राज्यों के कार्यों के सिद्धांत अध्याय-2 THEORIES OF THE FUNCTIONS OF STATES CHAPTER-2

कौटिल्य के अनुसार राज्य का कार्य क्षेत्र आती विस्तृत होना चाहिए प्रजा को सुशिक्षित करने समृद्ध बनाने और उसके हित संपादन हेतु राज्य द्वारा सभी संभव प्रयत्न किए जाने चाहिए|

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एन.सी. बंधोपाध्याय

राज शब्द है या साधन-

नागरिक शास्त्र के अध्ययन में यह प्रश्न बहुत अधिक विवादग्रस्त रहा है कि राज्य अपने आप में साध्य है या मनुष्य के हित और कल्याण का साधन मात्र है। इस सम्बन्ध में दोनों ही पक्षों की विवेचना इस प्रकार है :राज्य साध्य है (State is an End)–अनेक विद्वानों का यह विचार रहा है कि राज्य मानव जीवन का उच्चतम लक्ष्य और अपने आप में एक साध्य है। प्लेटो और कुछ सीमा तक अरस्तू ने इसी विचार का प्रतिपादन किया है कि ‘राज्य स्वयं साध्य है।’ इन यूनानी विचारकों के अनुसार व्यक्तियों का सर्वोत्कृष्ट जीवन राज्य में ही सम्भव हो सकता है और इस बात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है कि राज्य के हित से पृथक् व्यक्तियों का हित हो सकता है। सामान्य इच्छा के प्रतिपादक रूसो और हीगल, ब्रेडले, बोसांके आदि आदर्शवादी विचारकों तथा ट्रीटश्के, नीत्से आदि जर्मन विचारकों ने इसी धारणा का प्रतिपादन किया है। राज्य को साध्य मानने से व्यक्ति का महत्व गौण हो जाता है तथा उसकी स्वतन्त्रता व अधिकारों का कोई महत्व नहीं होता। राज्य का विकास व उसका हित सर्वोपरि है। फासीवादी विचारक मुसोलिनी ने भी राज्य को साध्य माना है। आदर्शवादी विचारक नैतिकता के आधार पर राज्य को व्यक्ति से श्रेष्ठ मानते हैं।

राज्य साधन मात्र है (State is merely a Means) — राज्य को साध्य मानने के नितान्त विपरीत दूसरी ओर अनेक विचारकों ने व्यक्ति को साध्य मानकर राज्य को उसके हित का साधन मात्र माना है। व्यक्ति वादियों ने राज्य को साधन माना है। इनमें जे. एस. मिल का नाम प्रमुख है। इसके अतिरिक्त लॉक तथा बेंथम ने राज्य को साधन मानकर उसकी व्याख्या की है। यूनानी विचारधारा के विपरीत भारतीय विचारधारा में राज्य को साधन मानते हुए कहा गया है कि “राज्य द्वारा धर्म, अर्थ तथा काम त्रिवर्ग की साधना होती है।” उदारवाद अराजकतावाद, व्यक्तिवाद और बहुलवाद के द्वारा भी इसी प्रकार के विचार का प्रतिपादन किया गया है। राज्य की सत्ता के सबसे प्रबल विरोधी अराजकतावादी हैं जिनके मतानुसार राज्य होना ही नहीं चाहिए और राज्य की सत्ता का पूर्ण अन्त कर देने में ही व्यक्ति का कल्याण निहित है। राज्य को साधन मानने वाले विचारक राज्य को प्राकृतिक के स्थान पर कृत्रिम संस्था मानते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति राज्य की गतिविधियों का केन्द्र है।

निष्कर्ष—मूल बात यह है कि राज्य को साध्य मानने से व्यक्ति का महत्व गौण हो जाता है तथा उसे साधन मानने से व्यक्ति का महत्व बढ़ जाता है। राज्य अपने आप में एक साध्य है, इस विचार को स्वीकार करने का परिणाम तो एक सर्वाधिकारवादी राज्य की स्थापना होगी, जिसे वर्तमान समय में स्वीकार किया ही नहीं जा सकता। इसके साथ ही अराजकतावादी, व्यक्तिवादी या बहुलवादी दृष्टिकोण को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता, जिसके अन्तर्गत राज्य को एक सामान्य साधन मात्र माना गया है। वस्तुतः राज्य अपनी सदस्यता की अनिवार्यता और व्यक्तियों के सम्पूर्ण हितों का प्रतिनिधित्व करने के कारण दूसरे समुदायों से अत्यन्त उच्च स्थिति रखता है। राज्य को मानव कल्याण का एक साधन कहा जा सकता है, लेकिन यह साधन इतना महत्वपूर्ण है कि इसके बिना व्यक्तियों के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। राज्य का लक्ष्य किसी एक पीढ़ी के व्यक्तियों या समुदायों के कल्याण से कही अधिक होता है। वास्तव में, राज्य और व्यक्ति एक-दूसरे पर इतनी अधिक सीमा तक निर्भर हैं कि इनमें साध्य और साधन का विवाद खड़ा करना ही नितान्त अनुचित है।

राज्य के उद्देश्य

राज्य को मानवीय कल्याण का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण साधन माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उपस्थित होता है कि वे कौन-से विविध उद्देश्य हैं, जिनकी साधना राज्य के द्वारा की जाती है। इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य के स्वरूप और संगठन में जैसे-जैसे परिवर्तन होते गये, वैसे-वैसे राज्य के उद्देश्यों से सम्बन्धित विचारधारा भी परिवर्तित होती रही है।
राज्य के उद्देश्यों के सम्बन्ध में जो विचार व्यक्त किये गये हैं, यद्यपि उनमें पर्याप्त भेद हैं, लेकिन फिर भी कुछ ऐसे उद्देश्य हैं, जिनका उल्लेख सभी विचारकों द्वारा समान रूप से किया गया है। सामान्य धारणा के आधार पर राज्य के निम्न उद्देश्य बताये जा सकते हैं |

(1) सामूहिक हित के कार्यों का संपादन,- वर्तमान समय में मानव जीवन अत्यंत जटिल हो गया है ऐसी स्थिति में यातायात और डाक व्यवस्था, मुद्रा चलन, उद्योगों की स्थापना, आदि ऐसे कार्य हो गये हैं जिनका सम्पादन राज्य के द्वारा ही किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, राज्य का उद्देश्य व्यक्तियों के शारीरिक और मानसिक स्तर की उन्नति भी है। अरस्तू का कथन है कि राज्य मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अस्तित्व में आया है, लेकिन व्यक्ति के जीवन को अच्छा बनाने के लिए बना हुआ है।

(2) शान्ति व्यवस्था और सुरक्षा की स्थापना-सभी विचारकों द्वारा इस बात को स्वीकार किया गया है कि राज्य का सर्वप्रथम उद्देश्य शान्ति और व्यवस्था की ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना है, जिनमें व्यक्तियों के द्वारा सुरक्षा पूर्वक अपना जीवन व्यतीत किया जा सके|

(3) राजसत्ता और वैयक्तिक स्वतन्त्रता के मध्य सामंजस्य की स्थापना—राज्य और व्यक्ति के बीच उचित सम्बन्धों की स्थापना नागरिक जीवन की सबसे प्राचीन समस्या रही है। इस सम्बन्ध में वर्तमान समय में इस बात की आवश्यकता अनुभव की जाती है कि शासक वर्ग की सत्ता और व्यक्ति की स्वतन्त्रता के मध्य ऐसा सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए कि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें और साथ-ही-साथ अन्य व्यक्तियों के विकास में बाधक न हों।

(4) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं मानवीय सभ्यता का विकास-अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और मानवीय सभ्यता का विकास भी राज्य का उद्देश्य कहा जा सकता है। विज्ञान और राजनीतिक चेतना ने विश्व के देशों को इतना अधिक समीप ला दिया है कि विश्व के अन्य देशों से पृथक् रहकर कोई भी राज्य अपना विकास नहीं कर सकता है।वस्तुतः जिस प्रकार राज्य के स्वरूप और संगठन में परिवर्तन होते रहते हैं उसी प्रकार परिवर्तित वातावरण और विचारधाराओं के कारण राज्य के उद्देश्य से सम्बन्धित विचारों में भी परिवर्तन होते रहते हैं। वर्तमान समय की प्रजातन्त्रात्मक शासन-व्यवस्था को दृष्टि में रखते हुए एक शब्द में राज्य का उद्देश्य लोकहित या लोककल्याण कहा जा सकता है।

राज्य के कार्य –

राज्य के कार्य देशकाल की परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहे हैं। प्रारम्भिक काल में राज्य के द्वारा केवल वे ही कार्य किये जाते थे, जिनका करना राज्य के अस्तित्व के लिए नितान्त आवश्यक होता था, किन्तु वर्तमान समय में राज्य के द्वारा किये जाने वाले कार्य इतने अधिक बढ़ गये हैं कि उनकी एक सूची बनाना सम्भव नहीं है। वर्तमान समय में राज्य के द्वारा जो कार्य किये जाते हैं उनका वर्गीकरण दो शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है : (1) आवश्यक या अनिवार्य कार्य, तथा (2) ऐच्छिक कार्य।

राज्य के आवश्यक कार्य-आवश्यक कार्यों में राज्य के वे कार्य सम्मिलित हैं, जिनका करना राज्य को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए नितान्त आवश्यक है। प्रत्येक राज्य के द्वारा चाहे वह कितना ही पिछड़ा हुआ क्यों न हो, इन आवश्यक कार्यों को पूरा किया जाता है। ये आवश्यक कार्य अग्रलिखित हैं

(1) बाहरी आक्रमण से रक्षा—बाहरी आक्रमण से अपनी सीमाओं की रक्षा राज्य का एक ऐसा कार्य है, जिसे पूरा किये बिना राज्य अपने अस्तित्व की ही रक्षा नहीं कर सकता। राज्य के द्वारा यह कार्य एक व्यवस्थित और संगठित जल, थल और वायु सेना के द्वारा पूरा किया जाता है।

(2) वैदेशिक सम्बन्धों का संचालन—बाहरी आक्रमण से अपनी रक्षा करने हेतु राज्य एक सुसंगठित सेना रखता है, किन्तु बाहरी आक्रमण की स्थिति उत्पन्न न हो और अन्य राज्यों के साथ परस्पर हितकारी सम्बन्ध बने रहें, इसके लिए राज्य के द्वारा वैदेशिक सम्बन्धों का संचालन किया जाता है। अन्य राज्यों के राज्य द्वारा अत्यन्त प्रारम्भिक काल से किया जाता रहा है। इस कार्य के अन्तर्गत राज्य अपने राजदूत भेजता है और अन्य देशों के राजदूतों के लिए अपने यहां साथ सम्बन्ध स्थापित करने का यह राजदूत दूसरे देशों रहने की व्यवस्था करता है।
(3) आन्तरिक क्षेत्र में शान्ति और व्यवस्था — राज्य का एक मुख्य कार्य नागरिकों के जान-माल की रक्षा, आन्तरिक उपद्रवों से उनका बचाव तथा उनकी व्यक्तिगत स्वाधीनता की रक्षा करना है। शान्ति और व्यवस्था स्थापित करने में असमर्थ राज्य, राज्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता। शान्ति और व्यवस्था स्थापित करने हेतु राज्य पुलिस दल की व्यवस्था करता है और विशेष परिस्थितियों में राज्य इस कार्य हेतु सेना का प्रयोग भी करता है।
(4) न्याय प्रबन्ध – शान्ति और व्यवस्था स्थापित करने का कार्य केवल सेना और पुलिस के द्वारा ही नहीं किया जा सकता वरन् इसके लिए उत्तम न्याय प्रबन्ध भी आवश्यक होता है। अतः न्याय प्रबन्ध भी राज्य का एक अनिवार्य कार्य है। एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति तथा व्यक्ति और राज्य के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों को हल करने के लिए प्रत्येक राज्य में न्यायालयों की स्थापना की जाती है।
गैटिल के अनुसार, राज्य के इन आवश्यक कार्यों में आर्थिक कार्य को भी सम्मिलित करना है जिसके अन्तर्गत राज्य के द्वारा कर निर्धारित करना, आयात-निर्यात कर लगाना, मुद्रा सम्बन्धी व्यवस्था करना, भूमि, जंगल और सार्वजनिक सम्पत्ति का प्रबन्ध करना, डाक और रेल का प्रबन्ध, आदि कार्य आते हैं।
यह उल्लेखनीय है कि जो राज्य केवल अनिवार्य कार्य करता है। उसे पुलिस राज्य (Police State) कहा जाता है। 20वीं शताब्दी के पूर्व राज्य का स्वरूप पुलिस राज्य का ही था।
राज्य के ऐच्छिक कार्य
ऐच्छिक कार्य का आशय उन कार्यों से होता है जिनका करना राज्य के अस्तित्व के लिए तो आवश्यक नहीं होता, किन्तु जो नागरिकों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हित में होते हैं। ये कार्य स्वतन्त्र रूप से व्यक्तियों द्वारा भी किये जा सकते हैं, किन्तु व्यक्तियों की तुलना में राज्य ये कार्य अधिक अच्छे प्रकार से कर सकता है। वर्तमान समय में ऐसा माना जाता है कि राज्य के द्वारा अधिक-से-अधिक ऐच्छिक कार्य किये जाने चाहिए। राज्य के ऐसे ऐच्छिक कार्य निम्नलिखित होते हैं :
(1) शिक्षा-शिक्षा श्रेष्ठ सामाजिक जीवन की प्रथम अवस्था है और शिक्षा के बिना कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता है। इसलिए वर्तमान समय के प्रत्येक राज्य में जनता को शिक्षित करने के कार्य पर अत्यधिक बल दिया जाता है। सामान्यतया ऐसा माना जाता है कि राज्य के द्वारा निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। वर्तमान युग में औद्योगिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए और नागरिकों के मानसिक विकास के लिए वाचनालय, पुस्तकालय और प्रयोगशालाओं की स्थापना की जानी चाहिए।
(2) स्वास्थ्य-रक्षा और सफाई—जीवन का आनन्द अच्छे स्वास्थ्य पर ही निर्भर है और स्वस्थ व्यक्ति ही सामाजिक जीवन के कर्तव्यों को भली-भांति पूर्ण कर सकता है। जनता के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए राज्य अनेक प्रकार के कानून बनाता है जिनके द्वारा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक स्थितियों को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है। इनके अतिरिक्त, सफाई, रोशनी, स्वच्छ जल, अस्पताल, नर्सिंग होम, आदि का प्रबन्ध भी राज्य के द्वारा किया जाता है जिससे नागरिकों की शरीर की रक्षा और उनका शारीरिक विकास संभव हो सके|

(3) यातायात के साधनों का प्रबन्ध-आधुनिक समय में यातायात के साधन देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन के प्राण हैं। आज कोई भी राज्य सड़कें, रेलें, ‘हवाई जहाज, रेडियो, टेलीफोन, कारखाने, आदि की सुविधा के बिना जीवित नहीं रह सकता है। जनता की सुविधा तथा देश के आर्थिक विकास के लिए राज्य के द्वारा इन सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाता है।

(4) व्यापार व उद्योग-धन्धों की सहायता — राज्य का एक महत्वपूर्ण कार्य व्यापार व उद्योग-धन्धों की सहायता है। राज्य के द्वारा यह कार्य अनेक साधनों द्वारा किया जाता है; जैसे आयात किये गये माल पर कर लगाना, उद्योगों को वित्तीय सहायता. औद्योगिक अन्वेषण केदो की स्थापना मेलों और प्रदर्शनियों का प्रबंध है वैज्ञानिक शिक्षा प्रदान करना आदि|..

