वीर अभिमन्यु अध्याय-15 Veer Abhimanyu chapter -15

फुलवारी कक्षा-4 की हिंदी पाठ्य पुस्तक

यह अध्याय प्राइमरी पाठशाला कक्षा 4 की हिंदी पाठय पुस्तक फुलवारी से लिया गया है इस पाठ पढ़ेंगे वीर अभिमन्यु

महाभारत का युद्ध चल रहा था। महाराज युधिष्ठिर के लिए यह दुविधा से भरा समय था, जिसमें वह कोई निर्णय नहीं ले पा रहे थे। कौरवों के सेनापति गुरु द्रोणाचार्य ने अपने युद्ध कौशल से चक्रव्यूह की रचना की थी, जिसे तोड़ने की सामर्थ्य केवल अर्जुन में ही थी।
ऐसे समय में अभिमन्यु महाराज युधिष्ठिर के सामने पहुँचे और चरण स्पर्श कर पूछा – “आप इस तरह सोच में क्यों डूबे हैं तातश्री ! युद्ध के क्या समाचार हैं ?” “समाचार अच्छे नहीं हैं, पुत्र! लेकिन तुम क्यों चिंता करते हो ? हम लोग तो हैं ही”, युधिष्ठिर ने कहा । “मुझे भी बताइए न!” अभिमन्यु ने आग्रह किया। युधिष्ठिर बोले-“अभी तक हम कौरव सेना पर लगातार विजय प्राप्त कर रहे थे। यह तो तुम जानते ही हो कि तुम्हारे पिताश्री अर्जुन कौरव वीर संसप्तक से युद्ध करते-करते बहुत दूर निकल गए हैं। ऐसे समय में हमें पराजित करने के लिए दुर्योधन ने द्रोणाचार्य से चक्रव्यूह की रचना कराई है, जिसे भेदना केवल अर्जुन को ही ज्ञात है।

“तो इसमें चिंता की क्या बात है ?” अभिमन्यु ने पूछा ।
युधिष्ठिर ने चिंतित होते हुए कहा-“तुम नहीं जानते पुत्र कि चक्रव्यूह तोड़ना कितना कठिन है? व्यूह में सात द्वार होते हैं और हर द्वार को तोड़ने की एक विशेष विधि होती है। हममें से तुम्हारे पिताश्री के अलावा और कोई भी चक्रव्यूह को भेदना नहीं जानता है। यदि हम कल चक्रव्यूह को भेदने में असफल रहे तो हमारी हार हो जाएगी।”
“आप क्यों चिंता करते हैं? तातश्री! मुझे युद्ध में जाने की आज्ञा दें, मैं चक्रव्यूह तोड़ दूँगा, अभिमन्यु ने दृढ़ता के साथ उत्तर दिया। युधिष्ठिर के लिए यह उत्तर अप्रत्याशित था। उन्होंने आश्चर्य से पूछा-
“तुमने चक्रव्यूह भेदने की विद्या कब सीखी ?”
“तातश्री! एक बार पिता जी ने माँ से चक्रव्यूह तोड़ने का वर्णन किया था। उस समय मैं माँ के गर्भ में था और यह वर्णन सुनकर मैंने यह विद्या सीख ली लेकिन जब अंतिम द्वार तोड़ने का वर्णन आया, तभी माँ को नींद आ गई और पिता जी ने वर्णन सुनाना बंद कर दिया जिससे मैं चक्रव्यूह का अंतिम द्वार भेदने की विधि नहीं सीख सका,” अभिमन्यु ने उत्तर दिया।
“चक्रव्यूह के अंतिम द्वार को तो मैं अपनी गदा से ही तोड़ दूँगा,” भीम ने गदा घुमाते हुए गरजकर कहा। अब युधिष्ठिर के सामने धर्म-संकट था। बालक अभिमन्यु को वह युद्ध में कैसे जाने दें! अभिमन्यु ने उन्हें असमंजस में देखकर आश्वस्त किया-
“तातश्री! जब शत्रु ललकार रहा हो तो हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना कायरता है। मैं वीर पुत्र हूँ और मेरा कर्त्तव्य यही कहता है कि शत्रु की चुनौती का मुकाबला डटकर किया जाए।” अभिमन्यु का आत्मविश्वास देखकर युधिष्ठिर ने अभिमन्यु को युद्ध में जाने की आज्ञा दे दी।
युद्ध का उद्घोष हो गया था। प्रत्येक द्वार की रक्षा में एक महारथी था। चक्रव्यूह के प्रथम द्वार पर गुरु द्रोणाचार्य खड़े थे। अभिमन्यु ने उनके चरणों में बाण छोड़कर प्रणाम किया। द्रोणाचार्य अभिमन्यु को देखकर समझ गए कि पांडवों को हराना आज आसान नहीं होगा। सामने कौरव सेना का रचा चक्रव्यूह था। इधर अभिमन्यु थे। उनके पीछे भीम और दूसरे पांडव वीर थे। अभिमन्यु ने बाणों की बौछार करते हुए चक्रव्यूह का पहला द्वार तोड़ दिया। कौरव सेना के लिए यह चौंकाने वाला हमला था। भीम ने द्रोणाचार्य के रथ को उठाकर घोड़ों समेत आकाश में फेंक दिया।

