक्ति ने न केवल बड़े सामाजिक समूहों के विकास में सहयोग किया वरन् कानूनों के पालन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये दोनों ही तत्व राज्य के विकास में महत्वपूर्ण हैं।
(5) सामाजिकता की भावना—व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है। प्राचीन यूनानी विचारक अरस्तू का मत था कि जो व्यक्ति समाज में नहीं रहता है वह या तो देवता है अथवा पशु। इसका तात्पर्य यह है कि सामाजिकता की भावना व्यक्ति का स्वाभाविक गुण है। व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों के साथ समाज में रहना चाहता है। समाज में रहकर ही उसके व्यक्तित्व का विकास संभव है। सामाजिकता की इसी भावना के कारण समाज का विकास हुआ तथा सामाजिकता की भावना के कारण बाद में राज्य का क्रमिक विकास संभव हो सका। सामाजिकता की भावना ही व्यक्तियों में आपसी सहयोग तथा भाईचारे की भावना का विकास करती है, जो राज्य के विकास में सहायक सिद्ध होती है। अतः सामाजिकता की भावना राज्य के विकास में एक आवश्यक तत्व है।

(6) राजनीतिक चेतना—राजनीति चेतना का तात्पर्य किसी मानव समुदाय में राजनीतिक रूप से संगठित होने की भावना से है। यदि कोई राजनीतिक समुदाय सचेत होकर अपने को एक राजनीतिक में संगठित होने के लिये तत्पर होता है तभी हम कह सकते हैं कि वह समुदाय राजनीतिक रूप से सचेत है। यदि किसी राज्य में राज्य के रूप में विकास के सभी तत्व मौजूद हैं लेकिन उसमें राजनीतिक चेतना का अभाव है तो समाज न तो राजनीतिक रूप से संगठित हो सकता है और न ही राज्य की स्थापना का विकास कर सकता है। राजनीतिक चेतना ही वह तत्व है जो किसी मानव समुदाय को एक राजनीतिक संगठन अथवा राज्य व उसके कानूनों के अधीन संगठित होने के लिये उस समुदाय को प्रेरित करती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीतिक चेतना राज्य के विकास में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।
निष्कर्ष-राज्य की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों के अध्ययन के उपरान्त हम कह सकते हैं कि विभिन्न सिद्धान्तों में राज्य के विकास में सहायक किसी-न-किसी महत्वपूर्ण तत्व पर जोर दिया गया है| लेकिन यदि तार्किक दृष्टि से विवेचना की जाये तो यह स्पष्ट है कि विकासवादी सिद्धान्त ही सर्वाधिक तार्किक व विवेकसम्मत है। वस्तुतः राज्य का वर्तमान में हम जो स्वरूप देख रहे हैं वह अचानक नहीं आ गया वरन् क्रमशः विकसित होकर हमारे सामने आया है। आज भी राज्य का विकास जारी है। इस विकास यात्रा में राज्य का स्वरूप क्रमश: सरलता से जटिलता की ओर अग्रसर है। आज भी राज्य में नई संरचनाओं तथा ढांचों का विकास हो रहा है। आज जो राज्य का स्वरूप है एक शताब्दी बाद ही राज्य का स्वरूप उससे भिन्न होगा। निष्कर्षतः राज्य की उत्पत्ति के सभी सिद्धान्तों में विकासवादी अथवा ऐतिहासिक सिद्धान्त ही सर्वाधिक मान्य, तार्किक तथा वैज्ञानिक है।

प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न-

निम्नलिखित प्रश्नों में चार विकल्प दिए गए हैं उनमें से एक सही विकल्प छांट कर लिखिए-