(5) श्रमिकों का कल्याण-श्रमिकों का कल्याण भी राज्य का एक महत्वपूर्ण कार्य है और वर्तमान समय में राज्य श्रमिकों की पूंजीपतियों व बड़े जमींदारों से रक्षा करने के लिए फैक्टरी कानून व न्यूनतम मजदूरी कानून, आदि का निर्माण करता है।
(6) बैंकिंग और मुद्रा का प्रबन्ध – विश्व के प्रायः सभी सभ्य देशों में राज्य के द्वारा मुद्रा का प्रबन्ध किया जाता है और अन्य देशों के साथ अपनी मुद्रा की विनिमय दर निर्धारित की जाती है।
(7) कृषि की उन्नति और ग्राम संगठन-वर्तमान समय में सरकार कृषि की उन्नति तथा ग्रामीण संगठन के कार्य पर भी जोर देती है। कृषि की उन्नति के लिए बिजली, कुओं, कृषि अनुसंन्धान तथा इसी प्रकार की दूसरी सुविधाएं दी जाती हैं और ग्रामीण संगठन के लिए ग्राम पंचायत, आदि की स्थापना की जाती है।
(8) असहाय, अपाहिज और वृद्ध व्यक्तियों की सहायता-वर्तमान समय का राज्य एक कल्याणकारी संस्था है और राज्य के द्वारा बूढ़े, निर्धन, अन्धे, असहाय और अपाहिज लोगों की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के कार्य किये जाते हैं। कुछ राज्यों में बेकार लोगों को सहायता देने तथा वृद्धावस्था में लोगों को पेंशन देने का प्रबन्ध भी किया जाता है।
(9) मनोरंजन की व्यवस्था —स्वस्थ मनोरंजन सफल व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन की आधारशिला है। अतः राज्य के द्वारा अपने नागरिकों को स्वस्थ मनोरंजन के साधन प्रदान करने का कार्य भी किया जाता है। राज्य बगीचे और पार्क, खेलकूद के मैदान, सार्वजनिक तरण तालों, सिनेमा, रेडियो, नाट्य-गृहों, आदि का प्रबन्ध करता है। अपने इसी कार्य के अन्तर्गत राज्य के द्वारा चलचित्रों और नृत्यघरों पर नियन्त्रण रखा जाता है, जिससे मनोरंजन अश्लील न हो जाय ।
(10) सामाजिक सुधार — वर्तमान समय में राज्य के द्वारा सामाजिक उन्नति और सुरक्षा के लिए भी कार्य किया जाता है। उदाहरण के लिए, भारत में राज्य के द्वारा अस्पृश्यता, जाति-पांति के भेद, बाल-विवाह और बहु-विवाह के विरुद्ध प्रयत्न किये गये हैं। प्रत्येक प्रगतिशील राज्य का धर्म है कि वह सामाजिक बुराइयों को दूर करे।
वास्तव में राज्य के ऐच्छिक कार्य इतने अधिक हैं कि उनकी कोई एक सूची बनाना सम्भव नहीं है। राज्य का कार्य नागरिकों को वे सभी सुविधाएं और अवस्थाएं प्रदान करना है जिनके द्वारा उनकी भलाई और उन्नति हो सकती है। राज्य के ऐच्छिक कार्य भी आज आवश्यक कार्यों के समान ही महत्वपूर्ण हो गये हैं। कल तक राज्य के जिन कार्यों को उसके ऐच्छिक कार्य समझा जाता था, वे आज आवश्यक प्रतीत होने लगे हैं। सभ्यता के विकास के साथ-साथ राज्य का कार्यक्षेत्र बढ़ता ही जा रहा है।
राज्य के जो अनिवार्य और ऐच्छिक कार्य बताये गये हैं उन कार्यों को एक लोकतन्त्रात्मक और लोककल्याणकारी राज्य ही ठीक प्रकार से कर सकता है। लोककल्याणकारी राज्य 20वीं शताब्दी में अस्तित्व में आए। इनका कार्य क्षेत्र विस्तृत है तथा ये पुलिस राज्य के विपरीत जनकल्याण के कई कार्य करते हैं।



राज्य का कार्यक्षेत्र : विविध विचारधाराएं-

जिस प्रकार राज्य के उद्देश्यों के सम्बन्ध में विचार परिवर्तित होते रहे हैं उसी प्रकार राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में भी विचार बदलते रहे हैं। राज्य का कार्यक्षेत्र संकुचित होना चाहिए या व्यापक, इस सम्बन्ध में अब तक अनेक विचारधाराओं का प्रतिपादन किया जा चुका है, जिनमें व्यक्तिवाद, समाजवाद और लोककल्याणकारी राज्य की धारणा सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।

1-व्यक्तिवाद

राज्य और राज्य के कार्यों के संबंध में व्यक्तिवादी धारणा –व्यक्तिवाद के अनुसार राज्य शक्ति के आधार पर कार्यकर्ता है लेकिन शक्ति के आधार पर किए गए राज्य के कार्य व्यक्ति के लिए असुविधा जनक और कष्टकर होते हैं। व्यक्ति के व्यक्तित्व का उच्चतम विकास स्वविवक के आधार पर कार्य करने पर ही सम्भव है, क्योंकि राज्य इस मार्ग में बाधक है, इसलिए राज्य बुराई का प्रतीक है। लेकिन चोर, उचक्कों और हत्यारों के रूप में समाज में कुछ ऐसे अवांछनीय तत्व होते हैं, जिन पर नियन्त्रण रखने के लिए राज्य का अस्तित्व आवश्यक है। इस प्रकार व्यक्तिवाद के अनुसार राज्य एक आवश्यक बुराई है, जिसका कार्यक्षेत्र अत्यन्त सीमित होना चाहिए। फ्रीमैन के शब्दों में, “वही सरकार सबसे अच्छी है, जो सबसे कम शासन करती है।” व्यक्तिवादी राज्य के कार्य और व्यक्ति की स्वतन्त्रता को एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं और इस बात का प्रतिपादन करते हैं कि व्यक्ति की स्वतन्त्रता के हित में राज्य के द्वारा कम-से-कम कार्य ही किये जाने चाहिए।व्यक्तिवाद के अनुसार राज्य का अस्तित्व व्यक्तियों की कुप्रवृत्तियों को नियन्त्रित रखने के लिए ही है, अतः राज्य का कार्यक्षेत्र निषेधात्मक ही होना चाहिए, सकारात्मक नहीं। हम्बोल्ट का कथन है कि “प्रत्येक नागरिक की प्रवृत्तियों और पूर्ण व्यक्तित्व का विकास ही राज्य का उद्देश्य होना चाहिए और इसलिए उसे केवल उन्हीं कार्यों को करना चाहिए, जिन्हें व्यक्ति स्वयं न कर सके, जैसे सुरक्षा।

“व्यक्तिवादी विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा केवल निम्नलिखित कार्य ही किये जाने चाहिए : (1) राज्य व राज्य के नागरिकों की बाहरी शत्रुओं से रक्षा करना;(2) नागरिकों की सुरक्षा और मानहानि से उनकी रक्षा करना;(3) लूटमार या अन्य प्रकार की क्षति से सम्पत्ति की रक्षा करना;(4) संविधान के निर्वाह की व्यवस्था करना ।व्यक्तिवादियों के अनुसार वही सरकार सबसे अच्छी है जो कम शासन करती है। मिल का मानना है कि “राज्य एक आवश्यक बुराई है।”

व्यक्तिवाद का समर्थन (Support of Individualism)इस सिद्धान्त का प्रतिपादन यूरोप में 18वीं सदी के अन्तिम काल में हुआ था। इसके मुख्य समर्थक जॉन स्टुअर्ट मिल, एडम स्मिथ, हरबर्ट स्पेन्सर, रिकार्डो तथा माल्थस थे। जॉन स्टुअर्ट मिल इनमें निश्चित रूप से सबसे अधिक प्रमुख हैं। इस सिद्धान्त के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं :(1) नैतिक तर्क—व्यक्तिवादियों के अनुसार मनुष्य समाज में उसी समय उन्नति कर सकता है,जबकि उसे अपने विवेक के अनुसार कार्य करने के लिए स्वाधीन छोड़ दिया जाय। यदि राज्य के द्वारा व्यक्तियों के कार्यों में हस्तक्षेप किया गया तो, व्यक्तियों का आत्मबल और आत्मविश्वास नष्ट होगा, उनमें स्वयं नया कार्य प्रारम्भ करने की शक्ति नहीं रहेगी, उनका विकास रुक जायेगा और वे दूसरों पर निर्भर रहने लगेंगे। इसके अतिरिक्त, स्वयं व्यक्ति ही अपने हितों के सम्बन्ध में ठीक प्रकार से निर्णय कर सकता है। अतः राज्य अपने आदेश-निर्देश के आधार पर व्यक्तियों के नैतिक विकास में बाधक ही होगा। मिल के शब्दों में, “राजकीय सहायता व्यक्ति के आत्मविश्वास के भाव को नष्ट कर देती है। यह उसके उत्तरदायित्व को दुर्बल बनाती और चरित्र के विकास को कुण्ठित कर देती है।”

(2) आर्थिक तर्क—व्यक्ति अपने आर्थिक हितों को सबसे अधिक अच्छे प्रकार से समझ सकता और अपने ही लाभों की प्रेरणा के आधार पर आर्थिक उन्नति के लिए सबसे अच्छे प्रकार से कार्य कर सकता है। इसके अतिरिक्त, आर्थिक क्षेत्र के प्राकृतिक नियमों-मांग और पूर्ति के नियम तथा स्वतन्त्र प्रतियोगिता के नियम—को स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करने दिया जाय, तो समस्त आर्थिक गतिविधियां भली-भांति चलती रहती हैं, अतः राज्य के द्वारा आर्थिक क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। एडम स्मिथ तथा रिकार्डो का विचार है कि ‘“आर्थिक क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप कम होने से न केवल उत्पादन में वृद्धि होगी, वरन् इसके साथ-ही-साथ उत्पादित वस्तुओं के गुण भी उच्चतर होंगे, पिछड़े हुए देशों का आर्थिक विकास होगा और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की उन्नति होगी।” आर्थिक क्षेत्र में राज्य को दूर रखने के विचार को अहस्तक्षेप की नीति (Laissez faire) कहते हैं।
(3) प्राणिवैज्ञानिक तर्क (Biological Argument)—हरबर्ट स्पेन्सर ने डार्विन की विकासवादी विचारधारा के आधार पर सामाजिक जीवन के क्षेत्र में ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ (Struggle for existence) तथा ‘योग्यतम की विजय’ (Survival of the fittest) के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया । स्पेन्सर का विचार है कि असहाय, दरिद्र और बूढ़े व्यक्तियों की सहायता करने से सामूहिक रूप से समाज को लाभ की अपेक्षा बहुत अधिक हानि उठानी पड़ती है, अतः राज्य के द्वारा समाज के इन निर्बल तत्वों की सहायता नहीं की जानी चाहिए। स्वयं स्पेन्सर के ही शब्दों में, “यदि हम शक्तिशाली और कर्मठ सन्तति का विकास करना चाहते हैं तो हमें मनुष्यों को उनकी ही इच्छा पर छोड़ देना चाहिए, जिससे शक्तिशाली व्यक्तियों की उन्नति और कमजोर व्यक्तियों की समाप्ति हो सके।”
(4) राज्य की अयोग्यता का तर्क-राज्य के द्वारा इसलिए भी कम-से-कम कार्य किये जाने चाहिए कि राज्य एक अयोग्य संस्था है और राज्य का नियन्त्रण ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जाता है जो प्रायः अयोग्य होते हैं। इसके अतिरिक्त, राज्य के कार्यों में उत्तरदायित्व निश्चित न होने के कारण प्रत्येक का कार्य किसी का भी कार्य नहीं होता। उद्योग और व्यापार का यह सरल सिद्धान्त है कि जो लोग जोखिम उठाते हैं, वे उन राज्य-अधिकारियों की अपेक्षा अधिक, योग्यता और मितव्ययता से व्यापार का संचालन कर सकते हैं, जिनकी अपनी कोई जोखिम नहीं होती है। इसके अतिरिक्त, राज्य प्रबन्ध का अर्थ है-लालफीताशाही, अनावश्यक देरी, फिजूलखर्ची और भ्रष्टाचार।
(5) अनुभव का तर्क—इतिहास मानवीय अनुभवों की खान है और इतिहास इस बात का साक्षी है कि राज्य का हस्तक्षेप सदैव ही मूर्खतापूर्ण होता है। जब कभी राज्य ने व्यक्तिगत, सामाजिक या आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप का प्रयत्न किया, तभी स्वतन्त्रता समाप्त हो गयी और विकास रुक गया। इस ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर कहा जाता है कि राज्य के द्वारा कम-से-कम कार्य ही किये जाने चाहिए।


व्यक्तिवाद की आलोचना (Criticism of Individualism)

अनेक व्यक्तियों द्वारा व्यक्तिवादी सिद्धान्त की कटु आलोचना की गयी है। उनका कहना है कि इस सिद्धान्त ने मनुष्य को मनुष्य का शोषण करना सिखाया तथा दमन और अनाचार के वातावरण को जन्म दिया। इस सिद्धान्त में प्रमुख रूप से निम्नलिखित दोष हैं :
(1) कानून स्वतन्त्रता को सीमित नहीं करते—व्यक्तिवादी विचारकों ने राज्य के कानून और व्यक्ति की स्वतन्त्रता को परस्पर विरोधी समझ लिया है, जो त्रुटिपूर्ण है। कानून व्यक्तियों की स्वतन्त्रता सीमित नहीं करते, वरन् सभी व्यक्तियों के लिए स्वतन्त्रता का उपभोग सम्भव बनाते हैं। सर्वसाधारण जनता कानूनों के माध्यम से ही स्वतन्त्रता का उपभोग कर सकती है। यदि राज्य और कानून न हों, तो समाज के सबल सदस्यों द्वारा निर्बल सदस्यों की स्वतन्त्रता का अन्त कर दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, राज्य ऐसी सकारात्मक सुविधाएं प्रदान करता है, जिनकी सहायता से व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें। व्यक्तिवादी जिस स्वतंत्रता की बात करते हैं उसे राज्य के कानून के अभाव में लागू करना मुश्किल है इसी कारण बार्कर ने मिल को खोखली स्वतंत्रता का मसीहा कहा है|

(2) राज्य एक बुराई नहीं है—व्यक्तिवादियों का यह विचार गलत है कि राज्य की उत्पत्ति बुराई में हुई है और राज्य बुराई का प्रतीक है। यदि राज्य बुराई होता तो कभी का समाप्त हो गया होता। वास्तव में राज्य व्यक्ति के नैतिक विकास के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करते हुए उसके व्यक्तित्व के विकास का सफल प्रयत्न करता है।
(3) अतिशय प्रतियोगिता हानिकारक होती है—व्यक्तिवादियों द्वारा आर्थिक क्षेत्र में जिस स्वतन्त्र प्रतियोगिता का प्रतिपादन किया गया है, वह तो दानव (पूंजीपति) और बौने (श्रमिक) के बीच संघर्ष के समान होती है जिसमें निर्बल श्रमिक वर्ग को दीनता, भूख, अस्वस्थता और अयोग्यता के परिणाम प्राप्त होते हैं। प्रतियोगिता के इस सिद्धान्त का परिणाम एकाधिकार की प्रवृत्ति, मांग और पूर्ति के बीच असमानता, अनुचित लाभ की प्रवृत्ति और राज्यों का पारस्परिक संघर्ष होता है। सिजविक के अनुसार, “स्वतन्त्र प्रतियोगिता की धारणा व्यक्तिवादी विचारधारा की सबसे बड़ी कमजोरी है।”

(4) ‘योग्यतम की विजय’ का सिद्धान्त भ्रमात्मक है—पशु जगत में प्रचलित ‘योग्यतम की विजय’ के सिद्धान्त को मानव प्राणियों पर लागू नहीं किया जा सकता है। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने का परिणाम तो हिंसक शक्तियों की विजय और जंगलीपन को स्थिर रखना होगा। जीवन-संघर्ष में सफलता प्राप्त कर लेना योग्यता की उचित कसौटी नहीं है। लीकॉक ने कहा है कि “यदि जीवित रहने को ही जीवित रहने की योग्यता की कसौटी मान लिया जाय तो एक समृद्ध चोर प्रशंसा का पात्र बन जायेगा और एक भूखा कलाकार घृणा का।” केवल योग्य व्यक्तियों को ही जीवित रखने के स्थान पर सभी जीवित व्यक्तियों को योग्य बनाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

(5) राज्य की अयोग्यता का तर्क असत्य है-वास्तव में, राज्य एक अयोग्य संस्था नहीं है। – यदि कुछ कार्यों को राज्य की अपेक्षा व्यक्ति भली प्रकार कर सकता है तो दूसरी ओर ऐसे अनेक कार्य हैं, जिन्हें स्वतन्त्र रूप से व्यक्तियों की अपेक्षा राज्य अधिक अच्छे प्रकार से कर सकता है और सामाजिक जीवन की जटिलता बढ़ने के साथ-साथ ऐसे कार्यों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

