UPSSSC PET SYLLABUS के भारतीय इतिहास में सिंधु घाटी की सभ्यता का सम्पूर्ण अति महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

UPSSSC PET SYLLABUS में भारतीय इतिहास के अंतर्गत एक चैप्टर सिंधु घाटी की सभ्यता को भी सामिल किया गया है| सिंधु घाटी की सभ्यता चैप्टर से एक प्रश्न या दो प्रश्न पूछे जाते हैं| इस चैप्टर को तैयार करने के बाद यूपी एसएसएससी पीईटी परीक्षा में एक या दो नंबर आप को अवश्य मिल जाएगा | आप को उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग – प्रारंभिक पात्रता परीक्षा की तैयारी में यह लेख भारतीय इतिहास के खंड सिंधु घाटी की सभ्यता का अध्ययन में पूरी मदद करेगा और अति आवश्यक महत्वपूर्ण प्रश्न व उनके उत्तर को इस लेख में समाहित किया गया है| यह सम्पूर्ण लेख पढ़ने के बाद Uttar Pradesh Subordinate Service Selection Commission Preliminary Eligibility Test परीक्षा में आप का एक या दो अंक अनिवार्य सही हो जाएगा |

सिंधु घाटी सभ्यता – Indus Valley Civilization in Hindi

सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization): इसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है, यह एक कांस्य युग का समाज था जो वर्तमान पूर्वोत्तर देश अफगानिस्तान से पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत तक फैला हुआ था। सिंधु सभ्यता तीन चरणों में विकसित हुई |प्रारंभिक चरण हड़प्पा (3300 ईसा पूर्व से 2600 ईसा पूर्व तक) परिपक्व हड़प्पा चरण (2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व तक),और बाद में हड़प्पा चरण (1900 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व तक) है | प्राचीन सिंधु घाटी के निवासियों ने हस्तशिल्प में नई तकनीक विकसित की थी, जिनमें कार्नेलियन उत्पाद और मुहर नक्काशी व तांबा, कांस्य, सीसा और टिन के साथ धातु विज्ञान भी शामिल था।
सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता है,जो मुख्य रूप से दक्षिण एशिया के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में, जो आज तक उत्तर पूर्व अफ़ग़ानिस्तान तीन शुरुआती कालक्रमों में से एक थी, विभिन्न प्रकाशित शोध के अनुसार यह सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी थी। इसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है|

सभ्यता का विकास सिंधु और घग्घर (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ | मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा, राखीगढ़ी और हड़प्पा इसके प्रमुख स्थल थे | रेडियो कार्बन C-14 जैसी विलक्षण-पद्धति के द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई० पू ० से 1750 ई० पू० मानी जाती है | सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की थी | सिंधु सभ्यता को प्राक्ऐतिहासिक (Prohistoric) युग में रखा जाता है | इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ लोग और भूमध्यसागरीय लोग थे | सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सुतकांगेंडोर (बलूचिस्तान) और पूर्वी पुरास्थल आलमगीर ( मेरठ), उत्तरी पुरास्थल मांदा (अखनूर, जम्मू कश्मीर) और दक्षिणी पुरास्थल दाइमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में स्थित है | सिंधु सभ्यता सैंधव कालीन एक नगरीय सभ्यता थी | सिंधु सभ्‍यता से प्राप्‍त परिपक्‍व अवस्‍था वाले स्‍थलों में केवल 6 नगर को ही बड़े नगरों की संज्ञा दी गई है | ये क्रमश: मोहनजोदड़ों, हड़प्पा, गनवेरीवाल, धौलावीरा, राखीगढ़ और कालीबंगन है | हड़प्पा के सर्वाधिक स्थल गुजरात से खोजे गए थे | लोथल और सुतकोतदा दोनो सिंधु सभ्यता का बंदरगाह था | जुते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का साक्ष्य कालीबंगन से प्राप्त हुआ है | मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्नागार सैंधव सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत थी| मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है | जो 11.88 मीटर लंबा व 7 मीटर चौड़ा है | अग्निकुंड लोथल और कालीबंगा से प्राप्त हुआ हैं | मोहनजोदड़ों से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता की मूर्ति मिली है, जिसके चारो तरफ हाथी, गैंडा, चीता और भैंसा विराजमान हैं |