चक्रव्यूह के अगले द्वार पर जयद्रथ था। जयद्रथ को लगा कि एक बालक उसके सामने युद्ध में कितनी देर टिक पाएगा लेकिन थोड़ी ही देर में जयद्रथ को लगने लगा कि इस वीर बालक को रोकना उतना आसान भी नहीं है, जितना वह समझ रहा है।
जयद्रथ को आखिरकार मुँह की खानी पड़ी। अभिमन्यु ने दूसरा द्वार भी तोड़ दिया और अगले द्वार की ओर बढ़ गए लेकिन जयद्रथ ने भीम और अन्य पांडव वीरों को आगे बढ़ने से रोक दिया। अभिमन्यु अब अकेले पड़ गए लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कौरव सेना के हाथी, घोड़े, पैदल सैनिक अभिमन्यु के बाणों के आगे गिरने लगे। अभिमन्यु के पराक्रम ने कौरव सेना के पैर उखाड़ दिए थे। कौरवों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक बालक उनकी इतनी विशाल सेना पर भारी पड़ जाएगा।
कौरव सेना में हाहाकार मच गया। दुर्योधन ने देखा कि चक्रव्यूह का अंतिम द्वार भी टूटने ही वाला है। पराजय को निकट देखकर दुर्योधन ने अनीति का सहारा लिया। दुर्योधन के कहने पर कौरव सेना के सातों महारथियों ने अभिमन्यु को चारों ओर से घेर लिया। वीर अभिमन्यु इस मुश्किल समय में भी हौसला नहीं हारे। उनका सारथी कौरव सेना का शिकार हो गया।

अभिमन्यु का धनुष भी काट दिया गया लेकिन अभिमन्यु रथ के पहिए को हथियार बनाकर सबसे मोर्चा लेते रहे। उन्होंने कौरव सेना से जूझते हुए सेनापति द्रोणाचार्य की ओर मुड़कर कहा-“गुरुवर, आपके होते हुए यह कैसी अनीति है! यह युद्ध का नियम नहीं है, जिसमें निहत्थे पर वार होता है।”
द्रोणाचार्य दुर्योधन के अधीन थे। उनके पास अभिमन्यु के प्रश्न का कोई उत्तर न था। अचानक दुःशासन के पुत्र ने पीछे से अभिमन्यु के सिर पर गदा से वार किया। अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन जीते-जी उन्होंने हार नहीं मानी। उनकी वीरता की कहानी सदैव अमर रहेगी ।

अभ्यास

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
आकाशआसमान
वीरगति युद्ध में वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारा जाना
निहत्थाजिसके हाथ में कोई अस्त्र-शस्त्र ना हो
सारथीरथ को हाँकने वाला

1-बोध प्रश्न उत्तर लिखिए-

(क) पांडवों और कौरवों का युद्ध किस नाम से प्रसिद्ध है ?

उत्तर-पांडव और कौरवों के युद्ध को महाभारत के युद्ध के नाम से जाना जाता है|

(ख) युधिष्ठिर क्यों चिंतित थे ?

उत्तर-गुरु द्रोणाचार्य ने अपने युद्ध कौशल से चक्रव्यूह की रचना की थी जिससे यह चक्रव्यूह तोड़ना अर्जुन के बस की ही बात थी इसलिए युधिष्ठिर ने सोचा अबकी बार पांडवों की पराजय हो जाएगी इसलिए युधिष्ठिर चिंतित थे |


(ग) अभिमन्यु ने गुरु द्रोणाचार्य को कैसे प्रणाम किया ?

उत्तर-चक्रव्यूह के प्रथम द्वार पर गुरु द्रोणाचार्य खड़े थे अभिमन्यु ने उनके चरणों में बाढ़ छोड़कर प्रणाम किया |


(घ) चक्रव्यूह के भीतर अभिमन्यु के साथ दूसरे पांडव वीर क्यों न जा सके?

उत्तर-जब अभिमन्यु ने चक्रव्यूह का दूसरा द्वारा तोड़कर आगे बढ़ा तो जयद्रथ ने भीम और अन्य पांडव वीरों को आगे बढ़ने से रोक दिया|

(ङ) अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदने की विधि कैसे सीखी?