(6) व्यक्ति सदैव ही अपने हितों का सर्वोत्तम निर्णायक नहीं होता—व्यक्तिवाद की यह मान्यता सही नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने हितों का सर्वोत्तम निर्णायक होता है। वास्तव में, व्यक्तिवादियों का व्यक्तियों की दूरदर्शिता और सूझबूझ में उचित से अधिक विश्वास है और वे प्रत्येक से बहुत अधिक आशा करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति वर्तमान समय में जटिल सामाजिक जीवन की समस्याओं को समझकर अपना मार्ग निश्चित नहीं कर सकता और राज्य ही उसके मार्ग का सही निर्देश कर सकता है।

(7) ऐतिहासिक दृष्टि से व्यक्तिवाद के आर्थिक और राजनीतिक परिणाम भयंकर हुए हैं—व्यक्तिवाद की आलोचना का सबसे सबल आधार यह है कि व्यक्तिवादी नीति को अपनाने के परिणाम कभी अच्छे नहीं रहे। इस नीति को अपनाने के परिणामस्वरूप पूंजी केवल कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में केन्द्रित हो गयी, असंख्य जनसमुदाय आश्रयहीन हो गये और मानव का नैतिक पतन हो गया। इन बुराइयों को दूर करने के लिए राज्य को आर्थिक क्षेत्र में हस्तक्षेप करना पड़ा और इस प्रकार समाजवादी विचारधारा का उदय हुआ। गिलक्राइस्ट के शब्दों में, “व्यक्तिवाद के विरुद्ध सबसे बड़ा तर्क यह है कि इस नीति को अपनाने का राजनीतिक, सामाजिक और औद्योगिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। “

(8) व्यक्तिगत व सार्वजनिक हितों में समन्वय—व्यक्तिवादी विचारधारा केवल व्यक्ति के हितों पर जार देने के कारण एकांगी है। व्यक्ति के साथ-साथ समाज के सार्वजनिक हितों पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। दोनों में समन्वय की आवश्यकता है।वर्तमान परिस्थितियों में राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में व्यक्तिवादी विचारधारा को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

नव-उदारवाद व राज्य का कार्यक्षेत्र

वर्तमान समय में राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में सबसे प्रभावशाली विचारधारा नव-उदारवाद है। इसके अनुसार राज्य सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में नियन्त्रक न होकर एक नियामक संस्था मात्र है। यह बाजारू प्रतियोगिता का समर्थक है तथा वैश्वीकरण का आधार है। पश्चिमी देशों में वर्तमान में आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था का संचालन नव-उदारवादी विचारधारा से प्रेरित है। मिल्टन फ्रीडमैन, रॉबर्ट नोजिक आदि इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक हैं।

2-समाजवाद या लोकतांत्रिक समाजवाद-(socialism or democratic socialism)

समाजवादी विचारधारा की उत्पत्ति व्यक्तिवाद की प्रतिक्रिया के रूप में हुई और वर्तमान समय में यह विचारधारा बहुत अधिक लोकप्रिय है। समाजवाद का अंग्रेजी पर्यायवाची ‘Socialism’, ‘Socius’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है समाज और जैसा कि शब्द व्युत्पत्ति से ही स्पष्ट है समाजवाद व्यक्तिवाद के विरुद्ध समाज के महत्व पर आधारित है। समाजवाद का आधारभूत उद्देश्य समानता की स्थापना करना है और इस समानता की स्थापना के लिए स्वतन्त्र प्रतियोगिता का अन्त किया जाना चाहिए। उत्पादन के साधनों पर सम्पूर्ण समाज का अधिकार होना चाहिए और उत्पादन व्यवस्था का संचालन किसी एक वर्ग के लाभ की दृष्टि में रखकर नहीं, वरन् सभी वर्गों के सामूहिक हित को दृष्टि में रखकर किया जाना चाहिए। समाजवाद की परिभाषा करते हुए रॉबर्ट ब्लैकफोर्ड ने कहा है कि “समाजवाद के अनुसार भूमि तथा उत्पादन के अन्य साधन सबकी सम्पत्ति रहे और उनका प्रयोग तथा संचालन जनता द्वारा जनता के लिए ही हो।” इसी प्रकार फ्रेड ब्रेमेल ने कहा है कि समाजवाद का अर्थ है—“व्यक्तिगत हित को सामाजिक हित के अधीन रखना।”


समाजवाद के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र

राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में समाजवाद का मत व्यक्तिवाद के नितान्त विपरीत है। इस विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा वे सभी कार्य किये जाने चाहिए, जो व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक हों, और क्योंकि व्यक्ति एवं समाज की उन्नति के लिए किये जाने वाले कार्यों की कोई सीमा नहीं है, अतः यह कहा जा सकता है कि सामाजिक जीवन के प्रायः सभी कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।
साधारणतया यह कहा जा सकता है कि समाजवादी विचारधारा के अनुसार राज्य को आन्तरिक एवं बाहरी सुरक्षा एवं न्याय-व्यवस्था के साथ-ही-साथ सार्वजनिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य का प्रबन्ध करना चाहिए, उत्पादन में वृद्धि और आर्थिक विषमता के अन्त का प्रयत्न करना चाहिए, सभी व्यक्तियों के लिए स्वस्थ मनोरंजन का प्रबन्ध एवं अपाहिज और बूढ़े व्यक्तियों की सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए।
इस प्रकार समाजवाद राज्य को अधिक-से-अधिक कार्य सौंपना चाहता है।


समाजवाद के प्रमुख सिद्धान्त (Main Tenets of Socialism)


समाजवाद व्यक्तिवादी विचारधारा और पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक सशक्त विचारधारा और आन्दोलन है। यह समानता को अपना आदर्श मानकर चलता है और राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में अधिकाधिक समानता स्थापित करना चाहता है। समाजवाद के प्रमुख सिद्धान्तों का अध्ययन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है :
(1) समाजवाद समाज की आंगिक एकता पर बल देता है-समाजवाद का आधारभूत विचार यह है कि व्यक्ति कोई एक अकेला प्राणी नहीं है, वरन् यह समाज के दूसरे व्यक्तियों से उसी प्रकार सम्बन्धित है, जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग परस्पर सम्बन्धित होते हैं।
(2) समाजवाद प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग को प्रतिष्ठित करता है–समाजवाद का विचार यह है कि पूंजीवादी व्यवस्था में प्रचलित प्रतियोगिता से धनिक वर्ग को ही लाभ होता है और श्रमिक वर्ग को हानि। प्रतियोगिता के कारण प्रत्येक व्यवसायी अपनी वस्तुओं को इतनी सस्ती बेचना चाहता है कि उसकी श्रेष्ठता बिल्कुल नष्ट हो जाती है अतः समाजवाद जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग प्रतिष्ठित करना चाहता है

(3) समाजवाद का ध्येय समानता है.सामाजिक व्यवस्था में विद्यमान असमानता का अत्यन्त विरोधी है और यह नवीन समाज का निर्माण ऐसे सिद्धान्तों के आधार पर करना चाहता है कि उसमें वर्तमान समय में विद्यमान गम्भीर असमानता कम-से-कम हो जाय। योग्यता के अन्तर को तो समाजवादी भी स्वीकार करते हैं और वे यह भी मानते हैं कि पूर्ण समानता अनुचित, अनावश्यक और असम्भव है, किन्तु साथ ही उनका लक्ष्य एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जिसमें प्रत्येक को उन्नति के समान अवसर प्राप्त हो सकें। वास्तव में समाजवादी समानता व स्वतन्त्रता में समानता को राजनीतिक अधिकारों की तुलना में आर्थिक व सामाजिक अधिकारों को अधिक महत्व देते हैं। इसके विपरीत उदारवादी स्वतन्त्रता व राजनीतिक अधिकारों को प्रमुखता प्रदान करते हैं।

(4) समाजवाद का उद्देश्य पूंजीवाद का अन्त है—समाजवाद व्यक्तिवादी विचारधारा तथा पूंजीवादी व्यवस्था के विरोध पर आधारित है। समाजवाद के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में कुछ लोग बहुत अधिक अमीर और कुछ लोग बहुत अधिक गरीब हो जाते हैं और इस प्रकार की आर्थिक विषमता से राष्ट्र की प्रगति रुक जाती है। इस प्रकार समाजवाद के अनुसार वर्तमान समय की पूंजीवादी व्यवस्था दोषपूर्ण, जर्जर, अन्यायी व शोषक है सम्पूर्ण समाज के हित में इस व्यवस्था का अंत कर दिया जाना ही उचित है|

(5) समाजवाद एक प्रजातान्त्रिक विचारधारा है—समाजवाद के सम्बन्ध में प्रमुख बात यह है कि यह एक प्रजातान्त्रिक विचारधारा है। अनेक बार समाजवाद को साम्यवाद का पर्यायवाची मान लिया जाता है, जो नितान्त भ्रमपूर्ण है। पूंजीवाद के विरोध में परस्पर सहमत होते हुए भी समाजवाद और साम्यवाद परस्पर नितान्त विरोधी विचारधाराएं हैं। इबन्सटीन (Ebenstein) के शब्दों में, “ये (समाजवाद और साम्यवाद) विचार और जीवन के दो नितान्त विरोधी ढंग हैं, उतने ही विरोधी जितने कि उदारवाद और सर्वाधिकारवाद।” इन दोनों विचारधाराओं में प्रमुख भेद साधनों के सम्बन्ध में है। साम्यवाद हिंसक साधनों को अपनाने के पक्ष में है, किन्तु समाजवाद का विचार है कि वांछित परिवर्तन प्रजातन्त्रात्मक और संवैधानिक साधनों से ही लाया जाना चाहिए। समाजवाद प्रजातन्त्रवादी विचार है, साम्यवाद सर्वाधिकारवादी।

(6) समाजवाद उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व के पक्ष में है—पूंजीवादी व्यवस्था का घोर विरोधी होने के कारण समाजवाद भूमि और उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के अन्त की मांग करता है और उत्पादन के समस्त साधनों पर सामाजिक स्वामित्व स्थापित करना चाहता है। समाजवादियों के अनुसार, ‘वैयक्तिक उद्योग वैयक्तिक लूटमार है’ और व्यक्तिगत सम्पत्ति को सामाजिक अथवा सामूहिक सम्पत्ति का रूप देना ही उचित है।

(7) समाजवाद व्यक्ति की अपेक्षा समाज को प्राथमिकता देता है—समाजवाद का विचार है कि सम्पूर्ण समाज का सामूहिक हित अकेले व्यक्ति के हित से अधिक मूल्यवान है और आवश्यकता पड़ने पर समष्टि के हित में व्यक्ति के हित का बलिदान किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में समाजवादियों का विचार है कि सामूहिक हित में व्यक्तिगत हित निहित होता है और सामूहिक हित की साधना से व्यक्तिगत हित की साधना अपने आप ही हो जाती है।

(8) समाजवाद राज्य को एक सकारात्मक गुण मानता है—समाजवाद व्यक्तिवाद के इस कथन को अस्वीकार करता है कि ‘राज्य एक आवश्यक दुर्गुण है’ और इसके विपरीत राज्य को एक ऐसी कल्याणकारी संस्था मानता है जिसका जन्म ही नागरिकों के जीवन को सभ्य और सुखी बनाने के लिए होता है। अधिकांश समाजवादी इतिहास से उदाहरण देते हुए कहते हैं कि राज्य संस्था चिरकाल से मानव जाति की सेवा करती चली आ रही है और यदि इसने कहीं बल का प्रयोग किया भी है तो सामूहिक हित के लिए ही। इस प्रकार साधारणतया समाजवादी राज्य को एक जनहितकारी संस्था मानते हैं।

(9) समाजवाद राज्य को अधिकाधिक कार्य सौंपना चाहता है -समाजवादी राज्य को एक कल्याणकारी संस्था मानते हैं और व्यक्ति को अधिकाधिक स्वतन्त्रता प्रदान करने के लिए राज्य के कार्यक्षेत्र को व्यापक करना चाहते हैं। समाजवाद के अनुसार, व्यक्तिवादी पुलिस राज्य समाज की पूरी-पूरी भलाई नहीं कर सकता और इस पुलिस राज्य में 99 प्रतिशत जनता पूंजीवादी शोषण से पिसकर अपने प्राण दे देगी। ऐसी स्थिति में गरीबों और मजदूरों के हित में राज्य के द्वारा आर्थिक क्षेत्र से सम्बन्धित अधिक-से-अधिक कार्य किये जाने चाहिए।इस प्रकार समाजवाद व्यक्तिवाद के विरुद्ध एक ऐसी प्रतिक्रिया है जिसके द्वारा वैयक्तिक हित के स्थान पर सामूहिक हित और प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग को प्रतिष्ठित करके, उत्पादन के साधनों पर सामाजिक नियन्त्रण के आधार पर आर्थिक समानता स्थापित कराने का प्रयत्न किया जाता है।

समाजवाद की आलोचना-

आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था के अन्त के लिए समाजवाद एक सुन्दर मार्ग प्रस्तुत करता है। समाजवाद ने व्यक्तिगत हित की अपेक्षा सामाजिक हित को उच्चतर स्थान प्रदान कर प्रशंसनीय कार्य किया है, किन्तु इन गुणों के होते हुए भी समाजवादी व्यवस्था दोषमुक्त नहीं है। इस व्यवस्था की प्रमुख रूप से निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है :
(1) उत्पादन क्षमता में कमी—यह मानव स्वभाव है कि व्यक्तिगत लाभ की प्रेरणा पर ही वह ठीक प्रकार से कार्य कर सकता है। समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन कार्य राज्य के हाथ में आ जाने और सभी व्यक्तियों का पारिश्रमिक निश्चित होने के कारण कार्य करने के लिए प्रेरणा का अन्त हो जाता है और व्यक्ति आलसी बन जाता है इसी कारण आर्थिक प्रगति भी रुक जाती है समाजवाद के दुष्परिणाम हम सोवियत संघ के विघटन के रूप में देख सकते हैं इसका प्रमुख कारण आर्थिक विकास की कमी थी|

(2) नौकरशाही का विकास-समाजवादी व्यवस्था में सभी उद्योगों पर राजकीय नियन्त्रण होगा और उनका प्रबन्ध सरकारी अधिकारियों द्वारा किया जायेगा। सरकारी अधिकारियों के हाथ में शक्ति आ जाने का स्वाभाविक परिणाम नौकरशाही का विकास होगा। काम की गति शिथिल हो जायेगी, सरल-से-सरल काम देर से होंगे और घूसखोरी तथा भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलेगा।

(3) समानता की धारणा प्राकृतिक विधान के विरुद्ध — समाजवाद समानता, सबसे प्रमुख रूप में आर्थिक समानता पर बल देता है और आलोचकों के अनुसार समानता का यह विचार प्राकृतिक विधान और प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध है। प्रकृति के द्वारा व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्तियां समान रूप में नहीं वरन् असमान रूप में प्रदान की गयी हैं और इसी कारण समानता स्थापित करने के किसी भी प्रयत्न में सफलता प्राप्त होना बहुत अधिक सन्देहपूर्ण है।

(4) राज्य की कार्यकुशलता में कमी-समाजवादी व्यवस्था में राज्य के कार्यक्षेत्र में बहुत अधिक विस्तार हो जाने के कारण राज्य की कार्यकुशलता में भी कमी हो जायेगी। समाजवादी व्यवस्था में सार्वजनिक निर्माण सम्बन्धी, उत्पादन, वितरण तथा श्रमिक विधान सम्बन्धी सभी कार्य राज्य द्वारा होंगे। आलोचकों का कथन है कि राज्य के हाथ में इतने अधिक कार्यों के आ जाने से एक भी कार्य ठीक प्रकार से सम्पन्न नहीं हो सकेगा।

(5) मनुष्य का नैतिक पतन-सभी कार्यों को करने की शक्ति राज्य के हाथ में आ जाने से आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, साहस और आरम्भक के नैतिक गुणों का व्यक्तियों में अन्त हो जायेगा। समाजवादी व्यवस्था में उसे अपने विकास की नवीन दिशाएं और दशाएं न प्राप्त होने के कारण वह हतप्रभ हो जायेगा और उसका नैतिक पतन हो जायेगा।

(6) समाजवादी व्यवस्था अपव्ययी होगी-आलोचक यह भी कहते हैं कि समाजवादी व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था से बहुत अधिक खर्चीली होगी। जब सरकार के द्वारा किसी प्रकार का कार्य किया जाता है तो एक छोटे से काम के लिए अनेक कर्मचारी रखे जाते हैं और फिर भी यह कार्य सफलतापूर्वक नहीं हो पाता।