हड़प्पा की मोहरों में एक ऋृंगी पशु का अंकन मिला है | मोहनजोदड़ों से एक नर्तकी की कांस्य की मूर्ति मिली है | मनके बनाने के कारखाने लोथल और चन्हूदड़ों में मिले हैं | सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक है | यह लिपि दाई से बाईं ओर लिखी जाती थी | सिंधु सभ्यता के लोगों ने नगरों और घरों के विनयास की ग्रिड पद्धति अपनाई थी | दरवाजे पीछे की ओर खुलते थे, सिंधु सभ्यता की मुख्य फसलें गेहूं और जौ थी | सिंधु सभ्यता को लोग मिठास के लिए शहद का इस्तेमाल करते थे | रंगपुर और लोथल से चावल के दाने मिले हैं |जिनसे धान की खेती का प्रमाण मिलता है| सरकोतदा, कालीबंगा और लोथल से सिंधु कालीन घोड़ों के अस्थि पंजर मिले हैं |

माप तौल की इकाई 16 के अनुपात में थी| सिंधु सभ्यता के लोग यातायात के लिए बैलगाड़ी और भैंसागाड़ी का प्रयोग करते थे | मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा शब्द का अभिप्राय सिंधु सभ्यता से ही है | हड़प्पा सभ्यता का शासन व्यवस्था वणिक वर्ग को हाथों में थी | सिंधु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानते थे, धरती की पूजा करते थे | पेड़ की पूजा और शिव पूजा के सबूत भी सिंधु सभ्यता से ही मिलते हैं | स्वस्तिक चिह्न हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त हुआ है | इससे सूर्यपासना का अनुमान लगाया जा सकता है , सिंधु सभ्यता के शहरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं | सिंधु सभ्यता के लोग में मातृदेवी की उपासना करते थे | पशुओं में कूबड़ वाला सांड, इस सभ्यता को लोगों के लिए पूजनीय पशु था | स्त्री की मिट्टी की मूर्तियां मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि सैंधव सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक समाज था | सैंधव सभ्यता के लोग सूती और ऊनी दोनो प्रकार के वस्त्रों का इस्तेमाल करते थे |मनोरंजन के लिए सैंधव सभ्यता को लोग मछली पकड़ना, शिकार करना और पासा खेलते थे | कालीबंगा एक मात्र ऐसा हड़प्पाकालीन स्थल था | जिसका निचला शहर भी किले से घिरा हुआ था | सिंधु सभ्यता के लोग तलवार से परिचित नहीं थे | पर्दा-प्रथा और वैश्यवृत्ति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थीं | शवों को जलाने और गाड़ने की प्रथाएं भी प्रचलित थी | हड़प्पा के लोग में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ों के लोगो में जलाने की प्रथा थी | लोथल और कालीबंगा में काफी युग्म समाधियां भी मिली हैं | सैंधव सभ्यता के विनाश का सबसे बड़ा मुख्य कारण बाढ़ था | आग में पकी हुई मिट्टी के वर्तन को टेराकोटा कहा जाता है |

भारत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से प्रारंभ होता है | जिसे हम हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जानते हैं। यह सभ्यता लगभग 2500 ईस्वी पूर्व दक्षिण एशिया के पश्चिमी भाग मैं फैली हुई थी | जो कि वर्तमान में पाकिस्तान व अफगानिस्तान तथा पश्चिमी भारत के नाम से जाना जाता है।सिंधु घाटी सभ्यता मिस्र,मेसोपोटामिया,भारत और चीन की चार सबसे बड़ी प्राचीन नगरीय सभ्यताओं से भी अधिक उन्नत थी।1920 में, भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा किये गए सिंधु घाटी के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से हड़प्पा तथा मोहनजोदडो जैसे दो प्राचीन नगरों की खोज हुई।भारतीय पुरातत्त्व विभाग के तत्कालीन डायरेक्टर सर जनरल जॉन मार्शल ने सन 1924 ईस्वी सिंधु घाटी में एक नई सभ्यता की खोज की घोषणा की।

