पाठ -4 वैदिक काल (1500 ई0 पू0 से 600 ई0पू0) Vaidik kal

वैदिक काल

"पशु सदैव से हमारे लिए उपयोगी रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि भारत में पशुओं को पालने की परम्परा कब से चली आ रही है ? प्रारम्भिक आर्य भी पशुपालक थे। आर्यों के रहन-सहन के तरीके तथा परम्पराओं का पालन आज भी भारतीय समाज में देखने को मिलता है।


वैदिक काल से तात्पर्य उस युग से है जिसका ज्ञान वैदिक साहित्य से होता है। वेदों से हमें आर्यों की राजनीतिक व्यवस्था, समाज, धर्म, कला इत्यादि की जानकारी मिलती है इसलिए वैदिक सभ्यता को आर्य सभ्यता भी कहते हैं। आर्य का अर्थ होता है-श्रेष्ठ या उत्तम। प्रायः यह माना जाता है कि हड़प्पा सभ्यता के अवसान के बाद वैदिक संस्कृति का विकास हुआ।

प्रारम्भिक जीवन- प्रारम्भ में आर्य इधर-उधर घूमते रहते थे। वे कबीलों में रहते थे। आर्य गाय, बैल, घोड़ा आदि पशुओं को पालते थे। चारा पानी तथा उपजाऊ भूमि की तलाश में वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते रहते थे। जहाँ चारा तथा उपजाऊ भूमि मिलती थी वे वहीं बस जाते थे। इस प्रकार आर्य समूह में आए और नए-नए स्थानों पर बसते गए। लगभग 1200 ई० पूर्व से 1000 ई०पू० तक आर्य सिन्धु, सतलज, व्यास और सरस्वती नदी के किनारे पर बस गए।

आर्य सभ्यता का प्रसार-भारत में आर्य सभ्यता का प्रारम्भ सप्त सैंधव प्रदेश से होता है। सप्त सैंधव प्रदेश में आर्य कहाँ से आए इसको लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद है। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि आर्य बाहर से आकर यहाँ बसे जबकि अनेक इतिहासकारों का कहना है आर्य मूलतः भारत के ही निवासी थे।

IMG 20240228 144658 पाठ -4 वैदिक काल (1500 ई0 पू0 से 600 ई0पू0) Vaidik kal
वेद-वेद शब्द संस्कृत भाषा के विद् शब्द से बना है इसका अर्थ होता है “जानना"। वेदों की संख्या चार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद है। ऋग्वेद में विभिन्न देवताओं को सम्बोधित प्रार्थनाएँ हैं, जिन्हें ऋचा कहा जाता है। ऋग्वेद में दस भाग हैं जिन्हें मण्डल कहते हैं। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र ऋग्वेद से लिया गया है, जिसका आज भी धार्मिक अवसरों पर उच्चारण किया जाता है। सामवेद में भारतीय संगीत के सप्तस्वर स, रे, ग, म, प, ध, नि का वर्णन है। यजुर्वेद में विभिन्न यज्ञों तथा उसे करने की विधियों का वर्णन है। अथर्ववेद में तंत्र-मंत्र, जादू-टोने का वर्णन है।

“ॐ भूर्भुवः स्वः, तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्”

'हे विश्व निर्माता, तुम्हारे पापनाशक ज्योतिपुंज से हमारा उद्धार हो। तुम्हारे आलोक स्पर्शी से हमारी बुद्धि सही दिशा में संचालित होती रहे।" (गायत्री मंत्र)


वैदिक सभ्यता को इतिहासकारों ने दो कालों में विभाजित किया है।

1. ऋग्वैदिक काल (लगभग 1500 ई० पू० से 1000 ई०पू०)

2.उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ई० पू० से 600 ई०पू०)

आर्यों के जन-

आर्य कबीलों में रहते थे। इन कबीलों का नाम मुखिया के नाम पर होता था। इन कबीलों को ‘जन’ कहा जाता था। वेदों में हमें पुरुजन, यदुजन, तुर्वशजन, भरतजन जैसे कई जनों का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में राजा को जन का स्वामी बताया गया है। उसे जनरक्षक कहा गया है।

एक जन में कई विश होते थे। इसके मुखिया को
विशपति कहा जाता था। कई ग्राम मिलकर विश बनाते थे। ग्राम के प्रमुख को ग्रामणी कहा जाता था। ग्राम कुल या गृह में विभाजित थे। कुल या गृह के मुखिया को कुलप या गृहपति कहा जाता था। उत्तर वैदिक काल में जब जन स्थायी रूप से किसी क्षेत्र में बस गए तब जन जनपद में परिवर्तित हो गए ।