(7) व्यक्ति की स्वतन्त्रता के अन्त का भय-समाजवाद के अन्तर्गत जब सरकार के द्वारा बहुत अधिक कार्य किये जाते हैं तो इस बात का भय रहता है कि व्यक्तियों के जीवन में सरकार के इस अत्यधिक हस्तक्षेप से उनकी स्वतन्त्रता का अन्त हो जायेगा। समाजवादी राज्य समाजवाद की स्थापना के नाम पर व्यक्ति की स्वतन्त्रता व उसके राजनीतिक अधिकारों को सीमित कर देते हैं।समाजवाद के पक्ष में तर्क (Case in Favour of Socialism)समाजवाद के विपक्ष में जो विभिन्न तर्क दिये गये हैं उनके आधार पर यह अनुमान नहीं लगाया जाना चाहिए कि समाजवाद एक सारहीन दर्शन है। समाजवाद के पक्ष में प्रमुख रूप से निम्नलिखित बातें कही जाती हैं

(1) समाजवाद वर्तमान व्यवस्था की बुराइयों का प्रभावशाली वर्णन और सुन्दर हल है—समाजवाद वर्तमान व्यवस्था की बुराइयों’ का स्पष्ट, विस्तृत और प्रभावशाली वर्णन है। समाजवाद पूंजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत निर्धन वर्ग के दुखों और कष्टों का व्यापक वर्णन करता है और नागरिकों को पूंजीवादी व्यवस्था की बुराइयां दूर करने का सन्देश प्रदान करता है।
इसके अलावा समाजवाद इन बुराइयों को दूर करने का व्यावहारिक मार्ग भी बताता है। आज के समाज में जो भी शोषण, अन्याय तथा भीषण असमानता दिखायी देती है, उन सबका मूल कारण पूंजी का असमान वितरण और उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व है। ऐसी स्थिति में उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व की स्थापना हो जाय और सबको उपभोग के लिए बराबर मिले, तो वर्तमान काल की सभी आर्थिक और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न सामाजिक तथा राजनीतिक बुराइयों का अन्त हो जायेगा।

(2)समाजवाद के प्रति की गई अधिकांश आलोचनाएं भ्रमपूर्ण –समाजवाद के आलोचकों द्वारा व्यक्ति को आलसी, निकम्मा और कमजोर मानकर इस बात का प्रतिपादन किया जाता है कि समाजवादी व्यवस्था में उद्योग के अन्तर्गत कार्य करने वाले व्यक्तियों का उद्योग के साथ लाभ-हानि का प्रश्न जुड़ा न होने के कारण उन्हें कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए कोई प्रेरणा नहीं मिलती और उत्पादन में कमी हो जाती है। आलोचकों का यह विचार मानव स्वभाव की त्रुटिपूर्ण मान्यता पर आधारित है।समाजवाद से व्यक्ति की स्वतन्त्रता सीमित हो जायेगी, यह भी एक भ्रान्ति ही है। वास्तव में तो समाजवाद में प्राप्त आर्थिक स्वतन्त्रता व्यक्ति को सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में स्वतन्त्र कर देगी। समाजवाद को सर्वाधिकारवाद पर आधारित नौकरशाही व्यवस्था भी नहीं कहा जा सकता। वास्तव में कर्मचारी वर्ग का सहारा तो सभी प्रकार की व्यवस्थाओं को लेना होता है। समाजवाद की आलोचनाएं तो भ्रमपूर्ण हैं ही, इसके विपरीत समाजवाद कुछ सकारात्मक श्रेष्ठताओं पर आधारित है।

(3) समाजवाद में सम्पत्ति का अपव्यय नहीं होगा—व्यक्तिवादी अर्थव्यवस्था में आपसी प्रतियोगिता के कारण विज्ञापन, आदि पर बहुत अधिक खर्च करना पड़ता है, जिससे वस्तु का लागत मूल्य बहुत अधिक बढ़ जाता है। समाजवादी व्यवस्था में आवश्यकता के अनुसार उत्पादन होने तथा विज्ञापन और मध्यस्थों की कोई जरूरत न होने के कारण बहुत अधिक मितव्ययता सम्भव हो सकेगी।

(4) समाजवाद सबको उन्नति के समान अवसर देगा—समाजवाद का लक्ष्य समानता है और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समाजवाद सभी व्यक्तियों को उन्नति के समान अवसर देने की व्यवस्था करता है। समाजवाद व्यक्तियों तथा राष्ट्र के चरित्र एवं भाग्य-निर्धारण में वातावरण के महत्व को स्वीकार करता है और एक ऐसे वातावरण के निर्माण पर जोर देता है जिसमें प्रत्येक के द्वारा अपने व्यक्तित्व का उच्चतम विकास किया जा सके।

(5) समाजवाद पर परिश्रमजीवी वर्ग का अन्त कर देगा—समाजवादी दर्शन ‘जो काम नहीं करेगा, वह खायेगा भी नहीं’ (He, who will not work, neither shall he eat) के विचार पर आधारित है। इससे स्पष्ट है कि समाजवाद में स्वयं परिश्रम कर रोजी कमाने वाले वर्ग को ही जीवित रहने का अधिकार होगा और आज की सामाजिक व्यवस्था में विद्यमान पर-परिश्रमजीवी पूंजीपति वर्ग का अन्त हो जायेगा । समाजवाद का यह विचार और कार्य पूर्णतया न्यायोचित है।

(6) समाजवाद भ्रातृत्व तथा समाज-सेवा भाव को बढ़ाता है—समाजवादी राज्य समानता पर आधारित होगा। यह राज्य सामूहिक हानि-लाभ के विचार को ध्यान में रखते हुए भ्रातृत्व की ओर अग्रसर होगा। व्यक्तियों पर समाजवादी व्यवस्था को अपनाने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ेगा और इस बात की आशा की जा सकती है कि समाजवादी व्यवस्था में उनकी प्रवृत्ति व्यक्तिगत स्वार्थों की तुष्टि के स्थान पर सामूहिक हितों की साधना ही हो जायेगी।

(7) समाजवाद एक न्यायपूर्ण तथा जनतान्त्रिक विचारधारा है— राजनीतिक क्षेत्र में समाजवाद जनतन्त्र के प्रति विश्वास व्यक्त करता है, क्योंकि राजतन्त्रीय या कुलीनतन्त्रीय व्यवस्था में अनिवार्य रूप से विद्यमान भेद समाजवाद को मान्य नहीं है। इसके अलावा समाजवाद उत्पादन पर ‘सामूहिक स्वामित्व’ और उसकी ‘सामूहिक व्यवस्था’ का समर्थक है, जो पूर्णतया प्रजातान्त्रिक तथा न्यायोचित विचार है। वास्तव में प्रजातन्त्र और समाजवाद परस्पर पूरक हैं जिनमें से एक राजनीतिक समानता का प्रतिपादन करता है तो दूसरा आर्थिक समानता का । लैडलर के शब्दों में, “प्रजातान्त्रिक आदर्श का आर्थिक पक्ष वास्तव में समाजवाद ही है।में,निष्कर्ष—यह तथ्य है कि समाजवाद एक न्यायपूर्ण तथा जनतान्त्रिक विचारधारा है। समाजवाद के पक्ष एक विशेष बात यह है कि समाजवाद के व्यावहारिक रूप के सम्बन्ध में मतभेद होने पर भी यह सर्वत्र स्वीकार कर लिया गया है कि लोककल्याण की दृष्टि से राज्य द्वारा आर्थिक क्षेत्र और मानव जीवन के सभी पक्षों पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण रखा जाना चाहिए। 1991 में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के अन्य राज्यों में जो घटनाचक्र बना, वह साम्यवाद की असफलता का उदाहरण है, यह समाजवाद की असफलता नहीं है।

व्यक्तिवादी व समाजवादी राज्यों में अन्तर
व्यक्तिवादी व समाजवादी राज्यों में निम्न अन्तर पाए जाते हैं :

  • 1.व्यक्तिवादी राज्य का कार्य क्षेत्र सीमित होता है, जबकि समाजवादी राज्य का कार्य क्षेत्र विस्तृत होता है।
  • 2. व्यक्तिवादी राज्य में अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियन्त्रण नहीं होता, जबकि समाजवादी राज्य में अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण होता है।
  • 3.व्यक्तिवादी राज्य में व्यक्ति की नागरिक स्वतन्त्रताओं पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि समाजवादी राज्य में आर्थिक समानता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • 4.व्यक्तिवादियों के अनुसार राज्य एक आवश्यक बुराई है, जबकि समाजवादियों के अनुसार राज्य एक
    अच्छाई है।

3.लोककल्याणकारी राज्य-

लोककल्याणकारी राज्य की धारणा का अभ्युदय (Origin of the Concept of Welfare State) – साधारणतया लोककल्याणकारी राज्य का तात्पर्य एक ऐसे राज्य से होता है, जिसके अन्तर्गत शासन की शक्ति का प्रयोग किसी वर्ग विशेष के कल्याण हेतु नहीं वरन् सम्पूर्ण जनता के कल्याण के लिए किया जाता है। इस रूप में लोककल्याणकारी राज्य का विचार नया नहीं है। भारत में प्राचीन काल से रामराज्य की जो धारणा प्रचलित है, वह एक ऐसे राज्य का प्रतीक है, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण रूप से विकास करने का प्रयत्न किया जाता है। इसी दृष्टि से वेदव्यास ने ‘महाभारत’ में कहा है कि “जो नरेश अपनी प्रजा को पुत्र के समान समझकर उसकी चतुर्मुखी उन्नति का प्रयत्न नहीं करता, वह नरक का भागी होता है। लगभग इसी प्रकार की धारणा यूनान के नगर राज्यों में प्रचलित थी और इसी विचार को लक्ष्य करते हुए अरस्तू ने कहा है कि “राज्य जीवन के लिए अस्तित्व में आया और सद्जीवन के लिए अस्तित्व में बना हुआ है।”

इस प्रकार अपने मूल रूप में लोककल्याणकारी राज्य की धारणा सदैव ही विद्यमान रही है, लेकिन वर्तमान समय में जिस अर्थ विशेष में इस धारणा का प्रयोग किया जाता है, वह वर्तमान परिस्थितियों की ही उपज है। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 19वीं सदी के प्रारम्भ में विश्व के अधिकांश राज्यों द्वारा व्यक्तिवादी ‘अहस्तक्षेप‘ (Laissez faire) की नीति को अपना लिया गया था, जिसके परिणामस्वरूप यूरोप के राज्य अधिकाधिक सम्पत्तिशाली बनते गये, लेकिन इसके साथ ही सम्पत्ति का केवल कुछ ही हाथों में केन्द्रीयकरण भी होने लगा। एक ओर तो अत्यधिक सम्पत्तिशाली वर्ग उत्पन्न हो गया और दूसरी ओर एक ऐसा श्रमिक वर्ग था, जिसके पास अपनी क्षमता से अधिक कार्य करने पर भी जीवन के साधन नहीं थे। ऐसी स्थिति में बहुसंख्यक जनता में विद्यमान व्यवस्था के प्रति असन्तोष उत्पन्न हुआ और रस्किन, कार्लायल, विलियम गाडविन, आदि विद्वानों द्वारा इस असन्तोष की अभिव्यक्ति की गयी।
व्यक्तिवादी व्यवस्था को नष्ट करने के उद्देश्य से ही 1848 में कार्ल मार्क्स और ऐंजिल्स ने ‘साम्यवादी

घोषणा-पत्र’ (Communist Manifesto) प्रकाशित किया। साम्यवादी विचारधारा से प्रेरणा ग्रहण करते हुए ही 1917 में सोवियत संघ में सर्वहारा वर्ग द्वारा एक सफल क्रान्ति की गयी और समस्त आन्तरिक एवं बाहरी विरोधों के बावजूद सोवियत संघ में साम्यवादी शासन-व्यवस्था स्थापित की गयी। यह साम्यवादी व्यवस्था निश्चित रूप से पाश्चात्य देशों में प्रचलित पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध और उनके लिए भय का एक कारण थी। ऐसी स्थिति में पूंजीवादी देशों ने अपनी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना प्रारम्भ किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विद्यमान व्यवस्था को बनाये रखने के लिए उसमें मूल परिवर्तन आवश्यक है। उनके द्वारा अपनी शासन-व्यवस्था को सर्वजन हितकारी बनाने का प्रयत्न किया गया और अपनी शासन-व्यवस्था में परिवर्तन करने के उद्देश्य से उनके द्वारा राज्य के जिस रूप विशेष को अपनाया गया, वह लोककल्याणकारी राज्य के नाम से प्रसिद्ध है। लोककल्याणकारी राज्य का विचार एक लोकतान्त्रिक विचार है लोकतन्त्र के विकास के साथ इसका विकास जुड़ा है। वस्तुतः लोककल्याणकारी राज्य आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में प्रजातन्त्र का विस्तार है। भारत के संविधान में नीति निदेशक तत्वों के माध्यम से लोककल्याणकारी विचार को लागू किया गया।
20वीं शताब्दी में ब्रिटिश विचारक लास्की पहला चिन्तक है जिसने ‘पुलिस राज्य’ की धारणा के विपरीत सर्वप्रथम कल्याणकारी राज्य की धारणा का समर्थन किया। ब्रिटेन पहला राज्य है जहां कल्याणकारी राज्य की धारणा को आधुनिक अर्थों में मूर्तरूप दिया गया। ब्रिटेन में 20वीं शताब्दी में श्रमिक संघ आन्दोलन, फेबियनवाद के प्रभाव तथा श्रमिक दल (Labour Party) के जनाधार के विस्तार के कारण कल्याणकारी राज्य की मांग जोर पकड़ने लगी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लॉर्ड एटली के प्रधानमन्त्री काल में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा का आरम्भ किया गया तथा कई बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति रूजबेल्ट की ‘न्यू डील’ (New Deal) की नीति जनकल्याण की नीति थी। यूरोप के अन्य राज्यों—स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क आदि में राज्य द्वारा कल्याणकारी कार्यक्रमों को लागू किया गया। समाजवादी राज्यों में पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से इस विचार को लागू किया गया। भारत के नए संविधान में नीति निदेशक तत्वों के माध्यम से कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा गया तथा योजनागत विकास व अन्य कानूनी प्रावधानों द्वारा कल्याणकारी राज्य की धारणा को मूर्त रूप प्रदान किया गया। इस प्रकार 20वीं शताब्दी में अधिकांश राज्य लोकतन्त्र के विकास के साथ-साथ कल्याणकारी राज्य की धारणा की ओर अग्रसर हुए।
लोककल्याणकारी राज्य की परिभाषा (Definition of Welfare State)
अपने वर्तमान रूप में लोककल्याणकारी राज्य की प्रमुख रूप से निम्न प्रकार परिभाषाएं की गयी हैं : 1918 में प्रकाशित ‘Encyclopaedia of Social Sciences’ में लोककल्याणकारी राज्य की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि “लोककल्याणकारी राज्य का तात्पर्य एक ऐसे राज्य से है जो अपने सभी नागरिकों को न्यूनतम जीवन-स्तर प्रदान करना अपना अनिवार्य उत्तरदायित्व समझता है।”
टी. डब्ल्यू. केण्ट के अनुसार, “लोकहितकारी वह राज्य है जो अपने नागरिकों के लिए व्यापक समाज सेवाओं की व्यवस्था करता है।” इन समाज सेवाओं के अनेक रूप होते हैं। इनके अन्तर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार वृद्धावस्था में पेंशन आज की व्यवस्था होती है इसका मुख्य उद्देश्य नागरिकों को सभी प्रकार की सुरक्षा प्रदान करना होता है|

डॉ. अब्राहम के अनुसार “कल्याणकारी राज्य वह है जो अपनी आर्थिक व्यवस्था का संचालन आय के अधिकाधिक समान वितरण के उद्देश्य से करता है।’

जवाहरलाल नेहरू ने अपने एक भाषण में लोककल्याणकारी राज्य को परिभाषित करते हुए कहा था, “सबके लिए समान अवसर प्रदान करना, अमीरों और गरीबों के बीच अन्तर मिटाना और जीवन-स्तर को ऊपर उठाना लोककल्याणकारी राज्य के आधारभूत तत्व हैं।