हड़प्पा सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल

स्थलखोजकर्त्ताअवस्थितिमहत्त्वपूर्ण खोज
हड़प्पादयाराम साहनी
(1921)
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में मोंटगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित है | मनुष्य के शरीर की बलुआ पत्थर की बनी मूर्तियाँ,अन्नागार, बैलगाड़ी
मोहनजोदड़ो
(मृतकों का टीला
राखलदास बनर्जी
(1922)
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के लरकाना जिले में सिंधु नदी के तट पर स्थित है।विशाल स्नानागर,अन्नागार,कांस्य की नर्तकी की मूर्ति,पशुपति महादेव की मुहर,दाड़ी वाले मनुष्य की पत्थर की मूर्ति,बुने हुए कपडे
सुत्कान्गेडोरस्टीन (1929)पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी राज्य बलूचिस्तान में दाश्त नदी के किनारे पर स्थित है।हड़प्पा और बेबीलोन के बीच व्यापार का केंद्र बिंदु था।
चन्हुदड़ोएन .जी. मजूमदार
(1931)
सिंधु नदी के तट पर सिंध प्रांत में।मनके बनाने की दुकानें,बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पदचिन्ह
आमरीएन .जी . मजूमदार (1935)
सिंधु नदी के तट पर।हिरन के साक्ष्य
कालीबंगनघोष
(1953)
राजस्थान में घग्गर नदी के किनारे।अग्नि वेदिकाएँ
ऊंट की हड्डियाँ
लकड़ी का हल
लोथलआर. राव (1953)गुजरात में कैम्बे की कड़ी के नजदीक भोगवा नदी के किनारे पर स्थित।मानव निर्मित बंदरगाह
गोदीवाडा
चावल की भूसी
अग्नि वेदिकाएं
शतरंज का खेल
सुरकोतदाजे.पी. जोशी
(1964)
गुजरातघोड़े की हड्डियाँ
मनके
बनावलीआर.एस. विष्ट (1974) हरियाणा के हिसार जिले में स्थित।मनके
जौ
हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा संस्कृतियों के साक्ष्य
धौलावीराआर.एस.विष्ट
(1985)
गुजरात में कच्छ के रण में स्थित।जल निकासी प्रबंधन
जल कुंड

सिंधु घाटी सभ्यता की विशेषताएं

  • सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है,ग्रिड सिस्टम के आधार पर व्यवस्थित शहर नियोजन है जो शहर को कई आयताकार ब्लॉकों में विभाजित करता है।
  • कालीबंगन नामक हड़प्पा स्थल में दो भाग शामिल हैं , पश्चिम भाग में गढ़‘ जो कि सार्वजनिक सभा के लिए इस्तेमाल किया जाता है और दूसरा निचला शहर है जो कि आवासीय क्षेत्रों में शामिल था |
  • इस सभ्यता के निर्माण में ईंटों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया है और इमारतों के निर्माण में केवल धोलावीरा में पत्थरों का उपयोग किया गया था।
  • मकान सड़कों के दोनों किनारों पर मौजूद था और इन घरों में एक तरफ प्रवेश द्वार था, जिसमें खिड़कियाँ मुख्य सड़क के सामने नहीं था
  • सभी घरों में भूमिगत जल निकासी व्यवस्था पाई है ,जो सड़कों से जुड़ी हुई थी।
  • घरों में रसोई और स्नानघर थे, जिसमें 4 से 6 कमरे थे, 30 कमरों और सीढ़ी वाले बड़े घर थे।
  • सड़कों पर स्ट्रीट लाइटिंग की व्यवस्था थी।
  • प्रारंभिक हड़प्पाई चरण ‘हाकरा चरण’ से संबंधित है‌ और जिसे घग्गर- हाकरा नदी घाटी में चिह्नित किया गया है।
  • हड़प्पा सभ्यता की लिपि का प्रथम उदाहरण लगभग 3000 ई.पू के समय का मिलता है।
  • इस चरण की विशेषताएं यह है कि एक केंद्रीय इकाई का होना तथा बढते हुए नगरीय गुण थे।
  • हड़प्पा सभ्यता में व्यापार क्षेत्र अति विकसित हो चुका था, साथ में खेती के साक्ष्य भी मिले हैं।
  • उस समय प्रमुख रूप से मटर, तिल, खजूर , रुई आदि की खेती होती थी।
  • कोटदीजी नामक स्थाल परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के चरण को प्रदर्शित करता है।
  • 2600 ई.पू. तक सिंधु घाटी सभ्यता पूरी तरह से अपनी परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर चुका था।
  • परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के आने तक प्रारंभिक हड़प्पाई सभ्यता बड़े- बड़े नगरीय केंद्रों में परिवर्तित हो चुकी थी। जैसे- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान में तथा लोथल जो कि वर्तमान में भारत के गुजरात राज्य में स्थित है।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के क्रमांक पतन का आरंभ 1800 ई.पू. से माना जाता है,1700 ई.पू. तक आते-आते हड़प्पा सभ्यता के कई शहर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे ।
  • प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के बाद की विभिन्न सभ्यताओ के संस्कृतियों में भी इसके झलक देखे जा सकते हैं।
  • कुछ पुरातात्त्विक आँकड़ों के अनुसार उत्तर हड़प्पा काल का अंतिम समय 1000 ई.पू.से 900 ई. पू. तक बताया गया है।
  • सिंधु सभ्यता की सोसायटी प्रकृति में शहरी थी और मुख्य रूप से 3 वर्गों में विभाजित थी शहर के पश्चिमी भाग में गढ़ क्षेत्र में रहने वाला एक कुलीन वर्ग, मध्यम वर्ग के निवासी अमीर व्यापारी और निचले इलाकों में रहने वाला एक अपेक्षाकृत कमजोर वर्ग मजदूर कस्बा था
  • सिंधु सभ्यता के लोग विद्वान, कारीगर, व्यापारी, योद्धा और व्यापारी थे।
  • सिंधु सभ्यता की सोसाइटी को मातृसत्तात्मक माना जाता है क्योंकि बड़ी संख्या में टेराकोटा आग से पकी हुई मिट्टी से निर्मित महिला मूर्तियाँ विभिन्न स्थलों से पाई गई हैं जो महान माँ देवी की पूजा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के पुरुषों और महिलाओं दोनों ही के ड्रेसिंग शैली भी टेराकोटा पर और पत्थर की मूर्तियों में इंगित की गई है।
  • पुरुषों को शरीर के निचले आधे हिस्से में लपेटे हुए कपड़े पहने हुए दिखाया गया है, जिसका एक सिरा बाएं कंधे पर और दाहिने हाथ के नीचे पहना जाता है।
  • सिंधु घाटी सभ्यता में वस्त्र विभिन्न सामग्रियों से निर्मित होते थे,जैसे कपास, रेशम, ऊन आदि से बनाए जाते थे।
  • मोहनजोदड़ो में बुने हुए कपड़े की मौजूदगी यह संकेत देती है कि सिन्धु सभ्यता के निवासी कताई और बुनाई से अच्छी तरह परिचित थे।