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राजा

वैदिककाल में जन का प्रमुख राजा था। राजा का प्रमुख कार्य जन के लोगों की रक्षा करना था व युद्ध में सेना
का नेतृत्व करना था । प्रारम्भ में राजा का चुनाव ‘सभा’ द्वारा
किया जाता था। उत्तर वैदिक काल में राजा का पद पूर्ण वंशानुगत हो गया। राजा को व्यापक अधिकार
प्राप्त थे। राजा पर नियंत्रण रखने के लिए सभा और समिति नामक संस्थाएं थीं।

किसी समस्या को सुलझाने के लिए एक सभा
होती थी। सभा में सत्तर-अस्सी लोग बैठते थे, उनमें से पाँच-छः लोग विशेष आसन पर बैठते थें। आसन पर बैठने वाले प्रमुख लोग राजन्य होते थे। राजन्य या तो अपनी उम्र, अनुभव, शक्ति, योगदान के कारण प्रमुख थे अथवा अन्य लोगों की अपेक्षा उनके पास अधिक गाय, घोड़े व रथ होते थे। प्रमुख लोगों के अलावा बाकी लोग ‘विश’ कहलाते थे। सभा में समस्या रखी जाती थी। सभी लोग मिलकर समस्या को सुलझाते थे


सूझ-बूझ
अपने गाँव की समस्या को सुलझाने के लिए आप क्या करेंगे ?
हमारे समाज में किन लोगों की सलाह को ज्यादा महत्व दिया जाता है ? और क्यों ?

राजा का शासन- जन का खर्च चलाने के लिए राजा, जन के लोगों से उपहार प्राप्त करता था। इस उपहार को बलि कहा जाता था । बलि के रूप में राजा अनाज, घी, वस्त्र, घड़ा, आभूषण, गाय आदि प्राप्त करता था। राजा अपनी आवश्यकता के अनुसार सामान रखकर शेष जरूरत के हिसाब से लोगों में बाँट देता था। इससे राजा तथा प्रजा के मध्य रिश्ते मजबूत होते थे।

युद्ध के बाद सभा

युद्ध के बाद भी एक सभा होती थी। सभा में जन के राजा जीत में मिली गायों, घोड़ों, रथ, हथियार, आभूषण दास-दासियों को जन के कई लोगों के बीच बाँटते थे लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा राजा अपने पास रखता था, फिर राजन्यों और ब्राह्मणों को हिस्सा मिलता था। कुछ गायें, भेड़ें, बकरियाँ, अनाज आदि जन के साधारण लोगों को भी दी जाती थीं । इससे राजन्यों के पास गायें, घोड़े, हथियार, सोना, दास-दासियों की संख्या ज्यादा हो जाती थी और वे पहले से ज्यादा ताकतवर बन जाते थे।

धर्म एवं यज्ञ-

आर्य लोग देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रारम्भ में स्तुतिपाठ करते थे। बाद में यज्ञ करने लगे। यज्ञ का कार्य पुरोहित करवाते थे। यज्ञ सामूहिक हुआ करते थे जिसमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं की भी सहभागिता होती थी। यज्ञ में कार्य की सफलता के लिए भेंट व चढ़ावे के साथ-साथ देवताओं की प्रशंसा में वेद के मंत्र गाए जाते थे।
इन्द्र आर्यों के सबसे प्रिय देवता थे, जो उन्हें युद्ध में विजय दिलाते थे।

यज्ञ के समय ब्राह्मण वेद-मंत्रों का सस्वर पाठ करते हुए आग में घी डालते जाते थे। ये मंत्र संस्कृत भाषा में थे। बहुत समय तक ये मन्त्र लिखे नहीं गए। इन्हें बोल-बोलकर याद रखा जाता था और दूसरों को सिखाया जाता था। बाद में इन्हें लिख दिया गया। आज हम ऋग्वेद के मंत्रों को पढ़कर आर्यों के जीवन की कई बातों को जान सकते हैं।