“उपर्युक्त सभी परिभाषाओं में लोककल्याण के आर्थिक पक्ष पर अधिक बल दिया गया है, परन्तु कल्याण की धारणा केवल भौतिक ही नहीं, वरन् मानवीय स्वतन्त्रता और प्रगति से भी सम्बन्धित है। सन् 1954 में मैसूर विश्वविद्यालय में दीक्षान्त भाषण देते हुए, न्यायमूर्ति छागला ने कल्याणकारी राज्य की सही धारणा को व्यक्त करते हुए कहा था, “लोककल्याणकारी राज्य का कार्य एक ऐसे पुल का निर्माण करना है जिसके द्वारा व्यक्ति जीवन की पतित अवस्था से निकलकर एक ऐसी अवस्था में प्रवेश कर सके जो उत्थानकारी और उद्देश्यपूर्ण हौ । लोककल्याणकारी राज्य का यथार्थ उद्देश्य नागरिक द्वारा सच्ची स्वतन्त्रता के उपभोग को सम्भव बनाना है।’इस प्रकार लोककल्याणकारी राज्य का अर्थ है— राज्य के कार्यक्षेत्र का विस्तार। राज्य के कार्यक्षेत्र के विस्तार का अर्थ प्रायः व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर बन्धन से लिया जाता है, लेकिन कल्याणकारी राज्य का अर्थ राज्य के कार्यक्षेत्र का इस प्रकार विस्तार करना होता है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर कोई विशेष बन्धन न लगे, राज्य के कार्यक्षेत्र के साथ-ही-साथ व्यक्ति का भी अपना स्वतन्त्र कार्यक्षेत्र हो। वास्तव में लोककल्याणकारी राज्य की धारणा पश्चिमी प्रजातन्त्र और साम्यवादी अधिनायकतन्त्र – दोनों से ही भिन्न है। पश्चिमी प्रजातन्त्र राजनीतिक स्वतन्त्रता को एक ऐसी स्थिति प्रदान करता है जिसके अन्तर्गत नागरिकों को आर्थिक सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है। इसके विपरीत, आर्थिक सुरक्षा के विचार पर आधारित साम्यवादी अधिनायकतन्त्र में राजनीतिक स्वतन्त्रता का अभाव होता है। लेकिन लोककल्याणकारी राज्य की धारणा राजनीतिक स्वतन्त्रता और आर्थिक सुरक्षा के बीच सामंजस्य का एक सफल प्रयत्न है।

हॉबमैन (Hobman) के शब्दों में, “यह (कल्याणकारी राज्य) दो अतियों में एक समझौता है जिसमें एक तरफ साम्यवाद है और दूसरी तरफ अनियन्त्रित व्यक्तिवाद।” लोककल्याणकारी राज्य लोकहित पर आधारित होता है और इस सम्बन्ध में लोकहित से हमारा तात्पर्य राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से व्यक्ति की अवसर की असमानता को दूर कर उसकी साधारण आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है । इस व्यवस्था का उद्देश्य किसी एक समुदाय या वर्ग विशेष के हितों की साधना न होकर जनता के सभी वर्ग के हितों की साधना होता है।

लोककल्याणकारी राज्य के लक्षण (Elements of Wel-fare State)

लोककल्याणकारी राज्य की उपर्युक्त धारणा को दृष्टि में रखते हुए इस प्रकार के राज्य के प्रमुख रूप से निम्नलिखित लक्षण बताये जा सकते हैं :

(1) आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था-लोककल्याणकारी राज्य प्रमुख रूप से आर्थिक सुरक्षा के विचार पर आधारित है। हमारा अब तक का अनुभव स्पष्ट करता है कि शासन का रूप चाहे कुछ भी हो, व्यवहार में राजनीतिक शक्ति उन्हीं लोगों के हाथों में केन्द्रित होती है, जो आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली होते हैं। अतः राजनीतिक शक्ति को जनसाधारण में निहित करने और जनसाधारण के हित में इसका प्रयोग करने के लिए आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था नितान्त आवश्यक है। लोककल्याणकारी राज्य के सन्दर्भ में आर्थिक सुरक्षा का तात्पर्य अग्र तीन बातों से लिया जा सकता है :

(i) सभी व्यक्तियों को रोजगार—ऐसे सभी व्यक्तियों को, जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से कार्य करने की क्षमता रखते हैं, राज्य के द्वारा उनकी योग्यतानुसार उन्हें किसी-न-किसी प्रकार का कार्य अवश्य ही दिया जाना चाहिए। जो व्यक्ति किसी भी प्रकार का कार्य करने में असमर्थ हैं या राज्य जिन्हें कार्य प्रदान नहीं कर सका है, उनके जीवनयापन के लिए राज्य’ द्वारा ‘बेरोजगार बीमे’ की व्यवस्था की जानी चाहिए।
(ii) न्यूनतम जीवन-स्तर की गारण्टी—एक व्यक्ति को अपने कार्य के बदले में इतना पारिश्रमिक अवश्य ही मिलना चाहिए कि उसके द्वारा न्यूनतम आर्थिक स्तर की प्राप्ति की जा सके। न्यूनतम जीवन-स्तर से आशय है—भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं। लोककल्याणकारी राज्य में किसी एक के लिए अधिकता के पूर्व सबके लिए पर्याप्त की व्यवस्था की जानी चाहिए।
(iii) अधिकतम समानता की स्थापना-सम्पत्ति और आय की पूर्ण समानता न तो सम्भव है और न ही वांछनीय; तथापि आर्थिक न्यूनतम के पश्चात् होने वाली व्यक्ति की आय का उसके समाज सेवा सम्बन्धी कार्य से उचित अनुपात होना चाहिए। जहां तक सम्भव हो, व्यक्तियों की आय के न्यूनतम और अधिकतम स्तर में अत्यधिक अन्तर नहीं होना चाहिए। इस सीमा तक आय की समानता तो स्थापित की ही जानी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अपने धन के आधार पर दूसरे का शोषण न कर सके।
(2) राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था —लोककल्याणकारी राज्य की दूसरी विशेषता राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था कही जा सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था की जानी चाहिए कि राजनीतिक शक्ति सभी व्यक्तियों में निहित हो और ये अपने विवेक के आधार पर इस राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कर सकें। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निम्न बातें आवश्यक हैं :
(i) लोकतन्त्रीय शासन-लोककल्याणकारी राज्य में व्यक्ति के राजनीतिक हितों की साधना को भी आर्थिक हितों की साधना के समान ही आवश्यक समझा जाता है, अतः एक लोकतन्त्रीय शासन-व्यवस्था वाला राज्य ही लोककल्याणकारी राज्य हो सकता है।
(ii) नागरिक स्वतन्त्रताएं—संविधान द्वारा लोकतन्त्रीय शासन की स्थापना कर देने से ही राजनीतिक सुरक्षा प्राप्त नहीं हो जाती। व्यवहार में राजनीतिक सुरक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नागरिक स्वतन्त्रता का वातावरण होना चाहिए अर्थात् नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति और राजनीतिक दलों के संगठन की स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। इन स्वतन्त्रताओं के अभाव में लोकहित की साधना नहीं हो सकती। लोकहित की साधना के बिना लोककल्याणकारी राज्य, आत्मा के बिना शरीर के समान होगा।
पूर्व सोवियत संघ और वर्तमान चीन, आदि साम्यवादी राज्यों में नागरिकों के लिए नागरिक स्वतन्त्रताओं और परिणामतः राजनीतिक सुरक्षा का अभाव होने के कारण उन्हें लोककल्याणकारी राज्य नहीं कहा जा सकता है|

(3) सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था-सामाजिक सुरक्षा का तात्पर्य सामाजिक समानता से है और इस सामाजिक समानता की स्थापना के लिए आवश्यक है कि धर्म, जाति, वंश, रंग और सम्पत्ति के आधार पर उत्पन्न भेदों का अंत करके व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में महत्व प्रदान किया जाय। डॉ. बेनी प्रसाद के शब्दों में, “सामाजिक समानता का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति के सुख का महत्व हो सकता है तथा किसी को भी अन्य किसी के सुख का साधनमात्र नहीं समझा जा सकता है।” वस्तुतः लोककल्याणकारी राज्य में जीवन के सभी पक्षों में समानता के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए।

(4) राज्य के कार्यक्षेत्र में वृद्धि-लोककल्याणकारी राज्य का सिद्धान्त व्यक्तिवादी विचार के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है और इस मान्यता पर आधारित है कि राज्य को वे सभी जनहितकारी कार्य करने चाहिए, जिनके करने से व्यक्ति की स्वतन्त्रता नष्ट या कम नहीं होती। इसके द्वारा न केवल आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था वरन् जैसा कि हॉब्स ने कहा है, “डॉक्टर, नर्स, शिक्षक, व्यापारी, उत्पादक, बीमा कम्पनी के एजेण्ट, मकान बनाने वाले, रेलवे नियन्त्रक तथा अन्य सैकड़ों रूपों में कार्य किया जाना चाहिए।

(5) अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना — इन सबके अतिरिक्त एक लोककल्याणकारी राज्य, अपने राज्य विशेष के हितों से ही सम्बन्ध न रखकर सम्पूर्ण मानवता के हितों से सम्बन्ध रखता है और इसका स्वरूप राष्ट्रीय न होकर अन्तर्राष्ट्रीय होता है। एक लोककल्याणकारी राज्य तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् ‘सम्पूर्ण विश्व ही मेरा कुटुम्ब है’ के विचार पर आधारित होता है।

लोककल्याणकारी राज्य के कार्य (Functions of Welfare State)

परम्परागत विचारधारा राज्य के कार्यों को दो वर्गों (अनिवार्य और ऐच्छिक) में विभाजित करने की रही है और यह माना जाता रहा है कि अनिवार्य कार्य तो राज्य के अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए किये जाने जरूरी हैं, किन्तु ऐच्छिक कार्य राज्य की जनता के हित में होते हुए भी राज्य के द्वारा उनका किया जाना तत्कालीन समय की विशेष परिस्थितियों और शासन के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, लेकिन लोककल्याणकारी राज्य की धारणा के विकास के परिणामस्वरूप अनिवार्य और ऐच्छिक कार्यों की यह सीमा रेखा समाप्त हो गयी है और यह माना जाने लगा है कि परम्परागत रूप में ऐच्छिक कहे जाने वाले कार्य भी राज्य के लिए उतने ही आवश्यक हैं जितने कि अनिवार्य समझे जाने वाले कार्य। लोककल्याणकारी राज्य के प्रमुख कार्य निम्न हैं:(1) आन्तरिक सुव्यवस्था तथा विदेशी आक्रमण से रक्षा।

(2) व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों और राज्य एवं व्यक्तियों के सम्बन्धों की व्यवस्था ।

(3) कृषि, उद्योग तथा व्यापार का नियमन और विकास।(4) आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी कार्य ।

(5) जनता के जीवन-स्तर को ऊंचा उठाना ।

(6) शिक्षा और स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्य ।

(7) सार्वजनिक सुविधा सम्बन्धी कार्य ।

(8) समाज-सुधार।

(9) आमोद-प्रमोद की सुविधाएं ।

(10) नागरिक स्वतन्त्रताओं की व्यवस्था ।

(11) अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र के कार्य |

इस प्रकार लोककल्याणकारी राज्य के कुछ कर्तव्य गिनाये गये हैं, किन्तु लोककल्याणकारी राज्य के समस्त कर्तव्यों की सूची तैयार करना सम्भव नहीं है। व्यक्ति के जीवन में राज्य का हस्तक्षेप कहां से आरम्भ हो और कहां पर समाप्त हो जाय, इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इस प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर स्थानीय तथा राष्ट्रीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के सन्दर्भ में ही दिया जा सकता है। आज की जटिल परिस्थितियों में कोई भी व्यक्ति केवल अपने लिए या अपने ही प्रयास से जीवित नहीं रह सकता है और समाज द्वारा जनहितकारी कार्यों का सम्पादन अच्छे जीवन की एक आवश्यकता बन गयी है। अतः राज्य के द्वारा अपने नागरिकों को वे समस्त सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए जो उनके सामूहिक कल्याण की वृद्धि करने वाली हों।
लोककल्याणकारी राज्य का मूल्यांकन (Evaluation of Welfare State)
यद्यपि लोककल्याण वर्तमान समय की सर्वाधिक लोकप्रिय प्रवृत्ति है, फिर भी लोककल्याणकारी राज्य के विरुद्ध कुछ तर्क दिये जाते हैं, जो निम्न प्रकार हैं :

(1) ऐच्छिक समुदायों पर आघात –जब लोग कल्याण की प्रवृत्ति को अपना लेने पर राज्य के कार्य बहुत अधिक बढ़ जाते हैं तो राज्य अनेक ऐसे कार्य करने लगता है जो वर्तमान समय में अच्छी समुदायों द्वारा किए जाते हैं इस प्रकार लोक कल्याणकारी राज्य ऐच्छिक समुदाय के लिए घातक होता है और मानव जीवन के संबंध में उपयोगी भूमिका निभाने वाले ऐच्छिक समुदाय समाप्त हो जाते हैं|

(2) वैयक्तिक स्वतन्त्रता का अन्त-व्यक्तियों का कहना है कि लोककल्याण की प्रवृत्ति को अपना लेने पर जब राज्य के कार्य बहुत अधिक बढ़ जाते हैं, तो स्वभावतः राज्य की शक्तियों में भी वृद्धि होती है और अति शक्तिशाली राज्य वैयक्तिक स्वतन्त्रता को समाप्त कर लेता है। अमरीकी राज्य सचिव वायनेंस ने इसी आधार पर इसमें ‘वृहद सरकार‘ (Big Government) की संज्ञा दी थी।

(3) नौकरशाही का भय—लोककल्याण की प्रवृत्ति को अपना लेने पर राज्य-नौकरशाही में भी बहुत अधिक वृद्धि होगी और नौकरशाही में यह अत्यधिक वृद्धि लालफीताशाही, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, आदि अन्य बुराइयों को जन्म देगी ।

(4) अत्यधिक खर्चीला—लोककल्याणकारी राज्य बहुत अधिक खर्चीला आदर्श है, क्योंकि राज्य को विभिन्न लोककल्याणकारी सेवाएं सम्पादित करने में बहुत अधिक धनराशि की आवश्यकता होती है। सामान्य आर्थिक साधनों वाला राज्य इस प्रकार का व्यय-भार वहन नहीं कर सकता। सिनेटर टाफ्ट ने इसी कारण कहा है कि “लोककल्याण की नीति राज्य को दिवालियेपन की ओर ले जायेगी।”

(5) प्रशासनिक अक्षमता-लोककल्याणकारी राज्य को सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में अनेक ऐसे कार्य करने पड़ते हैं जो प्रशासन की क्षमता के बाहर हैं, क्योंकि उनका स्वरूप सामाजिक है। प्रशासन इन कार्यों का कुशलता पूर्वक निष्पादन करने में असफल रहा है; जैसे—शिक्षा को बढ़ावा, दहेज प्रथा का अन्त या बाल विवाह को रोकना।लोककल्याणकारी राज्य के जो उपर्युक्त दोष बताये जाते हैं, उनके कारण लोककल्याणकारी राज्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में ये दोष लोककल्याणकारी राज्य के नहीं वरन् मानवीय जीवन की दुर्बलताओं के तथा हमारी अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के हैं। सर्वप्रथम, लोककल्याणकारी राज्य और सर्वाधिकारवादी राज्य में आधारभूत अन्तर है और लोककल्याणकारी राज्य का तात्पर्य राज्य द्वारा व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन पर अधिकार नहीं है। लोककल्याणकारी राज्य में न केवल व्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए एक बहुत बड़ा क्षेत्र बच जाता है, वरन् यह व्यक्ति की स्वतन्त्रता को वास्तविकता का रूप प्रदान करता है। लोककल्याणकारी राज्य के कारण ऐच्छिक समुदायों के कार्यक्षेत्र पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। इससे उनके कार्य और महत्व में वृद्धि ही होती है, कमी नहीं। द्वितीय, जहां तक नौकरशाही की बुराइयों का सम्बन्ध है, वे तो दोषपूर्ण राज-व्यवस्था और मानवीय चरित्र की दुर्बलता के परिणाम हैं और इनमें सुधार कर इन्हें दूर किया जा सकता है। तृतीय, इसके अतिरिक्त, यह देखने में आया कि लोककल्याण की प्रवृत्ति तत्काल तो राजकोष में भारी व्यय का कारण होती है, लेकिन लम्बे समय में इसका नागरिकों की कार्यकुशलता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है और राष्ट्रीय आय तेजी के साथ बढ़ती है। व्यवहार में लोककल्याणकारी राज्य की प्रवृत्ति को विश्व के लगभग सभी राज्यों द्वारा किसी-न-किसी रूप में अपना लिया गया है और इसे अपनाने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग भी नहीं है। लोकतन्त्र आज की सबसे अधिक लोकप्रिय शासन-व्यवस्था है और लोकतन्त्रीय शासन लोककल्याण के आदर्श को अपनाकर ही सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। लोकतन्त्र और लोककल्याणकारी राज्य एक-दूसरे के अनुकूल और परस्पर पूरक हैं।