सिंधु सभ्यता की नगरीय योजना और संरचना

  • हड़प्पा सभ्यता प्रमुख रूप से नगरीय योजना प्रणाली के लिये जानी जाती है।
  • मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के नगरों में अपने अपने अलग अलग दुर्ग थे , जो नगर से कुछ ऊँचाई पर स्थित होते थे, जिसमें संभावत: उच्च वर्ग के लोग निवास करते थे ।
  • दुर्ग से नीचे भाग में ईंटों से निर्मित नगर होते थे,जिनमें सामान्य छोटे लोग लोग निवास करते थे।
  • हड़प्पा सभ्यता की विशेषता यह भी है कि इस सभ्यता में ग्रिड प्रणाली मौजूद थी जिसके अंतर्गत सडकें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं ।
  • अन्नागारो का निर्माण हड़प्पा सभ्यता के नगरों की प्रमुख विशेषता थी।
  • पकी हुई ईंटों का प्रयोग हड़प्पा सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता थी क्योंकि समकालीन मिस्र में मकानों के निर्माण के लिये कच्चे इंटों का प्रयोग होता था।
  • हड़प्पा सभ्यता में जल निकासी प्रणाली बहुत ही व्यवस्थित थी।
  • सभी छोटे और बड़े घर के अंदर स्वंय का स्नानघर और आँगन होता था।
  • कालीबंगा में स्थित ऐसे बहुत से घरों में कुएँ नही पाए जाते थे।