  1. निम्नलिखित में कौन सामाजिक समझौता सिद्धान्त का समर्थक नहीं है ?
    (अ) जॉन लॉक
    (स) हाब्स
    (ब) रूसो (द) गार्नर
  2. निम्न में से कौन ऐतिहासिक अथवा विकासवादी सिद्धान्त का समर्थक नहीं है?
    (अ) हाब्स
    (स) गार्नर
    (ब) मैकाइवर
    (द) सर हेनरीमैन
  3. निम्न में से किस विचारक को फ्रांस की क्रान्ति का वैचारिक जनक माना जाता है ?
    (अ) हाब्स
    (ब) रूसो
    (स) गैटिल
    (द) गार्नर
  4. किस विचारक ने प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति को ‘आदर्श जंगली’ की संज्ञा दी है ?
    (अ) जॉन लॉक (स)रूसो
    (ब) हाब्स
    (द) इनमें से कोई नहीं
  5. निम्न में से कौन-सा अधिकार लॉक के प्राकृतिक अधिकारों में शामिल नहीं है?
    (अ) जीवन का अधिकार
    (स) स्वतंत्रता का अधिकार
    (ब) संपत्ति का अधिकार
    (द) समानता का अधिकार
  6. विकासवादी सिद्धान्त के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा तत्व राज्य के विकास में सहायक नहीं है?
    (अ) ईश्वरीय इच्छा
    (ब) रक्त सम्बन्ध
    (स) युद्ध ( द) आर्थिक परिस्थितियों
  7. किस विचारक ने व्यक्ति को स्वार्थी व डरपोक माना है ?
    (अ) रूसो
    (स) हाब्स
    (ब) लॉक
    (द) लास्की
  8. निम्नलिखित में से कौन रूसो की सामान्य इच्छा की विशेषता नहीं है ?
    (अ) बहुमत की इच्छा (स) सर्वोच्चता
    (ब) विवेकसम्मत
    (द) लोकहित से प्रेरित
  9. राज्य की उत्पत्ति का सर्वमान्य सिद्धान्त कौन-सा है ?
    (अ) सामाजिक समझौता सिद्धान्त। (ब) दैवीय उत्पत्ति का सिद्धान्त
    (स) विकासवादी सिद्धान्त। (द) शक्ति सिद्धान्त
  10. किसने कहा है कि राज्य गांवों से विकसित हुआ है ?
    (अ) रूसो
    (ब) हाब्स
    (स) अरस्तू
    (द) मार्क्स

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. ‘लेवियाथन’ पुस्तक के लेखक कौन हैं?

उत्तर-‘लेवियाथन’ नामक पुस्तक के लेखक थॉमस हाब्स हैं।


प्रश्न 2. राज्य के विकासवादी सिद्धान्त के दो समर्थकों के नाम लिखिए।

उत्तर-राज्य के विकासवादी सिद्धान्त के दो समर्थक हैं—मैकाइवर तथा गार्नर ।

प्रश्न 3. रूसो की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।


उत्तर-रूसो की पुस्तक का नाम सोशल कान्ट्रैक्ट है।


प्रश्न 4. किसने कहा था, ‘व्यक्ति स्वतंत्र पैदा हुआ है लेकिन वह सर्वत्र बन्धनों में है । ‘


उत्तर—यह कथन रूसो का है।


प्रश्न 5. राज्य की उत्पत्ति का सर्वमान्य सिद्धान्त कौन-सा है?


उत्तर—विकासवादी सिद्धान्त राज्य की उत्पत्ति का सर्वमान्य सिद्धान्त है।


प्रश्न 6. सामाजिक समझौता सिद्धान्त ने राज्य की उत्पत्ति के किस सिद्धान्त की आलोचना की थी?

उत्तर—सामाजिक समझौता सिद्धान्त ने राज्य की दैवीय उत्पत्ति के सिद्धान्त की आलोचना की थी।


प्रश्न 7. किसने कहा था, ‘राज्य का निर्माण नहीं विकास हुआ है। ‘
उत्तर—यह कथन गार्नर का है।


प्रश्न 8. राज्य के विकास में सहायक दो तत्वों का उल्लेख कीजिए।


उत्तर—राज्य के विकास में सहायक दो तत्व हैं— 1. रक्त सम्बन्ध तथा 2. राजनीतिक चेतना ।

प्रश्न 9. सामाजिक समझौता सिद्धान्त के किस विचारक ने दो समझौतों की बात की है?

उत्तर—जॉन लॉक ने दो समझौतों की बात की है।


प्रश्न 10. रूसो की सामान्य इच्छा की दो विशेषतायें लिखिए।


उत्तर—रूसो की सामान्य इच्छा की दो विशेषतायें हैं— 1. सर्वोच्चता तथा 2. सार्वजनिक हित से प्रेरित।

प्रश्न 11. किस विचारक को उदारवाद का प्रतिपादक माना जाता है?
उत्तर—जॉन लॉक को उदारवाद का प्रतिपादक माना जाता है।


प्रश्न 12. सर हेनरीमैन राज्य की उत्पत्ति के किस सिद्धान्त के समर्थक हैं?


उत्तर—सर हेनरीमैन राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धान्त के समर्थक हैं।


प्रश्न 13. किस विचारक ने कहा था कि प्राकृतिक अवस्था प्रत्येक की प्रत्येक के विरुद्ध युद्ध की
अवस्था थी?


उत्तर—यह विचार थॉमस हाब्स का है।


प्रश्न 14. किस विचारक ने इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति का समर्थन किया था?

उत्तर—जॉन लॉक ने इंग्लैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति का समर्थन किया था।


प्रश्न 15. किस विचारक ने प्राकृतिक अधिकारों को ‘व्यर्थ की बकवास’ माना है?