भारत में लोककल्याणकारी राज्य

भारत में लोककल्याण की परम्परा बहुत प्राचीन है। अपनी इस प्राचीन परम्परा के अनुसार भारतीय संविधान-निर्माता लोककल्याणकारी राज्य के विचार से प्रेरित थे, लेकिन एक लोककल्याणकारी राज्य से जिन कार्यों को करने की आशा की जा सकती है उन कार्यों को करने के लिए बहुत अधिक आर्थिक शक्ति और साधनों की आवश्यकता होती है। ग्रेट ब्रिटेन द्वारा भारत का एक लम्बे समय तक शोषण किये जाने के कारण, स्वतन्त्र भारत की सरकार के पास इतने साधन नहीं थे कि राज्य इस प्रकार के सभी जनहितकारी कार्यों को सम्पन्न कर सकता। अतः संविधान-निर्माताओं द्वारा संविधान के नीति निदेशक तत्वों में ही इस बात की घोषणा की गयी है कि हमारा उद्देश्य भारत को एक लोककल्याणकारी राज्य का स्वरूप प्रदान करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संविधान के नीति निदेशक तत्वों में अनेक बातों का उल्लेख किया गया है, जो इस प्रकार हैं :

(1) राज्य अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि (अ) समान रूप से नर और नारी सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त हों, (ब) राष्ट्रीय धन का स्वामित्व और वितरण सबके हित में हो, (स) पुरुषों और स्त्रियों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले, (द) बालकों का शोषण न किया जाय, इत्यादि ।

(2) राज्य अपने आर्थिक साधनों की सीमा में काम दिलाने, बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी व अंगहीन होने की दशा में सार्वजनिक सहायता देने की व्यवस्था करे।

(3) राज्य काम करने की दशाओं में सुधार करे और स्त्रियों के लिए प्रसूति सहायता का प्रबन्ध करे।

(4) राज्य नागरिकों के स्वास्थ्य को सुधारे तथा उनके आहार, पुष्टि तल और जीवन-स्तर को ऊंचा उठाये।

उपर्युक्त बातों को दृष्टि में रखते हुए भारत सरकार तथा राज्य सरकारों ने कल्याणकारी राज्य की स्थापना की दिशा में कुछ कदम उठाये हैं। भारत के तत्कालीन शासक दल राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा अपने 1955 के अबाड़ी अधिवेशन में ‘समाजवादी ढंग के समाज की व्यवस्था’ (Socialistic Pattern of Society) का लक्ष्य घोषित किया जा चुका है। कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारत ने स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद से ही नियोजन का मार्ग अपनाया और अब तक बारह पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत अनेक लोककल्याण योजनाएं स्वीकार और लागू की गयी हैं। 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान के प्रस्ताव में ‘समाजवाद’ शब्द जोड़ा गया। भारत में प्रजातान्त्रिक समाजवाद का जो रूप अपनाया गया है वह लोककल्याणकारी राज्य का ही एक प्रकार है।शिक्षा के क्षेत्र में प्रति वर्ष विभिन्न प्रकार की शिक्षा सुविधाओं का विस्तार हो रहा है और दिसम्बर 2003 में राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत 86वें संवैधानिक संशोधन (2002) के अन्तर्गत 6 से 14 वर्ष तक की आयु वर्ग के बच्चों हेतु निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान है। मई 1998 से ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन’ तथा नवम्बर 2000 से ‘सर्व शिक्षा अभियान’ का भी राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। शिक्षा की तरह ही सभी राज्यों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व चिकित्सा सेवाओं का भी विस्तार हो रहा है। वर्ष 2010 से पूरे देश में शिक्षा के अधिकार कानून को लागू कर दिया गया है तथा शिक्षा के मौलिक अधिकार को व्यावहारिक रूप प्रदान कर दिया गया है।आर्थिक क्षेत्र में भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन, चकबन्दी, सहकारी खेती, ग्रामोद्योग और रोजगार सम्बन्धी कानून बने हैं और योजनाएं चालू हैं। भारत गांवों का देश है, अतः गांवों के बहुमुखी विकास के लिए ‘सामुदायिक योजनाएं’ और ‘राष्ट्रीय विस्तार सेवा खण्ड’ की योजना सभी गांवों में लागू की गयी है। मजदूरों के कल्याण के लिए अनेक कानूनों का निर्माण किया गया है और उनके लिए जीवन बीमा योजनाएं, प्रॉविडेण्ट फण्ड योजना व बोनस देने की योजनाएं लागू की गयी हैं, जिनसे लाखों मजदूरों को लाभ पहुंच रहा है। इसी प्रकार ‘औद्योगिक कर्मचारियों के लिए पारिवारिक पेंशन’ की योजना भी लागू की गयी है।भारत जैसे देश में लोककल्याण का मूलाधार गांवों का विकास और गांवों में सदियों से चली आ रही पंचायत व्यवस्था को सुदृढ़ करना ही हो सकता है। अतः पहले तो 2 अक्टूबर, 1959 से ‘पंचायती राज’ की व्यवस्था को अपनाया गया तथा इसके बाद पंचायती राज और शहरी क्षेत्र की स्थानीय स्वशासन की कमियों को दूर करने के लिए 1993 ई. में 73वां और 74वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया। आशा की जाती है कि समस्त देश में स्थापित स्थानीय स्वशासन की यह व्यवस्था देश को लोककल्याण और विकास की दिशा में बहुत आगे ले जाने में सफल होगी। वर्ष 2004-05 में चौदहवीं लोकसभा चुनाव के पूर्व (राजग सरकार) और पश्चात् (यूपीए सरकार) द्वारा लोक कल्याण की दिशा में कुछ कदम बढ़ाए गए। राजग सरकार द्वारा ‘बाल श्रम उन्मूलन योजना’ लागू की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में आवास सुविधाओं के विस्तार के लिए ‘अटल ग्रामीण गृह योजना’ नाम से एक नई योजना लागू की गई। असंगठित क्षेत्र के लगभग 37 करोड़ श्रमिकों के लिए ‘सामाजिक सुरक्षा योजना’ अपनाई गई और बालिकाओं के शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए ‘कस्तूरबा गांधी विद्यालयों’ की योजना लागू की गई। मई 2004 में गठित ‘संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन’ की सरकार ने अपने ‘साझा न्यूनतम कार्यक्रम’ (CMP) में लोककल्याण की दिशा में कुछ सारभूत कदम उठाने और तीव्र गति से आगे बढ़ने की बात कही। एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम, 2005′ के रूप में उठाया गया, जिसके अनुसार देश की ग्रामीण जनसंख्या (प्रति परिवार एक सदस्य) को वर्ष में न्यूनतम 100 दिन के लिए रोजगार की गारण्टी दी गई है। प्रारम्भ में देश के 200 जिलों में इसे लागू किया गया। 1 अप्रैल, 2008 से इसे देश के अन्य जिलों में भी लागू कर दिया गया है। 2015 के मध्य तक इस योजना के अन्तर्गत 260 लाख दिनों का रोजगार दिया जा चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को स्वरोजगार देने के लिए 1999 में स्वर्ण जयन्ती स्वरोजगार योजना लागू की गई थी। अब इसका नाम ‘आजीविका’ रख दिया गया है। इसके अन्तर्गत मार्च 2012 तक 14.46 लाख स्वरोजगार प्रदान किए जा चुके हैं। आजीविका योजना में रोजगार के लिए कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें 30% महिलाओं को तथा 50% अनुसूचित जातियों/जनजातियों को आरक्षण दिया गया है। इसी प्रकार स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए शिक्षण संस्थाओं में ‘मध्यावकाश भोजन व्यवस्था’ (Mid-day Meals) लागू की गई है तथा ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ योजना भी लागू की गई है।

सरकार द्वारा सीमान्त किसानों, निर्धन वर्ग, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों आदि के लिए विशेष बजट प्रावधान करते हुए उनके हितों को विशेष रूप से ध्यान में रखा गया है। उदाहरण के लिए, सीमान्त किसानों को ऋण माफी दी गई है। मनरेगा कार्यक्रम के अन्तर्गत 2006-07 में 90.5 करोड़, 2007-08 में 143.9 करोड़, 2008-09 में 216 करोड़ 2009-10 में 283 करोड़, 2010-11 में 257 करोड़ तथा सितम्बर तक 2011-12 में 70 करोड़ कार्य दिवसों का सृजन किया गया है। 2011-12 में इस योजना के लिए 40 हजार करोड़ ₹ की धनराशि आबंटित की गई है। 2015-16 में 134.96 करोड़ श्रम दिवस सृजित किए गए। इस 11 प्रकार काम के अधिकार को ग्रामीण क्षेत्रों में एक कानूनी अधिकार का दर्जा दे दिया गया है। ‘मध्यावकाश भोजन व्यवस्था’ (Mid-day meals), प्राथमिक स्तर के बच्चों से आगे बढ़कर पूर्व माध्यमिक स्तर तक लागू कर दी गई है। वस्तुतः लोकतन्त्र और लोककल्याण एक-दूसरे से गहरे रूप में जुड़ी हुई स्थितियां हैं। शासक दल चाहे जो दल हो, उसे लोककल्याण की दिशा में तीव्र गति से और ठोस कदमों के आधार पर आगे बढ़ना ही होगा। एक अन्य कल्याणाकारी योजना ‘सम्पूर्ण ग्राम स्वरोजगार योजना’ की शुरुआत अप्रैल 1999 में की गयी। इसके अन्तर्गत जुलाई 2011 तक 41.7 लाख स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जा चुका है। 1985-86 में शुरू की गयी इन्दिरा आवास योजना (अब प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण पीएमवाई-जी) के अन्तर्गत वर्ष 2011-12 के लिए 27 लाख मकानों के निर्माण का लक्ष्य रख गया था, लेकिन जुलाई 2011 तक मात्र 4.4 लाख मकानों का निर्माण ही हो सका। इस योजना के अन्तर्गत 2013-14 में 13.7 लाख आवासों का निर्माण किया गया। इस योजना के प्रारम्भ होने से मार्च 2016 तक 360 लाख मकानों के निर्माण के लिए सहायता प्रदान की जा चुकी है, जिन पर 1,06,798.93 करोड़ ₹ की लागत आई है।
इस प्रकार लोककल्याण की दिशा में कुछ कदम उठाये गये। इस दिशा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कदम सभी नागरिकों के लिए ‘काम का अधिकार’ ही हो सकता है, लेकिन अनेक घोषणाओं के बावजूद अब तक भी इस कार्य को नहीं किया जा सका है। वस्तुतः लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना औपचारिक घोषणाओं, कोरी नारेबाजी या मात्र कानून निर्माण पर निर्भर नहीं करती; वरन् ऐसे ठोस प्रयत्नों पर निर्भर करती है, जिनसे जनसाधारण की स्थिति में वास्तविक रूप में सुधार हो । वस्तुतः आर्थिक सुरक्षा तथा समानता की दिशा में अभी बहुत अधिक किया जाना शेष है।
यह तथ्य है कि एक वास्तविक लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना से अभी हम बहुत दूर है और इस
सम्बन्ध में तीव्र गति से ठोस प्रयत्न किये जाने की आवश्यकता है।

राज्य के कार्यों के संबंध में भारतीय विचार को ( मनु और कौटिल्य) का दृष्टिकोण-

प्राचीन भारत में राजनीतिक चिन्तन की परम्पराअनेक पाश्चात्य विद्वानों, विशेषतया मैक्समूलर और डनिंग द्वारा इस धारणा का प्रतिपादन किया गया है कि प्राचीनकाल में भारतीयों की दृष्टि अध्यात्मवाद पर केन्द्रित थी और प्राचीन भारत के दर्शन में राजनीतिक चिन्तन का अभाव है। इन विद्वानों द्वारा प्रतिपादित यह विचार एक भ्रान्ति मात्र ही है। वस्तुस्थिति यह है कि भारत में राजनीतिक चिन्तन की भी अपनी एक सुदीर्घ परम्परा रही है जो पाश्चात्य राजदर्शन की तुलना में निश्चित रूप से अधिक प्राचीन, समृद्ध और सुव्यवस्थित है।मनु और कौटिल्य का सप्तांग सिद्धान्त भारतीय राजशास्त्र के अन्तर्गत मन, भीष्म, शुक्र और कौटिल्य आदि प्रमुख राजशास्त्रियों के द्वारा राज्य की कल्पना एक ऐसे जीवित एवं जाग्रत शरीर के रूप में की गई है, जिसके ‘सात अंग’ होते हैं। ‘मनुस्मृति’ के अध्याय 9 के श्लोक 294 में कहा गया है कि राज्य की ये सात प्रवृत्तियां हैं : स्वामी, मन्त्री, पुर, राष्ट्र, कोष, दण्ड तथा मित्र।इसी प्रकार कौटिल्य के अनुसार राज्य की ये 7 प्रवृत्तियां या अंग इस प्रकार हैं: स्वामी, आमात्य(मंत्री), जनपद (प्रदेश), दुर्ग, कोष, दण्ड और मित्र।राज्य की इन सप्त प्रकृतियों में मनु और कौटिल्य दोनों ही राजा को सर्वोच्च महत्व देते हुए, उसे पूरे शासन, समस्त व्यवस्था के संचालन की आधारशिला मानते हैं।

इस प्रकार भारतीय विचारकों ने राज्य और राज्य के अंगों के सम्बन्ध में अपेक्षाकृत अधिक विस्तार के साथ विवेचना की है। पाश्चात्य विचारकों ने राज्य के चार तत्वों या अंगों का उल्लेख किया है। भारतीय विचारकों ने 7 तत्वों या अंगों का उल्लेख किया है। भारतीय विचारकों मनु, भीष्म, शुक्र और कौटिल्य आदि का दृष्टिकोण इस प्रसंग में अधिक यथार्थ परक है।
प्राचीन भारतीय विचारकों—मनु, शुक्र, भीष्म, कौटिल्य, वृहस्पति और ‘रामायण’ तथा ‘महाभारत’ जैसे महाकाव्यों में राज्य के कार्यों और राजा के कर्तव्यों पर पर्याप्त विस्तार के साथ विचार किया गया है। सामान्य रूप से, प्राचीन भारत के राजनीतिक चिन्तन में राज्य को व्यापक कार्यक्षेत्र प्रदान किया गया है। भारत में प्राचीन काल से ‘रामराज्य’ की जो धारणा प्रचलित है, वह एक ऐसे राज्य का प्रतीक है, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति का सर्वांगीण रूप से विकास करने का प्रयत्न किया जाता है। इसी दृष्टि से वेदव्यास ने ‘महाभारत’ में कहा है कि “जो नरेश अपनी प्रजा को पुत्र के समान समझकर उसकी चतुर्मुखी उन्नति का प्रयत्न नहीं करता, वह नरक का भागी होता है।”