सिंधु घाटी सभ्‍यता की कृषि एवं पशुपालन व्यवस्था

  • सिंधु सभ्यता के लोगो का मुख्य प्रमुख व्‍यापार कपास का उत्‍पादन करने वाले प्रारंभिक लोग थे
  • गेहूं और जौ की खेती प्रमुख रूप से की जाती थी |
  • चावल भूसी के साक्ष्‍य पाए गए जिससे धान की खेती का प्रमाण मिलता है |
  • लकड़ी के खंभों का प्रयोग के साक्ष्य प्राप्त होता है
  • सिंधु सभ्यता के लोगो को लोहे के औजारों की कोई जानकारी नहीं थी
  • हड़प्पा के गाँव मुख्यतः समतल मैदानों के पास स्थित थे,जो पर्याप्त मात्रा में अनाज का उत्पादन करते थे।
  • सिंधु सभ्यता के लोग गेहूँ, जौ, सरसों, तिल, मसूर आदि का उत्पादन करतें थे। गुजरात के कुछ स्थानों से बाजरा उत्पादन के संकेत भी प्राप्त हुआ हैं,जबकि यहाँ से चावल के प्रयोग के संकेत तुलनात्मक रूप से बहुत ही कम प्राप्त हुआ हैं।
  • सिंधु सभ्यता के लोगो ने सर्वप्रथम कपास की खेती का सुरुआत की थी।
  • पूरानी कृषि परंपराओं को पुनर्निर्मित करना बहुत कठिन होता है क्योंकि कृषि की प्रधानता का मापन का पैमाना इसके अनाज उत्पादन की क्षमता के आधार पर किया जाता है।
  • मुहरों और टेराकोटा की मूर्तियों पर सांड के चित्र प्राप्त हुआ हैं तथा पुरातात्त्विक खुदाई से बैलों से जुते हुए खेत के साक्ष्य प्राप्त हुआ हैं।
  • हड़प्पा सभ्यता के अधिकतम स्थान अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों के रूप में प्राप्त होता है | जहाँ खेती के लिये सिंचाई की अति आवश्यकता होती थी।
  • नहरों के अवशेष हड़प्पा स्थल अफगानिस्तान में पाए गए हैं ,लेकिन पंजाब और सिंध में नहीं मिलता।
  • हड़प्पा सभ्यता के लोग कृषि के साथ बड़े पैमाने पर पशुपालन भी करते थे ।
  • घोड़े के साक्ष्य मूल रूप में मोहनजोदड़ो और लोथल की एक संदेहास्पद टेराकोटा की मूर्ति से मिले हैं।
  • हड़प्पाई संस्कृति किसी भी स्थिति में अश्व केंद्रित नहीं थी।
  • हड़प्पा सभ्यता में बकरी, भेंड़, बैल, भैंस और सुअर का पालन किया जाता था।
  • ऊंट और गधे का प्रयोग बोझा ढ़ोने में किया जाता था।
  • हड़प्पा लोगो को गेंडे और हाथी की जानकारी थी।
  • सुतकांगेडोर में घोड़ों के अवशेष, मोहनजोदड़ो तथा लोथल में घोड़े के साक्ष्‍य भी प्राप्‍त हुए हैं। 

सिंधु सभ्यता के लोगो की अर्थव्यवस्था स्थित कैसी थी?

  • बहुत से मिली मुहरों ,एकसमान लिपि,वजन और मापन की विधियों से सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों के जीवन में व्यापार के महत्त्व के बारे में पता चलता है।
  • हड़प्पा सभ्यता के लोग पत्थर ,धातुओं, सीप व शंख का व्यापर करते थे।
  • धातु की बनी मुद्रा का प्रयोग नहीं होता था। व्यापार की वस्तु विनिमय प्रणाली मौजूद थी।
  • सिंधु सभ्यता के लोग उत्तरी अफगानिस्तान में अपनी व्यापारिक बस्तियाँ स्थापित की थीं जहाँ से प्रमाणिक रूप से मध्य एशिया से सुगम व्यापार होता था।
  • दजला और फरात नदियों की भूमि वाले क्षेत्र से हड़प्पा वासियों के वाणिज्यिक संबंध थे।
  • हड़प्पा के लोग प्राचीन ‘लैपिस लाजुली’ मार्ग से व्यापार करते थे जो संभवतः उच्च लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि से संबधित था ।

सिंधु सभ्यता के लोगो का शिल्पकला की विशेषता

  • हड़प्पा सभ्यता के लोग कांस्य की वस्तुएँ निर्मित करने की विधि ,उसके उपयोग से भली भाँति परिचित थे।
  • तांबा राजस्थान की खेतड़ी बलुचिस्तान खान से प्राप्त किया जाता था ,और टिन को अफगानिस्तान से आयात किया जाता था ।
  • कपड़े बुनाई उद्योग में प्रयोग किये जाने वाले ठप्पे मुहरें बहुत सी वस्तुओं पर पाए जाते हैं।
  • ईंट से निर्मित संरचनाओं में राजगीरी जैसे महत्त्वपूर्ण शिल्प के साथ साथ राजमिस्त्री वर्ग व्यक्तियो के अस्तित्व का पता चलता है।
  • हड़प्पा सभ्यता के लोग नाव बनाने की विधि,मनका बनाने की विधि,मुहरें बनाने की विधि से भली- भाँति परिचित थे।
  • टेराकोटा की मूर्तियों का निर्माण हड़प्पा सभ्यता की महत्त्वपूर्ण शिल्प विशेषताओं में से एक है।
  • सुनार वर्ग सोने ,चांदी और कीमती पत्थरों से आभूषणों का निर्माण करते थे ।
  • मिट्टी के बर्तन बनाने की विधि पूर्णतः प्रचलन में थी,हड़प्पा वासियों की स्वयं की विशेष बर्तन बनाने की विधियाँ थीं, हड़प्पा सभ्यता के लोग चमकदार बर्तनों का निर्माण करते थे ।

हड़प्पा सभ्यता के लोग का राजनैतिक जीवन कैसा था ?