वैदिककालीन समाज-

वैदिक कालीन समाज का आधार परिवार था। परिवार का वरिष्ठ पुरुष सदस्य इसका मुखिया होता था। जिसको कुलप या गृहपति कहा जाता था। आरम्भ में आर्य तीन वर्णों में विभाजित थे- राजा, पुरोहित तथा अन्य जन। यह विभाजन उनके व्यवसाय पर आधारित था परन्तु कठोर नहीं था किन्तु धीरे- धीरे जो यज्ञ करवाते थे, वे ब्राह्मण कहलाए। जो युद्ध करते थे, वे क्षत्रिय कहलाए। जो व्यापार करते थे वे वैश्यं कहे जाते थे। बाद में शूद्र नामक चौथा वर्ण भी मिलता है जिसमें युद्ध में हारे लोग शामिल किए गए। धीरे-धीरे वर्ण व्यवस्था कठोर हो गई। अब कार्य रुचि के आधार पर न होकर वंश (पिता के कार्य) के आधार पर हो गए परन्तु योग्य व्यक्ति अपनी योग्यता के बल पर कोई भी पद प्राप्त कर सकता था।

महिलाओं को उच्च स्थान प्राप्त था वे पुरुषों के समान ही शिक्षा प्राप्त करती थी। वेदों से हमें लोपा मुद्रा, घोषा, शची आदि महिलाओं के नाम प्राप्त होते हैं।
आर्यों के मकान घास-फूस तथा मिट्टी के बने होते थे। आर्य दूध तथा उससे बने पदार्थ दधि (दही), नवनीत (मक्खन), घृत (घी) का प्रयोग करते थे। अन्न में यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), ब्रीहि (चावल) का प्रयोग करते थे।

आश्रम व्यवस्था-प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को व्यवस्थित करने के लिए आर्यों ने जीवन को चार अवस्थाओं में बाँट दिया था। पहली अवस्था ब्रह्मचर्य की थी। इसमें बच्चा आश्रम में रहकर शिक्षा पाता था। दूसरी अवस्था गृहस्थ थी । यह अवस्था पारिवारिक जीवन से सम्बन्धित थी। तीसरी और चौथी अवस्थाएँ क्रमशः वानप्रस्थ और संन्यास की थीं जिसमें व्यक्ति वन में जाता था और आत्म-चिन्तन द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने की कोशिश करता था।


आर्यों की भाषा– यह कहना कठिन है कि सारे आर्य लोग एक ही नस्ल के थे। वे इण्डो-यूरोपियन परिवार की भाषा संस्कृत बोलते थे। अब भी यह अपने बदले हुए रूपों में यूरोप, ईरान व भारत में बोली जाती है। यह तथ्य इन भाषाओं के बोलने के ढंग की समानताओं पर आधारित है।

शिक्षा

विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त
करते थे। वेदों के साथ गणित, ज्यामिती, ज्योतिष, भूगोल, सैन्य विज्ञान तथा शिल्प आदि की शिक्षा दी जाती थी ।

पशु-पालन-

प्रारम्भ में आर्य पशु-पालक थे। गाय तथा बैल व्यक्ति की सम्पत्ति माने जाते थे। ये उनकी समृद्धि का प्रतीक थे। गाय का प्रयोग वस्तुओं को खरीदने में किया जाता था। गाय को पवित्र पशु माना जाता था। वेदों में इसे ‘अघन्या’ कहा गया है। पणियों (आस-पास के किसान) द्वारा गाय चुरा लेने के कारण कई बार युद्ध प्रारम्भ हो जाता था। आर्य उन्हें ‘दस्यु’ कहा करते थे।

खेती का महत्व बढ़ा-

जनसंख्या वृद्धि के कारण वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृषि पर ध्यान देने लगे। आर्य अब गंगा, यमुना के दोआब क्षेत्र में बसने लगे । इन्होंने जंगल काटकर कृषि योग्य भूमि बनाया। कृषि करने के लिए वे हल का प्रयोग करते थे। वे जो के साथ गेहूँ, धान, दाल आदि उगाने लगे ।

शिल्प-

आर्य पशुओं से सम्बन्धित व्यवसाय जैसे ऊन कातना, घोड़े से रथ बनाना, लकड़ी की वस्तुएँ बनाना, मिट्टी के बर्तन, हस्तशिल्प, धातुकर्म का काम करते थे। धातु को अयस कहते थे। ऋग्वैदिक काल में इन्हें ताँबा, काँसा का ज्ञान था । लोहे का ज्ञान उत्तर वैदिक काल में हुआ ।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी-आर्यों को सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी व नक्षत्रों की गतियों का ज्ञान था। वे ज्यामितीय आकृति से परिचित थे।