मनु का दृष्टिकोण-

मनु ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘मनुस्मृति’ में राज्य के कार्यों पर समुचित विचार किया है। मनु राज्य और राज्य के शासक के रूप में राजा को व्यापक कार्यक्षेत्र प्रदान करता है। मनु के अनुसार राज्य के प्रमुख रूप से निम्नलिखित कार्य हैं :
(1) बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करना-मनु के अनुसार बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करना राज्य का सबसे प्रमुख कार्य है। राजा को युद्ध से कदापि भी डरना नहीं चाहिए। उसे अप्राप्त को पाने की इच्छा व प्राप्त भूमि की रक्षा करनी चाहिए। राजा सेना को तैयार रखे, सैनिक शक्ति का प्रदर्शन करता रहे और गुप्तचरों की सहायता से शत्रु की कमजोरियों का ज्ञान प्राप्त करे। राजा को राज्य की सुरक्षा के लिए स्वयं पहाड़ी दुर्ग में निवास करना चाहिए, क्योंकि वह सब दुर्गों में श्रेष्ठ होता है। दुर्ग के बीच में एक बड़ा सुरक्षित महल बनवाना चाहिए।
(2) आन्तरिक शान्ति स्थापित करना-मनु इस बात से परिचित थे कि समाज के कण्टक तत्व आन्तरिक शान्ति भंग करने का कारण बन सकते हैं। अतः राज्य का एक प्रमुख कार्य दण्ड शक्ति के आधार पर दुष्टों को नियन्त्रित करना है। दुष्टों के प्रति राज्य और राजा के द्वारा आवश्यकतानुसार बहुत कठोर व्यवहार किया जाना चाहिए। राज्य के द्वारा भ्रष्ट आचरण करने वाले व्यक्तियों, जुआरियों, धोखेबाजों तथा दुष्टों को दण्डित किया जाना चाहिए और गलत ढंग से चिकित्सा करने वालों पर भारी जुर्माने किये जाने चाहिए। मनु के अनुसार वैश्यों तथा शूद्रों को अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश करना भी राज्य का कार्य है। मनु ने इस बात पर बल दिया है कि स्त्रियों की सम्पत्ति का गबन करने वाले व्यक्तियों को राज्य के द्वारा बहुत कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।
(3) विवादों का निर्णय या न्यायिक कार्य-राज्य का एक महत्वपूर्ण कार्य यह है कि वह नागरिकों के आपसी विवादों का निर्णय करे और विभिन्न समुदायों के बीच होने वाले झगड़ों का निपटारा करे। न्याय करने में राज्य के द्वारा भावना या दुर्भावना को नहीं अपनाया जाना चाहिए। न्यायाधीशों को सभी विवादों का निर्णय निष्पक्षतापूर्वक करना चाहिए, क्योंकि ‘जिस सभा (न्यायालय) में सत्य असत्य से पीड़ित होता है, उसके सदस्य ही पाप से नष्ट हो जाते हैं।’
(4) राज्य का आर्थिक विकास और समृद्धि-मनु के अनुसार राज्य का आर्थिक विकास व समृद्धि भी राज्य का एक प्रमुख कार्य है। इस प्रसंग में शासन की नीति चार सूत्री होनी चाहिए : शक्ति और वैध उपायों द्वारा धन अर्जित करना, रक्षण करना, वृद्धि करना और सुपात्रों को दान करना।
राज्य की समस्त व्यवस्था का संचालन करने के लिए धन की आवश्यकता होती है, अतः मनु ने करों की व्यवस्था भी की है। मनु ने चार प्रकार के कर बतलाये हैं : बलि (विभिन्न प्रकार के कर), शुल्क (बाजार या हाट के व्यापारियों द्वारा बिक्री के लिए लायी गयी वस्तुओं पर चुंगी), दण्डकर (जुर्माने) और भाग (लगान)। मनु की कर सम्बन्धी धारणा में उसकी बुद्धिमत्ता, प्रगतिशीलता और लोककल्याणकारी प्रवृत्ति के स्पष्ट दर्शन होते हैं। मनु कहते हैं कि “कर न लेने से राजा के और अत्यधिक कर लेने से प्रजा के जीवन का अन्त हो जाता है।”” अधिक कर का निषेध करते हुए मनु का मानना है कि, “जिस प्रकार जोक, बछड़ा और मधुमक्खी थोड़े-थोड़े अपने खाद्य क्रमशः रक्त, दूध और मधु ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार राजा को प्रजा से थोड़ा-थोड़ा वार्षिक ग्रहण करना चाहिए।” मनु का स्पष्ट मत था कि कर इस प्रकार निर्धारित किये और वसूल किये जाने चाहिए कि गरीब जनता पर कर का भार कम पड़े और समृद्धिशाली लोगों पर कर-भार अधिक पड़े। मनु ने वस्तुओं के मूल्य को नियन्त्रित करना भी राज्य का एक कर्तव्य बताया है।

(5) असहाय व्यक्तियों की सहायता करना-मनु के अनुसार सभी असहाय व्यक्तियों की सहायता करना राज्य का एक प्रमुख कार्य है। राज्य के द्वारा सन्तान-विहीन स्त्रियों, विधवाओं तथा रोगग्रस्त स्त्रियों की देखभाल की जानी चाहिए और अवयस्कों की सम्पत्ति की विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए। जो व्यक्ति गायब हो गये हैं, राज्य के द्वारा उनकी सम्पत्ति अपने संरक्षण में ले ली जानी चाहिए और जब वे प्रकट हो जायें, तब उनकी सम्पत्ति लौटा दी जानी चाहिए।

(6) शिक्षा का प्रबन्ध-राज्य के द्वारा शिक्षा की व्यवस्था भी की जानी चाहिए और शिक्षकों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। राज्य के द्वारा वेदों का अध्ययन और अध्यापन करने वाले ब्राह्मणों को दान अवश्य ही दिया जाना चाहिए।

(7) स्थानीय संस्थाओं का प्रबन्ध—मनु ने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था के अन्तर्गत स्थानीय संस्थाओं के महत्व को भी स्वीकार किया है और स्थानीय विषयों का भार इन संस्थाओं को ही सौंपने का निर्देश दिया है। राज्य के कार्यक्षेत्र और राजा की शक्तियों के प्रसंग में मनु के राजनीतिक चिन्तन की दो प्रमुख बातें हैं : प्रथम, उसने सदैव इस बात पर बल दिया है कि राजा द्वारा कर्तव्य पालन किया जाना चाहिए और राजा का सर्वोच्च कर्तव्य है, प्रजा पालन। मनु के अनुसार, “राजा के द्वारा अपनी प्रजा के प्रति पिता के समान व्यवहार किया जाना चाहिए क्योंकि प्रजा का पालन करना राजा का श्रेष्ठ धर्म है और प्रजा पालन द्वारा शास्त्रोक्त फल को भोगने वाला राजा धर्म से युक्त होता है।”

द्वितीय, उसने राजा को निरंकुश शक्तियां प्रदान नहीं कीं, वरन् राजसत्ता को सीमित किया है। केवल मोटवानी मनु के चिन्तन की व्याख्या करते हुए लिखते हैं, “राजा को समझना चाहिए कि वह धर्म के नियमों के अधीन है। कोई भी राजा धर्म के विरुद्ध व्यवहार नहीं कर सकता, धर्म राजाओं और सामान्यजन पर एकसमान ही शासन करता है। इसके अतिरिक्त, राजा राजनीतिक प्रभु-जनता के भी अधीन है। वह अपनी शक्तियों के प्रयोग में जनता की आज्ञा पालन की क्षमता से सीमित है। इसी प्रकार सालेटोर ने लिखा है कि “मनु ने निस्सन्देह यह कहा है कि जनता राजा को गद्दी से उतार सकती है और उसे मार भी सकती है, यदि वह अपनी मूर्खता से प्रजा को सताता है। 3
राज्य के कार्यक्षेत्र सम्बन्धी मनु के चिन्तन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने मानव मात्र के कर्तव्यों और स्वधर्म पालन पर बल दिया है। यह एक ऐसी बात है जिसे अपनाकर सम्पूर्ण मानव जाति सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकती है। पाश्चात्य जगत के प्रसिद्ध विधिशास्त्री जस्टिनियन ने बार गर्वपूर्वक कहा था कि उन्होंने एक ऐसी पद्धति का प्रतिपादन किया है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकार प्राप्त हो सकेंगे। मनु गर्वपूर्वक यह कह सकते हैं कि उन्होंने ऐसी कानूनी पद्धति तथा राजधर्म का वर्णन किया है जिसमें सभी वर्गों के व्यक्तियों के कर्तव्यों की व्याख्या है।
इस प्रकार मनु के अनुसार, राज्य का कार्यक्षेत्र बहुत अधिक व्यापक है। केवल मोटवानी के अनुसार, “मन के निर्देशन में राज्य द्वारा बनाये जाने वाले अनेक कानून वर्तमान कालीन राजशास्त्र के विद्यार्थी को समाजवादी प्रतीत होंगे। वस्तुतः मनु द्वारा चित्रित राज्य एक कल्याणकारी राज्य है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को बौद्धिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त कर लेने का अवसर मिलता है।

राज्य के कार्यक्षेत्र के प्रसंग में कौटिल्य का दृष्टिकोण

मनु के समान ही कौटिल्य ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य के कार्यों और राजा के कर्तव्यों पर पर्याप्त विस्तार के साथ विचार किया है। कौटिल्य की पुस्तक का शीर्षक ‘अर्थशास्त्र’ देखकर यह भ्रम हो जाता है कि यह पुस्तक राजनीति विज्ञान की है अथवा अर्थशास्त्र विषय की। वस्तुतः कौटिल्य के समय में ‘अर्थ’ का व्यापक तात्पर्य है जिसका मतलब है राज्य की भूमि व संसाधनों से अर्थात् ‘अर्थशास्त्र’ पुस्तक राज्य की भूमि को सुरक्षित करने तथा उसका विस्तार करने से सम्बन्धित पुस्तक है। यही ‘अर्थशास्त्र’ का प्रमुख उद्देश्य है। इस प्रकार इस पुस्तक की विषय-वस्तु राजनीतिक है। कौटिल्य ने राज्य के सात अंग माने हैं—स्वामी (राजा), अमात्य, जनपद (क्षेत्र), सेना, कोष, दुर्ग तथा मित्र। इसे उसके सप्तांग सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। जहां तक राज्य व नागरिकों के सम्बन्ध की बात है। कौटिल्य की विचारधारा का मूल तत्व यह है कि “प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में राजा का हित है। राजा के लिए प्रजा के सुख से अलग अपना कोई सुख नहीं है।” उसके अनुसार, “राजा और प्रजा में पिता और पुत्र का सम्बन्ध होना चाहिए।” जैसे पिता पुत्र का ध्यान रखता है, वैसे ही राजा के द्वारा प्रजा का ध्यान रखा जाना चाहिए। इस सामान्य धारणा के प्रतिपादन के साथ कौटिल्य राज्य के कार्यक्षेत्र या राजा के कर्तव्यों की विशद विवेचना भी करता है। उसके अनुसार राज्य के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं :
(1) वर्णाश्रम धर्म को बनाये रखना-प्राचीन भारतीय जीवन के अन्तर्गत चार वर्णों और वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था को स्वीकार किया गया था। चार वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । कौटिल्य के अनुसार, राज्य का एक प्रमुख कार्य वर्णाश्रम धर्म को बनाये रखना और सभी प्राणियों को अपने धर्म से विचलित न होने देना है क्योंकि “जिस राजा की प्रजा आर्य मर्यादा के आधार पर व्यवस्थित रहती है, जो वर्ण और आश्रम के नियमों का पालन करती है और जो त्रयी (तीन वेद) द्वारा निहित विधान से रक्षित रहती है वह प्रजा सदैव प्रसन्न रहती है और उसका कभी नाश नहीं होता।”
(2) दण्ड की व्यवस्था करना—राज्य और राजा का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य दण्ड की व्यवस्था करना है क्योंकि दण्ड “अपर्याप्त वस्तु को प्राप्त करता है, उसकी रक्षा करता है, रक्षित वस्तु को बढ़ाता है और बढ़ी हुई वस्तु का उपभोग करता है।” समाज और सामाजिक व्यवहार दण्ड पर ही निर्भर करते हैं, इसलिए दण्ड की व्यवस्था महत्वपूर्ण है, किन्तु इस सम्बन्ध में स्वामी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दण्ड न तो आवश्यकता और औचित्य से अधिक हो और न ही कम। यथोचित दण्ड देने वाला राजा ही पूज्य होता है और केवल यथोचित दण्ड ही प्रजा को धर्म, अर्थ तथा काम से परिपूर्ण करता है। “यदि काम, क्रोध या अज्ञानवश दण्ड दिया जाय तो जनसाधारण की कौन कहे, वानप्रस्थी और संन्यासी तक क्षुब्ध हो जाते हैं। यदि दण्ड का उचित प्रयोग नहीं होता, तो वलवान मनुष्य निर्बलों को वैसे ही खा जाते हैं जैसे बड़ी मछली छोटी को।”

(3) आर्थिक विषयों का प्रबन्ध-कौटिल्य ने इस बात पर बहुत बल दिया है कि राज्य की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होनी चाहिए और आर्थिक विषयों का प्रबन्ध सुव्यवस्थित रूप में होना चाहिए। राज्य के पास भरा-पूरा कोष और आय के स्थायी स्रोत होने चाहिए। इस सम्बन्ध में उसका विचार है कि राजा प्रजा से उपज का छठा भाग ले तथा कोष में बहुमूल्य धातुएं तथा मुद्राएं पर्याप्त मात्रा में रखे। कौटिल्य के अनुसार, “कोष धर्मपूर्वक एकत्रित किया गया होना चाहिए और वह मात्रा में इतना अधिक हो कि उससे विपत्तिकाल में भी दीर्घ समय तक निर्वाह हो सके। कौटिल्य ने इस बात पर बल दिया है कि आवश्यक होने पर राज्य के द्वारा धनवानों पर अधिक कर लगाये जाने चाहिए और इस प्रकार एकत्रित की गयी धनराशि गरीबों में बांट दी जानी चाहिए।

(4) लोकहित और सामाजिक कल्याण सम्बन्धी कार्य-कौटिल्य ने राजा को लोकहित और सामाजिक कल्याण के भी कार्य सौंपे हैं। इसके अन्तर्गत राजा दान देगा और अनाथ, वृद्ध तथा असहाय लोगों के पालन-पोषण की व्यवस्था करेगा। असहाय गर्भवती स्त्रियों की उचित व्यवस्था करेगा और उनके बच्चों का पालन-पोषण करेगा। जो किसान खेती न करके जमीन परती छोड़ देते हों, उनके पास से जमीन लेकर वह दूसरे किसानों को देगा। राज्य के अन्य कर्तव्य हैं : कृषि के लिए बांध बनाना, जल मार्ग, स्थल मार्ग, बाजार और जलाशय बनाना, दुर्भिक्ष के समय जनता की सहायता करना और उन्हें बीज देना, आदि।कौटिल्य के अनुसार खदानों, वस्तुओं का निर्माण, जंगलों में इमारती लकड़ी और हाथियों को प्राप्त करना तथा अच्छी नस्ल के जानवरों को पैदा करने का प्रबन्ध भी राज्य के द्वारा ही किया जाना चाहिए। राजा• के लोकहित और समाज-कल्याण सम्बन्धी इन कार्यों के उल्लेख में कौटिल्य की दूरदर्शिता ही झलकती है।

(5) युद्ध करना तथा राज्य की सीमाओं का विस्तार-वर्तमान समय में युद्ध करने को राजा के कर्तव्यों में सम्मिलित करने पर भले ही आपत्ति की जाय, कौटिल्य के अनुसार युद्ध करना राज्य का एक प्रमुख कार्य है। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ का केन्द्र एक ऐसा विजिगीषु (विजय की इच्छा रखने वाला) राजा है जिसका उद्देश्य निरन्तर नयी भूमि प्राप्त कर अपने क्षेत्र में वृद्धि करना है। कौटिल्य राज्य की सभी आर्थिक और अन्य संस्थाओं की महत्ता इसी मापदण्ड से निश्चित करता है कि ये राज्य को किस सीमा तक सफल युद्ध के लिए तैयार करती हैं। नयी भूमि प्राप्त करना अर्थशास्त्र का इतना प्रमुख विषय है कि, अर्थशास्त्र के 15 अधिकरणों में से 9 अधिकरण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में युद्ध से ही सम्बन्ध रखते हैं।राजा के द्वारा उपर्युक्त सभी कार्यों का सम्पादन लोकहित की भावना से ही किया जाना चाहिए|

क्या कौटिल्य का राजा निरंकुश है?