  • हड़प्पा सभ्यता का विकसित नगर निर्माण प्रणाली, विशाल सार्वजनिक स्नानागारों का अस्तित्व और विदेशों से व्यापारिक संबंध किसी बड़ी राजनैतिक सत्ता के बिना नहीं हुआ होगा | लेकिन इसके पुख्ता प्रमाण नहीं मिले हैं कि यहाँ के शासक कैसे थे और शासन प्रणाली का स्वरूप क्या था। लेकिन नगर व्यवस्था को देखकर अनुमान लगता है कि कोई नगर निगम जैसी स्थानीय स्वशासन वाली संस्था थी।सिंधु घाटी सभ्यता से बहुत कम मात्रा में लिखित साक्ष्य मिले हैं ,जिन्हें अभी तक पुरातत्त्वविदों तथा शोधार्थियों द्वारा पढ़ा नहीं जा सका है| सिंधु घाटी सभ्यता में राज्य और संस्थाओं की प्रकृति समझना काफी कठिनाई का कार्य है ।हड़प्पाई स्थलों पर किसी मंदिर के प्रमाण नहीं मिले हैं। इसलिए हड़प्पा सभ्यता में पुजारियों के प्रुभुत्व या विद्यमानता को नकारा जा सकता है।हड़प्पा सभ्यता संभावत: व्यापारी वर्ग द्वारा शासित थी।अगर हम हड़प्पा सभ्यता में शक्तियों के केंद्रण की बात करें तो पुरातत्त्वीय अभिलेखों द्वारा कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती है।कुछ पुरातत्त्वविदों की राय में हड़प्पा सभ्यता में कोई शासक वर्ग नहीं था तथा समाज के हर व्यक्ति को समान दर्जा प्राप्त था ।

सिंधु सभ्यता के लोगो का धार्मिक जीवन कैसा था?

हड़प्पा स्थल से पकी मिट्टी की स्त्री मूर्तिकायां भारी संख्या में मिली हैं। हड़प्पा सभ्यता के मूर्तियों में से एक मूर्ति में स्त्री के गर्भ से एक पौधा निकलता दिखाया गया है। विद्वानों के अनुसार यह पृथ्वी देवी की प्रतिमा है |इसका सम्बन्ध पौधों के जन्म और वृद्धि से रहा होगा। इससे यह मालूम होता है कि यहाँ के लोग धरती को उर्वरता की देवी समझते थे, और इसकी पूजा उसी तरह करते थे जिस तरह मिस्र के लोग नील नदी को देवी के रूप में पूजा करते थे जिसे आइसिस्  कहा जाता था। लेकिन प्राचीन मिस्र की तरह ही यहाँ का समाज भी मातृ प्रधान या मातृसत्तात्मक था। वैदिक सूत्रो में पृथ्वी माता की स्तुति है | धोलावीरा के दुर्ग से एक कुआँ मिला है | इस कुएं में नीचे की तरफ जाती सीढ़ियाँ है |उसमें एक खिड़की थी, जहाँ दीपक जलाने के सबूत मिलते है।इस कुएँ में सरस्वती नदी का पानी आता था | सिन्धु घाटी के लोग इस कुएँ के द्वारा सरस्वती की पूजा करते थे।

सिन्धु घाटी सभ्यता के नगरों में एक सील पाया जाता है |जिसमें एक योगी का चित्र अंकित है, 3 या 4 मुख वाला | विद्वान मानना है कि यह योगी शिव है। मेवाड़ जो कभी सिन्धु घाटी सभ्यता की सीमा में था | वहाँ आज भी लोग 4 मुख वाले शिव के अवतार एकलिंगनाथ जी की पूजा करते है। सिंधु घाटी सभ्यता के लोग अपने परिजन के शवों को जलाया करते थे | मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े नगरों की आबादी करीब 50 हज़ार थी | लेकिन फिर भी वहाँ से केवल 100 के आसपास ही कब्रें प्राप्त होती है | जो इस बात की और इशारा करता है कि वे शव जलाते थे। लोथल, कालीबंगा आदि जगहों पर हवन कुण्ड प्राप्त होते है|जो की उनके वैदिक होने का प्रमाण देता है। यहाँ से स्वास्तिक के चित्र भी प्राप्त हुएं है।

