वाच्य-परिवर्तन – Vaachy-Parivartan

संस्कृत में वाक्य की क्रियाएँ तीन वाच्यों में होतीं हैं – कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य । सकर्मक धातुओं की क्रिया दो वाच्यों में – कर्तृवाच्य एवं कर्मवाच्य
में होती हैं।

कर्तृवाच्य

इसमें कर्ता में प्रथमा तथा कर्म में द्वितीया-विभक्ति होती है।

जैसेदेवदत्तः ग्रामं गच्छति ।

कर्मवाच्य


इसमें कर्म में प्रथमा तथा कर्ता में तृतीया-विभक्ति होती है। इन दोनों वाच्यों में क्रिया प्रथमान्त पद के अनुसार होती है।

जैसेदेवदत्तेन ग्रामः गम्यते । रमया ग्रन्थाः पठ्यन्ते ।

भाववाच्य

इसमें कर्ता में तृतीया विभक्ति होती है तथा क्रिया आत्मनेपदी प्रथम पुरुष एक वचन की ही होती है।

जैसेदेवदत्तेन हस्यते । शिशुना रुद्यते ।


कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य में बदलते समय प्रथमान्त कर्ता में तृतीया विभक्ति लगाना चाहिए तथा द्वितीयान्त कर्म में प्रथमा-विभक्ति होती हैं।

जैसे –
देवदत्तः ग्रामं गच्छति देवदत्तेन ग्रामः गम्यते ।
सीता ग्रन्थं पठति सीतया ग्रन्थः पठ्यते ।


कर्तृवाच्य से भाववाच्य में बदलने के लिए प्रथमान्त कर्ता में तृतीया-विभक्ति और क्रिया आत्मनेपदी लगाना चाहिए।

जैसेकर्तृवाच्य भाववाच्य
देवदत्तः हसति देवदत्तेन हस्यते ।
शिशुः रोदिति शिशुना रुद्यते ।

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