उत्तर—जेरेमी बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों को व्यर्थ की बकवास माना है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

1.दैवीय उत्पत्ति के सिद्धान्त के दो समर्थकों के नाम बताइए |

उत्तर -राज्य के दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत के दो समर्थक 1-जेम्स प्रथम 2-रॉबर्ट फिलमर|

2.राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक सिद्धान्त की दो विशेषताएं बताइए ।

उत्तर-राज्य के उत्पत्ति के दो ऐतिहासिक सिद्धांत की विशेषता प्रथम राज्य का जो वर्तमान स्वरूप है वह विभिन्न चरणों से होते हुए विकसित हुआ है

दूसरा राज्कीय उत्पत्ति की व्याख्या किसी एक तत्व के आधार पर नहीं की जा सकती बल्कि इसका विकास कई तत्वों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम हैं|

3.रूसो की सामान्य इच्छा की दो विशेषतायें लिखिए।

उत्तर-रूसो की समान इच्छा की दो विशेषता पहला समान इच्छा सर्वोच्च तथा निरंकुश है दूसरा कानून सामान इच्छा की ही अभिव्यक्ति है|

4.लॉक के अनुसार तीन प्राकृतिक अधिकार क्या हैं?राज्य के विकास में सहायक दो तत्वों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर-लाँक के अनुसार तीन प्राकृतिक अधिकार जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार ,संपत्ति का अधिकार|

1.हाब्स के अनुसार मानव स्वभाव का चित्रण कीजिए।

उत्तर-मानव स्वभाव-हाब्स ने मानव स्वभाव का नकारात्मक चित्रण किया है उसके अनुसार व्यक्ति स्वार्थी डरपोक ,तथा चालक होते हैं और वे सदैव अपने हितों की पूर्ति में संलग्न रहते हैं|

2.लॉक के प्राकृतिक अधिकारों की विवेचना कीजिए।

उत्तर-लाक ने प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति के तीन अधिकार स्वीकार किए हैं जीवन का अधिकार स्वतंत्रता का अधिकार तथा संपत्ति का अधिकार जान लाख में इन तीनों ही अधिकारों में संपत्ति के अधिकार को सबसे अधिक महत्व दिया है क्योंकि वह संपत्ति श्रम सिद्धांत का समर्थक है जिसके अनुसार व्यक्ति की संपत्ति में उसके श्रम के रूप में उसका व्यक्तित्व भी शामिल होता है

3. रूसो की सामान्य इच्छा की विशेषतायें बताइए ।

उत्तर-रूसो के अनुसार व्यक्तियों ने अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए एक समझौता किया तथा अपने ऊपर शासन करने की शक्ति को किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि समाज की समान इच्छा को सॉफ्टवेयर राज्य और सरकार किसी सामान इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं|

4.लॉक के अनुसार राज्य के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।

उत्तर-लाक के अनुसार राज्य का स्वरूप सरकार जन सहमति पर आधारित होगी सरकार को व्यक्तियों के प्राकृतिक अधिकारों के उल्लंघन का अधिकार नहीं होगा यह सरकार व्याख्या इन अधिकारों का उल्लंघन करती है अथवा इन अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होती तो व्यक्तियों को सरकार का विरोध करने का अधिकार होगा|

5.राज्य के विकास में सहायक किन्हीं चार तत्वों का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर-राज्य के विकास में सहायक चार तत्व निम्नलिखित है-

1-रक्त संबंध में मैकाइबर के अनुसार रक्त संबंध समाज का निर्माण करते हैं तथा समाज द्वारा राज्य का विकास किया जाता है रक्त संबंधों के द्वारा ही परिवार की स्थापना होती है |

धर्म राज्य के विकास में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका रही है धर्म के कारण एक विशेष धार्मिक पद्धति में विश्वास करने वाले लोग एक स्थान पर एकत्रित होते हैं तथा उनमें एकता का भाव विकसित होता है एकता की अतिरिक्त राज्य के विकास में धर्म का एक महत्वपूर्ण योगदान सत्ता के प्रति सम्मान की भावना का विकास है|

3-आर्थिक गतिविधियां प्राचीन काल से ही व्यक्ति अपने जीवन यापन के लिए आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहा है एक जैसी आर्थिक गतिविधियां व्यक्तियों को एक साथ लाती हैं|

4-राजनीतिक चेतना-राजनीति चेतना का तात्पर्य किसी मानव समुदाय में राजनीतिक रूप से संगठित होने की भावना से है|

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न-

1.सामाजिक समझौता सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।
2.राज्य की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों का उल्लेख करते हुए ऐतिहासिक अथवा विकासवादी सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
3.राज्य की उत्पत्ति के विषय में हाब्स, लॉक व रूसो के विचारों की तुलना कीजिए।
4.राज्य की उत्पत्ति के विषय में रूसो की सामान्य इच्छा के सिद्धान्त की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। सामाजिक 5.समझौता सिद्धान्त क्या है? इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।
6.राज्य की उत्पत्ति का सर्वमान्य सिद्धान्त की विस्तार से विवेचना कीजिए।

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