कुछ विद्वान मानना है कि हिन्दू धर्म द्रविड़ों का मूल धर्म था | और शिव द्रविड़ों के देवता थे | जिन्हें आर्यों ने अपना लिया। कुछ जैन और बौद्ध विद्वानों का मानना यह भी है कि सिन्धु घाटी सभ्यता से जैन या बौद्ध धर्म हुएं थे, लेकिन मुख्यधारा के इतिहासकारों ने यह बात नकार दिया और इसके अधिक प्रमाण भी नहीं मिला है।

प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया में पुरातत्वविदों को कई मन्दिरों के अवशेष प्राप्त हुए है, लेकिन सिन्धु घाटी में अभी तक कोई मन्दिर नहीं मिला | सर जान मार्शल आदि कई इतिहासकार मानते है कि सिंधु घाटी के लोग अपने घरो में, खेतो में , या नदी किनारे पूजा किया करते थे | लेकिन अभी तक केवल बृहत्स्नानागार या विशाल स्नान घर ही एक ऐसा स्मारक मिला है, जिसे पूजास्थल माना गया है। जैसे आज के समय हिन्दू धर्म के लोग गंगा में नहाने जाते है वैसे ही सैन्धव सभ्यता के लोग यहाँ नहाकर पवित्र हुआ करते थे।टेराकोटा की लघुमूर्तियों पर एक महिला का चित्र अंकित पाया गया है | इन मूर्तियों में से एक लघुमूर्ति पर महिला के गर्भ से उगते हुए पौधे को दर्शाया गया है।हड़प्पा सभ्यता के लोग पृथ्वी को उर्वरता की देवी मानते थे | और पृथ्वी की पूजा उसी देवी के रुप में करते थे | जिस प्रकार मिस्र के लोग नील नदी की पूजा देवी के रूप में करते हैं ।पुरुष देवता के रूप में मुहरों पर तीन शृंगी चित्र अंकित पाए गए हैं | जो कि योगी की मुद्रा में बैठे हुए हैं ।देवता के एक तरफ हाथी, एक तरफ बाघ, एक तरफ गैंडा तथा उनके सिंहासन के पीछे भैंसा का चित्र अंकित बनाया गया है। उनके पैरों के पास दो हिरनों के चित्र अंकित है। चित्रित भगवान की मूर्ति को पशुपतिनाथ महादेव की संज्ञा दी गई है। पत्थरों पर लिंग तथा स्त्री जनन अंगों के चित्र भी पाए गए हैं।सिंधु घाटी सभ्यता के लोग वृक्षों तथा पशुओं की पूजा करते थे।सिंधु घाटी सभ्यता में सबसे महत्त्वपूर्ण पशु एक सींग वाला गैंडा था | दूसरा महत्त्वपूर्ण पशु कूबड़ वाला सांड था। सिंधु सभ्यता से अत्यधिक मात्रा में ताबीज भी प्राप्त किये गए हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के कारणों का वर्णन

सिन्धु घाटी सभ्यता के पतन के पीछे विभिन्न तर्क दिये जाते हैं | जैसे: आक्रमण, जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिक असन्तुलन, बाढ़ और भू-तात्विक परिवर्तन, महामारी, आर्थिक आदि प्रमुख कारण थे। ऐसा लगता है कि इस सभ्यता के पतन का कोई एक प्रमुख कारण नहीं था बल्कि विभिन्न कारणों के मेल से पतन हुआ होगा। जो अलग-अलग समय में अलग अलग या एक साथ होने कि सम्भावना है।सिंधु घाटी सभ्यता का लगभग 1800 ई.पू. में पतन हो गया था | लेकिन इस सभ्यता के पतन के कारण अभी भी विवादित हैं। विद्यवानों का कहना है कि इंडो यूरोपियन जनजातियों लोग जैसे आर्यों ने सिंधु घाटी सभ्यता पर आक्रमण कर दिया तथा उसे हरा दिया होगा ।सिंधु घटी सभ्यता के बाद की संस्कृतियों में ऐसे कई उदाहरण पाए गए जिनसे यह सिद्ध होता है कि यह सभ्यता आक्रमण के कारण एकदम विलुप्त नहीं हुई होगी।दूसरी तरफ से बहुत से पुरातत्त्वविद सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण प्रकृति द्वारा भी मानते हैं।प्राकृतिक कारण भूगर्भीय और जलवायु संबंधी हो सकती हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र में अत्यधिक भू विवर्तिनिकी विक्षोभों की उत्पत्ति हुई, जिस कारण अत्यधिक मात्रा में भूकंपों की उत्पत्ति हुई होगी।एक प्राकृतिक कारण वर्षण का बदलाव भी हो सकता है।एक अन्य कारणों में यह भी हो सकता है कि नदियों द्वारा अपना मार्ग बदलने के कारण खाद्य उत्पादन क्षेत्रों में बाढ़ आ गई होगी ।इन प्राकृतिक आपदाओं को सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का मंद गति से हुआ | निकट के कारणो मे रेगिस्‍तान के विस्‍तार के कारण खारेपन में बढ़ोत्‍तरी के फलस्‍वरूप प्रजनन क्षमता में कमीभूमि के उत्‍थान में अचानक गिरावट से बाढ़ का आना | भूकंपों ने सिंधु सभ्‍यता के दौरान परिवर्तन किए होंगे हड़प्‍पा सभ्‍यता आर्यों के हमलों से नष्‍ट हो गई |

सिंधु सभ्यता से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास क्या है?