उत्तर-अभिमन्यु के पिता अर्जुन अभिमन्यु की मां से चक्रव्यूह तोड़ने का वर्णन जब कर रहे थे तो अभिमन्यु अपनी मां के गर्भ में था यह वर्णन सुनकर वह चक्रव्यूह तोड़ने का विद्या सीखा|

2-किसने किससे कहा-

  • आप इस तरह सोच में क्यों डूबे है तातश्री युद्ध के क्या समाचार हैं, अभिमन्यु ने युधिष्ठिर से कहा |
  • तुम नहीं जानते पुत्र की चक्रव्यूह तोड़ना कितना कठिन है, युधिष्ठिर ने अभिमन्यु से कहा |
  • अंतिम द्वार को तो मैं अपनी गदा से ही तोड़ दूंगा, भीम ने अभिमन्यु से कहा |
  • गुरुवार आपके होते यह कैसी अनीति है, अभिमन्यु ने गुरु द्रोणाचार्य से कहा |

3-सोच विचार बताइए-

1-अभिमन्यु के जीवन से आपको क्या प्रेरणा मिलती है?

हमें भी वीर अभिमन्यु की तरह है जीवन के विपरीत परिस्थितियों में डटकर मुकाबला करना चाहिए |

2-इस युद्ध में आपके विचार से क्या गलत हुआ और क्यों ?

इस युद्ध में दुर्योधन ने अपने पराजय को देखते हुए अनीति का सहारा लिया और भी वीर अभिमन्यु के ऊपर एक साथ मिलकर सात महारथियों ने आक्रमण किया |

4-भाषा के रंग –

(क)-नीचे लिखे मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए-

बालों की बौछार करना बालों की बौछार करते हुए वीर अभिमन्यु चक्रव्यूह को तोड़ता हुआ आगे बढ़ता गया|

खलबली मचाना अकेला वीर अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ते हुए कौरव सेना में में खलबली मचा दिया |

सिर नीचा होना युद्ध में अपनाई गई अनीति से द्रोणाचार्य का सिर नीचा हो गया |

खुशी का ठिकाना न रहना युद्ध में विजय प्राप्त करते देख सेनाओ के खुशी का ठिकाना ना रहा|

(ख) नीचे लिखे गए शब्दों के समानार्थक शब्द बताइए-

शब्दसमानार्थक शब्द
कठिनजटिल
आकाशआसमान
युद्ध संघर्ष
शत्रुदुश्मन
अलावाबगैर
धरतीपृथ्वी
आज्ञाअनुमति
प्रणसंकल्प
बाणतीर
जीवप्राण
नीदनिद्रा
कहानीकिस्सा

(ग) नीचे लिखे वाक्यों में उचित विराम-चिह्नों का प्रयोग कीजिए?


अभिमन्यु ने कहा | तातश्री ! मैं भी वीर पुत्र हूँ
|


समाचार अच्छे नहीं हैं |पुत्र लेकिन तुम क्यों चिंता करते हो!
तातश्री ! मैं वीरपुत्र हूँ| शत्रु ललकारे और मैं बैठा रहूँ ! यह कैसे हो सकता है
?

(घ) पढ़िए समझिए-

समास -विग्रहसामासिक पद
वीर का पुत्र वीरपुत्र
राजा का पुत्रराजपुत्र
वीरों की गतिवीरगति
देवताओं का लोकदेवलोक
राजा और रानीराजा – रानी
रात और दिनरात – दिन
राम और लक्ष्मणराम – लक्ष्मण
अंदर और बाहरअंदर – बाहर
आप लिखिए –
समास-विग्रहसामासिक पद
गृह का स्वामीगृहस्वामी
राष्ट्र का ध्वजराष्ट्रध्वज
वन में वासवनवास
पुष्पों की वर्षापुष्पवर्षा
आगे और पीछेआगे – पीछे
ऊपर और नीचेऊपर – नीचे
माता और पितामाता – पिता
हम और तुमहम – तुम

5-आपकी कलम से-

प्रश्न संख्या 5 और 6 विद्यार्थी स्वयं करें?

7-मेरे दो प्रश्न कहानी के आधार पर सवाल बनाइए-

1-युद्ध मैं किसने अनीति का सहारा लिया|

2-चक्रव्यूह की रचना किसने की थी?

8-इस कहानी से-

(क)-मैंने सीखा जीवन के विपरीत परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए|

(ख)-मैं करूंगी/करूंगा विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला डटकर करूंगा|

यह भी जानिए –

i
युधिष्ठिर ने अभिमन्यु से कहा – “लेकिन तुम अभी बालक हो, हम तुम्हें युद्ध में कैसे भेज सकते हैं ?”


इस वाक्य में युधिष्ठिर एवं अभिमन्यु (नाम) का प्रयोग हुआ है। किसी वस्तु, व्यक्ति एवं स्थान के नाम को संज्ञा कहते हैं,

जैसे- गीता, रमेश, मोहन, मथुरा, प्रयाग, मेज, कलम” आदि ।
इसी वाक्य में अभिमन्यु (नाम) की जगह पर ‘तुम’ और ‘तुम्हें’ का प्रयोग हुआ है।

इसी प्रकार युधिष्ठिर की जगह ‘हम’ सर्वनाम शब्द का प्रयोग हुआ है। किसी नाम या संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाने वाले शब्द को सर्वनाम कहते हैं, जैसे – मैं, तुम, हम, आप, मेरा, तुम्हारा, आपका, उसका, उसे आदि

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