ऋग्वैदिक काल से उत्तर वैदिक काल में आए परिवर्तन-

ऋग्वैदिक कालउत्तर वैदिक काल
जीवन गतिशील थाजीवन स्थाई हो गया
राजा का पद वंशानुगत नहीं थाराजा का पद वंशानुगत हो गया
वर्ण व्यवस्था नहीं थीवर्ण व्यवस्था विकसित हो गई
पशुपालन मुख्य व्यवसाय थाकृषि मुख्य व्यवसाय बन गया

और भी जानिए

  • लोहे की खोज उत्तर- वैदिक काल में हुई ।
  • वैदिक काल से पूर्व चित्रात्मक लिपि थी। अब ध्वनि के आधार पर अक्षरों का विकास होने लगा। अक्षरों को मिलाकर शब्द और शब्दों को मिलाकर वाक्य बनने लगे थे।
  • ब्राह्मण ग्रन्थ- इनकी रचना यज्ञ के विधान तथा क्रियाओं को समझने के लिए की गई प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण ग्रन्थ हैं।
  • उपनिषद- इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। इनकी संख्या 108 है।
  • भारत का आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।

→ शब्दावली
अघन्या। – जिसका वध न किया जाए।
दोआब। – दो नदियों के बीच का उपजाऊ क्षेत्र
वंशानुगत। – पिता के बाद पुत्र को प्राप्त होने वाला अधिकार ।

अभ्यास

1.आर्यों के बारे में आप क्या जानते हैं ? लिखिए।

आर्यों ने प्रारंभ में इधर-उधर घूमते रहते थे कबीलों में रहते थे और गाय बैल घोड़ा आदि पशु को पालते थे लगभग 1200 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक आर्य सिंधु, सतलज व्यास और सरस्वती नदी के किनारे बस गए।

2.वैदिक सभ्यता को आर्य सभ्यता क्यों कहते हैं ?

वेद के द्वारा आर्यों के राजनीतिक व्यवस्था समाज धर्म कला के बारे में पता चलता है इसलिए वैदिक सभ्यता को आर्य सभ्यता कहते हैं।

3.खेती का विकास हो जाने के बाद आर्यों के जीवन में क्या परिवर्तन हुआ ?

खेती के विकास के बाद आर्य स्थाई रूप से निवास करने लगे।

4.आर्यों की सामाजिक व्यवस्था कैसी थी ?

आर्यों की सामाजिक व्यवस्था परिवार समाज का आधार था परिवार का वरिष्ठ पुरुष सदस्य इसका मुखिया होता था जिसको कुलप या गृहपति कहा जाता था।

5.वैदिक कालीन शिक्षा व्यवस्था का वर्णन कीजिए ?

विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे वेदों के साथ गणित ज्यामिति ज्योतिषी भूगोल सैन्य विज्ञान तथा शिल्प आदि की शिक्षा दी जाती थी।

6.संक्षिप्त उत्तर लिखिए-

(क) आश्रम व्यवस्था
(ख) सभा एवं समिति

(ग) आर्यावर्त
(ग) आर्यावर्त

(घ) राजा के कर्तव्य

7.रिक्त स्थानों की पूर्ति करें-

(क) प्रसिद्ध गायत्री मंत्र…ऋग्वेद….वेद में है।
(ख) सप्तस्वर स, रे, ग, म, प, ध, नि का उल्लेख..सामवेद..
में मिलता है।

(ग) आर्यों की भाषा.. संस्कृत..थी ।
(.घ)…महाभारत…..की रचना महर्षि वेदव्यास ने की है।

8.निम्नलिखित कथन में सही (V) और गलत (X) का निशान लगाइए।

(क) ब्रह्मचर्य आश्रम में बालक शिक्षा ग्रहण करता था।
(ख) लोहे की खोज उत्तर वैदिक काल में हुई ।
(ग) अथर्ववेद सबसे प्राचीन वेद है।
(घ) आर्यों की भाषा वैदिक संस्कृत थी ।


प्रोजेक्ट वर्क

आधुनिक समय के विद्यालय तथा वैदिक कालीन विद्यालय (गुरुकुल) में क्या समानताएँ तथा असमानताएँ हैं। शिक्षक की सहायता से सूची बनाइए ।


निम्नलिखित वस्तुओं से दैनिक उपयोग के क्या-क्या सामान बनाए जाते हैं।

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