सिन्धु घाटी सभ्यता का पूर्व हड़प्पा काल करीब 3300 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व तक माना जाता है। पूरातत्वविद के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता को कम से कम 8000 साल पुरानी माना जाता है| भारत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से ही शुरू होता है |इसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से जाना जाता है।

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज कब और किसने की थी?

सिंधु सभ्यता की खोज 1921इस्वी में रायबहादुर दयाराम साहनी ने की | सिंधु सभ्यता को प्राक्ऐतिहासिक (Prohistoric) युग में रखा जाता है | रेडियो कार्बन C14 के परीक्षण द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई ०पू ० से 1750 ई ०पू० मानी जाती है|

सिंधु घाटी सभ्यता कहाँ पर है?

सिंधु घाटी सभ्यता एक कांस्य युग की सभ्यता थी | जो पाकिस्तान और भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में फैली थी। शॉर्टुगई और मुंडिगक अफगानिस्तान में स्थित सिंधु घाटी सभ्यता के एकमात्र स्थल हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता कितने वर्षों तक चली?

सिन्धु घाटी सभ्यता पूर्व हड़प्पा काल : ३३००-२५०० ईसा पूर्व, परिपक्व काल: २६००-१९०० ई॰पू॰ व‌ उत्तरार्ध हड़प्पा काल: १९००-१३०० ईसा पूर्व तक विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता है थी |

सिंधु घाटी सभ्यता के जनक कौन थे?

सर्वप्रथम 1921 ईस्वी में सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में रायबहादुर दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन किया | सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज की। इसलिए रायबहादुर दयाराम साहनी को ही जनक कहा जाता है

सिंधु घाटी सभ्यता का पहला नाम क्या है?

सिंधु सभ्यता को पहले कांस्य या हड़प्पा सभ्यता के नाम से जाना जाता है

सिंधु घाटी सभ्यता की भाषा कौन सी थी, यह एक विशेष आबादी की बुनियादी शब्दावली प्रोटो-द्रविड़ियन रही होगी | सिंधु घाटी सभ्यता में पैतृक द्रविड़ भाषाएँ बोली जाती रही होंगी।

मोहनजोदड़ो के खोजकर्ता कौन है?

मोहनजोदड़ो की खोज राखालदास बनर्जी ने 1921 ई. में की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक सर जान मार्शल के निर्देश पर खुदाई का कार्य शुरु हुआ था।

सिंधु घाटी सभ्यता को किसने नष्ट किया?

कुछ इतिहास कार विद्वानों ने सुझाव दिया कि एक खानाबदोश, इंडो-यूरोपीय जनजाति, जिसे आर्य कहा जाता है ने सिंधु घाटी सभ्यता पर आक्रमण किया और कब्जा कर लिया होगा |

सिंधु सभ्यता का अंत कैसे हुआ?

ऐसा माना जाता है कि जलवायु में परिवर्तन, मेसोपोटामिया के लोगों के साथ व्यापार में गिरावट, नदी का सूखना , बाढ़ का आना, सिंधु सभ्यता पर विदेशी आक्रमण, आदि प्रमुख कारण से सिंधु सभ्यता नष्ट हो गई|

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो कहाँ स्थित है?

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान में स्थित है व लोथल जो कि वर्तमान में भारत के गुजरात राज्य में स्थित है।

हड़प्पा नाम किसने दिया था?

सर जॉन मार्शल ने सिंधु घाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता का नाम दिया |

हड़प्पा में क्या पाया गया था?

पत्थर, शंख और धातु से बनी वस्तुएं, जिनमें तांबा, कांस्य, सोना और चांदी आदि शामिल हैं। तांबे और कांसे का उपयोग औजार, हथियार, आभूषण और बर्तन बनाने में किया जाता था।

“मोहनजोदड़ो” शब्द का अर्थ क्या है?

माउंट ऑफ द डेड या मृतकों का टीला

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