कौटिल्य राजतन्त्र को शासन का एकमात्र स्वाभाविक और श्रेष्ठ प्रकार मानता है और राज्य के सप्त अंगों में राजा को सर्वोच्च स्थिति प्रदान करता है, किन्तु ऐसा होने पर भी कौटिल्य का राजा निरंकुश नहीं है, उस पर कुछ ऐसे प्रतिबन्ध हैं जिनके कारण वह मनमानी नहीं कर सकता। ये प्रतिबन्ध निम्न प्रकार हैं :राजा की शक्ति पर प्रथम प्रतिबन्ध अनुबन्धवाद का था। कौटिल्य के अनुसार मनुष्यों ने राजा की आज्ञाओं के पालन की जो प्रतिज्ञा की उसके बदले में राजा ने अपने प्रजाजन के धन-जन की रक्षा का वचन दिया था। इसका स्वाभाविक निष्कर्ष यह है कि राजा के द्वारा प्रजा के धन-जन को हानि पहुंचाने वाला कोई कार्य नहीं किया जा सकता। कौटिल्य ने एक स्थान पर बताया है कि राजा की स्थिति वेतन-भोगी सैनिकों के समान ही होती है। इसका तात्पर्य यह है कि राजा कर्तव्यपालन के लिए बाध्य है और वह राजकोष से निश्चित वेतन ही ले सकता है। कौटिल्य के राजा को मनमाने ढंग से राज्य की सम्पत्ति का व्यय कर भोग-विलास के साधन प्राप्त करने का अधिकार नहीं था।राजा की शक्ति पर दूसरा प्रतिबन्ध धार्मिक नियमों और रीति-रिवाजों का था। राजा के अधिकार धर्म और रीति-रिवाजों से सीमित थे और वह इनका पालन करने के लिए बाध्य था। इस बात की आशंका रहती थी कि राजा द्वारा इन नियमों का उल्लंघन किये जाने पर जनता क्षुब्ध होकर स्वयं ही उसके जीवन का अन्त न कर दे। तत्कालीन जीवन में धर्म और परलोक की भावना बहुत प्रबल होने के कारण नरक का भय भी राजा को मनमानी करने से रोकता था। उसकी निजी नैतिक और धार्मिक भावना उसे निरंकुश बनने से रोकती थी कौटिल्य का राजा स्वयं राजधर्म के नियमों से बंधा है। राजधर्म का तात्पर्य है राजा का कर्तव्य। राजा का प्रमुख कार्य प्रजा की रक्षा व उसका कल्याण है। राजधर्म का अर्थ किसी पन्थ विशेष का पालन करना नहीं, वरन् राजा के कर्तव्यों से है।राजा की शक्ति पर तीसरा प्रतिबन्ध मन्त्रिपरिषद् का था। उसके अनुसार राज्य रूपी रथ के दो चक्र राजा और मन्त्रिपरिषद् हैं, इसलिए मन्त्रिपरिषद् का अधिकार राजा के बराबर ही है। मन्त्रिपरिषद् राजा की शक्ति पर नियन्त्रण रख उसे निरंकुश बनने से रोकती थी।इन सबके अतिरिक्त कौटिल्य ने राजा की निरंकुशता पर अन्तिम, किन्तु एक अत्यन्त प्रभावशाली प्रतिबन्ध राजा के व्यक्तित्व तथा उसे प्रदान की गयी शिक्षा के आधार पर लगाया है। कौटिल्य ने राजा के लिए अनेक मानसिक और नैतिक गुण आवश्यक बताये हैं और इस प्रकार का सर्वगुणसम्पन्न राजा अपने स्वभाव से ही निरंकुश नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त उसने राजा की शिक्षा पर बल देकर उस पर ऐसे संस्कार डालने चाहे हैं कि वह निरंकुशता का मार्ग न अपनाकर लोकहित के कार्यों में ही लगा रहे। वस्तुतः कौटिल्य ने राजतन्त्र का समर्थन और इस व्यवस्था में राजा को पर्याप्त शक्तियां देने का कार्य प्रजाजन के हित को दृष्टि में रखकर ही किया है।श्री कृष्ण राव ने ठीक लिखा है कि “कौटिल्य का राजा अत्याचारी नहीं हो सकता, चाहे वह कुछ बातों में स्वेच्छाचारी रहे, क्योंकि वह धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के सुस्थापित नियमों के अधीन रहता है। इसी बात को स्वीकार करते हुए सालेटोर (Saletore) ने लिखा है कि “वह अपना राज्य और जीवन खोये बिना यूनान के अत्याचारी राजाओं जैसा नहीं बन सकता, क्योंकि भारत में जनता ऐसे राजा को सहन नहीं कर सकती थी। यद्यपि राजा का पद सर्वोच्च था, किन्तु न तो वह जनता से पृथक् था और न उसके लिए विदेशी ही और वह जैसा चाहे, जनता के प्रति व्यवहार करने के लिए स्वतन्त्र न था।’

प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न-

निम्नलिखित प्रश्नों में चार विकल्प दिए गए हैं उनमें से एक सही विकल्प छाठकर लिखिए-

  1. निम्नलिखित में से किस विचारक के अनुसार राज्य साध्य है ?
    (अ) प्लेटो
    (स) हीगल
    (ब) रूसो (द) इनमें से सभी
  2. सामान्य इच्छा की अवधारणा का प्रतिपादन किसके द्वारा किया गया ?
    (अ) रूसो
    (स) बोसांके
    (ब) हीगल
    (द) ब्रेडले1
  3. “राज्य स्वयं ईश्वर है, यह पृथ्वी पर स्थित दैवीय विचार है।” यह कथन किस विचारक का है ?
    (अ) प्लेटो का
    (स) हीगल का
    (ब) अरस्तू का
    (द) ग्रीन का
  4. निम्नलिखित में से कौन-सी विचारधारा राज्य के सीमित कार्यक्षेत्र का समर्थन करती है ?
    (अ) व्यक्तिवाद। (ब) आदर्शवाद
    (स) समाजवाद। (द) इनमें से कोई नहीं
  5. राज्य का आवश्यक कार्य है :
    (अ) बाहरी आक्रमण से रक्षा। (ब) वैदेशिकक संबंधों का संचालन
    (स) आन्तरिक क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था। (द) इनमें से सभी
  6. राज्य का ऐच्छिक कार्य है :
    (अ) स्वास्थ्य रक्षा और सफाई
    (द) इनमें से सभी
    (ब) शिक्षा
    (स) यातायात के साधनों का प्रबंध

  7. निम्नलिखित में से किस विचारधारा के अनुसार राज्य एक आवश्यक बुराई है, जिसका कार्यक्षेत्र अत्यन्त सीमित होना चाहिए ?
    (अ) व्यक्तिवाद
    (स) लोककल्याणकारी राज्य की धारणा
    (ब) समाजवाद
    (द) अराजकतावाद
  8. “वही सरकार सबसे अच्छी है, जो सबसे कम शासन करती है।” यह कथन किसका है ?
    (अ) एडम स्मिथ का
    (स) हरबर्ट स्पेन्सर का
    (ब) फ्रीमैन का
    (द) रिकार्डो का
  9. राज्य की सत्ता व कार्यों को सीमित करने के कारण किस विचारक को दार्शनिक अराजकतावादी की संज्ञा दी जाती है ?
    (अ) कार्ल मार्क्स
    (स) महात्मा गांधी
    (ब) स्पेन्सर (द) इनमें से कोई नहीं
  10. निम्नलिखित में से कौन-सा विचारक व्यक्तिवाद का समर्थक नहीं है ?
    (अ) जॉन स्टुअर्ट मिल
    (स) हरबर्ट स्पेन्सर
    (ब) एडम स्मिथ
    (द) हीगल
  11. सामाजिक जीवन के क्षेत्र में ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ तथा ‘योग्यतम की विजय’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन
    किसने किया?
    (अ) हरबर्ट स्पेन्सर ने
    (स) माल्थस ने
    (ब) रिकार्डो ने
    (द) एडम स्मिथ ने
  12. किसने कहा, ‘राज्य का धीरे-धीरे लोप हो जाएगा’ ?
    (अ) लास्की
    (ब) अरस्तू
    (स) प्लेटो
    (द) मार्क्स
    (ब) कार्ल मार्क्स
  13. किस विचारक के अनुसार, ‘राज्य व्यक्ति का बड़ा रूप है’?
    (अ) अरस्तू। (ब) कार्ल मार्क्स
    (स) लास्की
    (द) प्लेटो
  14. “राज्य जीवन के लिए अस्तित्व में आया और सदजीवन के लिए अस्तित्व में बना हुआ है।” यह कथन किस
    विचारक का है?
    (अ) प्लेटो का
    (स) वेदव्यास का
    (ब) अरस्तू का
    (द) कौटिल्य का
  15. कार्ल मार्क्स और ऐंजिल्स ने साम्यवादी घोषणा-पत्र (Communist Manifesto) कब प्रकाशित किया :
    (अ) 1648 में। (ब)1748 में
    (स) 1848 में। ( द)1948 में
  16. “कल्याणकारी राज्य वह है जो अपनी आर्थिक व्यवस्था का संचालन आय के अधिकाधिक समान वितरण के उद्देश्य से करता है।” यह कथन किसका है
    (अ) टी. डब्ल्यू केण्ट का
    (स) जवाहरलाल नेहरू का
    (ब) डॉक्टर अब्राहम का
    (द) होब्मेन का
  17. किस विचारधारा के अनुसार राज्य एक ‘अनावश्यक बुराई है’?
    (अ) अराजकतावाद . (ब) व्यक्तिवाद
    (स) समाजवाद। (द)लाक का
  18. किसका कथन है ‘राज्य व्यक्ति से पहले है’?
    (अ) प्लेटो का। (द) लॉक का
    (स) रूसो का। (ब) अरस्तु का
  19. ‘अर्थशास्त्र’ नामक पुस्तक का लेखक कौन था ?
    (अ) प्लेटो। (ब) अरस्तू का
    (स) रूसो। (द) कौटिल्य (चाणक्य)
  20. कौटिल्य के अनुसार राज्य का प्रमुख कार्य है।
    (अ) वर्णाश्रम धर्म को बनाए रखना। (ब) दंड की व्यवस्था करना
    (स) आर्थिक विषयों का प्रबन्ध करना। (द) इनमें सभी
  21. वैज्ञानिक समाजवाद का जनक कौन है ?
    (अ) रूसो
    (स) स्पेन्सर
    (ब) कार्लमार्क्स
    (द) टी.एच.ग्रीन
  22. राज्य का कार्य एक उत्तम जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाओं में बाधा डालना है। उक्त कथन सम्बन्धित है :
    (अ) थॉमस एक्यूनास से
    (स) जॉन लाक से
    (ब) जे. एस. मिल से
    (द) टी. एच. ग्रीन से

अति लघु उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1-राज्य के कार्य सम्बन्धी कौन-कौन सी विचारधाराएं हैं?
उत्तर—(1) व्यक्तिवादी विचारधारा, (2) समाजवादी विचारधारा, (3) आदर्शवादी विचारधारा, और (4) लोककल्याणकारी
विचारधारा।
प्रश्न 2-राज्य के कार्यों को कितने भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर- (1) अनिवार्य कार्य, (2) ऐच्छिक कार्य।
प्रश्न 3 – व्यक्तिवादी विचारधारा के अनुसार राज्य का सबसे महत्वपूर्ण कार्य क्या है?

उत्तर—व्यक्तिवादी विचारधारा के अनुसार राज्य का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कानून व व्यवस्था बनाए रखना है।

प्रश्न 4-राज्य के कोई दो अनिवार्य कार्य लिखिए।


उत्तर-(1) राज्य में शान्ति तथा सुव्यवस्था की स्थापना करना, (2) न्याय प्रदान करना।

प्रश्न 5-नव-उदारवादी विचारधारा के किन्हीं दो समर्थकों के नाम बताइए।

उत्तर—नव-उदारवाद के दो समर्थक हैं—मिल्टन फ्रीडमैन तथा रॉबर्ट नोजिक।


प्रश्न 6-व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक किस बात पर सर्वाधिक जोर देते हैं?

उत्तर—व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सर्वाधिक जोर देते हैं।

प्रश्न 7–व्यक्तिवाद का प्रतिपादन कब हुआ ?
उत्तर—व्यक्तिवाद का प्रतिपादन यूरोप में 18वीं शताब्दी के अन्तिम काल में हुआ था।

प्रश्न 8-व्यक्तिवाद के समर्थन में दिये जाने वाले दो तर्कों को लिखिए।

उत्तर-(1) आर्थिक तर्क, (2) प्राणिवैज्ञानिक तर्क।


प्रश्न 9-व्यक्तिवाद के प्रमुख दोष लिखिए।


उत्तर—(1) कानून स्वतन्त्रता को सीमित नहीं करते, (2) राज्य एक बुराई नहीं है।


प्रश्न 10 वैज्ञानिक समाजवाद का जनक कौन है?


उत्तर—वैज्ञानिक समाजवाद का जनक प्रसिद्ध विद्वान कार्ल मार्क्स है।


प्रश्न 11- समाजवाद के पक्ष में दो तर्क दीजिए।


उत्तर- (1) न्याय की रक्षा, (2) व्यक्तित्व का विकास सम्भव होना ।

प्रश्न 12 — कौन-सी विचारधारा राज्य की सत्ता को स्वीकार नहीं करती?

उत्तर—अराजकतावाद की विचारधारा राज्य की सत्ता को नहीं स्वीकार करती ।


प्रश्न 13 – व्यक्तिवाद और समाजवाद के मध्य एक अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर—व्यक्तिवाद व्यक्ति के हित को महत्व देता है, जबकि समाजवाद समाज के हित को महत्व देता है।

प्रश्न 14 – कौन – सा सिद्धान्त राज्य के उन्मूलन के पक्ष में है?
उत्तर- अराजकतावाद ।


प्रश्न 15 – कल्याणकारी राज्य के दो प्रमुख कार्य लिखिए
उत्तर- (1) सामाजिक सुरक्षा, (2) आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था ।

प्रश्न 16-मनुस्मृति के लेखक कौन हैं?
उत्तर-मनुस्मति के लेखक भारतीय विचारक मनु हैं।


प्रश्न 17-कल्याणकारी राज्य क्या है?
उत्तर-कल्याणकारी राज्य का तात्पर्य ऐसे राज्य से है, जो आवश्यक कार्यों के साथ-साथ लोक कल्याण के कार्य; जैसे-शिक्षा, स्वास्थ्य आदि भी करता है।


प्रश्न 18-राज्य के कार्यों से सम्बन्धित व्यक्तिवादी सिद्धान्त के दो समर्थकों के नाम लिखिए।
उत्तर-(1) जॉन स्टुअर्ट मिल, (2) हरबर्ट स्पेन्सर ।


प्रश्न 19 पुलिस राज्य किसे कहते हैं?
उत्तर-ऐसा राज्य जो केवल आवश्यक कार्य करता है। उसे पुलिस राज्य कहते हैं।

प्रश्न 20- ‘अर्थशास्त्र’ पुस्तक के लेखक का नाम बताइए।
उत्तर-कौटिल्य (चाणक्य)।


प्रश्न 21-प्लेटो की प्रमुख पुस्तक का नाम क्या है?
उत्तर—प्लेटो की सबसे प्रमुख पुस्तक का नाम है : ‘रिपब्लिक’ (Republic) |


प्रश्न 22-मनु के अनुसार राज्य के दो कार्य क्या हैं?
उत्तर-(1) राज्य का आर्थिक विकास और समृद्धि, (2) असहाय व्यक्तियों की सहायता करना।

प्रश्न 23-समाजवाद व मार्क्सवाद में क्या अन्तर है?

उत्तर—दोनों विचारधाराएं आर्थिक साधनों पर समाज/राज्य का नियन्त्रण चाहती हैं। लेकिन समाजवादी लोकतान्त्रिक साधनों में विश्वास करते हैं, जबकि मार्क्सवादी हिंसा व क्रान्ति के माध्यम से अपने उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहते हैं।

प्रश्न 24-किस विचारक ने राजा व उसकी प्रजा के सम्बन्धों की तुलना पिता-पुत्र सम्बन्धों से की है?

उत्तर- कौटिल्य ।


प्रश्न 25. लोक कल्याणकारी राज्य की कोई दो विशेषताएं लिखिए।
उत्तर—1. यह नागरिकों के कल्याण के कार्य करता है। 2. इसमें जनता व सरकार के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

1.राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में कौन-कौन सी विचारधाराएं अथवा सिद्धान्त प्रचलित हैं?

गार्नर के अनुसार, राज्य के चार आवश्यक तत्व हैं – ( 1 ) मनुष्यों का समुदाय, (2) एक प्रदेश, जिसमें वे स्थायी रूप से निवास करते हैं, (3) आन्तरिक सम्प्रभुता तथा बाहरी नियन्त्रण से स्वतन्त्रता, (4) जनता की इच्छा को कार्यरूप में परिणित करने हेतु एक राजनीतिक संगठन । नागरिकों की रक्षा करना पर राष्ट्र नीति का संचालन करना क्र लगाना, धनवानों तथा निर्धनों के बीच सम्पति के वितरण की व्यवस्था करना देश की सम्पत्ति को बढ़ाना, अपराधियों को दण्ड देना, नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना, संस्कृति का उत्थान करना तथा आवास-प्रवास की व्यवस्था करना आदि राज्य के मुख्य कार्य हैं।

2. राज्य के प्रमुख ऐच्छिक कार्य क्या हैं?
3.राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में व्यक्तिवादी सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
4.व्यक्तिवाद के अनुसार राज्य के कार्य क्या हैं?
5.व्यक्तिवादी सिद्धान्त की आलोचना किन-किन तर्कों के आधार पर की जाती है?
6.समाजवाद के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
7.समाजवाद की आलोचना किन-किन तर्कों के आधार पर की जाती है ?
8.राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में कौटिल्य के विचार बताइए।

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